‘स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न’ डेटा को एक्सेस करने के लिए भारत के चुनाव आयोग की बाधाओं को तोड़ने के कुछ दिनों बाद हमने उसी अभ्यास को चार और निर्वाचन क्षेत्रों में बढ़ाया. ज्ञात हो कि ऑल्ट न्यूज़ ने खुलासा किया था कि भवानीपुर और बालीगंज में एक मुस्लिम मतदाता को हिंदू मतदाता की तुलना में ‘विचाराधीन’ के रूप में मार्क किए जाने की संभावना 3.1 गुना ज़्यादा थी.

हमने मालदह ज़िले के मानिकचक और मोथाबारी, तथा मुर्शिदाबाद ज़िले के समसेरगंज और बहरामपुर की मतदाता सूचियों को डिजिटल किया और उनका विश्लेषण किया.

वहां हमें जो मिला वो और भी चौंकाने वाला था.

मानिकचक में हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है, लेकिन ‘विचाराधीन’ रखे गए कुल मतदाताओं में से 97.4% मुस्लिम हैं.

मोथाबारी: यहां 69.5% मुस्लिम मतदाता हैं, लेकिन ‘विचाराधीन’ श्रेणी के 97.4% मतदाता मुस्लिम हैं.

समसेरगंज: यहां 82% मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि ‘विचाराधीन’ श्रेणी के 98.8% मतदाता मुस्लिम हैं.

बहरामपुर: यहां 26.9% मुस्लिम मतदाता हैं, लेकिन ‘विचाराधीन’ रखे गए मतदाताओं में 61.6% मुस्लिम हैं.

सभी 6 निर्वाचन क्षेत्रों को मिलाकर, ऑल्ट न्यूज़ ने अब तक 12,81,764 मतदाता रिकॉर्ड को डिज़िटल कर लिया है. इन निर्वाचन क्षेत्रों में ‘विचाराधीन’ रखे गए 3,02,573 मतदाताओं में से 92.6% मुस्लिम हैं, जबकि इन क्षेत्रों की संयुक्त मतदाता सूची में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 51.7% है. मुस्लिम मतदाताओं की समग्र ‘एडजुडिकेशन’ दर 42.2% है, यानी प्रत्येक 100 मुस्लिम मतदाताओं में से 42 से अधिक को विचाराधीन श्रेणी में रखा गया है. इसके विपरीत, हिंदुओं के लिए यह दर 3.5% है. यह संयुक्त अनुपात लगभग 12:1 का है.

पश्चिम बंगाल SIR 2026 के दौरान भारतीय चुनावी इतिहास में पहली बार ‘अंडर एडजुडिकेशन’ या ‘तार्किक विसंगति’ श्रेणी की शुरुआत की गई. इसे चुनाव आयोग द्वारा मतदाता रिकॉर्ड में विसंगतियों – नाम वर्तनी, पिता के नाम में भिन्नता, लिप्यंतरण अंतर – के कारण उत्पन्न एक सॉफ्टवेयर फ्लैग के रूप में वर्णित किया गया है.

यह बताया गया था कि इन ‘फ्लैग्स’ को उत्पन्न करने वाला एल्गोरिदम सभी समुदायों पर समान रूप से लागू किया गया है. अब ये डेटा एक गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है: अगर मानदंड समान रूप से लागू किए गए थे, तो उन निर्वाचन क्षेत्रों में भी जहां एक समुदाय का पूर्ण बहुमत नहीं है, विचाराधीन मतदाताओं का लगभग पूर्ण संकेंद्रण केवल उसी समुदाय से कैसे हुआ?

समसेरगंज (56)

समसेरगंज में 235592 मतदाता हैं. इसके मतदाताओं में 82% मुस्लिम हैं, जो कि 193,129 लोग हैं.

इस निर्वाचन क्षेत्र में निर्णयाधीन मतदाताओं की कुल संख्या 107,663 है. उनमें से 106,407, यानी 98.8% मुसलमान हैं.

दूसरे शब्दों में निर्वाचन क्षेत्र के सभी मुस्लिम मतदाताओं में से 55.1% को निर्णय के अधीन रखा गया था. हिंदू मतदाताओं के लिए ये आंकड़ा 2.3% है.

समसेरगंज में कुल निर्णय दर पूरे मतदाताओं का 45.7% है, जो ऑल्ट न्यूज़ द्वारा जांच की गई सभी 6 निर्वाचन क्षेत्रों में सबसे ज़्यादा है.

मोथाबारी (52)

मोथाबारी में 2,03,660 मतदाता हैं. इसके मतदाताओं में 69.5% मुस्लिम हैं, जो 141,592 लोग हैं.

इस निर्वाचन क्षेत्र में निर्णयाधीन मतदाताओं की कुल संख्या 78,797 है. उनमें से 76,781, यानी 97.4% मुसलमान हैं. 

दूसरे शब्दों में निर्वाचन क्षेत्र के सभी मुस्लिम मतदाताओं में से 54.2% को निर्णय के अंदर रखा गया था. हिंदू वोटरों के लिए ये आंकड़ा 3% है.

मोथाबारी में समग्र निर्णय दर पूरे मतदाताओं का 38.7% है.

मनिकचक (49)

जांचे गए सभी 6 निर्वाचन क्षेत्रों में से मनिकचक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र है, जहां आंकड़ों को समझाना सबसे कठिन है. यहां कुल 2,54,729 मतदाता हैं. मतदाता सूची में हिंदू 50.2% (1,27,820 मतदाता) हैं और मुस्लिम 49.4% (1,25,941 मतदाता) हैं. मतदाता पंजीकरण के मामूली अंतर को छोड़ दें, तो यह निर्वाचन क्षेत्र लगभग ठीक बीच से दो हिस्सों में बँटा हुआ है.

मानिकचक में ‘विचाराधीन’ रखे गए 65,421 मतदाताओं में से 63,689 मुस्लिम हैं और 1,524 हिंदू हैं. एक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में जहां दोनों की आबादी 50-50 के अनुपात में है, वहाँ विचाराधीन मतदाताओं में 97.4% एक ही समुदाय से हैं.

मानिकचक में मुस्लिम एडजुडिकेशन दर (कुल मुस्लिम मतदाताओं में से विचाराधीन रखे गए मुस्लिम) 50.6% है. वहीं, हिंदू एडजुडिकेशन दर मात्र 1.2% है. यह अनुपात 42.4 गुना का है. यानी, मानिकचक में एक मुस्लिम मतदाता के ‘विचाराधीन’ श्रेणी में रखे जाने की संभावना उसी निर्वाचन क्षेत्र के एक हिंदू मतदाता की तुलना में 42.4 गुना अधिक है

बहरामपुर (72)

बहरामपुर एक अलग कहानी बताता है – और ये अंतर इस बात के लिए मायने रखता है क्योंकि यह बाकी आंकड़ों को समझने का एक नया नज़रिया देता है. बहरामपुर में कुल 2,35,496 मतदाता हैं. यहां की मतदाता सूची में हिंदू 72.1% और मुस्लिम 26.9% हैं.

यहाँ समग्र ‘एडजुडिकेशन’ दर 4.7% है. विचाराधीन मतदाताओं में से 61.6% मुस्लिम हैं और 37.3% हिंदू हैं. यहां मुस्लिम एडजुडिकेशन दर 10.8% है (कुल मुस्लिम मतदाताओं में से विचाराधीन मुस्लिम), जबकि हिंदू एडजुडिकेशन दर 2.4% है. यह अनुपात 4.4 गुना का है.

बहरामपुर में भी असमानता मौजूद है और यह जांच का विषय है, लेकिन इसका पैमाना इस रिपोर्ट में शामिल अन्य तीन निर्वाचन क्षेत्रों की तुलना में काफी अलग है. बहरामपुर भी उसी SIR प्रक्रिया से गुज़रा, जिसमें उसी ERONET सॉफ्टवेयर का उपयोग किया गया और “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” (तार्किक विसंगति) के वही मानदंड अपनाए गए, जिन्हें एक ही तारीख — 28 फरवरी, 2026 — को प्रकाशित किया गया था. इस तुलना से एक सीधा सवाल उठता है: एक जैसी प्रक्रियागत परिस्थितियों के बावजूद, अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में इतने भिन्न परिणाम कैसे आए?

2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने उन 6 सीटों में से पांच पर जीत हासिल की थी, जिनका हमने अब तक विश्लेषण किया है. भाजपा की एकमात्र जीत बहरामपुर थी – ये निर्वाचन क्षेत्र भी हमारे डेटा में सबसे कम 4.7% की निर्णय दर वाला निर्वाचन क्षेत्र था.

समसेरगंज में तृणमूल ने कांग्रेस पर 26,379 वोटों से जीत हासिल की थी. SIR 2026 के तहत 1,07,663 मतदाता विचाराधीन हैं.

मोथाबारी में तृणमूल ने बीजेपी पर 56,573 वोटों से जीत हासिल की थी. SIR 2026 के तहत 78,797 मतदाता विचाराधीन हैं.

मानिकचक में तृणमूल ने बीजेपी पर 33,878 वोटों से हासिल की थी. SIR 2026 के तहत 65,421 मतदाता विचाराधीन हैं.

बहरामपुर में बीजेपी ने AITC पर 26,852 वोटों से हासिल की थी. SIR 2026 के तहत 11,088 मतदाता विचाराधीन हैं.

भबनीपुर में तृणमूल ने बीजेपी पर 28,719 वोटों से हासिल की थी. SIR 2026 के तहत 15,618 मतदाता विचाराधीन हैं.

बालीगंज में तृणमूल ने बीजेपी पर 75,359 वोटों से हासिल की थी. SIR 2026 के तहत 23,986 मतदाता विचाराधीन हैं.

हाई कोर्ट के जजों से लेकर ग्रामीण बूथों तक: SIR के मनमाने ‘फ्लैग्स’ की पहुंच

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया पर, ऐसे लोगों के डॉक्यूमेंट सामने आए हैं जिनके मतदान अधिकार SIR के तहत सस्पेंड कर दिए गए – ये वे लोग हैं जिनकी साख पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता. ऐसी अनगिनत रिपोर्टें हैं जहाँ परिवारों के कुछ सदस्यों का नाम सूची में आ गया और दूसरों का नहीं, और इस अंतर का कोई कारण नहीं बताया गया. इनमें से कुछ मामलों की नाम सहित रिपोर्ट दी गई है:

न्यायमूर्ति साहिदुल्ला मुंशी ने 2013 से 2020 के बीच कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में काम किया और वर्तमान में पश्चिम बंगाल बोर्ड ऑफ औकाफ़ के अध्यक्ष हैं. पूरक सूची में उनका नाम ”नॉट फ़ाउंड” मार्क किया गया. उनकी पत्नी और बेटों को ‘विचाराधीन’ रखा गया. उन्होंने अपने पासपोर्ट सहित सभी डॉक्यूमेंट जमा कर दिए और वेरिफ़िकेशन सुनवाई के दौरान जानबूझकर खुद को पूर्व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नहीं बताया था, वो चाहते थे कि उनके साथ एक सामान्य नागरिक के रूप में व्यवहार किया जाए. मीडिया कवरेज के बाद ही उनका नाम 27 मार्च की अनुपूरक सूची में बहाल किया गया, न कि तय प्रक्रिया के माध्यम से.

विंग कमांडर (रिटायर्ड) मोहम्मद शमीम अख्तर ने 17 सालों तक भारतीय वायु सेना की सेवा की. उनका नाम 2002 से मतदाता सूची में था. उनका नाम 23 मार्च की अनुपूरक सूची में ‘विचाराधीन’ मार्क किया गया था और फिर 28 मार्च को बिना किसी औपचारिक सुनवाई के बिना नोटिस और बिना किसी स्पष्टीकरण के पूरी तरह से हटा दिया गया था. उनके परिवार के सदस्यों के नाम सूची में बने हुए हैं. संपर्क करने पर उनके बूथ स्तर के अधिकारी ने उन्हें एक वकील नियुक्त करने और एक न्यायाधिकरण से संपर्क करने के लिए कहा.

मुर्शिदाबाद के फ़रक्का से कांग्रेस उम्मीदवार मोहताब शेख ने 28 फ़रवरी को पब्लिश अंतिम सूची में अपना नाम विचाराधीन पाया, जिससे उन्हें अपना नामांकन पत्र दाखिल करने से रोक दिया गया. उन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए मजबूर होना पड़ा. कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी एस शिवगननम की अध्यक्षता वाले एक न्यायाधिकरण ने उनकी बहाली का निर्देश दिया. ट्रिब्यूनल ने पाया कि हालांकि उनके पिता के विवरण में “डेटा इनकंसिस्टेंसी” थी, लेकिन उन्हें मतदाता सूची से बाहर करने का कोई वैध आधार नहीं था.

ये तीन डॉक्यूमेंटेड, नामित मामले हैं. राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया की रिपोर्ट्स में और भी बहुत कुछ का वर्णन किया गया है – राजपत्रित अधिकारी, पेशेवर, बुजुर्ग मतदाता जो हर सुनवाई में शामिल हुए और हर डॉक्यूमेंट जमा किया और फिर भी उनके नाम गायब पाए गए.

ऑल्ट न्यूज़ ने 29 मार्च को बंगाल के उत्तर 24 परगना ज़िले के बशीरहाट उत्तर विधानसभा क्षेत्र में बेगमपुर-बीबीपुर पंचायत क्षेत्र का दौरा किया, जहां कई गांवों में मुस्लिम मतदाताओं को सामूहिक रूप से सूची से हटा दिया गया. बोरो गोबरा गांव के बूथ 5 में फैसले के तहत रखे गए 358 ग्रामीणों में से 340 के नाम हटा दिए गए हैं. ये सभी मुसलमान हैं. कई पड़ोसी गांवों के पास बताने के लिए ऐसी ही कहानियां हैं. हमने वहां के लोगों के सदमे और लाचारी को करीब से देखा, जिनमें से कई पीढ़ियों से वहीं रह रहे हैं और हर चुनाव में मतदान करते आए हैं। फिर भी, रातों-रात उन्हें संदेह के घेरे में धकेल दिया गया है, जहाँ उनके अपने होने (belonging) के लिए ही सबूत की आवश्यकता महसूस हो रही है. इस मामले पर विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है.

डेटा जो सवाल पूछ रहा है

दोनों जांचों में ऑल्ट न्यूज़ का दृष्टिकोण स्पष्ट रहा है: हम डेटा पब्लिश करते हैं, हम वही रिपोर्ट करते हैं जो डेटा हमें दिखाता है, और हम वही सवाल पूछते हैं जो कोई भी ईमानदार विश्लेषक पूछेगा. आंकड़ों से जो पता चलता है, उसके पीछे की मंशा जानने का हम दावा नहीं करते. नीचे दिए गए सवाल सीधे डेटा से उठते हैं और चुनाव आयोग द्वारा उनका जवाब देना अभी बाकी है.

  1. ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ फ्लैग एक एल्गोरिदम द्वारा सक्रिय किया गया था। यदि ये मानदंड सभी समुदायों पर समान रूप से लागू किए गए थे, तो मनिकचक जैसे निर्वाचन क्षेत्र में, जहाँ हिंदू और मुस्लिम संख्या में बराबर हैं, विचाराधीन मतदाताओं में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 97.4% कैसे हुई? लिप्यंतरण (transliteration) या डेटा-मैचिंग का वह कौन सा विशिष्ट नियम है जो 50-50 वाले निर्वाचन क्षेत्र में ऐसा परिणाम देता है?
  1. मानिकचक से बूथ-स्तरीय डेटा कुछ बूथों में लगभग शून्य निर्णय दिखाता है, और कुछ अन्य बूथों में बहुत उच्च निर्णय दिखाता है. क्या ये तटस्थ एल्गोरिथम का अपेक्षित आउटपुट है? अगर हां, तो अंतर्निहित डेटा या एल्गोरिदम के मानदंडों की कौन सी विशेषता ये बताएगी कि एक ही निर्वाचन क्षेत्र के अंदर समुदाय द्वारा “तार्किक विसंगति” दर इतनी नाटकीय रूप से क्यों बदल जाती है?
  1. समसेरगंज में 1,06,407 मुस्लिम मतदाता, जो मुस्लिम मतदाताओं के आधे से ज़्यादा हैं, को निर्णय के अधीन रखा गया है. चुनाव कुछ दिन दूर हैं. उनकी स्थिति के समाधान के लिए सटीक समयसीमा क्या है? वे मतदान कर सकें ये सुनिश्चित करने के लिए नामित अधिकारी कौन जिम्मेदार है? और अगर वे इस चुनाव में मतदान नहीं कर सकते, तो संवैधानिक अधिकार से वंचित करने का क्या उपाय मौजूद है?
  1. विंग कमांडर (रिटायर्ड) मोहम्मद शमीम अख्तर ने 17 सालों तक भारतीय वायु सेना में सेवा की. न्यायमूर्ति साहिदुल्ला मुंशी ने सात सालों तक कलकत्ता उच्च न्यायालय में सेवा की. कांग्रेस का एक उम्मीदवार अपना नामांकन पत्र दाखिल नहीं कर सका. अगर प्रक्रिया इन मतदाताओं को उनके डॉक्यूमेंटेशन, उनके साधनों, संस्थानों तक उनकी पहुंच के साथ सही ढंग से संभाल नहीं सकी, तो ये प्रक्रिया उन लोगों के लिए कैसी हो सकती है जिनके पास इनमें से कुछ भी नहीं है?
  1. ये उचित रूप से अनुमान लगाया जा सकता है कि अंतिम अनुपूरक सूची के बाद बाहर किए गए 27 लाख मतदाताओं में से एक महत्वपूर्ण संख्या को आख़िरकार अपीलीय न्यायाधिकरण के माध्यम से बहाल किया जाएगा, जिससे प्रभावी रूप से ये स्थापित होगा कि उनका निष्कासन अनुचित था. अब, क्या ऐसी अपीलें लंबित रहते हुए, चुनाव कराना असल में स्वतंत्र और निष्पक्ष कहा जा सकता है?

डेटा सार्वजनिक है; स्वयं इसकी जाँच करें

ऑल्ट न्यूज़ ने 6 निर्वाचन क्षेत्रों के सभी 1,281,764 मतदाता रिकॉर्ड को नाम और मतदाता पहचान पत्र द्वारा खोजने योग्य बना दिया है.

भवानीपुर और बालीगंज के लिए, Sir-data-decoded.altnews.in पर जाएं.

मानिकचक, मोथाबारी, समसेरगंज और बहरामपुर के लिए, ओपनरोल पर जाएं.

इस रिपोर्ट का हर आंकड़ा डेटासेट के एक विशिष्ट रिकॉर्ड से जुड़ा है। प्रत्येक जनसांख्यिकीय वर्गीकरण का एक ‘कॉन्फिडेंस स्कोर’ है. हमारी कार्यप्रणाली — हमने कैसे 1568 PDF फाइलों को डिजिटल किया, किन उपकरणों का उपयोग किया और सटीकता की सीमाएं क्या हैं — सब कुछ प्रलेखित (documented) है.

हम खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं. ‘लोकतंत्र’ कोई ऐसा शीर्षक नहीं है जो उन लोगों के मताधिकार के निलंबन के साथ बना रह सके जो इसके लिए लड़ने में सबसे कम सक्षम हैं — भवानीपुर की वह बुजुर्ग महिला जिसके मतदाता कार्ड पर मुहर लगा दी गई है, मोथाबारी का वह किसान जो हर सुनवाई में शामिल हुआ और फिर भी उसका नाम गायब मिला, मणिकचक के वे परिवार जहाँ कुछ सदस्यों के नाम सूची में हैं और अन्यों के नहीं, और किसी को भी इसका कारण नहीं बताया गया है.

यदि इन आंकड़ों को उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया को इसे बनाने वाली संस्था (निर्वाचन आयोग) द्वारा सरल भाषा में और विशिष्ट उत्तरों के साथ स्पष्ट नहीं किया जा सकता, तो लाखों भारतीय नागरिकों के मताधिकार के उल्लंघन की ज़िम्मेदारी का प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं है. यह एक संवैधानिक प्रश्न है.

डेटा यहां है. सवाल यहां हैं. हमें जवाबों का इंतज़ार है.

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