12 मार्च 2026 की वह दोपहर श्रम अधिकार कार्यकर्ता शिव कुमार के लिए किसी भी अन्य दिन जैसी ही थी. वो दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और छात्र संगठन BSCEM से जुड़ी इलाक्किया के साथ ‘साम्राज्यवाद विरोधी सप्ताह’ की तैयारियों पर चर्चा के लिए सचिन एन. से मिलने दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली पहुंचा था. हालांकि, सचिन को देर हो रही थी, इसलिए वो दोनों कॉलेज की कैंटीन में दोपहर का भोजन कर रहे थे, इस बात से बेखबर कि उन पर पैनी नज़र रखी जा रही थी. जैसे ही वे जेएलएन मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 5 के पास से कॉलेज परिसर से बाहर निकले, उनकी दुनिया अचानक बदल गई.
शिव कुमार ने आरोप लगाया, “उन्होंने मेरा नाम पूछा और मुझे ज़बरदस्ती उठाया और मुझे एक सफ़ेद रंग की स्कॉर्पियो गाड़ी में बिठाया गया और तुरंत ज़बरदस्ती मेरा फ़ोन छीनकर उसे फ़्लाइट मोड पर डाल दिया. इतना ही नहीं, मेरे चेहरे पर पट्टी बाँध दी गई. मेरे चेहरे को नीचे की ओर, कार के फ़र्श की तरफ़ दबा दिया गया. मुझे कोई वारंट नहीं दिखाया गया और न ही मुझे हिरासत में लेने का कोई कारण बताया गया. उन अधिकारियों ने मेरे साथ-साथ इलाक्किया को भी अगवा कर लिया था.”
शिव अकेला नहीं था. शहर के अलग अलग हिस्सों से ऐसे 10 कार्यकर्ताओं को अचानक अगवा कर लिया गया था.
‘कैंपेन अगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन (CSAR)’ संगठन ने 13 मार्च को एक बयान जारी किया. उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस द्वारा 10 कार्यकर्ताओं का अपहरण कर लिया गया है. इनमें 2 श्रम अधिकार कार्यकर्ता (शिव कुमार, मनजीत), 2 विस्थापन विरोधी कार्यकर्ता (बादल, एहतमाम) और 6 छात्र (इलाक्किया, गौरव, अक्षय, रुद्र, दृष्टि, अविनाश) शामिल हैं.

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पहले तीन दिनों तक इन कार्यकर्ताओं को टॉर्चर किया. टॉर्चर में केवल नग्न करके मारा ही नहीं बल्कि यौन हिंसक कृत्यों का शिकार बनाने की कोशिश की. इतना ही नहीं, धर्म व जाति आधारित गालियां भी दी गई. फिर 14 मार्च की आधी रात (15 मार्च की सुबह) बिना पर्स, पैसे के और मोबाइल वापस दिये बगैर सुनसान सड़क पर इन्हें छोड़ दिया गया – CASR (CAMPAIGN AGAINST STATE REPRESSION)
मजदूर अधिकार संगठन के कार्यकर्ता मनजीत ने बताया कि वो 12 मार्च 2026 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, नई दिल्ली में सुरेंद्र गाडलिंग के प्रति एकजुटता दर्शाने वाली आयोजित एक जनसभा से वापस अपने गाँव लौटने की तैयारी में था. “मैंने जहाँगीर पुरी मेट्रो स्टेशन से सिंघु बॉर्डर की ओर जाने के लिए एक इको कैब ली. जैसे ही कैब करनाल बाई-पास से थोड़ी आगे चली, सिविल ड्रेस में 3 पुरुष पुलिसकर्मी और एक महिला पुलिस जो अधिकारिक वर्दी पहने हुई थी, मेरे कैब को रुकाया. उन्होंने मेरा नाम पूछकर मुझे अपनी सफ़ेद रंग की स्कॉर्पियो कार में जबरदस्ती बिठा लिया.”
मनजीत ने आरोप लगाया कि जब उसे पकड़कर न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी लाया गया तब स्पेशल सेल ने मनजीत के दोस्त अमन की तस्वीर दिखा कर उसके बारे में पूछताछ की और 14 मार्च को अमन को भी गिरफ़्तार कर लिया गया. मनजीत के अनुसार, स्पेशल सेल, अमन को न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के ऑफिस में उसी रूम लेकर आए जहां मनजीत को रखा गया था.
नज़रिया मैगज़ीन के रुद्र विक्रम ने बताया कि 13 मार्च को दिल्ली विश्वविद्यालय नार्थ कैंपस के पास विजय नगर में कुछ स्टूडेंट और कार्यकर्ता इलाक्किया और शिव कुमार के मिसिंग कंप्लेंट फ़ाइल करके हैबियस कॉर्पस फाइल करने की सोच ही रहे थे. “अचानक 7:30 बजे ख़ुद को दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल से बताते हुए कुछ लोग दरवाजे पे लात मार के घुसते हैं और सभी साथियों का फ़ोन ले लिया जाता है. सबका नाम पूछा जाता है. उनके फोटो खींचे जाते हैं फिर उसके बाद हमको जबरदस्ती अवैध रूप से उठाकर एक सफेद स्कॉर्पियो से तैमूर नगर गुरुद्वारे के पास, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की ऑफ़िस ले गए.”
दिल्ली यूनिवर्सिटी के जर्नलिज्म के छात्र और भगत सिंह छात्र एकता मंच (BSCEM) से जुड़े गौरव कुमार ने भी आरोप लगाया, “13 मार्च दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने मुझे और ‘BSCEM’ के अक्षय, दृष्टि, रुद्र, अभिनाश (किरण), ‘फोरम अगेंस्ट कॉरपोरेटाइजेशन एंड मिलिटराइजेशन (FACAM)’ से बादल और एहतमाम को मारपीट कर उठाकर न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के ऑफ़िस ले गए थे.”
पुलिसिया हिरासत और यातना के आरोप
शिव कुमार ने बताया, “मुझे कुछ भी नहीं पता था कि हमें कहाँ ले जा रहे हैं. कुछ घंटे बाद मुझे सीढ़ियों से घसीटकर एक कमरे में फेंक दिया और वो कमरा पूछताछ वाले कमरे जैसा था, कमरे में मौजूद अधिकारियों ने मुझे अश्लील भाषा में गालियाँ दी और मुझ पर शारीरिक हमला तथा मानसिक रूप से परेशान किया.”
साथ ही ये भी आरोप लगाया, “इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB), स्पेशल सेल और NIA के अधिकारी मुझसे वल्लिका वर्श्री समेत कुछ अन्य लोगों के बारे में बार-बार पूछा. जिन्हें मैं जानता ही नहीं, लेकिन पूछताछ के समय मुझे बार-बार पीटा गया और बंदूक की नोक पर ज़बरदस्ती यह झूठा बयान दर्ज करने के लिए मजबूर किया कि मैं उन व्यक्तियों को जानता हूँ और वे माओवादी पार्टी के सदस्य हैं.”
“इसके अलावा मुझे एक नोट लिखने के लिए भी मजबूर किया और मेरे हस्ताक्षर भी लिए गए. नोट में ये था कि मैं अंडरग्राउंड हो रहा हूं, मेरा नाम शिव कुमार है, मैं ‘मज़दूर अधिकार संगठन’ का सदस्य हूं और मैं दंडकारण्य के जंगलों में काम करने जा रहा हूं.”
पाठक गौर करें कि शिव कुमार को इससे पहले 2021 में सिंघु बॉर्डर पर किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान, मज़दूर अधिकारों की कार्यकर्ता नोदीप कौर के साथ गिरफ्तार किया गया था. उस दौरान, हिरासत में पीटा गया और यातनाएं दी गईं थीं. हिरासत में दी गई यातनाओं से जुड़ा ये मामला अभी भी पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में चल रहा है.
तत्कालीन पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने कहा था कि शिव कुमार को 16 जनवरी से 23 जनवरी 2021 तक गैर-कानूनी हिरासत में रखा गया था और इसके बाद गिरफ्तार दिखाया गया. इस गैर-कानूनी हिरासत के दौरान उसे बुरी तरह प्रताड़ित भी किया था.
हाई कोर्ट ने शिव कुमार के गिरफ़्तार दिखाए जाने के लगभग एक महीने बाद मेडिकल जांच के आदेश दिए थे. सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (GMCH) मेडिकल जांच रिपोर्ट सामने आने पर हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने उन्हें “बुरी तरह से मारा और यातनाएँ” दी. शरीर के कई हिस्सों में चोटें आईं, जिनमें हड्डियाँ टूटना भी शामिल है. साथ ही डॉक्टरों और विशेषज्ञों द्वारा की गई रिपोर्ट में पाया गया कि शिव कुमार को कई फ्रैक्चर, टूटे हुए नाखून, कई चोटें और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसे मनोरोग संबंधी लक्षण थे.
शिव कुमार ने अधिकारियों पर आरोप लगाया कि ख़ुद को PTSD से पीड़ित बताने के बाद भी अधिकारी मारते रहे. “वो जान से मारने की धमकी दे रहे थे और कह रहे थे, अगर उनके साथ सहयोग नहीं किया, तो गोली मार दी जाएगी.”
उसने आगे बताया, “इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी ने मेरी दाढ़ी पकड़कर ज़मीन से लगभग एक फुट ऊपर उठा दिया और उसने ज़बरदस्ती मेरी दाढ़ी के बाल नोचकर निकाल भी दिए. फिर मुझे धमकी दी कि इसी तरह मेरी पूरी दाढ़ी उखाड़ दी जाएगी.”
“इतना ही नहीं मुझे पूरी तरह नंगा कर दिया गया और मेरे गुप्तांगों पर पिस्तौल रखकर मुझे गोली मारने की धमकी दी गई. अपनी जान के खतरे के डर से, मुझे रुद्र के सामने अधिकारियों के कहे बयान दोहराने के लिए मजबूर किया गया. साथ ही मुझे रुद्र को थप्पड़ मारने के लिए भी मजबूर किया, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया.”
“इसके बाद मुझे फिर से मारना पीटना शुरू कर दिए. पूरी तरह नंगा कर मेरे गुप्तांगों पर बेल्ट से पीटा गया, तो वही इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी ने अपने जूते से दबाकर मेरा पैर भी कुचला.”
मनजीत ने आरोप लगाया कि प्रिंस कॉलोनी ऑफिस में मौजूद अधिकारियों ने मेरी दलित पहचान जानकर मेरे साथ जाति आधारित अपमानजक व्यवहार किया. मेरे कपड़े निकलवा के नग्न अवस्था में मुझे पूरे कमरे और फर्श की सफ़ाई करने के लिए मजबूर किया. इसके अलावा, मेरे साथ गंभीर यौन हिंसा भी की गई. एक अफ़सर द्वारा मुझे ज़बरदस्ती यौन कृत्य करने के मजबूर कर रहा था, इन सभी दुर्व्यवहार को कमरे में मौजूद अन्य अफ़सरों कैमरे पर रिकॉर्ड भी कर रहे थे.
दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र और भगत सिंह छात्र एकता मंच (BSCEM) के सदस्य अभिनाश ने बताया, “वहाँ मौजूद अधिकारी सभी स्टूडेंट और कार्यकर्ताओं को बंद कमरे में लेकर गए, जहाँ AC का तापमान न्यूनतम कर दिया. रूम में मौजूद बन्दूक पकड़े सिपाही जैसे दिख रहे लोगों ने ब्लैंकेट ओढ़ लिए थे और हम सभी को दीवार की तरफ़ कर के बैठाया गया था. इतना ही नहीं एक अधिकारी ने मुझे मेरे सीने में लाइटर दिखा के जला देने की धमकी दी.”
गौरव कुमार ने आरोप लगाया, “प्रिंस कॉलोनी ऑफिस के अंदर एक पूछताछ कमरा था, जहां तीन अधिकारी एक-एक कर लोगों से पूछताछ कर उन्हें मारते थे. अधिकारी बाल पकड़कर घसीटते, थप्पड़ मारते और सिर को दीवार पर दे मारते थे. मुझे एक दूसरे रूम में ले जाकर के मेटल के चेन से मेरे प्राइवेट पार्ट पर मारा गया और मेरे बाल घसीट कर लात घूसों से मारा गया.”
“फिर रात में दिल्ली स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर निशांत दहिया अपने ऑफिस में बुलाते हैं जहाँ पहले से ही रुद्र को नंगा करके बैठाये रहते हैं और ज़बरदस्ती मुझे भी नंगा कराया जाता है. मुझे मारा जाता है और रुद्र के सिर के ऊपर बैठने के लिए मजबूर किया जाता है.”
रुद्र विक्रम ने आरोप लगाया, “इंस्पेक्टर मनजीत जागलान और देवेंद्र त्यागी ने मुझसे बहुत बुरी भाषा में गाली गलौज की और रबर के पट्टे से मारा और उसके बाद मेरी आंखों में पट्टी बांध के पट्टे से मेरे हाथों पे मारा और उसी रबर के पट्टे से मेरा गला भी दबाया गया.”
“फिर मुझे अलग कमरे में ले जाकर तीन ऑफिसरों ने आकर धमकी दी कि मेरा बलात्कार करेंगे और मुझे एनकाउंटर में मार देंगे. फिर मेरे कपड़े उतारे जाते हैं और मुझे लाते घुसे मारे मारे जाते हैं और दो घंटे तक मेरा पूछताछ करते हैं.”
“दूसरी सुबह मुझे फिर दूसरे कमरे ले जाया जाता है, अविलाश नाम के ऑफिसर ने मुझे बोला कि मेरा जंगल में ले जाकर एनकाउंटर किया जाएगा क्योंकि 31 मार्च तक कीड़े मकोड़ों को खत्म करने का प्रेशर है. ऐसा बोलकर मुझे लगातार मां-बहन की गालियां दी गई और कहा गया कि मेरे पेरेंट्स को लाकर टॉर्चर करेंगे.”
“इसके बाद, बाकी सबको 14 मार्च की आधी रात (15 मार्च की सुबह) 1 बजे कुछ छोड़ दिया जाता है, लेकिन मुझे 15 मार्च की दोपहर को हैबियस कॉर्पस हियरिंग के बाद छोड़ा गया. मुझे ये बोल के वापस भेजा गया कि अगर तुम जाके बोलते हो कि तुमको आज छोड़ा है तो हम तुम्हारा एनकाउंटर कर देंगे तुमको जाके बोलना है कि पिछले दिन रात को सबके साथ सबके साथ ही छोड़ा था.”
हमें सभी कार्यकर्ताओं से बात करते हुए ये समझ में आया कि इनसे जबरदस्ती कोरे कागज़ और नोटिस में साइन कराए गए और यौन हिंसक यातनाएं दी गईं.
दूसरा वहां मौजूद सभी लोगों के मोबाइल फ़ोन, बैग, पर्स, पहचान पत्र और अन्य निजी सामान बिना कोई सीज़र मेमो जारी किए ज़बरदस्ती ज़ब्त कर लिए. 15 मार्च की सुबह को जब उन सभी को (कथित रुद्र के अलावा) रिहा किया तब उन सभी को बिना कोई साधन के मोबाइल पर्स सामान के बगैर छोड़ा गया था.

उच्च न्यायालय की कार्रवाई
14 मार्च को कथित अवैध हिरासत के संबंध में याचिका दायर कर उच्च न्यायालय को इस मामले में हस्तक्षेप करने और अदालत के समक्ष पेश और रिहाई करने का अनुरोध किया गया था.
15 मार्च 2026 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पेशल सेल के अधिकारियों द्वारा दस छात्रों और कार्यकर्ताओं की कथित अवैध हिरासत के संबंध में दिल्ली पुलिस से सवाल-जवाब पूछे.
एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति नवीन चावला और रविंदर दुदेजा की खंडपीठ ने पुलिस से हिरासत की वैधता पर जवाब मांगा.
15 मार्च को याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस और अधिवक्ता शाहरुख आलम, जसदीप ढिल्लों उपस्थित थे,
बार एंड बेंच के अनुसार, दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त स्थायी वकील संजीव भंडारी ने अदालत को बताया कि सभी आरोपियों को रिहा कर दिया गया है और उन्हें प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज होने के बाद हिरासत में लिया गया था.
संजीव भंडारी ने एफआईआर की प्रति को गोपनीय बताते हुए याचिकाकर्ता को प्रति देने से इनकार कर दिया.
16 मार्च को रुद्र विक्रम के लापता की याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पुलिस के द्वारा सभी को रिहा कर दिया गया था.
साथ ही अदालत ने पुलिस से एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने को कहा, जिसमें यह स्पष्ट करने कहा गया कि संबंधित व्यक्तियों को किस कानूनी अधिकार के तहत हिरासत में लिया गया था.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि दयाल सिंह कॉलेज, जेएलएन मेट्रो स्टेशन के साथ-साथ न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित स्पेशल सेल थाने के CCTV फुटेज को सुरक्षित रखा जाए, ताकि जरूरत पड़ने पर उन्हें अदालत में पेश किया जा सके. इस मामले की अगली सुनवाई 27 मार्च 2026 को निर्धारित की गई.
गौरव कुमार और अक्षय द्वारा दायर याचिका में पुलिस कार्रवाई को चुनौती दी गई. इस पर 23 मार्च को दिल्ली उच्च न्यायालय ने कथित गैर-कानूनी हिरासत से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया.
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि याचिकाकर्ता के निजी सामान (मोबाइल, पर्स आदि) स्पेशल सेल, न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी के पास हैं. इस पर अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता अपने अधिकृत प्रतिनिधि भेजकर अपना सामान उसी दिन प्राप्त कर सकता है और पुलिस इसे लौटाने के लिए बाध्य होगी.
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पुलिस तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करे. याचिकाकर्ता को उसके बाद जवाब पर प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल करने की अनुमति दी गई. इस मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल 2026 को तय की गई.
पीटीआई के रिपोर्ट अनुसार 27 मार्च को पुलिस ने दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित किया कि इस महीने की शुरुआत में गिरफ्तार किए गए कुछ छात्रों के साथ यातना और अवैध हिरासत के आरोप मनगढ़ंत हैं और ये माओवादी गतिविधियों से संबंधित चल रही जांच को पटरी से उतारने के लिए प्रेरित हैं.
लक्षिता राजौरा की छोटी बहन द्वारा दायर एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान लक्षिता ने आरोप लगाया था कि उसे और अन्य छात्रों को अगवा कर न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में एक अज्ञात इमारत में ले जाया गया था.
बार एंड बेंच के अनुसार, लक्षिता राजोरा की ओर से अधिवक्ता शाहरुख आलम ने उनके हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि पिछले साल जुलाई में हिरासत में लिए जाने के दौरान वह मासिक धर्म में थीं, फिर भी उन्हें दूसरे कपड़े लेने या नहाने की अनुमति नहीं दी गई थी.
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि नशे में धुत एक पुलिस अधिकारी ने उसे अपने कमरे में बुलाया, उसके हाथों को अनुचित तरीके से छुआ और उसे “दर्दनाक, यौन रंग की और इस्लाम विरोधी टिप्पणियों” का शिकार बनाया.
हलफनामे में पुलिस का कहना है कि उन्हें 8 जुलाई, 2025 को एक व्यक्ति से शिकायत मिली, जिसमें उसने बताया कि उसकी बेटी, जिसे “सुश्री वी” कहा गया है, 3 जुलाई, 2025 को दिल्ली के बेर सराय स्थित अपने घर से लापता हो गई. वह नागरिक अधिकार अभियानों में सक्रिय थी और फोन और सोशल मीडिया के माध्यम से उससे संपर्क नहीं हो पा रहा था.
शिकायत में आगे आरोप लगाया गया कि वह माओवादी या नक्सलवादी विचारधाराओं से जुड़े व्यक्तियों के संपर्क में आई हो सकती है और उसे “ब्रेनवाश्ड, कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित या अवैध रूप से हिरासत में लिया गया” हो सकता है.
पुलिस के अनुसार, शिकायतकर्ता ने रुद्र बिक्रम रॉय, एहतमाम उल हक, सम्राट, गौरव और गौरांग सहित कई व्यक्तियों और संगठनों का नाम लिया है. पुलिस का कहना है कि ये व्यक्ति भगत सिंह छात्र एकता मंच (BSCEM), फोरम अगेंस्ट कॉरपोरेटाइजेशन एंड मिलिटराइजेशन (FACAM), युवा संघर्ष मोर्चा (YSM) और नज़रिया मैगज़ीन से जुड़े हुए हैं, जो कथित तौर पर राष्ट्र-विरोधी और नक्सलवादी गतिविधियों के मंच हैं.
अगली सुनवाई के दौरा, सभी सीसीटीवी फुटेज संरक्षित करने के निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने कहा कि उन स्थानों में से दो, दयाल सिंह कॉलेज के पिछले गेट और मॉरिस नगर के सीसीटीवी कैमरे संबंधित तिथि और समय पर काम नहीं कर रहे थे.
न्यायालय ने शहर में खराब पड़े सीसीटीवी कैमरों पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा, “सीसीटीवी कैमरे लगाने का क्या उद्देश्य है, अगर हम जब भी उन्हें चालू करने के लिए कहें, वे काम ही न करें? सीसीटीवी का क्या मतलब है? क्या हमारे पास कोई खिलौना है?
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भी पुलिस के जवाब पर दो सप्ताह के भीतर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने की अनुमति दी है. मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है.
इसी तरह की अवैध हिरासत की पिछली घटनाएं और आरोप
गुरकीरत कौर, गौरव कुमार, गौरांग मोहन, FACAM के कार्यकर्ता लक्षिता राजोरा उर्फ बादल, एहतमामुल हक और प्रोफेसर सम्राट व नज़रिया मैगज़ीन के रुद्र को जुलाई 2025 में भी हिरासत में लिया गया था.
मकतूब के रिपोर्ट अनुसार जुलाई 2025 में भी न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में स्थित दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल द्वारा दिल्ली और हरियाणा के विभिन्न स्थानों से कई छात्र कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों को बिना किसी वारंट, नोटिस या कारण बताए अवैध रूप से और जबरन उठाने व उनको बिजली के झटके और पट्टियों से पिटाई तथा धर्म-जाति पहचान के आधार पर यातना देने के आरोप लगे थे.
मकतूब ने गिरफ्तार कार्यकर्ताओं में से एक, बादल से बात की. उन्होंने आरोप लगाया कि अवैध हिरासत के दौरान ना केवल मौखिक रूप से परेशान किया गया बल्कि एक नशे में धुत पुलिस अधिकारी द्वारा गलत तरीके से छूने की कोशिश भी हुई. पुरुषों को महिलाओं से ज़्यादा पीटा गया, लेकिन सभी पर हमला किया गया.
आगे बादल ने बताया, “मुझे तभी रिहा किया गया जब मेरे पिता को एक खाली कागज पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया. इसमें लिखा था कि मैं कभी दिल्ली में कदम नहीं रखूँगी, कभी राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लुंगी और कभी दिल्ली में किसी से बात नहीं करूँगी. ऐसे ही दिल्ली के बाहर रहने वाले कार्यकर्ताओं को ऐसे कागजात पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया जिसमें उन्होंने वादा किया था कि वे “दिल्ली में कदम नहीं रखेंगे”.
मकतूब को एक वकील ने बताया था कि अधिकारियों ने एहतमाम को सांप्रदायिक गालियां भी दीं और मुसलमानों के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया उन्होंने कहा, “मुसलमान सिर्फ लड़कियों को गर्भवती करना चाहते हैं ताकि वे दस बच्चे पैदा करें.” उनके परिवार को भी परेशान किया गया.
गौरव कुमार ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया, “9 जुलाई 2025 से 18 जुलाई 2025 तक अवैध हिरासत के दौरान हमें नंगा करना, पट्टों से पीटना और अपमानित करना जैसे यातनाएं दी गई थी. इसके अलावा, इंस्पेक्टर निशांत दहिया के निर्देश पर एक कांस्टेबल ने मेरा सिर एक अनफ़्लश्ड कमोड में डाल कर फ़्लस किया था.”
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने भगत सिंह छात्र एकता मंच के सदस्य गुरकीरत कौर, गौरव कुमार, गौरांग मोहन, FACAM के कार्यकर्ता लक्षिता राजोरा उर्फ बादल, एहतमामुल हक और प्रोफेसर सम्राट व नज़रिया मैगज़ीन के रुद्र पर जुलाई में हुए अवैध हिरासत और हिंसक यातना के संबंध में दिल्ली पुलिस आयुक्त श्री संजय अरोरा और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयुक्त (NHRC) को शिकायत भी किया था.
पाठक गौर करें 23 नवंबर 2025 को दिल्ली के इंडिया गेट पर प्रदूषण विरोधी प्रदर्शन के सिलसिले में 20 से ज़्यादा लोग गिरफ़्तार किए गए थे. इनमें अभिनाश, इलाक्किया, अक्षय समेत भगत सिंह छात्र एकता मंच और हिमखंड के सदस्य, वकील व पत्रकार भी शामिल थे. कथित आरोप लगाया गया था कि प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा सी-हेक्सागन के पास यातायात व्यवस्था में बाधा डाला गया था, कथित रूप से पुलिसकर्मियों पर मिर्च स्प्रे से हमला करने और मारे गए माओवादी कमांडर माडवी हिडमा के समर्थन में नारे लगाए थे.
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान अक्षय की एक तस्वीर भी वायरल हुई थी, जिसमें कुछ पुलिसकर्मियों द्वारा अक्षय को नीचे ज़मीन पर गिराकर उसे दबाते हुए देखा गया था.

द पोलिस प्रोजेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में पहली जमानत 2 दिसंबर को दी गई थी, जिसमें राजद्रोह के आरोप शामिल नहीं थे. इसके बाद 9 दिसंबर को दस प्रदर्शनकारियों और 26 दिसंबर को छह प्रदर्शनकारियों को जमानत दे दी थी. साथ ही बताया कि अदालत के आदेश में माडवी हिडमा के समर्थन में लगाए गए नारों पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई थी और सबसे आख़िर में 31 दिसंबर को अक्षय को भी रिहा कर दिया गया.
उस दौरान भी पुलिसकर्मियों पर गिरफ्तारी के बाद प्रदर्शनकारियों की बेरहमी से पिटाई और शारीरिक हमले के आरोप लगाये गए थे.
आगे रिपोर्ट में बताया गया कि जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ी, अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर पड़ता चला गया. सत्र न्यायालय में, राज्य ने स्वीकार किया कि कोई भी आरोपी प्रतिबंधित आरएसयू का सदस्य नहीं था, और न ही हिमखंड और न ही बीएससीएम प्रतिबंधित संगठन थे. राज्य ने यह भी माना कि किसी भी बंदी को सीपीआई (माओवादी) या उसके सहयोगी समूहों से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं है.
वल्लिका वर्श्री कौन हैं?
बता दें कि वल्लिका वर्श्री, 1995 बैच की आईएएस अधिकारी, वर्तमान में संयुक्त सचिव स्तर पर कार्यरत अर्चना वर्मा की पुत्री है. वो नज़रिया मैगज़ीन की सम्पादकीय टीम के रूप कार्यरत थी जो MLM की विचारधारा का अनुसरण करती है. नज़रिया मैगज़ीन मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी (MLM) विचारधारा और उनके संघर्षों को पत्रिका के रूप में प्रकाशित करता है.
सूत्रों के अनुसार, वल्लिका वर्श्री ने करीब 8 महीने पहले पत्र के ज़रिए अंडरग्राउंड होने की बाते कहते हुए अपनी माँ पर आरोप लगाया कि विचारधाराओं को लेकर झगड़े होते थे. “इसीलिए मेरे घर से भागने के बाद मेरी माँ, अपने बैचमेट और करीबी दोस्त की मदद से 9 जुलाई 2025 को नज़रिया के कुछ लोगों, FACAM और BSCEM सदस्यों को गिरफ़्तार कराई थी.”
पुलिस द्वारा हिरासत और यातना के इस पूरी घटना पर नज़रिया मैगज़ीन के रुद्र विक्रम ने कहा, “ये जो डिटेंशन हुआ है, पूरा जो इलीगल तरीके से हुआ है ये पूरा एक बोगस केस के बेसिस पे हुआ है. फोरम अगेंस्ट कॉरपोरेटाइजेशन एंड मिलिटराइजेशन जो कि अलग-अलग संगठनों का एक साझा मोर्चा है जिसने 23 से 31 मार्च तक साम्राज्यवाद विरोधी हफ्ता मनाने का कॉल दिया था, उस प्रोग्राम में बाधा डालने के लिए उनके साथियों को और हम लोगों को भी इसलिए उठाया गया था.
रुद्र विक्रम ने आगे कहा, “जिस-जिस संगठन के लोगों को उठाया गया चाहे वो मजदूर संगठन हो, छात्र संगठन हो या फिर फोरम अगेंस्ट कॉर्पोरेटाइजेशन मिलिटाइजेशन के साथी हो या फिर मेजर संगठन से हो या नजरिया मैगजीन जो एक राजनीतिक मैगजीन है, सभी वैचारिक तरीके से पॉलिटिकल इवेंट्स पे लिखते हैं, तो यह सब (गिरफ्तार और यातना देना) उसी काम को रोकने के लिए किया गया था.”
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