दशकों से सर्दियों का मौसम भारतीय मैदानी इलाकों में लोगों के दरवाजे पर कश्मीरी शॉल विक्रेताओं के आगमन इंतज़ार करता है. ये पैदल, साइकिल के ज़रिए, या नाव में बारीक रूप से तैयार किए गए शॉल की बोरियों को अन्य जगहों तक ले जाते हैं. ये कभी भी सिर्फ सेल्समैन नहीं थे. ये लोग अपने साथ कश्मीर की एक झलक भी ले आते थे – झेलम के किनारों से पश्मीना, गुलमर्ग के ऊंचे इलाकों से कालीन, ज़ैना कदल की गलियों की गूंज और एक घाटी की गर्मी जिसे कई लोग सिर्फ उनकी मौजूदगी के माध्यम से जानते थे.

परंपरागत रूप से, ज़्यादातर परिवारों के पास ‘अपना’ कश्मीरी शॉल विक्रेता होता है जो सालों के विश्वास और परिचितता से बंधा है. ये रिश्ता लेन-देन की तरह कम और किसी दूर के रिश्तेदार की वार्षिक यात्रा की तरह ज़्यादा लगता है. बोरी के खुलने से प्रत्याशा में एक शांति आ जाना, चमकीले शॉल और सर्दियों के कपड़े फैले तो आंखे चमक जाना जिससे वो पल सहसा आश्चर्य में बदल जाता था. वे प्राथमिकताओं को याद रखते थे, पसंद को समझते थे और उस सहजता से बात करते थे जो लंबे समय से परिचित होने के कारण आती है. अक्सर परिवारों को कश्मीर आने के लिए आमंत्रित करते थे और पुराने दोस्तों की तरह उनकी मेजबानी करने का वादा करते थे. कई लोगों के लिए जिन्होंने कभी घाटी में कदम नहीं रखा, ये दौरे ऐसे थे कि कैसे कश्मीर हमारे घरों में प्रवेश करता है – शॉल में लपेटा जाता है, कंधों के चारों ओर लपेटा जाता है, और धीरे से स्मृति के कपड़े में सिल दिया जाता है.

हालांकि, ये सब बदलने वाला है क्योंकि नफरत, दुश्मनी और हिंसा हमारे सार्वजनिक स्थानों और सार्वजनिक भाषणों को परिभाषित करने लगी है जहां कभी गर्मजोशी और विश्वास था, वहां अब डर की छाया पड़ रही है.

कुपवाड़ा के जहांगीर अहमद पर दिसंबर के आखिर में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के देहरा गोपीपुर शहर में एक व्यक्ति ने हमला किया था. अहमद ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया, “पिछले कुछ हफ्तों में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं पर हमले और धक्का-मुक्की की बहुत सारी घटनाएं हुई हैं. ऐसे हमलों की ख़बरें हमारे हलकों में घूम रही हैं. वे हमारे परिवारों तक भी पहुंच रहे हैं. हमारे अंदर डर की गहरी भावना पैदा हो गई है. ये हृदयविदारक है कि हम अपने ही देश में डरे हुए हैं और अपने साथी नागरिकों से भयभीत हैं. कश्मीर भारत का हिस्सा है, और हम अन्य राज्यों के लोगों की तरह ही भारतीय हैं. हमें डॉक्यूमेंट पेश करके या नारे लगाकर अपनी वफादारी साबित करने की ज़रूरत क्यों है? सर्दियों में हमारा गृहनगर बर्फ से ढका रहता है, और हमें जीविकोपार्जन के लिए दूसरे राज्यों में काम करना पड़ता है.” 

ऑल्ट न्यूज़ ने 14 दिसंबर से 1 फ़रवरी के बीच उत्तर भारतीय राज्यों में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं पर कम से कम 14 कथित हमलों का पता लगाया. जब हम पीड़ितों तक पहुंचे, तो उनकी दर्दनाक कहानियों से एक परेशान करने वाला पैटर्न सामने आया: लगभग हर मामले में विक्रेताओं को पहचान के लिए डॉक्यूमेंट दिखाने और ‘भारत माता की जय’ या ‘जय श्री राम’ का नारा लगाकर अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए कहा गया. जो लोग झिझक रहे थे, उन्हें और अधिक धक्का-मुक्की और आरोपों का सामना करना पड़ा कि वो “सच्चे भारतीय” नहीं थे. कुछ मामलों में दुश्मनी शारीरिक हिंसा में बदल गई. हर मामले में उनकी कश्मीरी मुस्लिम पहचान एक मुद्दा बन गई. चिंताजनक बात ये है कि कई मामलों में पुलिस ने पीड़ितों को औपचारिक शिकायत दर्ज न करने की सलाह दी.

विकास नगर, उत्तराखंड

इस तरह के सबसे जघन्य हमलों में से एक मामला उत्तराखंड से सामने आया. 28 जनवरी को उत्तराखंड के विकास नगर में मोहम्मद ताबिश नाम के एक 17 साल के लड़के पर बेरहमी से हमला किया गया. कथित तौर पर लोगों के एक ग्रुप ने उन पर और उनके भाई, 19 साल के मोहम्मद दानिश पर हमला किया जब उन्हें पता चला कि वे कश्मीर के मुस्लिम थे. ताबिश, जो अपनी छुट्टियों के दौरान कश्मीरी शॉल बेचने के अपने पारिवारिक व्यवसाय में अपने पिता की मदद करने के लिए कुपवाड़ा से उत्तराखंड आया था, उस पर लोहे की रॉड से हमला किया गया. उसे कई चोटें आईं, बायां हाथ टूट गया और सिर पर गंभीर चोटें आईं.

पीड़ित परिवार के मुताबिक, हमलावरों ने पहले लड़कों की पहचान की जांच करने की मांग की. जब उन्हें पता चला कि परिवार मुस्लिम है और कश्मीर से है तो वे हिंसक हो गए. 

दानिश ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया, “ये पहली बार था कि मेरा भाई, जो 17 साल का है, हमारे व्यवसाय में मदद करने के लिए हिमाचल आया था. उसे ‘कट्टमुल्ला’ कहा गया और कहा गया कि हम पहलगाम आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार थे.”

IANS के साथ एक इंटरव्यू में ताबिश ने हमले के बारे में बताया. उसने कहा कि जब वो और उसके बड़े भाई उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन शॉल और गर्म कपड़े बेच रहे थे, तो वे एक दुकान पर रुक गए और खाने की जगह की तलाश कर रहे थे. दुकानदार को कई बार बुलाने पर भी कोई जवाब नहीं मिला, उन्होंने अगली दुकान पर जाने का फैसला करते हुए एक-दूसरे से कश्मीरी में बात करना शुरू कर दिया.

जैसे ही वे जाने लगे, दुकानदार ने उन्हें वापस बुलाया और उन पर अपनी असली भाषा में मौखिक रूप से दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया. जब ताबिश और उसके भाई ने आरोपों से इनकार किया, तो दुकानदार ने टिप्पणी की, “ये उत्तराखंड है; आप यहां कश्मीरी में बात नहीं कर सकते.” इसके बाद उन्होंने ताबिश का चेहरा पकड़कर उसके साथ मारपीट की, उसे धक्का दिया और सांप्रदायिक टिप्पणियों के साथ-साथ गालियां दीं.

जवाब में जब ताबिश ने सम्मान के साथ व्यवहार करने की मांग की, तो दुकान के एक अन्य व्यक्ति ने कथित तौर पर उसके भाई का गला दबा दिया. इसके बाद, उन्होंने ताबिश को रॉड से मारना शुरू कर दिया और उसके सिर पर वार किया.

हमले के बाद, कुछ स्थानीय लोग ताबिश को पास के अस्पताल ले गए और बाद में उसे दून अस्पताल में ट्रांसफ़र कर दिया गया. 

विकास नगर पुलिस स्टेशन में धारा BNS 117(2) और 352 के तहत एक FIR दर्ज़ की गई थी. मुख्य आरोपी, संजय यादव और एक अन्य व्यक्ति को 29 जनवरी को गिरफ़्तार किया गया था.

यमुनानगर, हरियाणा

17 जनवरी को सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया जिसमें दो कश्मीरी शॉल विक्रेताओं को परेशान किया जा रहा था और उन्हें ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ बोलने के लिए मजबूर किया जा रहा था. वीडियो में एक शख्स दोनों को धमकी देते हुए दिख रहा है कि वो उनके कपड़े फाड़ देगा और दावा करेगा कि वे सच्चे भारतीय नहीं हैं.

जवाब में शॉल विक्रेता ने दावा किया कि वो एक सच्चा भारतीय है और इसमें कोई शक नहीं है. इसके बाद हेकलर मांग करता है कि कश्मीरी व्यक्ति राष्ट्र के प्रति अपना प्यार साबित करने के लिए ‘जय श्री राम’ का नारा लगाए. शॉल विक्रेता बताता है कि उसकी धार्मिक मान्यताएं अलग थीं, और इसलिए, वो उस वाक्यांश का उच्चारण नहीं कर सका जिससे हेकलर को याद दिलाया गया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. 

इस पॉइंट पर, एक अन्य व्यक्ति पहले से ही गरमागरम बातचीत में शामिल हो जाता है और सुझाव देता है कि वे अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाएं. वीडियो रिकॉर्ड करने वाला व्यक्ति इस बात से सहमत है और कहता है, “जाहिर तौर पर, हम ‘भारत की जय’ कह सकते हैं,” लेकिन हेकलर विक्रेताओं से ‘भारत माता की जय’ बोलने पर जोर देता रहा. 

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में कई घटनाएं

1 फ़रवरी, 2026 को कश्मीरी शॉल विक्रेता मोहम्मद रमज़ान को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले की नूरपुर तहसील के राजा का तालाब में सुरजीत राजपूत गुलेरिया नामक एक राईटविंग कार्यकर्ता ने कथित तौर पर परेशान किया और हमला किया. घटना के दौरान गुलेरिया ने फ़ेसबुक पर एक लाइव वीडियो बनाया जिसमें रमज़ान को बार-बार ये कहते हुए सुना जा सकता है कि वो एक भारतीय नागरिक है.

गुलेरिया ने ‘कश्मीरियों’ पर कई आरोप लगाए. कश्मीरी, सेना के जवानों से कहते हैं कि उनमें से एक होकर भारत छोड़ दें. जवाब में रमज़ान कहता है, “नहीं, हम ऐसा नहीं करते हैं. सैनिक हमारी रक्षा के लिए हैं; वे हमारे भाइयों की तरह हैं.” वो गुलेरिया को समझाने की कोशिश करता है कि वो गरीब कश्मीरी विक्रेताओं को परेशान कर रहा है. वो ये भी बताते हैं कि कश्मीर में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव और भाईचारे की भावना है. 

गुलेरिया ने रमज़ान पर कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार करने का आरोप लगाया और दावा किया कि रमज़ान शायद अपने बैग में शॉल की जगह एके-47 बंदूकें रखता है. वो रमज़ान को पहचान पत्र दिखाने के लिए भी मजबूर करता है.

ऑल्ट न्यूज़ से बात करते हुए रमज़ान ने एक चौंकाने वाला दावा किया. उसने कहा कि तीन-चार साल पहले भी इसी व्यक्ति ने उनके साथ धक्का-मुक्की की थी. वर्तमान मामले में फ़ेसबुक पर लाइव होने से पहले, गुलेरिया ने उसके साथ शारीरिक उत्पीड़न किया. शिकायत दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन में इंतजार करते समय रमज़ान ने ऑल्ट न्यूज़ को ये बताया. 

रमज़ान ने कहा, “अन्य स्थानीय निवासियों और दुकानदारों की मौजूदगी के बावजूद, कोई भी मेरा समर्थन करने नहीं आया या गुलेरिया से हमें परेशान करना बंद करने के लिए नहीं कहा. हमारे बीच लगातार डर का माहौल है. किसी भी समय हमारे साथ कुछ भी हो सकता है.”

उसने ये भी कहा कि उत्पीड़न और धमकी ने व्यवसाय पर नकारात्मक प्रभाव डाला है. ऑल्ट न्यूज़ से बात करते समय, रमज़ान पुलिस स्टेशन में गुलेरिया के खिलाफ शिकायत दर्ज़ कराने के लिए इंतज़ार कर रहा था. बाद में रमज़ान ने हमें बताया कि पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है. पुलिस गुलेरिया को लेकर आई और उसे रिहा करने से पहले माफी मांगने को कहा.

पिछले एक महीने में ये एकमात्र मौका नहीं है जब गुलेरिया ने कथित तौर पर किसी कश्मीरी शॉल विक्रेता को परेशान किया हो.

एक अलग घटना में, 15 जनवरी, 2026 को गुलेरिया ने फ़ेसबुक पर एक लाइव वीडियो पोस्ट किया जिसमें अयूब नाम का एक कश्मीरी शॉल विक्रेता था. वीडियो में अयूब को गुलेरिया ने परेशान किया और धमकाया है जो कश्मीर में 13 साल की सेवा के साथ एक सैन्यकर्मी होने का दावा करता है. उन्होंने अयूब पर पथराव करने और खुद को राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जोड़ने, कश्मीरी समुदाय के बारे में व्यापक सामान्यीकरण करने का आरोप लगाया.

गुलेरिया वीडियो में कहता है कि वो देश को अयूब के विचार बताने के लिए शॉल बेचने वाले का इंटरव्यू ले रहे हैं. उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि अयूब ‘लव जिहाद’ में शामिल था. हालांकि, उन्होंने ज़्यादा जानकारी नहीं दी. वीडियो में गुलेरिया अयूब को डराते हुए भी नजर आता है.

एक और घटना में, जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले के एक शॉल विक्रेता नसीर अहमद को 14 दिसंबर, 2025 को कांगड़ा में रवि बरसैन नाम के एक व्यक्ति ने कैमरे पर परेशान किया.

घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर शिवम दीक्षित नाम के एक यूज़र ने पोस्ट किया था जो RSS पत्रिका पांचजन्य का पत्रकार होने का दावा करता है.

 

अहमद से पूछताछ करने वाला व्यक्ति उससे उसका नाम, धर्म और गृह राज्य के बारे में पूछता है. “आप मुस्लिम हैं?” वो कहता है. अहमद जवाब देता है, “हां, मैं हूं.” इसके बाद रवि बरसैन ने भारत के प्रति अहमद की भावनाओं के बारे में पूछा, जिस पर अहमद ने जवाब दिया, “ये हमारा देश है.” रवि बरसैन ने और दबाव डालते हुए पूछा, “हमारा या सिर्फ आपका?” अहमद फिर कहते हैं, “ये हमारा देश है. ये हम सबका है.” 

इसके बाद रवि बरसैन मांग करता है कि अहमद ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाए. अहमद ने साफ़ तौर पर मना कर दिया और बताया कि उसका धर्म उसे ऐसा करने की इजाज़त नहीं देता है. रवि बरसैन लगातार उसे घेरते रहे और सवाल करते रहे कि अगर ये उनका देश है तो ‘भारत माता की जय’ बोलने में दिक्कत क्यों है. 

अहमद ने दोहराया कि वो अपने देश से प्यार करते हैं, लेकिन ‘भारत माता की जय’ नहीं बोल सकते. रवि बरसैन ने अहमद को चेतावनी देते हुए जवाब दिया कि वो वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड करेगा, और सभी को ये देखने को मिलेगा कि अहमद ये नारा नहीं लगाना चाहता था. इस पॉइंट पर, अहमद एक तरफ हट जाता है, अपना बैग फ़र्श पर रखता है, और दृढ़ता से कहता है कि वो ‘भारत माता की जय’ या ‘भारत की जय’ सिर्फ इसलिए नहीं बोलेगा क्योंकि कोई उसके साथ जबरदस्ती कर रहा है. वो इस बात पर जोर देता है कि उनका धर्म इस पर रोक लगाता है और कहते हैं कि भारतीय कानून उन्हें अपनी पसंद चुनने का अधिकार देता है.

नासिर अहमद ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि वो हर साल अक्टूबर से अप्रैल तक सर्दियों के महीनों के दौरान कांगड़ा जाता था. उसने कहा, “मैं इस क्षेत्र में नौ साल से ज़्यादा समय से शॉल और गर्म कपड़े बेच रहा हूं. मैंने पहले कभी इस तरह के अपमान का अनुभव नहीं किया है. वीडियो फ़िल्माने से पहले, उस व्यक्ति ने बिना कोई भुगतान किए मुझसे जबरदस्ती दो हुडी जैकेट ले ली.”

ये पूछे जाने पर कि क्या वो अपमान के बाद डरा हुआ था, कांगड़ा में एक ग्राहक के घर पर रह रहे अहमद ने कहा, “मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है, इसलिए मैं किसी से नहीं डरता.” उसने ये भी उल्लेख किया कि घटना के बाद पुलिस रवि बरसैन को उसके पास ले आई और उसने माफी मांगी. इस प्रकार औपचारिक शिकायत दर्ज किए बिना ही मामला ‘सुलझा’ लिया गया.

ज़िला से सामने आई चौथी घटना में कश्मीर के कुपवाड़ा में नियंत्रण रेखा पर एक गांव के निवासी जहांगीर अहमद पर दिसंबर के आखिर में देहरा गोपीपुर शहर में एक व्यक्ति ने शारीरिक हमला किया था जब वो शॉल बेचने की कोशिश कर रहा था. 

ऑल्ट न्यूज़ के साथ बातचीत में जहांगीर अहमद ने घटना का ज़िक्र करते हुए कहा कि वो सड़कों पर ठेला लगा रहा था, तभी एक आदमी ने उसके साथ विवाद शुरू कर दी. अहमद ने कहा, “मुझे वो जगह छोड़ने के लिए कहा गया क्योंकि बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार किया जा रहा था. उस व्यक्ति ने मांग की कि मैं अपनी देशभक्ति और देश के प्रति प्रेम साबित करने के लिए ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाऊं.”

उन्होंने कहा, “मैंने उनसे कहा कि मैं एक भारतीय हूं और बांग्लादेश से मेरा कोई संबंध नहीं है. लेकिन उन्होंने मेरे साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया और मुझे पीटा.”

पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराने के बारे में पूछे जाने पर अहमद ने कहा, “पुलिस ने मुझसे कहा कि मैं वहां से बहुत दूर रहता हूं और इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए कश्मीर से यात्रा करनी होगी. ये बहुत मुश्किल होगा.”

उन्होंने कहा, “वो आदमी मेरे पास आया और माफी मांगी और मैंने उसे माफ कर दिया.”

31 जनवरी को कांगड़ा ज़िले में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं को कथित तौर पर डराने-धमकाने और परेशान करने की एक और घटना सामने आई थी. सुनील सिंह और अनिल कटोच नाम के दो व्यक्तियों ने एक लाइव वीडियो रिकॉर्ड किया था जिसमें उन्होंने तीन कश्मीरी शॉल विक्रेताओं से पूछताछ की और उनसे अपनी पहचान साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट दिखाने की मांग की. लाइव वीडियो के कैप्शन में सुनील सिंह ने लिखा, “मैं इस वीडियो को देखने वाले सभी लोगों से आग्रह करता हूं कि वे जांच लें कि क्या ‘ऐसे लोगों’ को आपके गांव में प्रवेश करने की अनुमति है. अगर उनके पास अनुमति है तो उन्हें अंदर आने दें, लेकिन अगर उनके पास अनुमति नहीं है तो उन्हें यहां रहने न दें.”

उधम सिंह नगर, उत्तराखंड

22 दिसंबर, 2025 को बजरंग दल के सदस्य अंकुर प्रताप सिंह ने उत्तराखंड के उधम सिंह नगर ज़िले के काशीपुर शहर में एक कश्मीरी शॉल विक्रेता, बिलाल अहमद के साथ कथित तौर पर मारपीट की और धमकी दी. उधम सिंह को बाद में गिरफ़्तार कर लिया गया और फिलहाल वो जमानत पर बाहर हैं.  

घटना का एक वीडियो जिसे उधम सिंह ने खुद इंस्टाग्राम पर शेयर किया था और बाद में हटा दिया गया था, उसमें वो अहमद को ‘भारत माता की जय’ बोलने के लिए मजबूर करते दिख रहे हैं जिस पर अहमद कहता है, ‘भारत की जय!’ सिंह ने उस पर ‘भारत माता की जय’ बोलने का दबाव डाला. उधम सिंह और उनके अन्य सहयोगियों को अहमद को मौखिक रूप से गाली देते और डराते हुए देखा जाता है जब तक कि उसे ‘भारत माता की जय’ नहीं कहना पड़ता. 

“आप किस देश में रहते हैं? क्या आप पाकिस्तान से हैं? इन कमीनों को देखिए. ये कश्मीर में रहते हैं. देखिए उन्होंने बांग्लादेश में क्या किया है,” वो कैमरे पे कहता है, और अहमद की कलाई मरोड़ता है और गालियों, थप्पड़ों और लातों की झड़ी लगा देता है जिससे अहमद पूरी तरह हिल जाता है. 

वीडियो में अपराधी को अहमद को जमीन पर गिराते हुए दिखाया गया है, जबकि कुछ अन्य लोग भी हमले में शामिल हो गए. “तुम वही खाते हो जो भारत तुम्हें देता है. तुम भारत में व्यापार करते हो और यहीं कमाते हो, लेकिन तुम ‘भारत माता की जय’ नहीं कहोगे?”

इंस्टाग्राम पर उधम सिंह का यूज़र नाम ‘@ankursinghbajrangdal‘ है. टाइमलाइन ऐसे वीडियो से भरी हुई है जहां उन्हें अलग-अलग प्रकार की सतर्कता में शामिल देखा जाता है, चाहे वो गायों की रक्षा करना हो या ‘लव जिहाद’ को रोकना. उदाहरण यहां, यहां और यहां देखे जा सकते हैं.     

अहमद पर हमले का जो वीडियो उन्होंने इंस्टाग्राम पर शेयर किया था, उसमें हिंदी में लिखा था: “एक कश्मीरी जिहादी। भारत में रहने और व्यापार करने के बाद भी, वो ‘भारत माता की जय’ नहीं बोलना चाहता था! लेकिन अब उसका ‘इलाज’ किया गया है और उससे ‘भारत माता की जय’ बुलवाया गया है.”

जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन द्वारा उत्तराखंड के DGP के सामने मुद्दा उठाने के बाद अंकुर सिंह और चार अन्य के खिलाफ FIR दर्ज़ की गई थी जिनमें से सभी बजरंग दल के सदस्य थे. 

ऑल्ट न्यूज़ से बात करते हुए, अंकुर सिंह ने ये दावा करके अपने कार्यों को सही ठहराने की कोशिश की कि बिलाल अहमद बांग्लादेश में सांप्रदायिक हेट क्राइम और दीपू चंद्र दास की हत्या के समर्थन में बोल रहे थे. उन्होंने कहा, “इसलिए हम चाहते थे कि वो ‘भारत माता की जय’ कहें. मैंने उन पर हमला करके ग़लती की. लेकिन अगर मुझे कहीं गौहत्या होने के बारे में पता चला और पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तो मैं चीजों को अपने हाथों में ले लूंगा.”  

कैथल, हरियाणा

23 दिसंबर को, कश्मीर के एक शॉल विक्रेता मोहम्मद राशिद इरफ़ान को हरियाणा के कैथल ज़िले के कलायत इलाके में सिर्फ कश्मीरी मुस्लिम होने के कारण परेशान किया गया, दुर्व्यवहार किया गया और हमला किया गया.

सोशल मीडिया पर उपलब्ध घटना के फ़ुटेज में एक व्यक्ति हरियाणवी बोली में इरफ़ान का सामना करते हुए और उनसे ‘वंदे मातरम’ बोलने की मांग करते हुए दिखाई दे रहा है. वो इरफान से कहते हैं, भारतीयों के लिए ऐसा करना जरूरी है. जब इमरान चुप रहते हैं तो  वो शख्स उन्हें बांग्लादेश में दीपू चंद्र दास की पीट-पीटकर हत्या की घटना का ज़िक्र करके धमकाता है. इरफान ने पलटवार करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं बांग्लादेश में हो सकती हैं, लेकिन ये इंडिया है और कश्मीर इंडिया का हिस्सा है. इसके बाद वो शख्स उस पर देश को इंडिया की जगह भारत कहने का दबाव डालता है.

इरफान ने समझाने की कोशिश की कि उनका धर्म ‘भारत माता की जय’ कहने की इजाजत नहीं देता है. उत्पीड़क का दावा है कि ये हिंदुओं की हत्या की अनुमति देता है. “नहीं, ऐसा नहीं है,” इरफ़ान जवाब देता है. लेकिन अब गुस्से में ये मांग किया जाता है कि कश्मीरी शॉल विक्रेता अपने सभी सामान और सहयोगियों के साथ चला जाए, वो उनकी संपत्ति को जलाने की धमकी देता है और यहां तक ​​कि घोषणा भी करता है कि वो मुसलमानों को जला देगा.

ऑल्ट न्यूज़ से बातचीत में इरफ़ान ने कहा कि वो पिछले 10 सालों से उन इलाकों में शॉल बेच रहे और उन्हें पहले कभी ऐसी नफरत महसूस नहीं हुई थी. इरफ़ान ने कहा, “उसने मेरे साथ दुर्व्यवहार किया, मुझे प्रताड़ित किया और ये सुनिश्चित किया कि मैं इलाका छोड़ दूं. मैंने ऐसा अपमान कभी महसूस नहीं किया. इससे मेरा दिल टूट गया.”

उन्होंने कहा, “मैंने हमले के बाद इलाके का दौरा किया है क्योंकि मेरे वहां ग्राहक हैं. उसके बाद मेरा उस आदमी से सामना नहीं हुआ है, लेकिन मेरे अंदर एक डर बना हुआ है.”

न्यूज़ रिपोर्ट्स में कैथल के SP उपासना यादव के हवाले से कहा गया है कि पुलिस ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया और तुरंत मामला दर्ज किया. ऑल्ट न्यूज़ ने कलायत पुलिस से संपर्क किया और एक अधिकारी ने हमें बताया कि अभी तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है और जांच अभी भी जारी है. हमें बताया गया कि अपराधी का अभी तक पता नहीं लगाया जा सका है और उसे गिरफ़्तार नहीं किया जा सका है. 

इरफ़ान ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि जिस व्यक्ति ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और धक्का-मुक्की की, उन्होंने एक अन्य शॉल विक्रेता गुलाम नबी तागा के साथ भी ऐसा ही किया.

जब ऑल्ट न्यूज़ ने गुलाम नबी तागा से बात की, तो उन्होंने 24 दिसंबर को हुआ एक चौंकाने वाला अनुभव हमारे साथ साझा किया. कथित तौर पर एक व्यक्ति उनके पास आया और उन्हें ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ बोलने के लिए मजबूर किया. उन्होंने कहा कि उन्हें आग लगा देने की धमकी भी दी गई. चूंकि घटना का कोई वीडियो सबूत नहीं था, इसलिए इस पर किसी का ध्यान नहीं गया. ये पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने घटना की सूचना पुलिस को दी, उन्होंने कहा, “मैंने इसके बारे में सोचा, लेकिन आगे बढ़ने में बहुत डर लग रहा था. ये पहली बार था जब कैथल में काम करने के दौरान मुझे इस तरह की धमकी का सामना करना पड़ा. मुझे डर लग रहा है.”

फ़तेहाबाद, हरियाणा

हरियाणा के फ़तेहाबाद में, 28 दिसंबर को गर्म कपड़े बेचने वाले एक कश्मीरी युवक के पास एक व्यक्ति आया और उसे धमकाया. हमलावर ने विक्रेता का कॉलर पकड़ लिया और उसे ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ बोलने के लिए मजबूर किया. इस टकराव के दौरान हमलावर विक्रेता का दूसरा हाथ भी मरोड़ रहा था. घटना के एक वीडियो में, आसपास खड़े लोगों को उस व्यक्ति से शॉल विक्रेता को परेशान करना बंद करने के लिए कहते हुए देखा जा सकता है.

फ़तेहाबाद के SP सिद्धांत जैन ने मीडिया को बताया कि विक्रेता और उस व्यक्ति दोनों को पुलिस स्टेशन लाया गया और उस व्यक्ति के साथ “परामर्श” किया गया. उन्होंने बताया कि विक्रेता को औपचारिक शिकायत दर्ज़ करने के लिए कहा गया है.

ऊना, हिमाचल प्रदेश

जनवरी में हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले के सलोह में डराने-धमकाने की एक अन्य घटना में एक स्थानीय निवासी ने एक कश्मीरी शॉल विक्रेता से संपर्क किया जिसने उसका आधार कार्ड और अन्य पहचान डॉक्यूमेंट देखने की मांग की. विक्रेता के पहचान पत्र और डाक्यूमेंट्स को फ़िल्माया गया और सोशल मीडिया पर शेयर किया गया, वीडियो पर एक कैप्शन लिखा है जिसका अनुवाद है, “हमें मिलकर सलोह गांव की देखभाल करनी चाहिए. जय हिमाचल.”

जब विक्रेता, कुपवाड़ा के गुलगाम ज़िले के निवासी अब्दुल वहीद गोरजी ने अपना पुलिस वेरिफ़िकेशन डॉक्यूमेंट शेयर किया, तो स्थानीय निवासी ने दावा किया कि परमिट खत्म हो गया था, ये कहते हुए कि ये 2025 में जारी किया गया था और अब 2026 है. हालांकि, परमिट में साफ तौर पर कहा गया है कि विक्रेता 27 दिसंबर, 2025 से प्रभावी होकर 6 महीने के लिए व्यवसाय करने के लिए ऑथोराइज्ड था.

बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में, अब्दुल अहद खान नाम के एक कश्मीरी शॉल विक्रेता ने कई लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराई, जिन्होंने उसके साथ मारपीट की और उसके सामान को नुकसान पहुंचाया. पुलिस के मुताबिक, हमलावर, जो नकाब पहने हुए थे, मोटरसाइकिल पर आए और अब्दुल खान पर हमला किया, जिसके बाद उनका सामान क्षतिग्रस्त हो गया. 

बिलासपुर के SP संदीप धवल ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “तीन संदिग्धों की पहचान करने के प्रयास जारी हैं. हम आरोपियों और उनके द्वारा इस्तेमाल की जा रही मोटरसाइकिल का पता लगाने के लिए घुमारवीं मुख्य बाजार के CCTV फ़ुटेज की जांच कर रहे हैं.”

रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय न्याय संहिता की धारा 126(2), 115(2) और 324(4) के तहत FIR दर्ज़ की गई थी.

लखनऊ

लखनऊ में जेल रोड पर, कई कश्मीरी ड्राई फ्रूट विक्रेताओं को जनवरी में भगवा दुपट्टा पहने एक व्यक्ति और अन्य लोगों ने परेशान किया और उनसे ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाने और क्षेत्र छोड़ने की मांग की.

देश किस तरफ है?

अगर कोई एक बात है जो ये डॉक्यूमेंट साफ करता है, तो वो ये है: कश्मीरी शॉल विक्रेता – जिनका कभी सर्दियों के परिचित आगंतुकों के रूप में स्वागत किया जाता था – अब उन्हें अपने ही देश में संदिग्ध माना जाता है. बेवजह रोका गया, ये साबित करने के लिए कहा गया कि वे कौन हैं, उन्हें जीविकोपार्जन के अपने अधिकार को उचित ठहराने के लिए सार्वजनिक रूप से देशभक्ति का प्रदर्शन करने के लिए मजबूर किया जाता है.

इससे ज़ेनोफ़ोबिया और इस्लामोफ़ोबिया की बढ़ती अंतर्धारा का पता चलता है जहां नागरिकता सशर्त महसूस होती है और भय का आकार होता है – जहां कश्मीर को “हमारा” होने का दावा किया जाता है, और दूसरी तरफ खुद कश्मीरियों को भी बाहरी लोगों जैसा महसूस कराया जाता है.

इनमें से कई घटनाओं में एक खास बात ये है कि उत्पीड़न और हमले के वीडियो अक्सर अपराधियों द्वारा स्वयं रिकॉर्ड किए जाते हैं और ऑनलाइन शेयर किए जाते हैं. ज़्यादातर परिस्थितियों में ऐसे फ़ुटेज – साफ तौर से आपराधिक कृत्यों को दर्शाते हुए – इसमें शामिल लोगों के खिलाफ सबूत के रूप में काम कर सकते हैं. ऐसा लगता है कि ये एक निवारक के रूप में कार्य नहीं करता है जो हमलावरों द्वारा प्राप्त दण्ड से मुक्ति की एक डिग्री का सुझाव देता है.

इससे एक बड़ा सवाल उठता है: क्या ऐसी निर्लज्जता इस धारणा से उपजी है कि राज्य उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगा, या शायद उनके पक्ष में भी होगा? अगर ऐसा है, तो समस्या ज़्यादा गहरी है और व्यक्तिगत मामलों से भी आगे तक फैली हुई है. आपराधिक न्याय प्रणाली इस आधार पर टिकी हुई है कि राज्य पीड़ितों के पक्ष में है और अपराधियों को जवाबदेह ठहराना चाहता है. अगर उस ढांचे में गड़बड़ी की जाती है, तो परिणाम दूरगामी होंगे.

जनवरी के आखिर में जम्मू और कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (JKASA) ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर उत्तर भारतीय राज्यों में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं और श्रमिकों के खिलाफ “पहचान-आधारित उत्पीड़न और हिंसा के परेशान करने वाले और निरंतर पैटर्न” में हस्तक्षेप करने की मांग की.

ऑल्ट न्यूज़ के साथ बातचीत में, JKASA के राष्ट्रीय संयोजक नसीर ख़ुएहमी ने आरोप लगाया कि उत्तर भारत के कुछ राज्यों में “आतंक का शासन” उभर गया है. नसीर ख़ुएहमी के मुताबिक, कश्मीरी शॉल विक्रेताओं पर हमले और उत्पीड़न कोई अलग घटनाएं नहीं थीं, बल्कि एक “डिज़ाइन किए गए अभियान” को दिखाती थीं.

उन्होंने कहा, “अपराधी वैचारिक और संस्थागत समर्थन से उत्साहित हैं. अगर किसी को गिरफ़्तार भी किया जाता है, तो भी वे लंबे समय तक जेल में नहीं रहते हैं. कई मामलों में, FIR दर्ज़ की गईं, लेकिन आरोप इतने हल्के थे कि अपराधियों को आसानी से जमानत मिल गई या अधिकतम पांच दिन हिरासत में बिताने पड़े.” 

नसीर ख़ुएहमी ने कहा, “हिमाचल प्रदेश, जहां सबसे ज़्यादा हमले हुए हैं, एक कांग्रेस शासित राज्य है. मुझे नहीं पता कि सरकार की चुप्पी और आक्रोश की कमी का कारण क्या है. ऐसा लगता है कि प्रशासन चयनात्मक निंदा और चयनात्मक सुरक्षा में विश्वास करता है.”

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