बीते कुछ महीनों में भारत सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (आईटी एक्ट) की धारा 69A का हवाला देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कई यूज़र्स के पोस्ट को भारत में ब्लॉक करने के आदेश दिए हैं. हाल में कई सोशल मीडिया यूजर्स द्वारा शेयर किए गए ब्लॉकिंग ऑर्डर्स स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि इस कानून का धड़ल्ले से दुरुपयोग, सरकार की आलोचनाओं को मिटाने, असहमति की आवाज़ को दबाने, राजनीतिक व्यंग्य को कुचलने और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों पर की गई तीखी टिप्पणियों को खामोश करने के लिए हो रहा है.

जाने-माने कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य ने 10 मार्च को ट्वीट करते हुए जानकारी दी कि उनके दो कार्टूनों को सरकार के निर्देश पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ द्वारा भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया है. ये कार्टून मिडल ईस्ट के संकट और उस पर भारत की कूटनीतिक चुप्पी पर तीखा प्रहार कर रहे थे.

एक कार्टून में वर्ष 2016 और 2026 की तुलना करते हुए दिखाया गया था कि कैसे कभी भारत-ईरान दोस्ती की दुहाई देने वाले प्रधानमंत्री अब अयातुल्लाह खामेनेई की हत्या जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मौन हैं. वहीं दूसरे कार्टून में, भारत में आयोजित नेवल एक्सकर्साइज़ से लौट रही ईरानी जहाज ‘आईरिस डेना’ पर हिन्द महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा हुए हमले और उस पर सरकार की चुप्पी को ‘अतिथि देवो भव’ के तंज के साथ उकेरा गया था. सतीश आचार्य ने इस कार्रवाई पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जब सत्ता किसी कार्टून को बलपूर्वक दबाने का प्रयास करती है, तो वह उसकी पहुँच को 10 गुना बढ़ा देती है.

 

सामान्यतः इस कानून का इस्तेमाल राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था को होने वाले गंभीर खतरों से निपटने के लिए किया जाता है. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने 7 अक्टूबर, 2025 को नई दिल्ली में ‘मध्यस्थ प्लेटफॉर्म पर सूचना प्रबंधन’ विषय पर एक कार्यशाला का आयोजन किया था. इसमें मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने आईटी अधिनियम की धारा 69ए के दायरे और उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए बताया था कि धारा 69A सरकार को उसकी कार्यकारी क्षमता के तहत, ऐसे मामलों में ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने का अधिकार देती है, जहाँ वह राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के लिए खतरा उत्पन्न करती हो.

हालिया और आक्रामक सेंसरशिप की लहर का शिकार केवल सार्वजनिक हस्तियाँ ही नहीं बनी हैं, बल्कि इसके जरिए राजनीतिक आलोचना और व्यंग्य करने वाले सामान्य नागरिकों की सूक्ष्म टिप्पणियों को भी निशाना बनाया जा रहा है. कपिल नाम के एक यूज़र ने 5 मार्च को जब प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों पर होने वाले खर्च से संबंधित एक समाचार रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट पोस्ट करते हुए इसे ‘टोटली यूजलेस’ करार दिया, तो उनके दो शब्दों के ट्वीट को भी सरकारी आदेश पर भारत में ब्लॉक कर दिया गया.

पूनम नाम की यूजर ने 5 मार्च को एक पोस्ट में लिखा था, “एक रेंगने वाले कीड़े में नरेंद्र मोदी से ज़्यादा रीढ़ होती है.” सरकार ने उनके इस ट्वीट को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (आईटी एक्ट) की धारा 69A का हवाला देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स एक्स पर भारत में ब्लॉक करने का आदेश दे दिया.

इसी प्रकार, शिक्षाविद संदीप मानुधने ने 4 मार्च को जब हिंद महासागर की सुरक्षा और प्रधानमंत्री की चुप्पी पर कटाक्ष किया, तो उनके विचारों को भी सरकारी आदेश पर भारत में ब्लॉक कर दिया गया. ये उदाहरण दर्शाते हैं कि सरकार अब नीतिगत आलोचना के प्रति कितनी संवेदनशील हो चुकी है, जहाँ सामान्य आलोचनाओं को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मान लिया गया है.

राजनीतिक राय व्यक्त करने वाले अन्य यूजर्स को भी कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है. The Protagonist नाम के यूजर ने ‘मोदी 3.0’ के बारे में अपनी तीखी राय व्यक्त की. इस पोस्ट को तत्काल सरकारी आदेश पर भारत में ब्लॉक कर दिया गया.

नितिन नाम के एक अन्य यूजर ने खाड़ी देशों के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री की बातचीत पर व्यंग्य करते हुए पोस्ट किया, जिसके परिणामस्वरूप उनके ट्वीट को भी सरकारी आदेश पर ब्लॉक कर दिया गया. गौर करने वाली बात ये है कि इस ट्वीट में कहीं भी स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री मोदी या भारत सरकार का नाम भी नहीं लिखा था.

डॉ. ज्वाला गुरुनाथ और डॉ. रंजन ने जब राजनीतिक विचारधारा और सरकार के प्रभाव पर टिपण्णी कीं, तो उन्हें भी इसी सेंसरशिप का शिकार होना पड़ा. विशेष रूप से डॉ. रंजन के मामले में तो उस पोस्ट को भी ब्लॉक कर दिया गया जिसमें उन्होंने अपने पिछले पोस्ट के ब्लॉक होने की जानकारी दी थी.

‘सर काज़म’ नाम के यूज़र ने मिडल ईस्ट युद्ध पर प्रधानमंत्री की भूमिका को लेकर हल्का-फुल्का मज़ाक किया और लिखा, “मोदी ने अबतक मिडल ईस्ट के युद्ध को नहीं रोका है, लगता है कुछ बड़ा पक रहा है.” इसके अलावा, एक दूसरे ट्वीट में यूजर ने प्रधानमंत्री के ’56 इंच के सीने’ वाले प्रसिद्ध बयान का मज़ाक उड़ाते हुए लिखा था, “यह दावा केवल 12 समुद्री मील तक लागू होता है.” उनके दोनों पोस्ट्स ब्लॉक कर दिए गए.

इसी क्रम में अर्पित शर्मा ने 5 मार्च को प्रधानमंत्री के एक पुराने पोस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर किया जिसमें हिंद महासागर को नीतिगत प्राथमिकता बताया गया था. अर्पित ने इस पर ‘झूठ बोलो’ की टिप्पणी की. इस पोस्ट को भी हटा दिया गया जो यह संकेत देता है कि सरकार अपने स्वयं के पुराने वादों की याद दिलाए जाने को भी चुनौती मान रही है. स्वाति खन्ना नाम की यूज़र द्वारा मोदी, भाजपा और आरएसएस के समर्थकों के मानसिक स्वास्थ्य पर की गई एक तीखी टिप्पणी को भी इसी कड़ी में ब्लॉक किया गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल स्पेस में अब आलोचनात्मक विमर्श के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है. व्यंग्य और पुराने बयानों की याद दिलाना भी अब डिजिटल अपराध की श्रेणी में आता दिख रहा है.

धारा 69A भारत की संप्रभुता और अखंडता या सार्वजनिक व्यवस्था के हित में ब्लॉकिंग की अनुमति देती है. हालाँकि, सतीश आचार्य के कार्टून या एक नागरिक द्वारा “Totally Useless” जैसी दो शब्दों की सीधी-सादी आलोचनाओं पर की गई कार्रवाई ये दर्शाती है कि सरकार अब नेतृत्व पर की गई टिपण्णी को राष्ट्र को नुकसान पहुँचाने के बराबर मान रहा है. कूटनीतिक चुप्पी पर एक कार्टूनिस्ट के व्यंग्य या प्रधानमंत्री के विदेश यात्रा पर खर्चों को लेकर एक नागरिक की निराशा को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा मानकर, सरकार प्रभावी रूप से देश और सरकार के बीच के अंतर को मिटा रही है. व्यंग्य, अपने स्वभाव से ही अतिशयोक्तिपूर्ण होता है. यह जनता की निराशा को अहिंसक रूप से व्यक्त करने का एक माध्यम है. सरकार द्वारा आलोचना, व्यंग्यात्मक टिपण्णी और कार्टून्स पर ब्लॉकिंग ऑर्डर जारी करना दर्शाता है कि असंतोष की आवाज़ को दबाने के लिए कानून का दुरुपयोग किया जा रहा है.

इस रवैये का चिंताजनक पक्ष पारदर्शिता की कमी और उचित प्रक्रिया का अभाव भी है. चूंकि, ये ब्लॉकिंग ऑर्डर्स् गोपनीय होते हैं, यूज़र्स को अक्सर यह पता तब चलता है, जब उन्हें X जैसे प्लेटफ़ॉर्म से ईमेल के जरिए ऑटोमैटिक नोटिफ़िकेशन मिलते हैं कि उनका कंटेंट भारत में ब्लॉक कर दिया गया है. इसके लिए ना तो कोई सुनवाई का मौका दिया जाता है, ना ही कोई साफ़ सफ़ाई दी जाती है कि कोई पोस्ट राष्ट्रीय सुरक्षा का उल्लंघन कैसे करता है.

अगर सरकार मामूली टिप्पणियों और राजनीतिक व्यंग्य को चुप कराने के लिए धारा 69A का इस्तेमाल करती रही, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स लोगों के स्वतंत्र विचार रखने का अड्डा नहीं, बल्कि सरकारी मंजूरी वाले विचार रखने का इको चैंबर बन जाएगा, यह एक लोकतान्त्रिक देश के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.

इस विषय पर विस्तार से समझने के लिए हमने भारत में नागरिकों की डिजिटल स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए काम कर रही गैर-लाभकारी संस्था इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक-निदेशक अपार गुप्ता से चर्चा की. बातचीत के मुख्य अंश यहाँ दिए गए हैं:

1. क्या आप समझा सकते हैं कि सरकार द्वारा इन ब्लॉकिंग आदेशों को जारी करने की वर्तमान प्रक्रिया क्या है? एक शिकायत दर्ज होने से लेकर किसी प्लेटफॉर्म को उसे हटाने के लिए मजबूर करने तक की प्रक्रिया कैसे काम करती है?

2009 के ब्लॉकिंग नियमों के तहत, एक शिकायत आमतौर पर सबसे पहले किसी मंत्रालय, विभाग, राज्य सरकार या एजेंसी के नोडल अधिकारी के पास जाती है. उस संस्था को इसकी जांच करनी होती है और अगर उसे लगता है कि धारा 69A के नियम लागू होते हैं, तो वह इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के नामित अधिकारी को एक लिखित रीक्वेस्ट भेजती है. नामित अधिकारी रीक्वेस्ट की जांच के लिए एक समिति बनाता है, और जिस व्यक्ति या प्लेटफॉर्म ने कंटेंट डाला है उसे नोटिस और सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए, बशर्ते उस व्यक्ति की पहचान हो सके. समिति की सिफारिश मंत्रालय के सचिव के पास जाती है, जो इसे मंजूर या खारिज करते हैं. अगर मंजूरी मिल जाती है, तो नामित अधिकारी प्लेटफॉर्म को एक तय समय के भीतर उस विशेष जानकारी को ब्लॉक करने का निर्देश देता है. तुरंत ब्लॉक करने के लिए एक आपातकालीन रास्ता भी है, लेकिन इसे 48 घंटों के भीतर समिति के सामने रखा जाना चाहिए और फिर पक्का किया जाना चाहिए या वापस लिया जाना चाहिए. हालांकि, पारदर्शिता की कमी के कारण इनमें से कई सुरक्षा उपाय दिखाई नहीं देते हैं. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन द्वारा लड़े गए कई मामलों में, प्रभावित पक्षों को सुनवाई के नोटिस तक नहीं भेजे गए थे.

2. प्लेटफॉर्म द्वारा पोस्ट को रोकने के अलावा, कॉन्टेन्ट पोस्ट करने वाले यूजर के खिलाफ सीधे तौर पर क्या कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है?

धारा 69A का आदेश मुख्य रूप से एक प्लेटफॉर्म को कॉन्टेन्ट की पहुंच को रोकने का निर्देश देता है. अपने आप में, यह कॉन्टेन्ट पोस्ट करने वाले यूज़र को दोषी नहीं ठहराता या सजा नहीं देता है. हालांकि, पुलिस इन्हीं बातों के आधार पर अपनी सामान्य शक्तियों का उपयोग करके एक आपराधिक मामला शुरू कर सकती है. व्यवहार में, यूज़र्स पर अक्सर दुश्मनी को बढ़ावा देने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, सार्वजनिक रूप से शरारत करने वाले बयान देने, आपराधिक मानहानि, या राज्य को खतरे में डालने वाले भाषण देने के आरोप में मामला दर्ज किया जाता है. 1 जुलाई 2024 से, ये अपराध भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत आते हैं जिसने आईपीसी की जगह ली है, और कानूनी प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत आती है. इसके अलावा, आईटी अधिनियम के कुछ हिस्से अभी भी अश्लील कॉन्टेन्ट, बाल यौन शोषण कॉन्टेन्ट, या प्राइवेसी के उल्लंघन जैसे विशेष अपराधों के लिए सजा तय करते हैं. अधिकारों की निगरानी करने वाली संस्थाओं ने ऑनलाइन पोस्ट, जिनमें राजनीतिक भाषण भी शामिल हैं, को लेकर गिरफ्तारियों और एफआईआर दर्ज होने के कई मामले डॉक्यूमेंट किये हैं.

3. कोई न कोई नियम या मूल दस्तावेज तो होना चाहिए जो यह तय करता हो कि पुलिस और नामित अधिकारी इन स्थितियों में क्या कर सकते हैं और क्या नहीं. क्या आप मुझे बता सकते हैं कि ये सीमाएं कहां दर्ज हैं?

ब्लॉक करने की मुख्य कानूनी सीमाएं आईटी अधिनियम की धारा 69A और 2009 के ब्लॉकिंग नियमों में हैं. धारा 69A ब्लॉक करने को संप्रभुता और अखंडता, रक्षा, राज्य की सुरक्षा, मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था और इनसे जुड़े अपराधों के लिए उकसाने जैसे विशिष्ट आधारों तक सीमित करती है और इसके लिए लिखित में कारण दर्ज करने की आवश्यकता होती है. इसके बाद ब्लॉकिंग नियम यह तय करते हैं कि कौन रीक्वेस्ट कर सकता है, नामित अधिकारी की भूमिका क्या होगी, समिति की समीक्षा, आपातकालीन प्रक्रिया, रिकॉर्ड रखना, और समीक्षा समिति की समय-समय पर निगरानी कैसे होगी. एक बड़ी ढांचागत कमी नियम 16 की गोपनीयता है, जो अक्सर आदेशों को उन यूज़र्स से दूर रखती है जो उन्हें अदालत में चुनौती देना चाहते हैं. इसके अलावा, प्लेटफॉर्मों को आईटी नियम 2021 के तहत भी पोस्ट हटाने के निर्देश मिलते हैं, विशेष रूप से नियम 3(1)(d), जिसे समय के साथ सख्त किया गया है, और हाल के बदलावों में आदेश का पालन करने के लिए बहुत कम समय दिया जाता है.

4. कार्टून, व्यंग्यात्मक टिप्पणियों और आलोचनात्मक टिप्पणियों के खिलाफ भी ब्लॉकिंग आदेश जारी किए गए थे. इन विशिष्ट मामलों के संदर्भ में, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A के तहत किस कानूनी आधार पर ऐसी कॉन्टेन्ट को ब्लॉक किया जा सकता है? सरकार किसी राजनीतिक कार्टून या व्यंग्य को सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में कैसे सही ठहराती है?

कार्टून, व्यंग्य और प्रधानमंत्री की आलोचना के लिए, सरकार आमतौर पर सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा से जुड़े उकसावे को रोकने के लिए धारा 69A का उपयोग करने का प्रयास करती है. कानूनी तौर पर, इसके लिए हिंसा या अव्यवस्था के साथ एक सीधा संबंध साबित करने की आवश्यकता होती है, न कि केवल यह कि कॉन्टेन्ट सरकार का मजाक उड़ा रही है या उसके लिए असहज है. एक वैध 69A निर्देश को विशिष्ट कॉन्टेन्ट तक सीमित होना चाहिए, सटीक पोस्ट या लिंक की पहचान करनी चाहिए, और लिखित में कारण दर्ज करने चाहिए. एक्स (X) पर हाल ही की यूज़र रिपोर्टें एक बार-बार होने वाली कमी दिखाती हैं: पोस्ट को ‘धारा 69A के तहत भारत में रोक दिया गया है’, लेकिन यूज़र्स को कोई कारण नहीं बताया जाता है और आदेश की कोई कॉपी नहीं मिलती है, जिससे कानूनी चुनौती मुश्किल हो जाती है.

व्यंग्य को धारा 69A में फिट करने के लिए, सरकार आमतौर पर यह तर्क देती है कि कॉन्टेन्ट सिर्फ मज़ाक नहीं है, बल्कि इससे अव्यवस्था, घृणा या हिंसा भड़कने की संभावना है. और इसलिए यह सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा को प्रभावित करती है. यह साबित करना कानूनी रूप से बहुत मुश्किल है. सुप्रीम कोर्ट ने किसी विचार को रखने और उकसावे के बीच एक रेखा खींची है, और कहा है कि सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिबंधों का उकसावे से सीधा लिंक होना चाहिए. एक राजनीतिक कार्टून के मामले में, सरकार को यह साबित करना होगा कि उस पोस्ट से केवल किसी की भावनाएं आहत नहीं हो रही हैं या छवि खराब नहीं हो रही है, बल्कि उससे तत्काल हिंसा, लक्षित उत्पीड़न, या लोगों के उग्र रूप से इकट्ठा होने का एक वास्तविक खतरा है जिसे वह पोस्ट भड़का रहा है. इसके बिना, व्यंग्य को ब्लॉक करने के लिए 69A का उपयोग करना सिर्फ सेंसरशिप जैसा लगता है और इसे धारा 69A और अनुच्छेद 19(2) की सीमाओं के तहत सही ठहराना मुश्किल है.

इससे पहले एक रिपोर्ट में हमने देखा था कि अक्सर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचनात्मक व्यंग्यात्मक या पैरोडी कंटेन्ट पोस्ट करने वाले कई अकाउंट्स 18 मार्च को भारत में ब्लॉक कर दिए गए हैं.