सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने 25 जुलाई को कहा कि गंगा नदी के पास चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं है. उन्होंने इस साल मार्च में वाराणसी में 14 युवा मुस्लिम की गिरफ़्तारी की आलोचना की.
भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में जस्टिस जीपी सिंह मेमोरियल लेक्चर देते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, “मुझे यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है. ये अपराध हो ही नहीं सकता. ऐसा कोई कानून नहीं है जो गंगा नदी के पास चिकन खाने पर रोक लगाता हो.” उन्होंने इस बात पर निराशा जताई कि इन युवाओं को इसी वजह से गिरफ़्तार किया गया और उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा. उन्होंने आगे कहा, “कोर्ट से उन्हें ज़मानत मिलने में तीन महीने लग गए.”
संबंधित पक्ष को नीचे दिए गए वीडियो में 2 घंटे 5 मिनट 45 सेकेंड पर सुना जा सकता है.
लोगों को संबोधित करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, “ये कहना ग़लत नहीं होगा कि भारत में अलग-अलग राय रखने और उन्हें जाहिर करने के लिए पब्लिक स्पेस कम हो रहा है.” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि अपने विचार रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार नागरिकों को मिली बुनियादी आज़ादी है और “बहस और असहमति लोकतंत्र की जान हैं.” उन्होंने आगे कहा, “दुर्भाग्य से आम गतिविधियों को भी अपराध माना जा रहा है.” [2 घंटे 3 मिनट 46 सेकेंड]
पर्यावरण से जुड़े विरोध प्रदर्शनों और छात्रों के प्रदर्शनों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “जो लोग पर्यावरण को हो रहे नुकसान पर अपना दुख ज़ाहिर करने आते हैं, जो कि एक सच्चाई है – उन्हें ऐसे भगा दिया जाता है जैसे वो अपराधी हों.” [2 घंटे 4 मिनट 11 सेकेंड]
उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “कैंपस में विरोध करने वाले छात्रों को गिरफ़्तार कर लिया जाता है और उन्हें 30 से 40 दिनों तक ज़मानत नहीं मिलती. उन्हें सस्पेंड कर दिया जाता है जिसके लिए उन्हें कोर्ट जाना पड़ता है. इसमें समय लगता है. ये मुद्दे गंभीर सवाल खड़े करते हैं.” [2 घंटे 4 मिनट 25 सेकेंड]
ये मानते हुए कि ऐसे कई मामलों में कोर्ट आखिर में ज़मानत दे देती है, जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि क्या देर से राहत मिलना और ज़मानत की कड़ी शर्तें लोकतांत्रिक भागीदारी को हतोत्साहित कर रही हैं. उन्होंने कहा, “ये मुद्दे गंभीर सवाल खड़े करते हैं… हालांकि कोर्ट संवेदनशील हैं और ज़मानत देती भी हैं, लेकिन कई बार इसमें देर हो जाती है. लेकिन ज़मानत देते समय लगाई जाने वाली पाबंदियां सबसे ज़्यादा चिंता का विषय है. क्या ऐसे प्रतिबंधात्मक आदेशों के ज़रिए कोर्ट अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को अपनी असहमति ज़ाहिर न करने के लिए कह रही है या उन्हें हतोत्साहित कर रही है?” [2 घंटे 4 मिनट 34 सेकेंड]
उन्होंने एक ऐसे मंत्री से जुड़े मामले का भी ज़िक्र किया जिन्होंने भारतीय सेना की एक अधिकारी को सिर्फ़ उनके धर्म की वजह से ‘आतंकवादी की बेटी’ कहा था. मंत्री के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की गई थी और बाद में उन्होंने अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) की मांग की. हालांकि, उन्हें ज़मानत मिल गई. लेकिन जस्टिस भुइयां ने उन शर्तों पर सवाल उठाए जो लगाई गई थीं जैसे पासपोर्ट जमा करना, फ़ेसबुक पर पोस्ट न करना और इस मामले पर सार्वजनिक बैठकों में शामिल होने या भाषण देने से बचना. [2 घंटे 6 मिनट 6 सेकेंड]
उन्होंने कहा कि लोगों का ये पूछना सही है कि क्या ज़मानत की ऐसी सख़्त शर्तें नागरिकों को सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने से रोकने का संदेश देती हैं. लंबे समय तक जेल में रहे एक युवा छात्र एक्टिविस्ट का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “हालांकि कोर्ट ने उन्हें ज़मानत दे दी थी, लेकिन उन्हें न सिर्फ़ अपना पासपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया, बल्कि किसी भी सार्वजनिक बैठक में – चाहे वो आमने-सामने हो या वर्चुअल – हिस्सा लेने या उसे संबोधित करने से भी मना किया गया.” उन्होंने आगे कहा, “ऐसी सख़्त शर्तें लगाने से उनकी बुनियादी आज़ादी और स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित होती है.” [2 घंटे 7 मिनट 42 सेकेंड]
अपने भाषण की शुरुआत में जस्टिस भुइयां ने कहा, “हालांकि मैं सुप्रीम कोर्ट का हिस्सा हूं, लेकिन मैं अंदर का व्यक्ति हूं मैं सुप्रीम कोर्ट के कामकाज की काफ़ी आलोचना करता हूं और अपनी बात कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाता.” जस्टिस जी.पी. सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने उन्हें भारत के बेहतरीन जजों में से एक बताया जिन्हें दुर्भाग्य से कभी सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति नहीं मिली. उन्होंने कहा कि “ऐसी चूक आज भी भारतीय सुप्रीम कोर्ट के लिए एक समस्या बनी हुई है.” [1 घंटे 8 मिनट 12 सेकेंड]
यूनिवर्सिटीज़ को आलोचना को बढ़ावा देना चाहिए जिसमें अदालती फ़ैसलों की आलोचना भी शामिल हो.
जस्टिस भुइयां ने यूनिवर्सिटीज़ से कहा कि वो स्टूडेंट्स को सोच-समझकर राय बनाने और न्यायपालिका समेत स्थापित संस्थाओं पर सवाल उठाने के लिए प्रोत्साहित करके बौद्धिक आज़ादी को बढ़ावा दें. “हमारी यूनिवर्सिटीज़ के पास इतनी एकेडमिक आज़ादी होनी चाहिए कि वो नए और अनछुए क्षेत्रों में काम कर सकें.” उन्होंने ज़ोर दिया कि अदालती फैसलों की कड़ी एकेडमिक जांच-पड़ताल होनी चाहिए. “हमारे स्टूडेंट्स को आलोचनात्मक सोच रखने और सवाल पूछने की ज़रूरत है जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है. फैसले सुनाए जाने के बाद उनकी आलोचनात्मक जांच होनी चाहिए और ज़रूरत पड़ने पर आलोचना भी की जानी चाहिए. किसी फैसले की आलोचना करने का मतलब जज की आलोचना करना नहीं है.”
उदाहरण के तौर पर, उन्होंने आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) वाले फैसले का ज़िक्र किया और कहा कि कानून के एक छात्र के तौर पर उनका मानना है कि इस फैसले में “बुनियादी कमियां” हैं जिनकी आलोचनात्मक जांच होनी चाहिए. “मैं कह रहा हूं कि इस फैसले में बुनियादी कमियां हैं. इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए.” उन्होंने आगे कहा, “जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे, तब तक हम कैसे बेहतर बनेंगे? अगर हर कोई जज के पास जाकर कहे, ‘बहुत बढ़िया फैसला, सर आपकी बात बेहतरीन है, आप बहुत बड़े कानून-विशेषज्ञ हैं’, तो सिस्टम कैसे बेहतर होगा?” [1 घंटे 29 मिनट 5 सेकेंड]

बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़िलिस्तीन विरोध प्रदर्शन वाले आदेश पर सवाल
फ़िलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन की इजाज़त न देने के बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, “पारंपरिक रूप से भारत ने हमेशा फ़िलिस्तीन को मान्यता दी है, और भारत में फ़िलिस्तीन का दूतावास भी है.” उन्होंने कोर्ट की उस टिप्पणी को “बहुत ही मज़ेदार” बताया जिसमें पूछा गया था कि जब भारत के अपने मुद्दे हैं, तो लोग ग़ाज़ा की घटनाओं पर विरोध प्रदर्शन क्यों करना चाहते हैं. उस आदेश को याद करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे ये बहुत मज़ेदार लगा जब बॉम्बे के शिवाजी पार्क में लोगों का एक समूह ग़ाज़ा के लोगों के समर्थन में प्रदर्शन करना चाहता था. सरकार ने इजाज़त नहीं दी, इसलिए वो बॉम्बे हाई कोर्ट गए. सम्मानित जज ने कहा, क्या भारत में आपके पास मुद्दे नहीं हैं? आपको विरोध करने के लिए इतनी दूर क्यों जाना है? इस पर बस इतना ही कहा जा सकता है कि ये वाकई बहुत मज़ेदार बात है.” उन्होंने तर्क दिया कि अदालतों की ऐसी प्रतिक्रियाओं से छात्रों और शोधकर्ताओं के बीच आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा मिलना चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया, “ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर युवा शोध छात्रों को सोचना चाहिए. आपको पढ़ना चाहिए, आपको सवाल पूछने चाहिए.” [1 घंटे 30 मिनट 4 सेकेंड]

उन्होंने यूनिवर्सिटीज़ से ये भी कहा कि वो बहस को दबाने के बजाय उसे बढ़ावा दें. सवाल पूछने पर एक स्टूडेंट के खिलाफ़ सज़ा वाली कार्रवाई की खबरों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “स्टूडेंट के इस अहम पहलू को… मुझे बताया गया है कि एक नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) ने सवाल पूछने पर एक स्टूडेंट के खिलाफ़ सज़ा वाली कार्रवाई की है. यूनिवर्सिटीज़ को ऐसा होना चाहिए जो स्टूडेंट्स को बहस करने और मुश्किल सवाल पूछने के लिए बढ़ावा दें. आसान सवाल तो कोई भी पूछ सकता है और कोई भी जवाब दे सकता है. ऐसे मुश्किल सवालों को ऐसी आवाज़ों को दबाने या रोकने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.” [1 घंटे 39 मिनट 9 सेकेंड]
शक्तियों का बंटवारा और न्यायपालिका की आज़ादी
फ्रांसीसी राजनीतिक दार्शनिक मोंटेस्क्यू के दिए ‘ट्रायस पॉलिटिका’ (शक्तियों के बंटवारे) के सिद्धांत का ज़िक्र करते हुए, जस्टिस भुइयां ने समझाया कि ये विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच ‘चेक एंड बैलेंस’ (एक-दूसरे पर नज़र रखने और संतुलन बनाए रखने) को बताता है. तीन पैरों वाली स्टूल का उदाहरण देते हुए, उन्होंने सवाल किया कि क्या ऐसी स्टूल स्थिर रह सकती है अगर उसके पैरों की सीध, मज़बूती या दूरी अलग-अलग हो. उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी तरह का असंतुलन स्टूल को गिरा सकता है और तर्क दिया कि यही ‘ट्रायस पॉलिटिका’ का मूल सिद्धांत है. [1 घंटे 35 मिनट 48 सेकेंड]
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए, जस्टिस भुइयां ने भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) के कार्यपालिका में शामिल होने के फ़ैसले की आलोचना की और इसे “बुनियादी तौर पर ग़लत” बताया. उन्होंने कहा, “इसलिए, जब कोई पूर्व CJI कहता है कि मैं राज्यसभा जा रहा हूं, ताकि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच की खाई को भरा जा सके, तो ये बुनियादी तौर पर ग़लत है. ये पूरी तरह से ग़लत है. बुनियादी तौर पर, यह शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ़ है. ये एक बुनियादी ग़लती है.” [1 घंटे 37 सेकेंड 12 सेकेंड]

1950 में चीफ़ जस्टिस कानिया के बारे में बात करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, “उनके शब्दों का मतलब है कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ एक कानूनी संस्था नहीं है, बल्कि इसे देश की नैतिक दिशा दिखाने वाली शक्ति और संवैधानिक अंतरात्मा के तौर पर काम करना है. आज़ादी पर ज़ोर देने से ये पक्का होता है कि न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका द्वारा सत्ता के ग़लत इस्तेमाल को रोक सके और लोकतंत्र व व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा कर सके.” उन्होंने आगे कहा, “आखिरकार, जनता का सम्मान पाने पर ज़ोर ये बताता है कि न्यायिक शक्ति सिर्फ़ कानून पर नहीं, बल्कि भरोसे और वैधता पर टिकी होती है. इसलिए, लोकतांत्रिक समाज में न्यायपालिका के असरदार ढंग से काम करने के लिए जवाबदेही, ईमानदारी और पारदर्शिता ज़रूरी है.” [1 घंटे 41 मिनट 49 सेकेंड]
उन्होंने कहा कि संविधान की रक्षा की ज़िम्मेदारी आखिरकार न्यायपालिका, खासकर सुप्रीम कोर्ट की है. “हालांकि, राज्य के तीनों अंगों का ये संवैधानिक कर्तव्य है कि वे संविधान के मूल ढांचे पर कोई हमला न होने दें और संविधान को बनाए रखें. लेकिन आखिरकार, इन ज़रूरी विशेषताओं की रक्षा करना न्यायपालिका और खासकर सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी है.” उन्होंने आगे कहा, “मैं खुद से पूछता हूं कि अगर जज न्यायपालिका की आज़ादी की रक्षा नहीं करेंगे, तो कौन करेगा? अगर जज कानून के शासन को लागू नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?” [1 घंटे 51 मिनट 31 सेकेंड]
हेट स्पीच और बुलडोज़र जस्टिस पर
हेट स्पीच के बढ़ते मामलों पर सवाल उठाते हुए, जस्टिस भुइयां ने पूछा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि लोग बिना किसी डर के कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं. “आज हम देखते हैं कि कई लोग कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं. वो नफ़रती भाषण देते हैं और ऐसा बिना किसी डर के करते हैं. ऐसा क्यों है? हमें खुद से ये सवाल पूछना चाहिए; जजों को भी खुद से ये सवाल पूछना चाहिए.” [1 घंटे 51 मिनट 56 सेकेंड]
18 नवंबर, 2024 को नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई एक कॉन्फ्रेंस का ज़िक्र करते हुए, जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्होंने जस्टिस बी.आर. गवई के उस ‘बुलडोज़र फ़ैसले’ की तारीफ़ की थी जिसमें बुलडोज़र से तोड़-फोड़ करने पर रोक लगाई गई थी. इसे “निस्संदेह एक अच्छा फ़ैसला” बताते हुए उन्होंने कहा कि “ये फ़ैसला दो साल की देरी से आया है.” उनके मुताबिक, इस फ़ैसले का असर “लगभग न के बराबर – यानी ज़ीरो” रहा, क्योंकि “बिना किसी रोक-टोक के, बुलडोज़र की ताक़त का इस्तेमाल करके रिहायशी घरों और छोटे कारोबारों की जगहों को तोड़ा जा रहा है.” उन्होंने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “जब आप बुलडोज़र का इस्तेमाल करते हैं, तो ये अपने संविधान को बुलडोज़ करने जैसा है. ये अपने संविधान को कुचलने जैसा है.” [2 घंटे]
1991 में गुवाहाटी हाई कोर्ट से अपनी कानूनी प्रैक्टिस शुरू करने के बाद, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कई अहम सरकारी पदों पर काम किया. इनमें इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के लिए 16 साल तक स्टैंडिंग काउंसिल, मेघालय के लिए एडिशनल सरकारी वकील, अरुणाचल प्रदेश सरकार के लिए स्पेशल काउंसिल और असम के एडिशनल एडवोकेट जनरल के पद शामिल हैं. 2010 में सीनियर वकील का दर्ज़ा मिलने के बाद, उन्हें 2011 में गुवाहाटी हाई कोर्ट का एडिशनल जज और 2013 में परमानेंट जज नियुक्त किया गया. बाद में, 2022 में तेलंगाना हाई कोर्ट का चीफ़ जस्टिस बनने से पहले उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट और तेलंगाना हाई कोर्ट में जज के तौर पर काम किया.
जुलाई 2023 में उन्हें भारत के सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया गया. जस्टिस भुइयां ने कानूनी शिक्षा और न्यायिक प्रशासन में भी अहम पदों पर काम किया है, जैसे कि स्टेट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन और प्रमुख नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज़ की गवर्निंग काउंसिल के सदस्य के तौर पर.





