न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (NBDSA) ने पिछले साल अगस्त में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में छात्रों के विरोध प्रदर्शन की कवरेज के लिए ज़ी न्यूज़ पर 2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है.

शिकायत दर्ज होने के एक साल से ज़्यादा समय बाद, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस ए.के. सिकरी की अध्यक्षता वाली अथॉरिटी ने 11 सितंबर को एक आदेश जारी किया. इसमें कहा गया कि ज़ी न्यूज़ की कवरेज ने ब्रॉडकास्टिंग आचार संहिता का उल्लंघन किया है.

आदेश के मुताबिक़, पाया गया कि प्रसारण में भड़काऊ भाषा और अपमानजनक विज़ुअल एलिमेंट्स के ज़रिए विरोध प्रदर्शन के दौरान शिकायतकर्ता के भाषण को ग़लत तरीके से पेश किया गया था. आदेश में ब्रॉडकास्टर को सभी प्लेटफ़ॉर्म से विवादित कंटेंट हटाने और सात दिनों के भीतर लिखित रूप में इसके पालन की जानकारी देने का निर्देश दिया गया.

16 अगस्त, 2025 को ज़ी न्यूज़ ने कई सेगमेंट दिखाए जिनमें बताया गया कि AMU के कुछ छात्रों ने कैंपस में विरोध प्रदर्शन के दौरान फ़िलिस्तीन-समर्थक और धार्मिक नारे लगाए थे. प्रसारण में इन नारों को देश-विरोधी गतिविधि के सबूत के तौर पर पेश किया गया और सांप्रदायिक पहलू को सामने लाकर मुस्लिम समुदाय के छात्रों को विलेन के तौर पर दिखाया गया.

शिकायतकर्ता तलहा मन्नान (जो हैदराबाद की मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में PhD स्कॉलर हैं) ने बताया कि ज़ी न्यूज़ ने उनके 18 मिनट के भाषण के आखिर में हुई 10-15 सेकंड की नारेबाज़ी को अलग करके दिखाया. ये भाषण उन्होंने 12 अगस्त, 2025 को AMU कैंपस में हफ़्तों से चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान दिया था.

मन्नान, जो AMU के पूर्व छात्र और ‘स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इंडिया’ (SIO) के राष्ट्रीय सचिव हैं, ने ट्यूशन फ़ीस में बढ़ोतरी समेत कई मुद्दों पर छात्रों के लगभग तीन हफ़्ते तक चले विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. आखिरकार, AMU प्रशासन ने छात्रों की मांगें मान लीं, जिससे विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से खत्म हुआ. शिकायतकर्ता का कहना है कि छात्रों के आंदोलन की सफलता ने उनकी शिकायतों की जायज़ता और विरोध प्रदर्शन के शांतिपूर्ण तरीके को सही साबित किया.

मन्नान ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ज़ी न्यूज़ ने ये सेगमेंट चार दिन बाद बिना किसी संदर्भ के दिखाए. उन्होंने विरोध प्रदर्शन की असली वजह को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए सिर्फ़ फ़िलिस्तीन से जुड़े नारों पर भड़काऊ अंदाज़ में ध्यान केंद्रित किया और ऐसा दिखाया मानो पूरा आंदोलन फ़िलिस्तीन के ख़िलाफ़ युद्ध के विरोध में आयोजित किया गया हो.

शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में कहा, “चुनिंदा और देर से की गई ये कवरेज, जो खुद ही इस प्रसारण के मकसद पर कई सवाल खड़े करती है, एक सोचे-समझे संपादकीय फैसले को दिखाती है. इसमें तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग के बजाय सनसनी फैलाने को प्राथमिकता दी गई, जबकि पूरी और संतुलित कवरेज देने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन मौजूद थे.”

18 अगस्त 2025 को ज़ी न्यूज़ पर विवादित हिस्से दिखाए जाने के दो दिन बाद, हिंदू रक्षा दल के एक नेता ने मन्नान और नौ अन्य अज्ञात छात्रों के खिलाफ़ FIR दर्ज़ कराई.

‘फ़िलिस्तीन-प्रेमी गैंग’ का ‘योगी स्टाइल’ में इलाज

सवाल उठाए गए हिस्सों में से पहला, जो 4 मिनट 34 सेकंड लंबा है, 16 अगस्त 2025 को चैनल के प्राइम-टाइम न्यूज़ एनालिसिस शो “देशहित” में दिखाया गया. इसका शीर्षक था: “AMU में ‘फ़िलिस्तीन प्रेमी गैंग’…’योगी स्टाइल’ में होगा इलाज! । Palestine logans।” (AMU का ‘फ़िलिस्तीन-प्रेमी गैंग’… उनका ‘योगी स्टाइल’ में इलाज किया जाएगा!) अगले दिन, इसे ज़ी न्यूज़ के यूट्यूब चैनल पर भी अपलोड किया गया. हटाए जाने का आदेश होने बावजूद ये वीडियो 25 सितंबर 2026 तक यूट्यूब पर मौजूद है.

इस प्रसारण के दौरान, छात्रों को उग्रवाद और आतंकवाद के साथ जुड़ाव के माध्यम से फ़िलिस्तीन के समर्थन में आवाज उठाने के लिए “अराजक तत्व” का लेबल दिया गया और खलनायक बनाया गया. 

इसके अलावा, बताने वाले के बयानों में निहित है कि फ़िलिस्तीन के साथ एकजुटता की अभिव्यक्ति को उन मुद्दों को उठाने के एक पैटर्न के रूप में माना जा सकता है जो AMU जैसे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में आपराधिक इरादे और उग्रवाद की उत्पति की ओर इशारा करता है. चैनल ने कहा:  “कभी जिन्ना की तस्वीर, कभी होली खेलने का विवाद और अब यूनिवर्सिटी कैंपस में फ़िलिस्तीन के समर्थन में नारे. कौन है जो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को बनाना चाहता है, इस्लामी कट्टरपंथ का सेंटर” 

शिकायतकर्ता ने पेश किया कि नारा, जिसमें संवैधानिक रूप से संरक्षित मुक्त भाषण शामिल है, का मकसद किसी विशेष समूह या राजनीतिक दल के संदर्भ के बिना दुनिया भर में उत्पीड़ित लोगों के साथ एकजुटता व्यक्त करना था. हालांकि, बताने वाले ने इस बात पर ज़ोर दिया कि फ़िलिस्तीनियों के लिए समर्थन व्यक्त करने का मतलब आतंकवाद को नज़रअंदाज़ करना है. उन्होंने कहा, “ये कौन लोग हैं जिनके सीने में हमास का दर्द पनपता है? ये कौन लोग हैं जिनका जख्म बार-बार छलकता है?” 

दूसरा विवादित कंटेंट ज़ी न्यूज़ द्वारा प्रसारित 4 मिनट 9 सेकेंड का एक सेगमेंट था, जिसका शीर्षक था “Breaking News: AMU में ‘फिलिस्तीन प्रेमी गैंग’ ‘योगी स्टाइल’ में होगा ईलाज!” 

दूसरे हिस्से में उसी 10-15 सेकंड के फ़ुटेज का इस्तेमाल किया गया, जिसमें विरोध प्रदर्शन के भाषण में इस्तेमाल किया गया ये नारा शामिल था: AMU का मतलब क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह” (What does AMU mean? There is no god but Allah).   छात्रों ने “गाज़ा से है रिश्ता क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह”  जैसे नारे भी लगाए.

इसके अलावा, इन हिस्सों में ऐसी हेडलाइंस (टिकर) दिखाई गईं जैसे “AMU में फ़िलस्तीन प्रेमी गैंग एक्टिव”और फिर, “योगी स्टाइल में होगा इलाज.” जहां पहला बयान छात्रों के एक समूह को “गैंग” बताता है और उनके मकसद के समर्थन में नारे लगाने की वजह से उन्हें फ़िलस्तीन से जोड़ता है, वहीं दूसरा बयान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के सख्त रवैये का ज़िक्र करते हुए एक सीधी धमकी के तौर पर देखा जा सकता है.

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‘फैल रहा है वैचारिक प्रदूषण’

तीसरा विवादित सेगमेंट उसी तारीख को ज़ी न्यूज़ पर उसके शो DNA (दैनिक समाचार और विश्लेषण) के हिस्से के रूप में प्रसारित किया गया था. इसका शीर्षक था “DNA: फीस माफी वाले आंदोलन में फिलिस्तीन जिंदाबाद कहां से आ गया? अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ज़ी न्यूज़.”

इस सेगमेंट में एंकर ने इस कथन के साथ शुरुआत की: अलीगढ़ यूनिवर्सिटी जो अक्सर विवादों में रहती है… इस बार अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों की निष्ठा फ़िलस्तीन प्रेम के वजह से सवालों में है. यानी सिवान से लेकर अलीगढ़ तक एक विशेष तरीके की वैचारिक प्रदूषण फैलाया जा रहा है”. ये संकेत देते हुए कि AMU के छात्र अलग-अलग इलाकों में देश-विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहे थे.

इसके अलावा, इस सेगमेंट में कई भड़काऊ टिकर्स का इस्तेमाल किया गया था: “अलीगढ़ में फ़िलिस्तीन ज़िंदाबाद क्यों?” “फ़ीस माफ़ी में फ़िलिस्तीन का क्या काम?” और “वैचारिक प्रदूषण के कितने गढ़?” शिकायतकर्ता ने कहा कि ये व्यवस्थित राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों की झूठी कहानी बनाने में सहायक थे और इस तरह सांप्रदायिक नफरत को बढ़ावा देते थे.

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ज़ी न्यूज़ का जवाब

ज़ी न्यूज़ का कहना था कि तीनों ब्रॉडकास्ट NBDSA के तय किए गए आचार संहिता (Code of Conduct) के मुताबिक थे. उसने कहा कि कोई भी बांटने वाली बात या विवाद 16 अगस्त को ज़ी न्यूज़ की रिपोर्टिंग की वजह से नहीं, बल्कि खुद वायरल वीडियो क्लिप की वजह से पैदा हुआ. खास तौर पर, ब्रॉडकास्टर ने कहा कि हालांकि फ़िलिस्तीन के समर्थन में न्यूट्रल तरीके से बात रखी जा सकती थी, लेकिन “अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं” (There is no god but Allah) जैसे नारे लगाने से ट्यूशन फ़ीस के विरोध-प्रदर्शन में “धार्मिक भावनाएं या जोश” शामिल हो गया.

इसके अलावा, ज़ी न्यूज़ ने बताया कि शिकायत करने वाले के ख़िलाफ़ FIR दर्ज़ की गई थी और वो अभी AMU का छात्र नहीं है. उसने इन आरोपों को खारिज कर दिया कि उसकी कवरेज की वजह से पुलिस की कार्रवाई हुई; उसका तर्क था कि उनके ब्रॉडकास्ट करने से पहले ही क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी. यहां ये ध्यान देना ज़रूरी है कि वो असल भाषण, जिसके आखिर में प्रदर्शनकारी छात्रों ने नारा लगाया था, 12 अगस्त को हुआ था.

NBDSA का आदेश

शिकायत, संबंधित फ़ुटेज और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद, NBDSA इस नतीजे पर पहुंचा कि ज़ी न्यूज़ ने घटना को चुन-चुनकर ग़लत तरीके से पेश किया और विरोध-प्रदर्शन की मुख्य वजह (कैंपस में फीस बढ़ोतरी) को नहीं दिखाया. बिना किसी संदर्भ के नारे का एक छोटा सा हिस्सा दिखाकर, चैनल ने पूरे प्रदर्शन को फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ युद्ध से जोड़कर ग़लत तरीके से पेश किया.

इसके अलावा, अथॉरिटी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चैनल ने आचार संहिता का गंभीर उल्लंघन किया है; उसने उस संदर्भ को ग़लत तरीके से दिखाया जिसमें विवादित नारा लगाया गया था. साथ ही, भड़काऊ कमेंट्री भी प्रसारित की गई. खास तौर पर, ‘योगी जैसा बर्ताव’ करने की बात कहना उकसाने वाला था; ऐसा लगा कि फ़ीस बढ़ोतरी के बारे में निष्पक्ष ख़बर देने के बजाय, ये प्रदर्शनकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के लिए उकसाने जैसा था.

ज़ी न्यूज़: बार-बार नियमों का उल्लंघन करते हुए पाया जा रहा

ये पहली बार नहीं है जब NBDSA ने ज़ी न्यूज़ को ‘भड़काऊ’ रिपोर्टिंग के लिए फटकार लगाई है. अक्टूबर 2025 में, रेगुलेटरी बॉडी ने ‘मेहंदी जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ पर रिपोर्टिंग को लेकर ज़ी न्यूज़ और टाइम्स नाउ नवभारत पर कड़ी कार्रवाई की थी. इसने ज़ी न्यूज़ को अपनी वेबसाइट और यूट्यूब चैनल से चार वीडियो रिपोर्ट सात दिनों के भीतर हटाने का निर्देश दिया था. एक अन्य आदेश में इसने टाइम्स नाउ नवभारत से अपनी रिपोर्टिंग में आपत्तिजनक टिकर हटाने को कहा था.

हाल ही में इस साल फ़रवरी में ज़ी न्यूज़ पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था. ये जुर्माना एक ऐसी रिपोर्ट के लिए लगाया गया था जिसमें ग़लत दावा किया गया था कि श्रीनगर-जम्मू हाईवे पर एक ट्रक ड्राइवर ने अपनी गाड़ी के ऊपर नमाज़ पढ़ी, जिससे ट्रैफ़िक जाम लग गया. अपने आदेश में NBDSA ने मीडिया आउटलेट्स के लिए सोशल मीडिया पर मौजूद जानकारी के आधार पर स्टोरीज़ करने के लिए कुछ गाइडलाइंस भी जारी की थीं. 3 मार्च 2025 को, ज़ी न्यूज़ के प्रोग्राम ‘DNA’ के एक सेगमेंट में “ट्रक पर नमाज़, हाईवे किया जाम” जैसी हेडलाइंस दिखाई गईं. इसमें दावा किया गया कि ड्राइवर ने दूसरों की परवाह किए बिना हाईवे के बीच में गाड़ी रोकी और एक तरफ का रास्ता ब्लॉक कर दिया, जबकि दूसरी तरफ गाड़ियों की आवाजाही के लिए रास्ता खुला था. ऑल्ट न्यूज़ की फ़ैक्ट-चेक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, शिकायतकर्ताओं ने NBDSA का ध्यान इस बात की ओर दिलाया कि ज़ी न्यूज़ ने एक बिना पुष्टि वाला वीडियो दिखाया था, जिससे सटीकता के मानकों और धार्मिक रूढ़िवादिता से जुड़ी गाइडलाइंस का उल्लंघन हुआ.