भारत में जनवरी से कोविड टीकाकरण तीन चरणों में हो रहा है. तीसरा चरण 1 मई को शुरू हुआ जिसमें 18 से 44 साल के लोगों के लिए टीकाकरण की शुरुआत की गयी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 अप्रैल को सभी राज्यों को वैक्सीन खरीदकर लोगों को मुहैया करवाने के लिए निर्देश दिए थे. अप्रैल में ही सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र की पॉलिसी की आलोचना की थी. 7 जून को प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि केंद्र सरकार अब 75% वैक्सीन खुद ख़रीदेगी और 18 साल से ऊपर की उम्र के सभी लोगों को मुफ़्त वैक्सीन मुहैया करवाएगी.

इसके बाद कई पत्रकारों और मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों ने ये दिखाने की कोशिश की कि केंद्र सरकार का वैक्सीन खरीद के पूरे प्रोग्राम का केन्द्रीकरण करने का प्लान 1 जून को ही शुरू हो गया था. यानी, सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर से एक दिन पहले ही. यानी, वो ये बताना चाह रहे थे कि नरेंद्र मोदी खुद ही ये फ़ैसला ले चुके थे और सुप्रीम कोर्ट की कही बातों का उसपर कोई असर नहीं था.

टाइम्स नाउ की संपादक नाविका कुमार ने लिखा, “मुझे बताया गया है कि वैक्सीन की खरीद का केंद्रीकरण का प्लान 1 जून को नरेंद्र मोदी की मेज़ पर था. डीटेल में हुई प्रेज़ेंटेशन और उनकी हामी की मोहर उसी रोज़ उसपर लग गयी थी. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई 2 जून को थी. अब विपक्ष जाने.” बाद में उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट कर लिया.

एबीपी न्यूज़ ऐंकर विकास भदौरिया ने ‘सरकारी सूत्रों’ का हवाला देते हुए दावा किया कि ‘3 जून’ को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई थी और उससे पहले ही केंद्र का प्लान ‘चालू हो चुका था’. अमन शर्मा, पायल मेहता और मेघा प्रसाद सहित तमाम पत्रकारों ने ऐसे ही ट्वीट किये जिसमें ‘सरकारी सूत्रों’ के हवाले से बात की गयी थी.

रिपब्लिक ने रिपोर्ट किया, ‘भारत सरकार में उच्च दर्जे के सूत्रों ने विपक्ष के दावों का खंडन किया है और कहा है कि फ़्री टीकाकरण के केंद्रीकरण का प्लान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 1 जून को सौंप दिया गया था. प्रधानमंत्री ने उसी दिन इसपर अपनी सहमति दे दी थी जबकि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी एक दिन बाद यानी 2 जून को आयी थी.” ऐसी ही रिपोर्ट्स ANI, याहू न्यूज़, टाइम्स नाउ, ज़ी5, लेटेस्टली, लाइव हिंदुस्तान और नवहिंद टाइम्स ने भी छापीं.

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फ़ैक्ट-चेक

पाठकों को ये जान लेना चाहिए कि तीसरे चरण के टीकाकरण से पहले सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल के आख़िरी हफ़्ते में केंद्र के कोविड मैनेजमेंट पर स्वतः संज्ञान लिया था. तीसरे चरण की सर्वोच्च अदालत ने आलोचना भी की थी. मामला अभी भी जारी है.

30 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आर्टिकल 21 के तहत जीवन के हक़ को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को यही करना चाहिए कि वो ख़ुद ही सभी वैक्सीन ख़रीदे और वैक्सीन निर्माताओं से दाम के मामले में तोल-मोल करे और फिर राज्यों को दे जहां से लोगों तक उसे पहुंचाने की ज़िम्मेदारी का निर्वहन राज्य सरकार करे. अदालत का कहना था कि एक तरफ़ वैक्सीन की खरीद केंद्र के अंडर हो, वहीं राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लोकल सरकार ये काम करे. (कोर्ट की टिप्पणी नीचे पढ़ें या लाइव लॉ के इस दस्तावेज़ के 40वें पन्ने पर जाएं.)

इसलिए, ये कहना कि नरेंद्र मोदी ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के 1 दिन पहले ही 75% वैक्सीन खरीदने और 18 साल से ऊपर के लोगों के लिए मुफ़्त टीकाकरण का प्लान तैयार कर लिया था, ग़लत मालूम देता है.

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई 31 मई को थी और ऑर्डर 2 जून को अपलोड किया गया था. लाइव लॉ के मैनेजिंग एडिटर मनु सेबेस्टियन ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया, “31 मई का ऑर्डर, जो जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़, एल नागेश्वर राव और एस रवीन्द्र भट की बेंच ने पास किया था, 2 जून को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया था. (31 मई के ऑर्डर की ये कॉपी देखें.)

मीडिया आउटलेट्स और पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट की 31 मई को की गयी आलोचना पर ध्यान ही नहीं दिया. असल में 30 अप्रैल को ही सुप्रीम कोर्ट ने सुझाया था कि टीके ख़रीदने के लिए केंद्र की ही ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए.

घटनाक्रम की पूरी टाइमलाइन

टीकाकरण का पहला चरण 16 जनवरी को शुरू हुआ. वैक्सीन की ख़रीद केंद्र कर रहा था.

  • 3 दिन बाद ही भारत सरकार ने घोषणा की – “इन अनुरोधों का जवाब देते हुए, और भारत की वैक्सीन उत्पादन व वितरण क्षमता का उपयोग करके कोविड-19 महामारी से लड़ने में मानवता की हर संभव मदद करने की भारत की प्रतिबद्धता को ध्यान में रखते हुए 20 जनवरी 2021 से भूटान, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार और सेशेल्स को अनुदान सहायता के तहत वैक्सीन की आपूर्ति शुरू की जाएगी।”
  • मीडिया और भाजपा नेताओं ने इस मौके का फ़ायदा उठाते हुए भारत को वैक्सीन बनाने के क्षेत्र में वर्ल्ड लीडर बताना शुरू कर दिया. हालांकि इसमें एक बहुत बड़ा हिस्सा कमर्शियल सप्लाई थी. विदेश मंत्रालय के अनुसार 29 मई तक 663.698 लाख डोज़ भेजी गयी हैं जिसमें 50% से ज़्यादा कमर्शियल सप्लाई का हिस्सा है. इस ट्वीट थ्रेड में आप वैक्सीन डिप्लोमेसी के बारे में पढ़ सकते हैं.
  • 1 फ़रवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के भाषण में 35 हज़ार करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी. ये पैकेज वैक्सीन डेवेलपमेंट और ड्राइव के लिए होगा.

1 मार्च को टीकाकरण का दूसरा चरण शुरू हुआ. इस दौरान भी पहले चरण की ही तरह वैक्सीन की ख़रीद केंद्र के ही ज़िम्मे थी.

  • 1 मार्च को को-विन 2.0 पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन शुरू हुआ.
  • पॉलिसी के अंतर्गत, “प्रतिभागियों को बताया गया कि ऐसे सभी नागरिक जो बुजुर्ग हैं, या जो 1 जनवरी 2022 को 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के हो जाएंगे, टीकाकरण के लिए रजिस्ट्रेशन कराने के लिए पात्र हैं। इसके अलावा ज्यादा आयु के ऐसे सभी नागरिक या 1 जनवरी 2022 को 45 से 59 वर्ष के हो जाएंगे और जो निर्दिष्ट 20 सह-रुग्णाताओं (अनुलग्नक के अनुसार) में से किसी से पीड़ित हैं, भी रजिस्ट्रेशन कराने के लिए पात्र हैं।”

1 मई से तीसरा चरण शुरू हुआ. इस दौरान वैक्सीन ख़रीदने की ज़िम्मेदारी राज्यों को दी जा चुकी थी.

  • अप्रैल से लेकर मई के मध्य तक, भारत कोविड-19 की भीषण चपेट में आया हुआ था. हमने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को चरमराते हुए देखा और मौतों का आंकड़ा रुकने का नाम नहीं ले रहा था. अप्रैल से अब तक 2 लाख के करीब मौतें हो चुकी हैं.
  • दूसरी वेव के दौरान ही भारत सरकार ने टीकाकरण के उदार और तेज़ तीसरे चरण की घोषणा की. वैक्सीन ख़रीद से जुड़े एक बिंदु के मुताबिक़ – “वैक्सीन निर्माताओं को राज्य सरकारों और प्रतियोगी बाज़ारों में भेजी जाने वाली 50% आपूर्ति की कीमतों की अग्रिम घोषणा 1 मई, 2021 से पहले से पारदर्शी तरीके से करनी होगी। इन कीमतों के आधार पर राज्य सरकारें, निजी अस्पताल, औद्योगिकी इकाइयां आदि वैक्सीन निर्माताओं से वैक्सीन की की खुराक खरीदने में सक्षम होंगे।
  • मनु सेबेस्टियन ने ऑल्ट न्यूज़ से कहा, “अप्रैल में कम से कम 6 उच्च न्यायालय महामारी नियंत्रण से जुड़े केस देख रहे थे. 22 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा की थी कि वो महामारी के दौरान अत्यावश्यक सेवाओं के वितरण के मामले में स्वतः संज्ञान ले रहा है. इसमें बताया गया कि ऑक्सीजन सप्लाई, ज़रूरी दवाईयां, टीकाकरण का तौर तरीका और लॉकडाउन के ऐलान का अधिकार मुख्य केंद्र-बिंदु होंगे. पहली सुनवाई 30 अप्रैल को हुई जिसमें डी वाई चंद्रचूड़, एल नागेश्वर राव और एस रवीन्द्र भट की बेंच ने उदार टीकाकरण पॉलिसी में कई कमियां गिनायीं. 30 अप्रैल को पास किये गए ऑर्डर में कोर्ट ने टिप्पणी की थी. 30 अप्रैल को पास किये ऑर्डर में कोर्ट ने प्राइम फ़ेसाई यही माना था कि केंद्र की टीकाकरण की पॉलिसी लोगों के जीवन के अधिकार के प्रति हानिकारक दिख रही थी और उन्होंने केंद्र से इसपर पुनर्विचार करने को कहा.”
  • सेबेस्टियन ने आगे कहा, “अगली सुनवाई 31 मई को हुई. इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि 30 अप्रैल के ऑर्डर पर केंद्र ने जिस तरह से कार्रवाई की है, वो कतई संतोषजनक नहीं है. 31 मई को हुई लम्बी सुनवाई में बेंच ने पैसों को लेकर दोहरी पॉलिसी, अलग-अलग राज्यों के लिए ख़रीद के अलग-अलग तरीके, कोविन ऐप और उससे जुड़ी डिजिटल असमानता वगैरह से जुड़े मुद्दे उठाये. कोर्ट ने ये भी पूछा कि राज्यों को क्यूं ज़्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं और साथ ही ये भी कहा कि पूरे देश में वैक्सीन के दाम एक समान होने चाहिए. कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल को ये भी कहा कि इस पॉलिसी को दोबारा बनाया जाना चाहिए.

जो भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को तफ़सील से पढ़ना चाहते हैं, वो ऊपर लिंक किये गए दस्तावेज़ को पढ़ सकते हैं. लाइव लॉ की रिपोर्ट्स से भी आपको इस मामले के बारे में जानकारी मिल सकती है- पहली रिपोर्ट और दूसरी रिपोर्ट.

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About the Author

Archit is a graduate in English Literature from The MS University of Baroda. He also holds a post-graduation diploma in journalism from the Asian College of Journalism. Since then he has worked at Essel Group's English news channel at WION as a trainee journalist, at S3IDF as a fundraising & communications officer and at The Hindu as a reporter. At Alt News, he works as a fact-checking journalist.