‘द लल्लनटॉप’ के पत्रकार रजत पांडे 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के विरोध प्रदर्शन की कवरेज करने पहुंचे थे, तभी नीली टी-शर्ट पहने एक युवक उनके कैमरे के सामने आ गया. वो न तो कोई छात्र नेता था और न ही आयोजकों का कोई प्रतिनिधि. वो मोहम्मद इरफान था, 35 साल का दिहाड़ी मजदूर जो अपने जैसे मजदूरों के संघर्षों के बारे में बात करने आया था.

इसके बाद एक ऐसी बातचीत हुई, जो जल्द ही पूरे देश में वायरल हो गई. इरफान ने गरीबी, शिक्षा, न्यूनतम मजदूरी और रोजमर्रा की जिंदगी में झेलने वाले अपमान के बारे में बहुत साफगोई और जज्बे के साथ बात की. उसने झुग्गी-बस्ती में पले-बढ़े होने और एक मजदूर के तौर पर परिवार का पेट पालने के अपने कठिन संघर्षों का ज़िक्र किया. कुछ ही दिनों में उसका चेहरा, उसकी बातें और उसकी कहानी पूरे देश में जानी-पहचानी हो गई.

एक फ़ॉलो-अप वीडियो रिपोर्ट में रजत पांडे ने विस्तार से बताया कि कैसे विरोध प्रदर्शन के दौरान 35 साल के इरफ़ान से मिलना हुआ, जो भारत में मज़दूरों की समस्याओं को उठाना चाहते थे. उन्होंने ये भी कहा कि वे इरफ़ान की उस काबिलियत से कितने प्रभावित हुए, जिससे वो तुरंत ही देश में अपनी और हर मज़दूर की मुश्किलों को बयां कर सकते थे.

इरफ़ान की असलियत

सावदा घेवरा की झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास कॉलोनी, राजधानी के हलचल भरे मुख्य इलाके से लगभग 35 किलोमीटर दूर है, जहां इरफ़ान अपने माता-पिता और दो बहनों के साथ रहते हैं. ऑल्ट न्यूज़ से बात करते हुए उन्होंने बताया कि उनका बचपन लक्ष्मी नगर के पास एक झुग्गी इलाके में बीता, जहां से उन्हें लगभग 15 साल पहले JJ कॉलोनी में बसाया गया था. वे सड़क किनारे बर्फ़ के टुकड़े बेचकर और दिहाड़ी कमाकर अपने परिवार का गुज़ारा करते हैं.

इरफ़ान, जिनकी औपचारिक शिक्षा सिर्फ़ आंगनवाड़ी तक ही सीमित रही और जो न तो पढ़ सकते हैं और न ही लिख सकते हैं. लेकिन इन्होंने कई मीडिया इंटरव्यू में संविधान की प्रस्तावना सुनाई. साथ ही, उन्होंने हिंदी-उर्दू शायरी से लेकर न्यूनतम मज़दूरी और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे विषयों पर भी बहुत समझदारी से बात की

जब उनसे पूछा गया कि बिना स्कूल गए उन्होंने संविधान की प्रस्तावना (Preamble) कैसे याद की, तो इरफ़ान ने बताया कि वे इंटरनेट से सीखते हैं — वे अपने फ़ोन पर वॉइस सर्च फ़ीचर का इस्तेमाल करते हैं, AI से मिलने वाले जवाब सुनते हैं, और अगर कोई बात साफ़ नहीं होती, तो वे तब तक बार-बार पूछते हैं जब तक उन्हें तसल्ली न हो जाए. ‘द लल्लनटॉप’ के इंटरव्यू के दौरान, उन्होंने पत्रकार को अपनी सर्च हिस्ट्री भी दिखाई, जिसमें जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी वॉइस सर्च भी शामिल थीं.

भारत में शिक्षा व्यवस्था तक पहुंच न होने के मुद्दे पर बात करते हुए उन्होंने इंटरव्यू में बताया कि हालांकि बेहतर ज़िंदगी के लिए शिक्षा ज़रूरी है, लेकिन ग़रीब परिवारों के बच्चे अक्सर अपनी पढ़ाई पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं. उन्होंने आगे कहा कि इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (ITI) और पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट जैसे टेक्निकल संस्थान, जो असल में कम आय वाले वर्गों को हुनर ​​सिखाने के लिए बनाए गए थे, उनका फ़ायदा ज़्यादातर मिडिल-क्लास परिवार ही उठा पाते हैं, जिससे ग़रीब बैकग्राउंड के बच्चे शिक्षा हासिल नहीं कर पाते.

मज़दूरों की हालत

मेनस्ट्रीम के मंचों पर शायद ही कभी चर्चा होने वाला विषय ‘मज़दूरों की हालत’ पर रोशनी डालते हुए 35 साल के इरफ़ान ने बताया कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (2024) के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में होने वाली कुल आत्महत्याओं में से लगभग एक-तिहाई दैनिक वेतन भोगी मज़दूरों की होती हैं, जिसकी वजह आर्थिक तंगी और मानसिक परेशानी है. उन्होंने बताया कि दिल्ली में तय न्यूनतम वेतन लगभग 18 हज़ार रुपये प्रति माह है, फिर भी ज़्यादातर मज़दूर दिन में 10-11 घंटे काम करते हैं और उन्हें सिर्फ़ 13,000-14,000 रुपये ही मिलते हैं.

इंटरव्यू में इरफ़ान ने कहा था, “पेट भर खाना खा लेना ही जीवन नहीं है” — ये बात लोगों के दिलों को छू गई, क्योंकि इससे पता चलता है कि इंसानी ज़िंदगी के लिए सिर्फ बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करना ही काफी नहीं है. छात्रों के अधिकारों के लिए हो रहे विरोध-प्रदर्शन के बीच, उनकी बातों ने व्यापक स्तर पर लोगों को प्रभावित किया. इससे भारत के मज़दूर वर्ग के संघर्ष और असमान अर्थव्यवस्था के बोझ पर ध्यान गया, जिसके कारण उन्हें सिर्फ ज़िंदा रहने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है.

इंटरव्यू के बाद, कई मीडिया संस्थानों ने सावदा जेजे कॉलोनी में उनके घर का दौरा किया. वहां उन्हें एक ऐसा कमरा दिखा जिसकी छत ठीक नहीं थी; अंदर रहने वाले पांच लोगों के लिए छत की जगह ऊपर एक तिरपाल तानी गई थी. इरफ़ान ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि जब तक झुग्गी-बस्ती में रहने वालों का दर्द अपनी आंखों से न देखा जाए, तब तक उसे महसूस करना नामुमकिन है. उन्होंने आगे कहा कि उनका मानना ​​है कि कई तरह की व्यवस्थागत समस्याएं हैं जो उनके जैसे लाखों लोगों को निराशा की ओर धकेल देती हैं.

उन्होंने कहा, “शिक्षा का कोई मौका न होने और सम्मानजनक नौकरी पाने का कोई प्रोत्साहन न होने के कारण, मुझ जैसे गरीब झुग्गी-बस्ती में रहने वाले लोग स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित रह जाते हैं, जिनका वादा सभी भारतीयों से संविधान में किया गया है.” साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया: “हम कैसे भारत की कल्पना कर रहे हैं?”

एक अनदेखा संघर्ष

उनके वायरल इंटरव्यू के बाद मीडिया ने उन पर जो ध्यान दिया, वो उनकी इस बात के सामने बहुत मामूली लगा: “मोहम्मद इरफ़ान आपको भारत की गलियों में लाखों मिल जाएंगे.” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ये समस्या किसी एक व्यक्ति के संघर्ष से कहीं बड़ी है.

इरफ़ान ने देश में मज़दूरों की बेहद खराब हालत को दिखाने के लिए अपने ही इलाके का उदाहरण दिया. न्होंने बताया कि जिस पुनर्वास कॉलोनी में वे रहते हैं, वहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए प्रवासी मज़दूर रहते हैं. उन्हें रोज़ी-रोटी कमाने के लिए दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में जाना पड़ता है और उससे होने वाली कमाई बमुश्किल गुज़ारा करने लायक ही होती है. सम्मानजनक जीवन जीने की तो बात ही छोड़ दें. उनकी नज़र में, देश भर के मज़दूर—चाहे वे कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले हों, किसान हों, औद्योगिक मज़दूर हों या दिहाड़ी मज़दूर—सभी एक जैसी हक़ीक़त का सामना कर रहे हैं.

उन्होंने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि उनकी झुग्गी बस्ती का लगभग हर परिवार शराब के सेवन से जूझ रहा है. उन्होंने कहा, “नशा नारे से नहीं जाएगा. बड़े-बड़े होर्डिंग पर ‘नशा मुक्त भारत’ का जो नारा लिखा है, उससे नहीं जाएगा. ज़मीन पर आपको उस तरह की व्यवस्था करनी पड़ेगी.” 

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि श्रमिकों की मांगें, जिनके बारे में उनका दावा है कि सालों के उत्पीड़न के कारण अदृश्य हो गई हैं, संवैधानिक गारंटी हैं. उन्होंने पूछा: “क्या वो इस देश के जो अमीर हैं, उसके हिस्सेदारी में नहीं आते? क्या वो ये उम्मीद नहीं रखते कि सरकार उनको बेहतर जीवन दे?.” 

इरफ़ान एक दशक से ज़्यादा वक्त से विरोध प्रदर्शनों और प्रदर्शनों में सक्रिय हैं. उन्होंने ऑल्ट न्यूज़ के साथ बातचीत में कहा कि उन्होंने 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, NRC-CAA विरोध (2019-20), सितंबर 2020 में किसान आंदोलन, 2023 में महिला पहलवानों के विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ सरकारी जवाबदेही और मानवाधिकारों के लिए दबाव डालने वाली कई अन्य सभाओं में भाग लिया था.

इरफ़ान ने दोहराया कि उनका एकमात्र मकसद उनके जैसे गरीब लोगों की जीवन स्थितियों में सुधार करना है जो सरकारी उदासीनता का खामियाजा भुगतते हैं. “मैं किसी सरकार या व्यक्ति का विरोधी नहीं हूं. मैं अन्याय का विरोधी हूं, हिंसात्मक सोच का विरोधी हूं. मैं संप्रदाय की राजनीति का विरोधी हूं. मैं इंसान से इंसान को भेद करने वाला हर बात और सोच का विरोध करता हूं, जो मानवता के लिए खतरा है.” 

राजनेता, पत्रकारों का समर्थन

जंतर-मंतर बवाल के बाद जुलाई के आखिरी हफ्ते में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दिल्ली में इरफ़ान और उनके परिवार से मुलाकात की. इसके बाद, राहुल गांधी ने इंस्टाग्राम पर इरफान के साथ तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा: “इरफ़ान से मुलाक़ात हुई – दिल्ली की बस्ती का एक युवा, जिसकी सोच उसके हालात की मोहताज नहीं है. संविधान की उसकी समझ, देश के प्रति उसका नज़रिया और सीखने की उसकी इच्छा यही बताती है कि भारत की सबसे बड़ी ताक़त उसके युवाओं में बसती है. इरफ़ान जैसे लाखों युवा ही देश की असली उम्मीद हैं – जिज्ञासु, संवेदनशील और अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग.” इरफ़ान के मुताबिक, राहुल गांधी ने कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी से फ़ोन पर बातचीत भी कराई. 

सत्ता से सवाल पूछने के पक्के इरादे के साथ, ‘ऑल्ट न्यूज़’ से बात करते हुए इरफ़ान ने 27 जुलाई को राहुल गांधी के साथ हुई अपनी मुलाक़ात का ज़िक्र किया. उन्होंने कांग्रेस नेता से कहा था कि अगर पार्टी सत्ता में आती है और ये समस्याएं बनी रहती हैं, तो इरफ़ान को सड़कों पर उतरकर फिर से विरोध करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी.

सीनियर पत्रकार अजीत अंजुम ने भी इरफ़ान के घर का दौरा किया और दिखाया कि वो अपने परिवार के साथ कितनी मुश्किल हालत में रहते हैं. उन्होंने इरफ़ान को अपने निजी अनुभवों, पड़ोसियों के संघर्षों और मज़दूरों की बड़ी लड़ाई को और ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए एक मंच दिया. हालांकि, अंजुम सिर्फ़ कवरेज तक ही सीमित नहीं रहे; उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर इरफ़ान का एक यूट्यूब चैनल — ‘मैं इरफ़ान‘ (Main Irfan) — शुरू करने में मदद की. चूंकि इरफ़ान की कहानी ने पूरे देश का ध्यान खींचा था, इसलिए अंजुम ने इसे एक ऐसा ज़रिया के तौर पर देखा जिससे इरफ़ान आगे चलकर अपने जीवन और उसकी चुनौतियों के बारे में वीडियो बनाकर अपने परिवार का गुज़ारा कर सकें.

इसके अलावा, अजीत अंजुम ने ‘मिलाप’ (Milaap) पर इरफ़ान के लिए 10 लाख रुपये के लक्ष्य के साथ एक क्राउडफ़ंडिंग कैंपेन शुरू किया, जो बहुत कम समय में पूरा हो गया. पेज पर अपनी अपील में इरफ़ान ने अपने परिवार के बारे में जानकारी दी, जिसमें उन्होंने अपने दो भाइयों और दो बहनों का ज़िक्र किया और बताया कि उनकी एक बहन रोज़ाना सिर्फ़ 400 रुपये कमाती है. उनकी मुख्य चिंता अपनी बहनों की शादी के लिए पैसे जुटाना और अपने व अपने परिवार के लिए गुज़ारे का एक पक्का ज़रिया बनाना थी.

इरफ़ान के यूट्यूब चैनल की ग्रोथ भी ज़बरदस्त रही; लॉन्च होने के कुछ ही घंटों के भीतर इसके लगभग 26 हज़ार सब्सक्राइबर हो गए और अगली सुबह तक यह संख्या 70 हज़ार को पार कर गई. हालांकि, लॉन्च के एक दिन बाद ही यूट्यूब ने चैनल को सस्पेंड कर दिया, जिससे दर्शकों में नाराज़गी फैल गई. लोगों ने यूट्यूब इंडिया की टीम को टैग किया और जनता के समर्थन से बने और रातों-रात हज़ारों सब्सक्राइबर पाने वाले चैनल को सस्पेंड करने की निंदा की, साथ ही इसे बहाल करने की मांग भी की.

हालांकि, यूट्यूब ने इस मामले की पुष्टि या खंडन करते हुए कोई सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया, लेकिन कुछ दिनों बाद चैनल को बहाल कर दिया गया. फिलहाल, चैनल के लगभग 145,000 सब्सक्राइबर और 32 वीडियोज़ हैं. अपने वीडियो के ज़रिए इरफ़ान न सिर्फ़ अपनी चुनौतियों और भारत में दिहाड़ी मज़दूरों के संघर्षों को सामने लाते हैं, बल्कि अपने छोटे से मोहल्ले के लोगों की खास चुनौतियों को भी उजागर करते हैं — जो अब इस साझा उम्मीद से एकजुट हैं कि सत्ता में बैठे लोग हाशिए पर रहने वालों की आवाज़ सुनेंगे.

ऑल्ट न्यूज़ के साथ अपनी बातचीत को खत्म करते हुए, इरफ़ान ने कवि अदम गोंडवी के शब्दों का सहारा लिया: “आइए महसूस करिए ज़िंदगी की तप को, मैं ले चलूं निर्धनों की गली तक आपको.”