17 अगस्त को भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी नई सोशल मीडिया टीम का ऐलान किया. इसमें दीपक म्हास्के को नेशनल सोशल मीडिया कन्वीनर और प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी, आलोक भट्ट और अरुण यादव को को-कन्वीनर बनाया गया.

जब लोगों में ये जानने की उत्सुकता बढ़ी कि ये नए लोग कौन हैं और पार्टी के साथ उनका क्या जुड़ाव रहा है, तो सोशल मीडिया यूज़र्स ने गौर किया कि ऐलान के तुरंत बाद प्रीति गांधी, शिवानंद द्विवेदी और अरुण यादव ने अपने X अकाउंट प्राइवेट कर लिए और इंटरनेट पर आलोक भट्ट का कोई अता-पता नहीं है.

हालांकि IT सेल के बाकी सभी सदस्य X पर फिर से एक्टिव हो गए हैं (भले ही उन्होंने अपने हज़ारों पुराने पोस्ट डिलीट कर दिए हों), लेकिन आलोक भट्ट इस ग्रुप में अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिनका X हैंडल नई टीम के ऐलान के एक महीने बाद भी एक्सेस नहीं किया जा सकता या ‘प्रोटेक्टेड’ है.

आलोक भट्ट की ऑनलाइन मौजूदगी की बस कुछ ही निशानियां बची हैं: उनका X अकाउंट (जो अब बंद हो गया है), उनके X पोस्ट के स्क्रीनशॉट और OpIndia, Organiser और Swarajya जैसे राईटविंग मीडिया आउटलेट्स में छपे कुछ आर्टिकल्स.

ऑल्ट न्यूज़ ने पाया कि पहले भी आलोक भट्ट को उनके विवादित ट्वीट्स के लिए कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा था. उनके पुराने पोस्ट के आर्काइव किए गए स्क्रीनशॉट में, BJP के इस पदाधिकारी को सेक्सिस्ट, इस्लामोफ़ोबिक और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए देखा जा सकता है; इनमें से कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं:

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आलोक भट्ट कौन हैं?

आलोक भट्ट देहरादून के रहने वाले बताए जाते हैं. इन्होंने अपने करियर में कई तरह के काम किए हैं. उनके लिंक्डइन प्रोफ़ाइल के मुताबिक, उन्होंने उत्तराखंड की हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी (HNBGU) से ग्रेजुएशन किया और कई संस्थाओं के साथ काम किया. इनमें NIIT यूनिवर्सिटी भी शामिल है, जहां उन्होंने अप्रैल 2010 तक फ़ाइनेंशियल कंट्रोलर के तौर पर काम किया.

2010 में उन्होंने ‘नेचर कनेक्ट आउटडोर्स‘ (Nature Connect Outdoors) नामक एक नॉन-प्रॉफ़िट संस्था शुरू की. ये संस्था आउटडोर एजुकेशन और स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में काम करती है, जिसमें ट्रेकिंग, कैंपिंग और राफ्टिंग जैसे एडवेंचर शामिल हैं. वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, आलोक भट्ट ने अपने पैशन को फॉलो करने के लिए अपना कॉर्पोरेट करियर छोड़ दिया था, जिसके बाद इस NGO की शुरुआत हुई. ये संस्था अभी भी काम कर रही है.

आलोक भट्ट (लाल घेरे में) ‘नेचर कनेक्ट’ के एक कार्यक्रम में अभिनेता सुशांत सिंह के साथ

ज़ौबा कॉर्प (Zauba Corp) पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, आलोक भट्ट एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) हैं और RSAC & CO LLP नाम की CA फ़र्म में पार्टनर हैं, जिसे मई 2021 में शुरू किया गया था.

आलोक भट्ट उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के आर्थिक सलाहकार भी रह चुके हैं. हालांकि, ये साफ़ नहीं है कि उन्हें कब नियुक्त किया गया था और उनका कार्यकाल कब ख़त्म हुआ. उन्होंने ‘फ़र्स्टपोस्ट’ के लिए एक आर्टिकल में विवादित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को लेकर आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय का बचाव करते हुए लिखा था. लेखक के परिचय में उन्हें त्रिवेंद्र सिंह रावत का ‘आर्थिक सलाहकार’ बताया गया था.

2020 में जब एक ज़िला अधिकारी की प्रेस रिलीज़ में अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाहों को बढ़ावा देने की बात कही गई और सोशल मीडिया यूज़र्स ने इसकी आलोचना की, तो आलोक भट्ट ने कथित तौर पर ये ट्वीट किया था: “सरकार की ओर से किसी ने भी अंतर-धार्मिक विवाहों को बढ़ावा देने के समर्थन में कुछ नहीं कहा है. BJP सरकार में कोई भी, सपने में भी, ऐसी किसी चीज़ का समर्थन नहीं करेगा, जैसी बातें यहां कही जा रही हैं.”

हमने आलोक भट्ट से और जानकारी लेने के लिए कई बार ईमेल किया और फ़ोन भी किया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

बीजेपी के साथ लंबे समय से जुड़ाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आलोक भट्ट के X हैंडल @alok_bhatt को फ़ॉलो करते थे. असल में 2024 में मोदी ने आलोक भट्ट की एक पोस्ट को कोट-ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने लोगों से ‘साबरमती रिपोर्ट’ फ़िल्म देखने की अपील की थी.

आलोक भट्ट को पहले भी PM मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया गया था. 2024 में राइट-विंग इन्फ्लुएंसर विकास पांडे ने आलोक भट्ट की एक तस्वीर शेयर की, जिसमें उनके साथ BJP की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा, PM की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल और अन्य लोग भी थे. इस तस्वीर के साथ कैप्शन लिखा था – “पहला शपथ ग्रहण.”

हमें 2015 का एक X पोस्ट भी मिला, जिसमें आलोक भट्ट को प्रधानमंत्री के साथ देखा जा सकता है.

अप्रैल 2022 में राईटविंग इन्फ्लुएंसर शेफाली वैद्य (जिनके दावों की ‘ऑल्ट न्यूज़’ ने पहले कई बार पड़ताल की है) ने X पर आलोक भट्ट के साथ एक तस्वीर पोस्ट की और बताया कि वो उनसे उत्तराखंड में मिली थीं. ऑल्ट न्यूज़ ने कई बार शेफाली वैद्य के दावों को ग़लत पाया है. 

गाइडलाइंस फॉलो नहीं करने पर X हैंडल 3 बार सस्पेंड किया गया

ऑल्ट न्यूज़ को 2018, 2019 और 2020 में कम से कम तीन ऐसे मामले मिले, जिनमें X (पूर्व में Twitter) ने कम्युनिटी गाइडलाइंस तोड़ने के लिए आलोक भट्ट के हैंडल के खिलाफ कार्रवाई की थी. इनमें से कम से कम दो कार्रवाइयां नफ़रत फैलाने वाले कंटेंट की वजह से की गई थीं.

2018 में आलोक भट्ट ने कहा था, “पंडितों के हत्यारे, पंडितों के साथ रेप करने वाले, कश्मीर में हत्या करने वाले आतंकवादी, गोधरा कांड को भड़काने वाले और मुंबई में बम धमाके करने वाले सभी मुसलमान थे, और इसलिए इस्लाम ही समस्या है.” तब उनके अकाउंट को ‘लिमिटेड’ कर दिया गया था.

2019 में आलोक भट्ट ने एक पोस्ट में कहा कि “उनके लड़के जिहादियों का मुकाबला कर सकते हैं”. लेकिन एक्टिविस्ट शेला रशीद जैसे “अफवाह फैलाने वालों” के खिलाफ पुलिस कार्रवाई की ज़रूरत है. ट्वीट में लिखा था, “जिहादियों के ये साथी मीडिया की मदद और शह से नफरत फैलाने का अभियान चला रहे हैं… कृपया अफवाहों को दूर करने में हमारे राज्य की मदद करें.” इसके बाद उनका अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया. पॉलिटिकल एनालिस्ट और राइट-विंग इन्फ्लुएंसर सुरेश नखुआ ने ट्विटर पर इस कदम की निंदा की.

2020 में उनका अकाउंट फिर से सस्पेंड कर दिया गया था.

‘द पैम्फलेट’, ‘सावित्र एनालिटिक्स’ और आलोक भट्ट के बीच कनेक्शन

2022 में आलोक भट्ट ने ‘सावित्र एनालिटिक्स मीडिया एंड रिसर्च फाउंडेशन’ में डायरेक्टर का पद संभाला. ये कंपनी उसी साल 26 अप्रैल को बनी थी और शुरुआत में आलोक भट्ट और आशीष नौटियाल को इसके डायरेक्टर के तौर पर शामिल किया गया था. कॉर्पोरेट मामलों के केंद्रीय मंत्रालय (MCA) में जमा किए गए डाक्यूमेंट्स के मुताबिक, आलोक भट्ट के पास कंपनी के 9,500 शेयर (यानी 95 प्रतिशत हिस्सेदारी) हैं, जबकि आशीष नौटियाल के पास बाकी बचे 500 शेयर (यानी 5 प्रतिशत हिस्सेदारी) हैं.

दिलचस्प बात ये है कि आशीष नौटियाल राईटविंग मीडिया आउटलेट ‘द पैम्फलेट‘ के संस्थापक संपादक भी हैं.

सावित्री एनालिटिक्स की कोई वेबसाइट या ऑनलाइन मौजूदगी नहीं है. हमने फ़ाइनेंशियल इयर 2022-23, 2023-24 और 2024-25 के लिए MCA के पास जमा किए गए इसके फ़ाइनेंशियलय रिकॉर्ड देखे और पाया कि इसे सेक्शन 8 कंपनी, यानी एक गैर-लाभकारी संस्था के तौर पर रजिस्टर किया गया था. फ़ाइनेंशियल इयर 2024-25 में, कामकाज से इसकी कुल कमाई 2.7 करोड़ रुपये थी.

तीनों सालों में संगठन की कमाई ‘सेवाओं की बिक्री’ से हुई है, और 2022-23 और 2023-24 की फ़ाइलिंग में ‘मिले अनुदान या दान (सेक्शन 8 कंपनियों के लिए प्रासंगिक)’ वाली लाइनें खाली छोड़ी गई हैं. 2024-25 में ये लाइन मौजूद ही नहीं है.

‘कॉर्पोरेट जानकारी’ के तहत, वे अपनी गतिविधियों के रूप में ‘भारतीय संस्कृति और विरासत के बारे में रिसर्च और जागरूकता…’, ‘व्यापार, कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, रिसर्च, समाज कल्याण, धर्म, दान और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना…’ और ‘शिक्षा, ज्ञान और कौशल विकास को आगे बढ़ाना…’ का उल्लेख करते हैं.

2022-23 की फ़ाइलिंग में ‘प्रोफ़ेशनल खर्च’ नाम की एक कैटेगरी थी, जिसे बाद में ‘कंटेंट प्रोडक्शन खर्च’ का नाम दिया गया. पहले साल में ₹41,48,600 खर्च हुए, दूसरे साल में ₹95,36,600 (सीधे ‘कंटेंट प्रोडक्शन खर्च’ के तौर पर फ़ाइल किए गए) खर्च हुए और तीसरे साल में ₹1,38,53,200 खर्च हुए (इन्हें भी सीधे ‘कंटेंट प्रोडक्शन खर्च’ के तौर पर फ़ाइल किया गया).

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इसके बाद, हमें पता चला कि रिधिका अग्रवाल नामक एक महिला ने लिंक्डइन पर बताया था कि उन्होंने अगस्त 2023 तक ‘सावित्री एनालिटिक्स मीडिया एंड रिसर्च फाउंडेशन’ के लिए कंटेंट राइटर के तौर पर काम किया था. हमने उनकी X टाइमलाइन (जो उनके लिंक्डइन प्रोफ़ाइल से जुड़ी थी) देखी और पाया कि ‘सावित्री’ में काम करने के दौरान उन्होंने ‘द पैम्फलेट’ के लिए कम से कम तीन आर्टिकल लिखे थे. इनमें से कोई भी आर्टिकल अभी वेबसाइट पर मौजूद नहीं है.

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रिधिका का नाम 2023 में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा गठित एक संचालन समिति के गैर-आधिकारिक सदस्य के तौर पर भी शामिल है.

द पैम्फलेट‘ (जिसे पहले ‘द इंडियन अफ़ेयर्स’ के नाम से जाना जाता था) ने पहली बार अप्रैल 2022 में फ़ेसबुक पर पोस्ट किया था; ठीक उसी समय ‘सावित्री एनालिटिक्स’ को भी इनकॉर्पोरेट किया गया था.

द पैम्फलेट दावा करता है कि वो “आधुनिक सूचना तंत्र के शोर-शराबे को दरकिनार करते हुए पाठकों और दर्शकों को भारत और दुनिया को नैरेटिव देने वाले मुद्दों पर स्पष्टता, गहराई और नज़रिया देता है.” इसकी रिपोर्ट्स बीजेपी-समर्थक नैरेटिव को दोहराती हुई लगती हैं. उदाहरण के लिए, 11 अगस्त की एक वीडियो रिपोर्ट का कैप्शन था: “CJP के दो नेताओं: Abhijeet Dipke और Saurav Das के credentials को लेकर public domain में सामने आए सवालों ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं.” इसमें दीपके की बॉस्टन यूनिवर्सिटी की डिग्री, एकेडमिक टाइमलाइन और फंडिंग, साथ ही दास की संपत्ति, किरायेदारी, किराया, पुलिस वेरिफिकेशन और चुनावी रिकॉर्ड पर सवाल उठाए गए.

CJP के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान, एक और रिपोर्ट में मोहम्मद जुनैद पर निशाना साधा गया, जो प्रदर्शनकारियों को खाना खिला रहे थे; रिपोर्टर ने कहा कि शाहीन बाग और किसानों के आंदोलन वाली जगहों पर “ऐसे भाईजान भी देखे गए.” इन रिपोर्ट्स के थंबनेल में केंद्र सरकार की आलोचना करने वाले लोगों की AI-जनरेटेड तस्वीरें थीं, जिनके चेहरों को AI के ज़रिए बिगाड़कर उन्हें नकारात्मक रूप में दिखाया गया था. ये राईटविंग मीडिया आउटलेट्स और सोशल मीडिया ट्रोल हैंडल्स में आम तौर पर अपनाई जाने वाली एक रणनीति है.

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हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस आउटलेट के साथ-साथ अभिजीत अय्यर-मित्रा, लॉ बीट, द जयपुर डायलॉग्स और द संडे गार्डियन को भी समन भेजा. ये समन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रवक्ता सौरव दास द्वारा दायर 2 करोड़ रुपये के प्राइवेसी केस (निजता के अधिकार से जुड़े मामले) के सिलसिले में भेजा गया था. सौरव दास का आरोप था कि इन लोगों ने उनका घर का पता और दूसरी निजी जानकारी ऑनलाइन सार्वजनिक कर दी थी.

नीचे दिया गया वीडियो उस समय का है जब इस आउटलेट का नाम ‘द इंडियन अफ़ेयर्स’ हुआ करता था. वीडियो में आशीष नौटियाल (धारीदार शर्ट पहने हुए) अपने साथियों और शिक्षाविद पवन गुप्ता के साथ दिखाई दे रहे हैं.

आशीष नौटियाल का ‘द पैम्फ़लेट’ के साथ आखिरी वीडियो दिसंबर 2024 में अपलोड किया गया था. जून 2025 में नौटियाल को ‘ऑपइंडिया’ (OpIndia) की टीम के साथ देखा गया. ‘ऑपइंडिया’ के लिए उनका पहला वीडियो – उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी के साथ एक इंटरव्यू – एक महीने बाद, जुलाई 2025 में आया.

नौटियाल अब ‘ऑपइंडिया’ में मल्टीमीडिया और डिजिटल हेड और एडिटर हैं, और MCA की वेबसाइट पर ‘सावित्री’ (Savitr) के डायरेक्टर के तौर पर उनका नाम अब नहीं है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि ‘द पैम्फलेट’ की वेबसाइट पर किसी भी पैरेंट कंपनी, मालिकाना हक, एडिटोरियल टीम, फंडिंग की जानकारी या बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है. ‘हमारे बारे में’ (About Us) पेज पर सिर्फ़ ये बताया गया है कि ये क्या काम करता है. खुद को ‘एक स्वतंत्र डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म’ बताया गया है. इसकी फंडिंग का एकमात्र सार्वजनिक रूप से ज्ञात ज़रिया जो हमें मिला, वह ‘द पैम्फलेट’ की यूट्यूब मेंबरशिप थी, जिसकी कीमत ₹119 से ₹3199 प्रति माह है.

आशीष नौटियाल ही ‘सावित्र एनालिटिक्स’ और ‘द पैम्फलेट’ के बीच एकमात्र कड़ी नहीं हैं. अप्रैल 2023 में शिव कुमार मिश्रा नाम के एक व्यक्ति को ‘सावित्र एनालिटिक्स’ का डायरेक्टर नियुक्त किया गया था. मार्च 2023 में मिश्रा को ‘द पैम्फलेट’ का CEO घोषित किया गया था.

दूसरे शब्दों में कहें तो, ‘सावित्री एनालिटिक्स मीडिया एंड रिसर्च फ़ाउंडेशन’ के तीन में से दो डायरेक्टर ‘द पैम्फलेट’ में सीनियर पदों पर रह चुके हैं. और दोनों ही मामलों में, ‘सावित्री’ और ‘द पैम्फलेट’ में नियुक्तियां बहुत कम समय के अंतराल पर हुईं. इससे ये सवाल उठता है कि क्या ये दोनों संस्थाएं औपचारिक रूप से जुड़ी हुई हैं.

हमें ये भी पता चला कि ‘द पैम्फलेट’ का देहरादून में शुरुआत से ही एक ऑफ़िस था, और आशीष नौटियाल की पोस्ट की गई एक फ़ोटो से साफ़ पता चलता है कि इसकी शुरुआत कम से कम 20 लोगों की टीम के साथ हुई थी. पाठकों को याद होगा कि आलोक भट्ट भी देहरादून से ही हैं.

हालांकि, ये सभी बातें आलोक भट्ट और ‘द पैम्फलेट’ के बीच संबंध की ओर इशारा करती हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि इस रिश्ते को छिपाए रखने की सोची-समझी कोशिश की जा रही है. इसलिए, हमने और गहराई से छानबीन करने की कोशिश की.

क्या आलोक भट्ट ‘द पैम्फलेट’ से जुड़े हैं? हमने ‘द पैम्फलेट’ से ही पूछा

हमने 3 सितंबर को ‘द पैम्फलेट’ को एक ईमेल भेजा और उनसे ‘सावित्री एनालिटिक्स’ और ‘द पैम्फलेट’ के बीच संबंध के बारे में सवाल किया. साथ ही, हमने ये भी पूछा कि क्या आलोक भट्ट ‘द पैम्फलेट’ से जुड़े हैं, क्योंकि ‘सावित्री एनालिटिक्स’ में उनकी 95% हिस्सेदारी है और इस कंपनी के अन्य डायरेक्टर ‘द पैम्फलेट’ में सीनियर पदों पर रह चुके हैं. हमने उनसे उनकी फ़ंडिंग के स्रोतों के बारे में भी पूछा, क्योंकि वेबसाइट पर इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.

जवाब में उन्होंने हमसे कहा कि हम अपने सवाल ‘द पैम्फलेट’ की एक दूसरी ईमेल आईडी पर भेजें और साथ ही आलोक भट्ट, निर्वा मेहता, आशीष नौटियाल और शिव मिश्रा को भी भेजें. दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने हमें इन सभी लोगों की ईमेल आईडी और फ़ोन नंबर भी दिए. इसे अपने आप में ‘द पैम्फलेट’ और आलोक भट्ट के बीच किसी तरह के संबंध का संकेत माना जा सकता है. किसी ऐसी संस्था के लिए ये बहुत कम संभावना है कि वो किसी ऐसे व्यक्ति की सीधी संपर्क जानकारी दे जिसके साथ उसका कोई पेशेवर संबंध न हो.

इसके बाद हमने उन सभी को अपने सवाल भेजे.

आशीष नौटियाल ने हमें जवाब दिया कि उनके रिपोर्टिंग मैनेजर, ऑपइंडिया की एडिटर नूपुर जे. शर्मा ने उन्हें “सलाह” दी थी कि वे “हमें कोई कोट या जानकारी न दें, क्योंकि पॉलिसी के तहत ऐसी संस्थाओं से बात नहीं की जाती जो नेक नीयत से काम नहीं करतीं.” एक दिन बाद, उन्होंने X पर दुनिया को बताया कि ऑल्ट न्यूज़ की एक महिला, “जिनका नाम हिंदू जैसा लगता है”, ने कुछ सवालों के साथ उनसे संपर्क किया था.

Pamphlet की एडिटर निर्वा मेहता ने हमें 1,071 शब्दों का जवाब भेजा, लेकिन हमारे किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया. इसके बजाय, उन्होंने ऑल्ट न्यूज़ की फंडिंग में पारदर्शिता, इसके फ़ाउंडर्स और एडिटर के बाहरी संबंधों और ऑल्ट न्यूज़ से जुड़े लोगों को अभी और पहले मिले ग्रांट के बारे में कई सवाल पूछे. उन्होंने कहा कि अगर ऑल्ट न्यूज़ पहले उनके सवालों का जवाब दे, तो वे ऑल्ट न्यूज़ के सवालों का लिखित जवाब देंगी.

ध्यान देने वाली बात है कि The Pamphlet ने ऑल्ट न्यूज़ पर 16 अगस्त, 2026 को एक वीडियो पब्लिश किया था, जिसमें उन्होंने हमसे बिना कोई जवाब मांगे ही अपने दावे किये थे.

इस आर्टिकल के रिपोर्टर ने निर्वा मेहता को जवाब दिया कि ऑल्ट न्यूज़ की फंडिंग से जुड़े सवाल इसके एडिटर से पूछे जाने चाहिए, जबकि फ़ाउंडर्स के निजी कामों से जुड़े सवाल संबंधित व्यक्ति से पूछे जाने चाहिए. हमने उन्हें ये भी याद दिलाया कि ऑल्ट न्यूज़ के फ़ाउंडर्स पर एक तथाकथित ‘एक्सपोज़’ The Pamphlet ने पब्लिश किया था, जिसमें संबंधित लोगों से जवाब नहीं मांगा गया था — जो पत्रकारिता के बुनियादी नियमों का उल्लंघन है.

अपने आखिरी जवाब में निर्वा मेहता ने नैतिकता के सवाल पर कोई बात नहीं की. इसके बजाय, उन्होंने एक ऐसी मांग की जो कई लोगों को अजीब लग सकती है; उन्होंने इस रिपोर्टर से कहा कि वो “एक ज़िम्मेदार कर्मचारी” के तौर पर उनके सवालों को ‘ऑल्ट न्यूज़’ के डायरेक्टर्स तक पहुंचाए.

इस पॉइंट पर, हमें लगा कि बातचीत जारी रखने का कोई फ़ायदा नहीं है.

अगर ‘द पैम्फलेट’ (The Pamphlet) ‘ऑल्ट न्यूज़’ के इन सवालों का जवाब देता है, तो हम अपना आर्टिकल अपडेट करेंगे: क्या ‘सावित्र एनालिटिक्स’ (Savitr Analytics) और ‘द पैम्फलेट’ किसी तरह से जुड़े हुए हैं? और क्या आलोक भट्ट — जो बीजेपी के नए आईटी सेल सदस्य हैं और ‘X’ (ट्विटर) से दूर रहते हैं — ‘द पैम्फलेट’ में किसी पद पर हैं?

सोशल मीडिया पोस्ट से मिलता है इन सवालों का जवाब

ऐसा लगता है कि ‘द पैम्फलेट’ और आलोक भट्ट के बीच का कनेक्शन इंटरनेट पर सबसे कम छिपे हुए रहस्यों में से एक है. हमें सोशल मीडिया पर कई ऐसे उदाहरण मिले जहां दक्षिणपंथी (राइट-विंग) इकोसिस्टम के जाने-माने चेहरों ने ‘द पैम्फलेट’ टीम के सदस्यों के साथ आलोक भट्ट को टैग किया — चाहे वो ‘दिल्ली शब्दोत्सव 2026’ (Delhi Shabdotsav 2026) के निमंत्रण के लिए उन्हें धन्यवाद देना हो (जिसके कार्यक्रम में ‘द पैम्फलेट पंचायत’ शामिल थी) या संगठन से जुड़े अन्य कार्यक्रमों के सिलसिले में हो.

5 जनवरी 2026 को राईटविंग इन्फ्लुएंसर अभिजीत अय्यर-मित्रा — जिनकी हाल ही में ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ (Newslaundry) के पत्रकारों की तुलना वेश्याओं से करने के लिए आलोचना हुई थी — ने ‘द पैम्फलेट पंचायत’ में बोलने के लिए बुलाए जाने पर ‘द पैम्फलेट’ टीम (जिसमें एडिटर निर्वा मेहता, एंकर श्रेया अरोड़ा और आलोक भट्ट शामिल थे) का धन्यवाद किया.

अभिजीत अय्यर-मित्रा को जवाब देते हुए, निर्वा मेहता और ‘द पैम्फ़लेट’ की एक और कर्मचारी प्रतिभा ने सेशन में शामिल होने के लिए उनका शुक्रिया अदा किया. ये बातचीत इसलिए अहम है क्योंकि इसे ‘द पैम्फ़लेट’ के एडिटर और एक अन्य कर्मचारी की ओर से इस बात की पुष्टि के तौर पर देखा जा सकता है कि आलोक भट्ट संगठन का हिस्सा हैं.

दिल्ली शब्दोत्सव 2026 तीन दिन का एक सांस्कृतिक और साहित्यिक फ़ेस्टिवल था, जो 2 से 4 जनवरी 2026 तक चला. इसे दिल्ली सरकार के कला, संस्कृति और भाषा विभाग के सहयोग से सुरुचि प्रकाशन ने आयोजित किया था. इस इवेंट में ‘द पैम्फ़लेट’ डिजिटल पार्टनर था और इसने फ़ेस्टिवल में ‘द पैम्फलेट पंचायत’ का आयोजन किया. ‘द पैम्फ़लेट’ की टीम ने इन तीन दिनों में कई चर्चाओं का आयोजन और संचालन किया, जिनमें संजीव नेवार, विजय पटेल और सुभी विश्वकर्मा के साथ हुई चर्चाएं भी शामिल थीं. चर्चाओं के विषय ‘लव जिहाद: फ़ैक्टशीट’ से लेकर ‘भारत का दुश्मन पड़ोसी और दुश्मनी को फिर से जगाने की ज़रूरत’ तक थे.

हमने शब्दोत्सव की वेबसाइट पर पोस्ट की गई तस्वीरों को देखा और पाया कि आलोक भट्ट इस इवेंट में मौजूद थे.

आलोक भट्ट और ‘द पैम्फ़लेट’ के बीच का संबंध X पर हुई एक और बातचीत से और साफ़ हो जाता है, जिसमें अभिजीत अय्यर-मित्रा ने सीधे तौर पर निर्वा मेहता को ‘पैम्फ़लेट’ और आलोक भट्ट का ‘स्टाफ़’ कहा. अय्यर ने एक खास तरह की कार पसंद करने के लिए मज़ाक-मज़ाक में मेहता को टोका. आलोक भट्ट को टैग करते हुए उन्होंने लिखा, “क्या @Pamphlet_in, @alok_bhatt और @shreya_arora22 अपने स्टाफ़ के इन घिनौने और बेहद नफ़रत भरे बयानों को सही मानते हैं?” मेहता ने अय्यर-मित्रा की पोस्ट का जवाब तो दिया, लेकिन ‘स्टाफ़’ कहे जाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई.

1 जून 2023 को, ‘द पैम्फलेट’ के शुरू होने के एक साल से कुछ ज़्यादा समय बाद, @saket71 नामक एक यूज़र ने आशीष नौटियाल के साथ एक फ़ोटो पोस्ट की. आशीष उस समय ‘द पैम्फ़लेट’ में काम कर रहे थे और यूज़र ने उन्हें ‘मीडिया मुग़ल’ कहा. बाद में उन्होंने आलोक भट्ट और शिव मिश्रा को टैग किया और “एक बेहतरीन टीम बनाने” के लिए उनकी तारीफ़ की.

‘द पैम्फ़लेट’ के कुछ खास मुकाम हासिल करने पर अलग-अलग मौकों पर कई लोगों ने आलोक भट्ट को बधाई दी है.

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कुल मिलाकर, बीजेपी के सोशल मीडिया को-कन्वीनर के तौर पर आलोक भट्ट के नाम पर गंभीर सवाल सिर्फ़ उनके सोशल मीडिया पर पहले के व्यवहार की वजह से नहीं उठ रहे हैं, बल्कि उनके प्रोफ़ेशनल कनेक्शन को लेकर जो अस्पष्टता है, उसकी वजह से भी उठ रहे हैं. ‘द पैम्फ़लेट’ नाम का एक संगठन, जिससे वे जुड़े हुए लगते हैं, वो अपनी ओनरशिप, एडिटोरियल टीम, बोर्ड या फंडिंग के सोर्स के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई जानकारी नहीं देता है. फंडिंग का कोई साफ़ सोर्स न होने के बावजूद, ये 20 सदस्यों वाले संगठन के तौर पर शुरू होता है. उनकी सैलरी कौन देता है? कामकाज का खर्च कैसे चलता है? इन सवालों का कोई जवाब नहीं है. इसके अलावा, उनसे गहराई से जुड़ी एक और कॉर्पोरेट कंपनी, ‘सावित्री एनालिटिक्स’, की कोई वेबसाइट या ऑनलाइन मौजूदगी नहीं है, जबकि 2025 में उसने 2.7 करोड़ रुपये का ऑपरेशनल रेवेन्यू दिखाया था.

मामला और भी संदिग्ध तब हो जाता है जब हम ‘द पैम्फ़लेट’ के साथ आलोक भट्ट के जुड़ाव को छिपाने की उनके साथियों की ज़बरदस्त कोशिशों पर गौर करते हैं; ये बात संगठन के इस मामले से जुड़े सीधे सवालों का जवाब देने से इनकार करने से साफ़ पता चलती है.

दूसरे शब्दों में एक ऐसा व्यक्ति जो संदिग्ध रिकॉर्ड वाले संगठनों से जुड़ा है, और जिसका सरकार-समर्थक आउटलेट के साथ जुड़ाव सार्वजनिक रूप से तो साफ़ दिखता है, लेकिन उस आउटलेट की अपनी जानकारी में कहीं नहीं मिलता, उसे अब बीजेपी के सोशल मीडिया सेल में एक औपचारिक पद दिया गया है.