भारतीय जनता पार्टी के डिजिटल विंग में परिवर्तन होते ही हिंसक मीम्स और वीडियो के जरिए सोशल मीडिया पर पहले से और आक्रामक प्रचार किया जाने लगा है. 27 अगस्त को भाजपा कर्नाटक ने फिल्म ‘KGF: चैप्टर 2’ की एक क्लिप मीम के रूप में शेयर की. इसमें हीरो, विरोधियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाता है. मीम के जरिए गोलियां चलाने वालों को भाजपा के अलग-अलग राज्यों की इकाई और विरोधियों को ‘दिमागी नक्सल’ बताया गया. साथ ही कैप्शन में लिखा गया, रुकना नहीं है, ‘दिमागी नक्सलियों’ का पूरी ताकत से सामना कर रहे हैं. भाजपा कर्नाटक ने ये वीडियो इंस्टाग्राम पर भाजपा दिल्ली, भाजपा गोवा और भाजपा जम्मू-कश्मीर के साथ कॉलैब करके पोस्ट किया.

भाजपा छत्तीसगढ़ ने वेब सीरीज ‘मिर्ज़ापुर’ की एक क्लिप पोस्ट की. इसमें वेब सीरीज का किरदार ‘मुन्ना भैया’ एक छात्र को लगातार थप्पड़ मारता है. इसमें छात्र को दिमागी नक्सल के रूप में दर्शाया गया. पोस्ट के कैप्शन में लिखा है कि दिमागी नक्सल बनने के बजाय, आप ऐसे व्यक्ति बन सकते हैं जो देश की तरक्की में योगदान दे सके. ध्यान दें कि थप्पड़ मारने वाले एक गुंडा है और जिसे वो थप्पड़ मारा जा रहा है वो एक छात्र है जिसे बीजेपी ने ‘दिमागी नक्सल’ बताया है. 

भाजपा हिमाचल प्रदेश ने वेब सीरीज़ ‘मिर्ज़ापुर’ का एक अन्य सीन पोस्ट किया जिसमें एक किरदार द्वारा पहले चाकू दिखाया जाता है, वहीं दूसरा किरदार अपनी रिवॉलवेर टेबल पर रखता है और दूसरे किरदार को जोरदार थप्पड़ मारता है. इसमें चाकू वाले किरदार को दिमागी नक्सल के रूप में दर्शाया गया है. वहीं दूसरे किरदार को भाजपा हिमाचल प्रदेश दर्शाया गया है. इस पोस्ट के कैप्शन मे लिखा है कि ये दिमागी नक्सल की हालत है.

 

फ़िल्मी मीम्स और क्लिप्स का ये सिलसिला और भी आगे बढ़ता दिखा. BJP बंगाल ने मारपीट का एक और सीन ये कहकर पोस्ट किया, “बस दिमागी नक्सल का लंका लगा रहे हैं.”

इसके बाद, बीजेपी तेलंगाना ने भी ‘दिमागी नक्सल’ को जेन ज़ी के साथ मिलकर मारने का एक मीम पोस्ट किया.

पंजाब भाजपा ने आर्टफ़िशियल इंटेलिजेंस से बना एक वीडियो पोस्ट किया. इसमें एक नाराज अभिभावक को सरकारी स्कूल के अंदर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को थप्पड़ मारते हुए दिखाया गया. वीडियो में क्लास में एक शिक्षक ब्लैकबोर्ड पर गलत स्पेलिंग लिख रहा है जिसे पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल खड़े होकर देख रहे हैं. तभी वो अभिभावक अपने बच्चे की कॉपी में गलतियां पकड़ता है और गुस्से में मुख्यमंत्री को थप्पड़ मार देता है.

बीजेपी पंजाब के पोस्ट में फिल्म KGF या वेब सीरीज़ मिर्ज़ापुर के मीम्स से अलग बात ये थी कि इसमें किसी लेबल को दिखाने के लिए काल्पनिक किरदारों का इस्तेमाल नहीं किया गया. बल्कि इसमें एक राज्य के चुने हुए मुख्यमंत्री पर शारीरिक हमले का सीन आर्टफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से बनाया गया था. और इसे शिक्षा नीति पर टिप्पणी के तौर पर पेश किया गया था. ये पोस्ट फ़िक्शन (कल्पना) के ज़रिए हिंसा को बढ़ावा नहीं दे रहा है, बल्कि एक असली और पहचाने जा सकने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ हिंसा की झूठी तस्वीर बना रहा था. काफी आलोचना के बाद पंजाब भाजपा ने ये पोस्ट डिलीट कर दिया.

‘दिमागी नक्सल’ का संदर्भ

भारत की राजनीतिक शब्दावली में प्रवेश शब्द ‘दिमागी नक्सल’, अब सोशल मीडिया पर हथियार बन रहा है. इसकी शुरुआत लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण से हुई. उन्होंने मंच से ऐलान किया था कि ‘देश ने जंगलों में छिपे हथियारबंद नक्सलियों को तो खत्म कर दिया है. लेकिन ‘दिमागी नक्सली’ अभी भी समाज में सक्रिय हैं. देश की सत्ता में माओवादी सोच के लोग गलियारों में अपनी जगह बना करके बैठे थे. सरकारी कमेटियों में सलाहकार के रूप में भी ये माओवादी सोच ने नीतियों को प्रभावित किया था, उन्हें पहचानकर आइसोलेट करना जरूरी है.’

प्रधानमंत्री ने किसी व्यक्ति या संगठन पर सीधा निशाना नहीं साधा. लेकिन आलोचकों का मानना है कि ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और ‘आंदोलनजीवी’ की तरह ‘दिमागी नक्सल’ भी उसी तरह का एक नया लेबल है जो शब्द पहले सिर्फ राजनीतिक भाषणों से उपजते हैं, बाद में वैचारिक विरोधियों और असहमति जताने वालों को कठघरे में खड़ा करने का औजार बन जाते हैं.

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने ट्वीट करते हुए कहा, “दिमागी नक्सली वो ही हैं जो माओवादियों का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को नहीं मानते, जो अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं और अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं, जो नॉर्थ-ईस्ट को भारत से अलग करने के लिए ‘चिकन नेक’ को काटना चाहते हैं. कपिल सिब्बल और उनकी टीम, शरजील इमाम और उसके ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के सदस्यों को बचाने की कोशिश कर रही है, उसके अलावा पी. चिदंबरम को भी ये साफ़ करना चाहिए कि क्या वो भी इस बयान का समर्थन करते हैं. किसी व्यक्ति के कामों और बातों से ये साबित हो सकता है कि वो ‘दिमागी नक्सली’ है या नहीं.”

प्रधानमंत्री के भाषण के बाद, ‘दिमागी नक्सल’ का ये नैरेटिव सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रहा. वैचारिक विरोधियों के लिए गढ़े गए इस शब्द को भाजपा के सोशल मीडिया हैंडल्स ने ‘दिमागी नक्सल’ को निशाना बनाने के लिए फिल्मों और वेब सीरीज़ के हिंसक दृश्यों का इस्तेमाल करना शुरू किया.

इस पूरे मनगढ़ंत ‘दिमागी नक्सल’ के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का सबसे डरावना पहलू कोई एक वीडियो नहीं, बल्कि इसके पीछे काम कर रहा वो खतरनाक पैटर्न है. दिमागी नक्सल एक ऐसा लेबल बन गया जिसे किसी असल आतंकी गुट के लिए नहीं. बल्कि महज़ अलग राय रखने वालों के लिए गढ़ा गया जिन्हें मीम के ज़रिए बेरहमी से पीटे जाने और गोलियों से छलनी किया जाने का इशारा किया गया.

आलोचक जिस पैटर्न की ओर इशारा कर रहे हैं, वो भारत के हालिया राजनीतिक इतिहास में जाना-पहचाना है. राजनीतिक भाषणों में गढ़ा गया लेबल ज़मीनी स्तर पर अक्सर उन छात्रों, किसानों, आंदोलनकारियों या बुद्धिजीवियों पर चिपका दिया जाता है जिनका एकमात्र अपराध सरकार से अलग राय रखना है. और जब इस असहमति का जवाब किसी फिल्मी हीरो की गोलियों या गुंडे की पिटाई के मीम से दिया जाने लगे, तो ये महज़ एक मीम नहीं बल्कि खुली धमकी जैसी लगती है.

ये सभी वीडियोज़ राज्य हैन्डल्स के इंस्टाग्राम अकाउंट से भी पोस्ट किये गए हैं. ऑल्ट न्यूज़ ने मेटा को इस मामले पर अवगत कराया है. उनकी तरफ से जवाब मिलने पर आर्टिकल को अपडेट किया जाएगा.

भारतीय जनता पार्टी के डिजिटल विंग में हाल ही में बड़ा नेतृत्व परिवर्तन हुआ. पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन की अगुवाई में अरुण यादव, प्रीति गांधी और आलोक भट्ट जैसे चेहरों को अहम ज़िम्मेदारियां सौंपी गई हैं. इन सभी का सोशल मीडिया पर पहले से ही विवादित इतिहास रहा है.

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