स्वतंत्र पत्रकार लोकभद्र सिंह, मोनिका सिंह, बिंदु गुर्जर और सौरभ भाटी ने आरोप लगाया है कि मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले में आदिवासी बच्चों की मौतों पर रिपोर्टिंग करने के बाद उनपर निगरानी और दबाव बनाने की कोशिश की गई. वहाँ से लौटने के बाद उनके इंस्टाग्राम अकाउंट बार-बार सस्पेंड किये गए. बिंदु और मोनिका के अकाउंट बाद में वापस आ गए, लेकिन उनकी रीच प्रभावित हुई. लोकभद्र का अकाउंट अब भी सस्पेंड है. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने इन पत्रकारों के अकाउंट सस्पेंड होने पर इसकी निंदा की है. पत्रकारों को डराने या चुप कराने की कोशिश बताकर इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की गई है.

बिंदु गुर्जर बताती हैं कि सबसे पहले उन्हीं का अकाउंट निशाने पर आया. 5 सितंबर को बालाघाट अस्पताल वाली रिपोर्ट पर कॉपीराइट स्ट्राइक आया था, जबकि यह पूरी तरह उनकी ओरिजिनल रिपोर्टिंग थी.

6 सितंबर को उनके फ़ोन पर तीन अलग-अलग जगहों से उनकी आईडी में लॉगिन करने की कोशिश के अलर्ट आए. इससे पहले कि वे कुछ समझ पातीं, दोपहर करीब ढाई बजे उनका अकाउंट सस्पेंड कर दिया गया. उन्होंने पहले आधार कार्ड डालकर पहचान वेरिफ़ाई करने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही. 24 घंटे बाद उसमें पैन कार्ड का विकल्प आया, जिसके इस्तेमाल से उनका अकाउंट अगले दिन सुबह करीब 10 बजे बहाल हुआ. बिंदु के मुताबिक़, उनके अकाउंट की रीच अब तक प्रभावित है.

बिंदु का अकाउंट सस्पेंड होने के कुछ ही घंटे बाद, 6 सितंबर की शाम मोनिका सिंह का अकाउंट सस्पेंड हुआ. एक ही दिन में यह दो बार हुआ. हर बार अपील के बाद अकाउंट बहाल हुआ.

इन सबमें सबसे ज़्यादा फॉलोअर वाला लोकभद्र सिंह का अकाउंट था. और ये सबसे ज़्यादा बार सस्पेंड हुआ. पहली बार 6 सितंबर शाम 5:47 बजे अकाउंट सस्पेंड हुआ, जो रात 10:30 बजे अपील करने पर करीब 30 मिनट में बहाल हो गया. इसके बाद लोकभद्र सिंह का अकाउंट 7 सितंबर, 8 सितंबर, और फिर 9 सितंबर रात करीब 11 बजे चौथी बार सस्पेंड किया गया. उन्होंने बताया कि इस बार उन्होंने अपील नहीं की है, क्योंकि कुछ साइबर विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि यह हैकरों की कोशिश भी हो सकती है, जो अपील करते ही दोबारा हमला कर सकते हैं, इसलिए उन्हें कुछ दिन रुककर देखने की सलाह दी है.

मेटा द्वारा इन पत्रकारों के अकाउंट को सस्पेंड करने के जो कारण दिए गए थे वो बिल्कुल एक जैसे थे. इसमें बताया गया था कि आपका अकाउंट या उस पर की गई एक्टिविटी, अकाउंट इंटेग्रिटी हमारे कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स को फॉलो नहीं करती है. इसके तहत ऐसा अकाउंट बनाना जो किसी अन्य व्यक्ति का लगे, लोगों को धोखा देने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की फ़ोटो का उपयोग करना या ऐसा कंटेंट बनाना शामिल है जो किसी अन्य व्यक्ति की ओर से बोलने का दिखावा करता हो.

चारों पत्रकारों में से सौरभ भाटी का निजी अकाउंट सस्पेंड नहीं हुआ, चूंकि तीन पत्रकारों के अकाउंट पर लगातार कार्रवाई देखकर उनकी टीम ने एहतियातन अपना अकाउंट और साझा रिपोर्टिंग पेज ‘Unsalted’ कुछ समय के लिए डीएक्टिवेट कर दिया था, जिसे बाद में उन्होंने चालू कर दिया. मोनिका सिंह और सौरभ भाटी Unsalted नामक पेज से रिपोर्टिंग करते हैं.

मध्य प्रदेश के बालाघाट ज़िले के आदिवासी इलाकों से करीब जून-जुलाई से ही बुखार, शरीर पर दाने या अन्य लक्षणों से बच्चों की मौत की खबरें आनी शुरू हुईं. यह इलाका कभी नक्सल-प्रभावित माना जाता था, जिसे राज्य सरकार ने पिछले साल दिसंबर में नक्सल-मुक्त घोषित किया था. मरने वाले ज़्यादातर बच्चे बैगा समुदाय से थे, जो एक विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह है. इसके अलावा, कुछ बच्चे गोंड परिवारों के भी थे, जो ज़िला मुख्यालय से 100 से 150 किलोमीटर दूर घने जंगलों के बीच बसे गाँवों में रहते हैं.

शुरुआत में ये मामला स्थानीय स्तर पर सीमित था और सरकार का आधिकारिक आंकड़ा आठ मौतों का था. लेकिन अगस्त आते-आते आदिवासी संगठनों और विपक्ष ने ये संख्या 24 से 30 कहीं ज़्यादा बताना शुरू कर दिया. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को उठाया और मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर 30 मौतों का ज़िक्र किया और पानी, पोषण व समय पर इलाज न मिलने को इसकी वजह बताया. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी एक जनहित याचिका पर राज्य सरकार से जवाब माँगा है, जिसमें 30 से अधिक मौतों और 50 बिस्तर वाले अस्पताल में करीब 400 बच्चों के भर्ती होने का दावा किया गया है.

सच दिखाने की कीमत – अकाउंट सस्पेंड?

अगस्त के अंत में ये चारों पत्रकार मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत पर रिपोर्टिंग करने पहुंचे. गांव-गांव जाकर और प्रभावित परिवारों से मिलकर उन्होंने बच्चों की मौत से जुड़े आंकड़ों की पड़ताल शुरू की. 

सरकार द्वारा आठ बच्चों की मौत के आंकड़े और गांव-गांव से बढ़ते हुए आंकड़ों के बीच अंतर थी. रिपोर्टिंग के दौरान इन पत्रकारों ने स्थानीय अस्पताल की स्थिति भी दिखाई, जहां एक ही बेड पर कई बच्चों का इलाज किया जा रहा था. लोगों के पास पीने के लिए साफ पानी नहीं था. ये सब सच्चाई सामने आने लगी तो उनका पीछा किया गया और उन पर अधिकारियों से मिलने का दबाव बनाया गया. होटल छोड़ने के लिए मजबूर किया गया. ऐसे हालात में 3 सितंबर की रात उन्हें बालाघाट छोड़ना पड़ा.

ऑल्ट न्यूज़ ने लोकभद्र सिंह, मोनिका सिंह और बिंदु गुर्जर से बात की.

लोकभद्र सिंह

लोकभद्र सिंह 28 अगस्त को दिल्ली से बालाघाट पहुँचे. उन्होंने बताया कि स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया के ज़रिए उन्हें पहले ही पता चल चुका था कि सरकारी आंकड़े में सिर्फ आठ बच्चों का ज़िक्र है, जबकि ज़मीनी स्तर पर 24 बच्चों की मौत की बात हो रही है. बालाघाट पहुंचते ही उसी शाम उन्होंने जनपद पंचायत के सामने चल रहा प्रदर्शन कवर किया, और फिर ज़िला अस्पताल पहुँचे. वहां के स्टाफ ने उन्हें बताया, ‘पिछले 12 दिनों में मलेरिया या खसरे जैसे लक्षण वाले 250 से ज़्यादा बच्चों को भर्ती किया गया है’.

अगले दिन लोकभद्र सिंह बालाघाट से करीब 120 किलोमीटर दूर बिरसा ब्लॉक के बोंदारी इलाके पहुँचे. यहां सबसे ज़्यादा बच्चे प्रभावित थे. उन्हें पता चला कि जो 24 बच्चों की मौत का आंकड़ा है, वह असल में बढ़कर 30 हो चुका है. इनका तब तक कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं था. लोकभद्र सिंह ने इन छह बच्चों का अलग से डेटा जुटाया और उनके परिवारों से मिलकर घर-घर जाकर वीडियो रिपोर्टिंग शुरू की. नीचे एम्बेड किया गया वीडियो लोकभद्र सिंह के बैकअप अकाउंट का है.

 

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1 सितंबर को रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें पता चला कि ज़िला अस्पताल में उस दिन शाम को डीएम का दौरा होने वाला है. इसलिए वे दौरे से पहले ही शाम को अस्पताल के हालात देखने पहुँचे. उन्होंने कहा, “इससे पहले मैंने जब अस्पताल की रिपोर्टिंग की थी, तब लगभग हर बिस्तर पर चार बच्चे लेटे मिले थे. इनमें से कुछ को मलेरिया और कुछ को खसरे जैसे लक्षण थे. जैसे ही डीएम के आने की खबर फैली, अस्पताल में सफ़ाई का काम शुरू हो गया, चादरें बदली गईं, नए बिस्तर लगाए गए.”

डीएम के आने पर लोकभद्र सिंह ने सीधा सवाल पूछा कि सरकारी आंकड़े में आठ बच्चों की बात है, जबकि आंकड़ा 30 तक पहुँच चुका है. डीएम ने इस पर कोई साफ़ जवाब नहीं दिया.

 

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‘आदिवासी परिवेश से होने की वजह से अस्पताल में भीड़’ – डीएम

लोकभद्र ने डीएम से एक ही बिस्तर पर कई बच्चों के होने का सवाल किया. डीएम ने बेहद असंवेदनशील जवाब देते हुए कहा, “आदिवासी परिवेश से आने वाले बच्चों में कई बार चार-चार सिबलिंग्स होते हैं, उनके पेरेंट्स भी रहते हैं, इसलिए भीड़ ज़्यादा लगती है”. पत्रकारों ने पलटकर पूछा कि सिबलिंग्स भी हों तो एक को मलेरिया और दूसरे को खसरा होने पर उन्हें एक बिस्तर पर कैसे रखा जा सकता है. डीएम ने इसका भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया, इसी क्रम में डीएम ने कैमरे पर पहली बार 24 का आंकड़ा स्वीकार किया.

लोकभद्र सिंह के मुताबिक़, ‘आगे और सवाल पूछे जाने पर डीएम झुंझला गए और कैमरे को हाथ से झटक कर वहां से चले गए.’

इस घटना के वीडियो कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, खबरें चलने लगी कि बालाघाट के डीएम मीडिया के सवालों से बचते हुए नज़र आए.

लोकभद्र ने बताया, “उसी रात करीब 2 बजे दो लोग, एक पुलिस वर्दी में और एक सिविल कपड़ों में मेरे होटल के कमरे पर पहुँचे और होटल मैनेजर से मेरी पहचान से जुड़े डॉक्यूमेंट्स माँगे. जबकि ये डॉक्यूमेंट्स चेक-इन के वक्त ही दिए जा चुके थे. अगली सुबह मैनेजर ने कहा कि पुलिस वाले चेकिंग के लिए आए थे और आधार कार्ड का प्रिंट-आउट न होने की वजह से दोबारा मांगा. मैंने मैनेजर से बहस भी की और पूछा कि क्या पुलिस की तरफ़ से निगरानी रखने का दबाव बनाया जा रहा है, मैनेजर ने इससे इनकार कर दिया. लेकिन उसी दिन जब मैं होटल से बाहर निकला, तो आसपास की दुकानों पर पुलिस के स्टीकर वाली एक गाड़ी और तीन-चार सिविल ड्रेस में पुलिसकर्मी खड़े मिले. मैंने जैसे ही कैमरा खोला, ये लोग पोस्टरों के पीछे छिपते नज़र आए.”

होटल खाली करने को कहा गया

लोकभद्र सिंह बताते हैं कि 3 सितंबर को बालाघाट में आदिवासी संगठनों के आह्वान पर एक बड़ा ज़िला बंद प्रदर्शन होना था. उसी दिन होटल का मालिक खुद आया और कहा कि उनके घर एक पारिवारिक कार्यक्रम है, इसलिए पूरा होटल खाली कराया जा रहा है, जबकि वे छह दिन से उसी होटल में ठहरे हुए थे और इससे पहले कभी ऐसी कोई सूचना नहीं दी गई थी.

बहस के बाद तय हुआ कि प्रदर्शन कवर करने के बाद शाम को कमरे खाली कर दिए जाएँगे. प्रदर्शन के दौरान वही सिविल ड्रेस वाले लोग लगातार उनका पीछा करते और वीडियो बनाते रहे. प्रदर्शन ख़त्म होने पर जब वे होटल लौटकर चेक-आउट कर रहे थे, तब भी वही पुलिसकर्मी वहां मौजूद थे. खाना खाकर करीब एक घंटे बाद जब उन्हें लगा कि पुलिस जा चुकी है और वे रेलवे स्टेशन के लिए निकले, तो रास्ते में भी पुलिस की गाड़ी मिली और स्टेशन पर भी सिविल ड्रेस में पुलिसकर्मी उनका पीछा करते मिले.

लोकभद्र सिंह के मुताबिक़, “इस बीच बालाघाट के कुछ स्थानीय इन्फ्लुएंसरों ने मेरे ख़िलाफ़ वीडियो बनाना शुरू कर दिया. यह कहते हुए कि मुझे मीडिया एथिक्स नहीं पता, डीएम से सवाल पूछने का तरीक़ा ग़लत था.”

लोकभद्र सिंह ने यह भी बताया गया कि एसपी ने एक बैठक में यह कहा था कि दिल्ली से आए इन चार लोगों को “सबक सिखाया जाएगा”, यह बात उन्हें एक स्थानीय इन्फ्लुएंसर ने बताई, जो ख़ुद उस बैठक में मौजूद था. इसी दबाव भरे माहौल के चलते वे 3 सितंबर की रात को ही बालाघाट से निकल गए.

बालाघाट ज़िला अस्पताल के प्रभारी डॉक्टर नीलय जैन का एक वीडियो लोकभद्र सिंह के पास है. नीलय जैन उस वीडियो में कहते हैं, “एसडीएम अस्पताल आए थे, तो उन्होंने कहा था कि दिल्ली से जो लोग आए थे, उनमें से कुछ लोग जामिया मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्कॉलर थे, इसलिए यह देखना होगा कि इन्हें अस्पताल में एंट्री या परमिशन देनी है या नहीं.”

लोकभद्र सिंह ख़ुद जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता में मास्टर्स कर चुके हैं. उनका कहना है कि यह ठीक उसी तरह का माहौल बनाने की कोशिश थी, जैसा जामिया को लेकर पूरे देश में बार-बार बनाया जाता रहा है. उन्होंने बताया, “इसका असर यह हुआ कि अगले दिन रिपोर्टिंग के वक्त कुछ स्थानीय लोगों ने उनसे पूछना शुरू कर दिया, “भैया, आप जामिया से पढ़े हो क्या?”, और कुछ ने तो यह भी पूछा कि “जेएनयू और जामिया एक ही है या अलग-अलग?”

एसपी से मिलने को कहा गया

लोकभद्र सिंह ने यह भी बताया, “जब मैंने डीएम से सवाल किया था, उसी रात एक स्थानीय इन्फ्लुएंसर बार-बार मेरे होटल आकर एसपी से मिलने का आग्रह किया. मैंने निजी तौर पर रात में मिलने से इनकार करते हुए एक औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की माँग रखी. इसकी वजह मैंने यह बताई कि नए शहर में, रात के वक्त, दो महिला पत्रकारों समेत किसी अनजान गाड़ी में बैठकर जाना सुरक्षा की दृष्टि से ठीक नहीं था. अगले दिन जब हम रिपोर्टिंग के लिए गए हुए थे, तो उसी होटल में रुके अन्य पत्रकार ने बताया कि कुछ लोग होटल आकर हमारा पता और नाम पूछ रहे थे.”

मोनिका सिंह

मोनिका सिंह और सौरभ 31 अगस्त को बालाघाट पहुंचे थे. मोनिका बताती हैं कि वे इस स्टोरी को दिल्ली से ही फॉलो कर रही थीं. “शुरुआत में सिर्फ स्थानीय इन्फ्लुएंसर और शहर के पत्रकारों के पेज पर ही जानकारी थी, कोई आधिकारिक रिकॉर्ड सामने नहीं था. आधिकारिक आंकड़ा 8 मौतों का था, लेकिन प्रदर्शन कर रहे लोगों और उन परिवारों से बात करने पर मालूम चला कि उनके बच्चे का नाम किसी लिस्ट में नहीं है.”

मोनिका कहती हैं, “ज़मीन पर पहुंचने के बाद पता चला कि यह आंकड़ा 24 से बढ़कर 30 हो चुका है.”

6 अगस्त को इलाज के अभाव में एक बच्चे की मौत के बाद उसके घर के सामने अस्थायी अस्पताल बना 

मोनिका ने उस वायरल वीडियो का भी ज़िक्र किया, जिसमें मुख्यमंत्री एक महिला से कहते नज़र आए कि “तुम अभी कुछ मत बोलो, तुम ज़्यादा बोलती हो”. मोनिका ने बताया कि ये महिला उस बच्चे की बहन थी, जिसकी मौत सबसे पहले हुई थी. लेकिन प्रशासन ने अपनी गिनती बहुत बाद की तारीख़, 23 जुलाई के आसपास शुरू की, इसलिए उस पहले बच्चे को कभी गिनती में ही नहीं लिया गया. 6 अगस्त को एक और बच्चे की मौत के बाद प्रशासन ने हरक़त में आते हुए 7 अगस्त को उसी बच्चे के घर के ठीक सामने एक अस्थायी अस्पताल बनवाया. ये उस परिवार के लिए बेहद पीड़ादायक था, क्योंकि एक दिन पहले ही इलाज़ के अभाव में उनके बच्चे की मौत हुई थी और अगले ही दिन से सैकड़ों दूसरे बच्चे उनके घर के सामने इलाज़ करवा रहे थे.

बीमारी की वजहों पर मोनिका सिंह बताती हैं, “बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, भले ही इसे कोई खुलकर स्वीकार न करें, क्योंकि भुखमरी से मौत मान लेना प्रशासन की बड़ी नाकामी मानी जाएगी. इसके अलावा, पहाड़ी-आदिवासी इलाके में बच्चों की इम्युनिटी कमज़ोर है, मलेरिया हर साल होता है पर आमतौर पर सुर्खियों में नहीं आता, और खसरे के लक्षण शरीर पर साफ़ दिखते हैं, फिर भी अधिकारी सीधे खसरे का नाम लेने से बचते हैं और सिर्फ़ मलेरिया की बात करते हैं.”

हालांकि, ऑफ द रिकॉर्ड डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल ने बताया कि बच्चे कुपोषित हैं, खसरा भी हैं और मलेरिया की भी समस्या है.

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कोई सुविधा नहीं

मोनिका सिंह सोनगुड़ा पहुंची, वहां से ज़िला अस्पताल 50 से 150 किलोमीटर दूर था. सोनगुड़ा गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक भी मरीज़ का इलाज करने लायक सुविधा नहीं थी. मोनिका ने बताया, “मरीज़ को सीधे एंबुलेंस में बिठाकर 90 किलोमीटर दूर ज़िला अस्पताल भेजा जाता था. कमज़ोर इम्युनिटी और लंबी यात्रा की वजह से, कई बच्चों की मौत रास्ते में ही हो जाती थी.”

मोनिका के मुताबिक, “कुछ मामलों में परिवार अस्पताल ले ही नहीं गए क्योंकि उस इलाके में झाड़-फूँक पर ज़्यादा भरोसा है. कुछ बच्चों की मौत अस्पताल पहुँचने के रास्ते में हो गई, जिनकी मौत की वजह डॉक्टर ने दर्ज ही नहीं की, इसलिए उनका नाम भी किसी सूची में नहीं है. कुछ को ज़िला अस्पताल से महाराष्ट्र के गोंदिया अस्पताल में रेफ़र कर दिया गया, राज्य के बदल जाने से वे बच्चे मध्य प्रदेश की सूची से बाहर हो गए.”

इसीलिए मोनिका मानती हैं कि असली आंकड़ा 30 से भी ज़्यादा हो सकता है. हालांकि, उनके पास दर्ज आंकड़ा 30 का ही है.

मोनिका ने बताया कि जहां 30 बच्चों की मौत हो चुकी है, वहां अस्पताल की मृत्यु-दर की जाँच करने पर आधिकारिक मृत्यु-दर शून्य दर्ज है. “इसकी वजह यह थी कि हल्का ठीक होते ही बच्चों को डिस्चार्ज कर दिया जाता है, जो कुछ दिन बाद फिर बीमार होकर लौट आते हैं, यह एक लूप की तरह चलता रहता है. जो बच्चे बहुत गंभीर हालत में होते हैं, उन्हें सीधे महाराष्ट्र के गोंदिया भेज दिया जाता है, जिससे उनका आंकड़ा भी स्थानीय सूची से कट जाता था.”

‘एक बिस्तर पर अलग-अलग बीमारी से पीड़ित तीन-चार बच्चे’

मोनिका ने बताया कि अस्पताल में बिस्तरों की भारी कमी थी, वहां एक बिस्तर पर तीन-चार बच्चे, जिनमें कोई खसरे का, कोई मलेरिया का, कोई कुपोषण का और कोई सामान्य बुखार का मरीज़ होता, जिससे संक्रमण और फैलता है, क्योंकि खसरा संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने आदि से फैलता है.

मोनिका सिंह ने रिपोर्टिंग के दौरान दो अलग-अलग समय पर अस्पताल कवर किया. एक बार दिन में यह देखने कि कितने बच्चे आ रहे हैं और उन्हें कैसे रखा जा रहा है, और एक बार रात करीब 2 बजे यह देखने कि स्टाफ किस हालत में काम कर रहा है. मोनिका सिंह ने बताया कि वहां स्टाफ की भारी कमी थी, एमपी पुलिस के कुछ लोग नर्स जैसा काम कर रहे थे, दवाई दे रहे थे, जबकि असली नर्स गिनी-चुनी थीं और डॉक्टर लगभग नदारद, इमरजेंसी में उन्हें बुलाए जाने पर समय लग जाता है. इलाज के लिए जो बच्चे करीब 100 किलोमीटर से आ रहे हैं वो अगर शाम में निकलते हैं, तो उनको हॉस्पिटल पहुंचते-पहुंचते सुबह के दो-तीन तो बज जाते हैं, तो उस समय उन बच्चों को स्टेबल करने वाला अस्पताल में कोई नहीं होता.

जब यह सब रिपोर्टिंग फैलने लगी, तो 1 सितंबर की शाम डीएम अस्पताल पहुँचे. मोनिका के मुताबिक़, जिस वार्ड को उन्होंने एक दिन पहले एक बिस्तर पर चार बच्चों के होने का रिपोर्ट किया था, उसी वार्ड में डीएम के आने पर एक बिस्तर पर एक ही बच्चा मिला और पूरी सफ़ाई हो चुकी थी. एक नर्स ने बताया कि उस दिन 34 बच्चे डिस्चार्ज किए गए हैं, जबकि पिछले एक महीने में कभी एक दिन में इतने बच्चे डिस्चार्ज नहीं हुए थे.

 

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मोनिका सिंह बताती हैं कि पत्रकारों ने जब डीएम से मौत का आंकड़ा पूछा तो उन्होंने कहा कि वे आंकड़े नहीं बता सकते और आगे बढ़ गए. गार्डों ने पत्रकारों को पीछे धकेलना शुरू किया, और इसी घबराहट भरी स्थिति में डीएम के मुँह से 24 का आंकड़ा निकल गया, इसके बाद से 2 सितंबर से हर जगह यही आंकड़ा दोहराया जाने लगा, जबकि उससे पहले हर जगह आठ का ही ज़िक्र था.

वीडियो वायरल होने के करीब आधे-एक घंटे में ही स्थानीय लोगों ने उन्हें वहाँ से निकल जाने की सलाह दी, यह कहते हुए कि हालात बिगड़ सकते हैं. कुछ लोग उन्हें आधी रात तक इधर-उधर घुमाते रहे, जिससे बाद में पता चला कि इस दौरान एसपी और स्थानीय पुलिस उनके होटल की निगरानी कर रहे थे और प्रदर्शन स्थल पर जाकर पूछताछ कर रहे थे कि ये चारों लोग कौन हैं. रात को होटल पहुँचकर उन्होंने अपनी वीडियो पोस्ट कीं और अगली सुबह गाँव में आगे की रिपोर्टिंग के लिए निकल गईं.

2 सितंबर को जब वे नो-नेटवर्क ज़ोन में थीं, तब एक अन्य पत्रकार का संदेश आया कि होटल में कुछ लोग उनके बारे में पूछने आए थे. शाम को नेटवर्क मिलने पर उन्हें यह संदेश दिखा. लौटते वक्त लगभग हर जगह सिविल ड्रेस में लोग उनका पीछा करते नज़र आए. वे बाइक से आगे थे, तो पीछा करने वाले बिल्कुल पीछे-पीछे चल रहे थे.

बिंदु गुर्जर

बिंदु गुर्जर 27 अगस्त की दोपहर दिल्ली के निज़ामुद्दीन से बालाघाट में रिपोर्टिंग के लिए रवाना हुईं. बिंदू बताती हैं कि ये यात्रा पहले से तय नहीं थी, इसलिए वे बिना रिज़र्वेशन के जनरल डिब्बे में ही निकल पड़ीं. 28 अगस्त सुबह करीब 10 बजे वे गोंदिया पहुँचीं और वहाँ से बस पकड़कर बालाघाट गईं. बालाघाट के बीचों-बीच, ज़िला अस्पताल से महज़ एक किलोमीटर दूर, मुख्य सड़क पर प्रदर्शन चल रहा था. वहाँ लोगों से बातचीत करने पर पता चला कि सरकार अब भी सिर्फ़ आठ बच्चों की मौत का आंकड़ा मान रही है.

बिंदु बताती हैं कि रिपोर्टिंग के लिए ज़मीनी तैयारी करते वक़्त ही उन्हें पता चल गया था कि यहाँ बैगा समुदाय पीवीटीजी में आता है, और केंद्र की पीएम जनमन योजना और राज्य की योजनाओं के तहत बैगा माताओं को हर महीने ₹1,500 मिलते हैं ताकि वे बच्चों के लिए पोषण आहार ख़रीद सकें, लेकिन ज़मीन पर स्थिति अच्छी नहीं है.

28 अगस्त को ही उन्होंने बालाघाट के सरकारी अस्पताल का दौरा किया, जहाँ मरीज़ों की भीड़ थी. उन्हें वहाँ मालूम हुआ कि बैगा और गोंड समुदाय के मरीज़ों के लिए अलग वार्ड बनाए गए थे, जो बालाघाट के बाकी मरीज़ों के वार्ड से अलग थे. तीन वार्डों में मिलाकर 100 से ज़्यादा मरीज़ थे, और हालात यह थे कि एक-एक बिस्तर पर दो से ज़्यादा मरीज़ और पूरा परिवार वहीं मौजूद था. बिंदु ने बताया, “मरीज़ों में छोटे बच्चों की संख्या ज़्यादा थी, एक-दो साल के बच्चों से लेकर करीब 13 साल तक के बच्चे भी वहाँ मिले.”

माता-पिता की अनुमति के बगैर हुआ अंतिम संस्कार

बिंदू के मुताबिक, “वहाँ मौजूद एक परिवार से बात करने पर पता चला कि हाल ही में जिस बच्चे की मौत हुई थी, उसके माता-पिता बालाघाट में नहीं रहते, वे रोज़गार के लिए बेंगलुरु गए हुए थे. जब उन्हें बच्चे की तबियत ख़राब होने की सूचना मिली, तब तक वे रास्ते में ही थे. उनके पहुँचने से पहले ही बच्चे की मौत हो चुकी थी, ट्राइबल बेल्ट की परंपरा के अनुसार बच्चे का अंतिम संस्कार मिट्टी में दबाकर किया जाता है, जो बिना माता-पिता की अनुमति के कर दिया गया. जब तक माता-पिता पहुँचे, तब तक बच्चे का अंतिम संस्कार हो चुका था. इससे वहां विवाद खड़ा हो गया. बच्चे का नाम लवकुश था.”

बिंदू को लवकुश के माता-पिता उसी अस्पताल में मिले. क्यूंकी उनके और 3 बच्चे एक ही बेड पर भर्ती थे, जिन्हें बुखार, खसरे जैसे लक्षण और आँखों में सूजन जैसी शिकायतें थीं. अस्पताल में सेनीटाइज़र और मास्क जैसी मूलभूत सुविधा की कमी थी.

फ़ोटो: बिन्दु गुर्जर

बिंदु गुर्जर ने अस्पताल के स्टाफ से बात कर पता लगाया कि वहाँ एक या दो नर्सें ही सौ से ज़्यादा मरीज़ों को संभाल रही थीं, और पिछले 15 दिनों में 250 से ज़्यादा मरीज़ भर्ती हो चुके थे. इस कमी को पूरा करने के लिए पुलिस लाइन से आए लोग, अस्पताल में मदद कर रहे थे. एक दिन में उनकी चार शिफ्ट होती थी, हर शिफ्ट में दस लोग, जो मरीज़ों को इधर-उधर ले जाने और स्टाफ की मदद करने का काम कर रहे थे.

अस्पताल में बच्चों के मौत का कोई रिकॉर्ड नहीं

बिंदु ने प्रदर्शनकारियों की 24 मौतों वाली सूची के बारे में अस्पताल के स्टाफ से पूछा, तो पता चला कि अस्पताल में एक भी बच्चे की मौत दर्ज नहीं है. क्योंकि जैसे ही किसी बच्चे की हालत गंभीर होने का अंदेशा होता, उसे महाराष्ट्र के गोंदिया रेफ़र कर दिया जाता है जो मध्य प्रदेश के बॉर्डर के बिल्कुल करीब है, जिसकी वजह से मौत मध्य प्रदेश में दर्ज नहीं हो पाती है. इसी क्रम में उन्होंने काजल नाम की एक बच्ची की मौत को ट्रैक किया, जिसकी मौत 29 अगस्त को हुई थी, काजल को गोंदिया रेफ़र किया गया था और वहीं उसकी मौत हुई. उसके गाँव किसनगढ़ जाकर बिंदु की टीम ने उसे दफ़नाते हुए खुद देखा.

इसके बाद बिंदु गुर्जर, लोकभद्र सिंह के साथ मिलकर 29 अगस्त से अपना स्वतंत्र सर्वे शुरू किया. प्रिंट कराए गए फ़ॉर्म पर नाम, पिता का नाम, गाँव, बीमारी कब और कैसे शुरू हुई, पहले किसे दिखाया गया, यह सब दर्ज किया. 29 अगस्त को, मुख्यमंत्री मोहन यादव उसी गाँव पहुँचे जहाँ बिंदु के मुताबिक़ आठ से ज़्यादा बच्चों की मौत हुई थी. उन्होंने वहाँ मृत बच्चों के परिवारों को ₹2 लाख मुआवज़े का ऐलान किया. लेकिन इत्तेफ़ाक़ यह था कि जिस गाँव में वे गए थे, उसी गाँव के आठ बच्चों में से एक का भी नाम उनकी सूची में नहीं था. मुख्यमंत्री बिना जवाबदेही के वापस चले गए, तो वहाँ मौजूद प्रदर्शनकारियों ने नारेबाज़ी शुरू कर दी. बिंदू बताती हैं कि लगातार मामले से जुड़ी रिपोर्टिंग पोस्ट करने के बाद से उन पर निगरानी शुरू हो गई. बिंदु गुर्जर ने भी यह बताया कि 2 सितंबर को अस्पताल के सर्जन डॉक्टर निलय जैन ने कहा कि “जामिया मुस्लिम यूनिवर्सिटी से कुछ लोग आए हुए हैं, एसपी सर से बात हुई है, तो देखना पड़ेगा कि इन्हें अस्पताल में एंट्री देना है कि नहीं देना है”