बड़ो गोबरा को देखकर ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि वहां निर्वाचक नामावली जैसी कोई अमूर्त चीज़ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में खलल डाल सकती है. बशीरहाट के परिदृश्य में बसा यह गांव अपनी शांति में डूबा रहता है: दोपहर की धूप में थमे हुए तालाबों का पानी, आंगनों की ओर झुके हुए फलों के पेड़, और पुराने मिट्टी के घरों के बगल में खड़े आधे बने ईंटों के मकान. ज़्यादातर दिनों में, दोपहर होते-होते यह गांव एक तरह की खु़मार भरी खामोशी की आगोश में समा जाता है.

लेकिन अब नहीं.

शांति की जगह लोगों के झुंड ने ले ली है. पुरुष और महिलाएं तंग घेरे में जमा हुए, धीमी लेकिन ज़रूरी आवाजों में बोल रहे थे, उनके हाथों में दबे दस्तावेज उनके अस्तित्व का कोई नाजुक सा सबूत लग रहे हैं. इस चिंताजनक मंथन के केंद्र में स्थानीय प्राथमिक विद्यालय के पास एक छोटी सी स्टेशनरी की दुकान है. ज़ेरॉक्स मशीन की घरघराहट गांव का बैकग्राउंड स्कोर बन गई है. कागज की शीट एक के बाद एक निकल रहीं हैं: आधार कार्ड, प्रवेश पत्र, जमीन डॉक्यूमेंट, शपथ पत्र; हर एक कागज़ ये बताने की हताश कोशिश है कि मैं यहीं का हूं.

बीते दिनों यहां की मतदाता सूची से सैकड़ों नाम चुपचाप गायब हो गए.

और ये दरवाजे पर दस्तक या सार्वजनिक घोषणा से नहीं, बल्कि आधी रात को प्रकाशित एक सूची से गायब हो गए. 23 और 24 मार्च की रात को लगभग 11 बजकर 55 मिनट पर जैसे ही पहली पूरक सूची सामने आई, पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बशीरहाट -2 ब्लॉक के बेगमपुर-बीबीपुर पंचायत में बोरो गोबरा के 340 निवासियों ने खुद को मतदाता सूची से बाहर पाया. इस स्तर को समझने में थोड़ा समय लगता है. एक सूची ने बेगमपुर बीबीपुर पंचायत के बूथ 5 से सभी अपर्याप्त मतदाताओं को मिटा दिया – और ये सभी मुस्लिम थे.

यह विलोपन उनकी समझ से परे था. कई लोग जीवन भर यहीं रहे हैं. उन्होंने लगातार चुनावों में मतदान किया है. कुछ लोग अपनी जड़ें पीढ़ियों तक खोज सकते हैं. फिर भी, रातों-रात, उन्हें शक के घेरे में धकेल दिया गया है, जहां उनके संबंध को ही प्रमाण की आवश्यकता लगती है. और आस-पास के गांवो में भी ऐसी ही कहानियां सामने आ रही हैं.

मोहम्मद मिजानुर रहमान की दुकान पर, जहां ऑल्ट न्यूज़ द्वारा गांव का दौरा करने पर कई लोग जमा हुए थे, कहानियां एक-दूसरे से मेल खाने लगीं.

यहां तक ​​कि बूथ लेवल ऑफ़िसर को भी नहीं बख्शा गया

बूथ स्तर अधिकारी (BLO) सफीउल आलम, जिन्होंने बूथ 5 में पूरी प्रक्रिया का संचालन किया, ने सूची प्रकाशित होने पर अपना नाम गायब पाया.

“जब मैंने सूची के साथ काम करना शुरू किया, तो इसमें 990 मतदाता थे. मसौदा चरण के दौरान, हमें 36 मृत या बचे हुए मतदाता मिले. बाकी मतदाता खुद को 2002 की सूची से जोड़ने में सक्षम थे. हालांकि बाद में तार्किक विसंगति के माध्यम से 358 मतदाताओं को मार्क किया गया और नोटिस जारी किए गए. 28 फ़रवरी को 18 मतदाता अपना नाम साफ करने में सक्षम थे. शेष 340 मतदाता हटा दिए गए.”

ऑल्ट न्यूज़ ने सूची देखी और इसकी पुष्टि की.

अपने खुद के नोटिस में बताए गए कारण ने आलम को हैरान कर दिया.

“मुझे मिले ‘अंडर एडजुडिकेशन’ नोटिस के अनुसार, मुझे इसलिए चिन्हित किया गया क्योंकि मेरे जन्म के समय मेरे पिता की आयु 50 वर्ष से अधिक थी. क्या भारत में 50 वर्ष की आयु के बाद संतान होना कोई अपराध है?”

बीएलओ (BLO) सफीउल आलम हाथ में ‘अंडर एडजुडिकेशन’ सुनवाई का नोटिस लिए अपने घर के सामने

उन्होंने एक और पैटर्न की ओर इशारा किया.

“विचाराधीन सूची में केवल पांच हिंदू नाम थे और उन सभी के नाम स्पष्ट कर दिए गए (सूची में बने रहे). संबंधित हिंदू मतदाताओं के पास आधार के अलावा कोई अन्य दस्तावेज़ नहीं था. फिर भी उनके नाम आसानी से बहाल हो गए. लेकिन मुस्लिमों के पास सभी उचित दस्तावेज़ होने के बावजूद उन्हें दंडित किया जा रहा है. इससे हमारे क्षेत्र में सामाजिक तनाव पैदा हो रहा है.”

उनके भाइयों के नाम भी हटा दिए गए; इसका कारण भी यही बताया गया कि उनके पिता कथित तौर पर छह व्यक्तियों से जुड़े थे.

“मजेदार बात ये है कि मेरी बहनें जो क्रमशः बदुरिया और मिनाखान ब्लॉक में रहती हैं, उन्होंने खुद को मेरे पिता के साथ जोड़कर अपना नाम बहाल करवा लिया. लेकिन हम भाई बीच में ही फंस गए.”

वो अकेले नहीं थे. बगल के बूथ की BLO सहनारा खातून का भी नाम डिलीटेड लिस्ट में मिला.

बीएलओ (BLO) सहनारा खातून अपने घर के सामने खड़ी हुई, जिनके एक ओर फुलचुरातन बीबी (बाएं) और दूसरी ओर सूफिया बीबी खड़ी हैं

“2002 की सूची में मेरा नाम सहनारा खातून बैद्य था. शादी के बाद मैंने इसे बदलकर सहनारा खातून कर लिया. मेरे पास अपनी बात साबित करने के लिए एक हलफनामा है, और मैंने इसे सुनवाई के दौरान भी जमा किया था. फिर भी मेरा नाम हटा दिया गया.”

बूथ 4 से उनका डेटा एक स्पष्ट पैटर्न दिखाता है.

“मिश्रित इलाके में, हिंदू मतदाताओं की संख्या लगभग 200 थी. इनमें से केवल 10 को न्यायिक नोटिस मिला और हर एक ने जांच में मंजूरी दे दी. लेकिन उसी बूथ के 504 मुस्लिम मतदाताओं में से केवल 189 ही अपना नाम बहाल करवा पाए. शेष 314 मतदाताओं के नाम हटा दिए गए.”

“मुझे वाकई लगता है कि लगभग सभी डॉक्यूमेंट्स की अनदेखी की गई. वरना, ऐसा परिणाम असंभव है.”

हटाए गए सभी मतदाताओं को अब न्यायिक न्यायाधिकरण में अपील करना होगा.

‘ये दो अतिरिक्त व्यक्ति कहां से आए?’

हटाए गए लोगों में काजिरुल मंडल भी शामिल हैं, जो लगभग 20 साल के बूथ स्तर के एजेंट हैं.

उन्होंने ऑल्ट न्यूज़ को बताया, “मेरे माता-पिता दोनों 2002 SIR सूची में हैं. लेकिन चुनाव आयोग ने तार्किक विसंगति का इस्तेमाल करके मेरा नाम हटा दिया.”

उन्होंने अपना माध्यमिक (पश्चिम बंगाल कक्षा दसवीं बोर्ड परीक्षा) प्रवेश पत्र, उच्च माध्यमिक प्रमाणपत्र और कॉलेज की डिग्री जमा की थी. फिर भी, सिस्टम ने उन्हें मार्क किया.

“मेरे पिता का नाम उनके डॉक्यूमेंट्स में शेरअली मंडल है. लेकिन मेरे डाक्यूमेंट्स में ये शेर अली मंडल है. ECI ने तार्किक विसंगति का इस्तेमाल करके इसे मार्क किया. इसके साथ ही, एक दूसरा कारण भी है. मेरे पिता के मुझ सहित चार बेटे हैं. लेकिन हम चारों को जो नोटिस मिला, उसके मुताबिक मेरे पिता का नाम कुल मिलाकर छह लोगों के साथ जोड़ा गया. तो ये दो अतिरिक्त व्यक्ति कहां से आए? और हम इस एरर के लिए क्यों भुगतें?”

दुकान के मालिक मिजानुर रहमान को भी ऐसा ही लेकिन अधिक हैरान करने वाला अनुभव हुआ. “काजिरुल के उलट, मेरे डाक्यूमेंट्स में मेरे पिता के नाम का कोई मिलान नहीं है. फिर भी मेरा नाम हटा दिया गया.” काजिरुल की तरह, उन्हें भी मार्क किया गया क्योंकि उनके पिता का नाम 6 व्यक्तियों से जुड़ा था.

“हम सिर्फ चार भाई-बहन हैं, तीन भाई और एक बहन. ये दो अतिरिक्त इंसान कहां से आए? मुझे नहीं पता कि मैं इस उलझन से अपना नाम कैसे हटाऊंगा.”

मोहम्मद मिज़ानुर रहमान अपनी दुकान में खड़े होकर हाथ में ‘एडजुडिकेशन’ (सुनवाई) का नोटिस लिएउन्होंने उस ओर इशारा किया जिसे वे एक बड़ी विसंगति मान रहे थे.

“अगर आप हमारी मतदाता सूची के क्रम संख्या 253 को देखेंगे, तो आपको प्रतिमा रुइदास का नाम मिलेगा. लेकिन उनके पति का नाम भी प्रतिमा रुइदास दिया गया है, जो एक ग़लती है. फिर भी उनका नाम मतदाता सूची में है, और हम जैसे लोगों को सभी सही डाक्यूमेंट्स के बावजूद बाहर कर दिया गया है.”

मनीरुल इस्लाम मंडल जैसे मामलों से विश्वासघात की भावना और गहरी हो जाती है.

मनिरुल, जिनकी उम्र पचास वर्ष है, और उनके पिता दोनों 2002 SIR सूची में थे. उसके पास पासपोर्ट है. उनके परिवार के ज़मीन संबंधी दस्तावेज आजादी से पहले के हैं. फिर भी उनका नाम हटा दिया गया. मनीरुल ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया, “इस गांव में मेरे जैसे 32 अन्य दुर्भाग्यपूर्ण मतदाता हैं, जो 2002 की सूची में होने के बावजूद इस बार हटा दिए गए हैं. हमें नहीं पता कि हमारे साथ क्या ग़लत है.”

उन्होंने कहा, “मैं 21 मार्च को सुनवाई नोटिस में शामिल होने के लिए बशीरहाट-2 बीडीओ कार्यालय गया था. यहां तक ​​कि बीडीओ ने भी कहा कि मेरे सभी डॉक्यूमेंट ठीक हैं और मुझे किसी भी चीज के बारे में चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है. लेकिन अब मैं यहां हूं, अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहा हूं.”

जब नौकरशाही निजी जीवन में दखल देती है

कुछ लोगों के लिए, इसके परिणाम गहरे व्यक्तिगत स्थानों तक पहुंच गए हैं.

फुलचुरातन बीबी, जिनका खुद का नाम सूची में है, ने अपने तीन बच्चों के नाम कटते देखे हैं.

“मेरे बच्चों ने खुद को अपने पिता के साथ जोड़ा, फिर भी उनके नाम हट दिए गए. मेरी बेटी ने सुनवाई के दौरान एक पारिवारिक वृक्ष स्केच पेश किया, और जवाब मिला कि ये पर्याप्त नहीं है, और वो अपने पिता की संतान नहीं हो सकती है. इससे उसके ससुराल में तनाव पैदा हो गया है. ये किस तरह का भद्दा मज़ाक है?”

पूरी पंचायत में नाम हटाए जाने का पैमाना डराने वाला है. बूथ संख्या 1 में विचाराधीन 401 नामों में से 176 हटा दिए गए. बूथ 2 में 212 में से 142; बूथ 3 में 352 में से 233 नाम हटाए गए. बूथ 11 में शायद सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा दर्ज किया गया: जहां 538 में से केवल 30 नाम ही बहाल हो पाए.

पड़ोसी कछुआ पंचायत में चाय की दुकान के मालिक ओबैदुल्ला मंडल ने इसी तरह के पैटर्न का वर्णन किया.

उन्होंने कहा, “इस पंचायत से लगभग 2400 मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं. मेरे बूथ से 118 कम निर्णायक मतदाताओं में से 97 के नाम हटा दिए गए हैं.”

ओबैदुल्ला मंडल (दाएं) स्वरूपनगर बाज़ार में अपनी चाय की दुकान पर एक ग्राहक को चाय देते हुए

पीढ़ियां यहां गुज़रीं, फिर भी पर्याप्त नहीं 

संख्याओं से परे, ऐसी कहानियां हैं जो अविश्वास की भावना को और गहरा करती हैं.

जिन लोगों के नाम हटाये गये हैं उनमें कछुआ पंचायत क्षेत्र की 77 साल की सूफ़िया बीबी भी शामिल हैं. वो 2002 SIR सूची में थी और पासपोर्ट धारक है. उनके दिवंगत पति एक स्थानीय स्कूल के प्रधानाध्यापक थे और उनकी मौत के बाद से उन्हें सरकारी पेंशन मिल रही है. उनके परिवार के पास पुश्तैनी ज़मीन है और वे पीढ़ियों से इस क्षेत्र में रह रहे हैं.

फिर भी, उनका और उनके बेटे मुस्तफ़ा कमाल दोनों का नाम सूची से हटा दिया गया है.

मुंशी अब्दुल हलीम ने कहा, “सूफ़िया बीबी का परिवार कम से कम 5 पीढ़ियों से इस क्षेत्र में रहता है. इसके बावजूद, उनका और उनके बेटे मुस्तफ़ा कमाल दोनों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए.”

स्थानीय CPI (M) नेता हलीम ने इस मुद्दे को अधिक व्यापक रूप से पश किया.

“हमारी पंचायत के बूथ-64 में 274 नाम हटा दिए गए हैं. इस गांव में ज़्यादातर छोटे मछुआरे रहते हैं. बुजुर्ग अनपढ़ हैं और युवा पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं. आप अच्छी तरह से कल्पना कर सकते हैं कि नामों में गलतियां और बेमेल होंगे. उस विसंगति का हवाला देते हुए, ये लोग सामूहिक रूप से मताधिकार से वंचित हैं. ये अमानवीय है.”

‘कोई कारण नहीं बताया गया’

अनिश्चितता सामाजिक स्थितियों में कटौती करती है. यहां तक ​​कि बशीरहाट अदालत के सरकारी वकील मोफिजुल इस्लाम भी बेगमपुर बीबीपुर पंचायत के बूथ 11 से खुद को विचाराधीन सूची में पाते हैं.

“मैं खुद हर दिन अनिश्चितता में जी रहा हूं. मुझे नहीं पता कि मेरा नाम हटा दिया जाएगा या हटा दिया जाएगा… अगर हमारे जैसे विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग इस चरण से गुज़र सकते हैं, तो आप अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि गरीब लोगों को क्या सामना करना पड़ रहा है.”

कई लोगों के लिए, कारणों का न होना उतना ही परेशान करने वाला है जितना कि खुद नामों का हटाया जाना. पूरक सूची में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है; बस वे नाम हैं जो अब वहां मौजूद नहीं हैं.

इसी ब्लॉक के घोराराश कुलिंगग्राम पंचायत के नसीरुल हक कोलकाता हाई कोर्ट में वकील के तौर पर काम करते हैं. उन्होंने अपने इलाके में SIR सहायता शिविर स्थापित करने के साथ-साथ स्थिति के बारे में जागरूकता पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. ऑल्ट न्यूज़ से बात करते हुए उन्होंने बड़े प्रभाव का वर्णन किया.

“लोग डर की स्थिति में हैं. उन्हें लगता है कि उन्होंने न केवल मतदान का अधिकार खो दिया है, बल्कि नागरिकता भी खो दी है. उन्हें सरकारी लाभ खोने का डर है… ये स्थिति निहित स्वार्थ वाले लोगों के लिए पीड़ितों को बरगलाने की है.”

“निर्णय में दोनों पक्षों को जवाब देने का अधिकार होना चाहिए… लेकिन यहां, पीड़ितों को केवल नोटिस मिला और उन्होंने डॉक्यूमेंट जमा किए. ये स्पष्ट नहीं है कि सभी डॉक्यूमेंट न्यायिक अधिकारी तक पहुंचे या नहीं, और उन अधिकारियों ने उनकी प्रामाणिकता का फैसला कैसे किया.”

स्थिति की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए, नसीरुल ने कहा, “मुझे जो डेटा मिला है, उसके अनुसार बशीरहाट-II ब्लॉक पश्चिम बंगाल में सबसे बुरी तरह प्रभावित है. हर मुस्लिम बहुल बूथ से औसतन लगभग 200 मतदाताओं को हटा दिया गया है. लगभग 50 BLO के नाम भी काट दिए गए हैं. इनमें से कुछ अधिकारियों को बाद में चुनाव ड्यूटी प्रशिक्षण के लिए बुलाया गया था. ये एक तमाशा है.”

फिर से गिनती किये जाने के इंतजार में

बोरो गोबरा में, ये संरचनात्मक प्रश्न कुछ और तत्काल में तब्दील हो जाते हैं.

लोग मिजानूर की दुकान पर लौटते रहते हैं.

वे डाक्यूमेंट्स की फ़ोटोकॉपी कराते रहते हैं.

वे नोटिसों की तुलना करते रहते हैं.

और वे वही सवाल पूछते रहते हैं – ऐसे सवाल जिनका फिलहाल कोई स्पष्ट जवाब नहीं है.

एक गांव जो कभी मौसमों की रफ़्तार से चलता था, वहां अब समय जैसे ‘डेडलाइन’ और सुनवाइयों के बीच सिमट गया है. यहां के सैकड़ों लोगों के लिए भविष्य अब एक ही थका देने वाले काम में सिमट कर रह गया है: यह साबित करना कि वे उसी जगह के वासी हैं जिसे उन्होंने हमेशा अपना घर कहा है.

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