9 मई को ऑप इंडिया ने एक आर्टिकल में ये दावा किया था कि गोपालगंज में एक 15 साल के लड़के रोहित की मस्जिद में बलि दी गई. पड़ताल में उनके सभी दावे गलत पाए गए. उनके ख़िलाफ़ गोपालगंज में ही पुलिस ने एफ़आईआर भी दर्ज की. 19 मई को ऑप इंडिया के CEO राहुल रोशन ने एक आर्टिकल में बताया कि किस तरह से उनके एडिटर्स को परेशान किया जा रहा है. राहुल रोशन का कहना था कि ऑप इंडिया वालों की गलती सिर्फ़ इतनी है कि उन्होंने बच्चे के पिता के कथन पर भरोसा किया. इस आर्टिकल में हम आपको बतायेंगे कि कैसे राहुल का ये कथन अपने आप में ग़लत जानकारी है और कैसे ऑप इंडिया ने एक के बाद एक पब्लिश किये गए आर्टिकल्स के ज़रिये पूरे मामले में ग़लत जानकारी फैलाई जबकि सबूत कुछ और ही कह रहे थे.
ऑप इंडिया के दावों की नींव में क्या था?
17 मई को अपडेट किये गए आर्टिकल में ऑप इंडिया ने रोहित के पिता राजेश जायसवाल से बातचीत का सिर्फ़ वो हिस्सा सामने रखा जिसमें वो मस्जिद में बलि की बात करते हैं. इसके कुछ दिन बाद राजेश जायसवाल ने बताया कि ऐसा उन्होंने महज़ शक के आधार पर कहा था. इस आर्टिकल में शामिल 2 मिनट के एक वीडियो में राजेश जायसवाल से 9 मई और 14 मई को की गयी बातचीत दिखाई गयी है. 9 मई को वो मस्जिद में हत्या होने की बात कहते हैं. 14 मई को हुई बातचीत में सुनाई देता है कि राजेश जायसवाल ये साफ़ कर रहे हैं कि उन्होंने 9 मई को जो भी कहा, शक के आधार पर कहा था.
यहां दो बातें साफ़ करने लायक हैं :
पहली – ऑप इंडिया ने बातचीत के इस ऑडियो को काट-छांट कर पेश किया है. इसके लिए उन्होंने वीडियो में ही लिखा है कि “हम सिर्फ़ वही हिस्सा सुना रहे हैं जो आवश्यक है.” ऐसे में, जब ग़लत जानकारी फैलाने का आरोप जिसपर है, वो ही इस बात का फ़ैसला कर रहा है कि कौन सी बात ज़रूरी है और कौन सी गैर ज़रूरी.
दूसरी – 9 मई से 14 मई (कुल 6 दिन जिनमें 5-6 आर्टिकल छपे हैं) तक कितनी दफ़ा ऑप इंडिया की राजेश जायसवाल से बात हुई? और उस दौरान हुई बातचीत में क्या राजेश के पिता हर बार रोहित की मस्जिद में बलि दिए जाने की ही बात कहते रहे? क्या सुनाई जा रही रिकॉर्डिंग के पहले राजेश ने हर बार यही कहा कि उनके बेटे की मस्जिद में बलि दी गयी है और इसी की बिनाह पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट को ग़लत बताते हुए ऑप इंडिया लगातार आर्टिकल पर आर्टिकल छापता गया? ये सभी बातें साफ़ नहीं हुई हैं.
इस मामले में कायदे से होना क्या चाहिए था? ऑप इंडिया को रोहित के पिता राजेश जायसवाल की कही बातों का आधार पूछना चाहिए था. 15 साल के बेटे को खो चुके पिता की कही बातों को बिना वेरीफ़ाई किये छापना, वो भी तब जब उन बातों से साम्प्रादायिक समीकरण के बिखरने की तिनके बराबर भी गुंजाइश हो, पत्रकारिता के मूलभूत सिद्धांतों के सीधे ख़िलाफ़ जाता है. अगर ऑप इंडिया इस पूरे दौरान एफ़आईआर देखता, पुलिस से बातचीत करता, पोस्ट मार्टम रिपोर्ट को गौर से देखता तो यकीनन मस्जिद में बलि दिए जाने के हवा-हवाई दावे को छापने का ख़याल भी नहीं करता. उसे ये भी सवाल करना चाहिए था कि अगर राजेश जायसवाल को मस्जिद में बलि दिए जाने का कोई शक था तो एफ़आईआर में आखिर उस शक का रत्ती भर भी उल्लेख क्यूं नहीं मिला?
ऑप इंडिया खुद को फ़ैक्ट चेकिंग वेबसाइट के रूप में स्थापित करने की पुरज़ोर कोशिश में है मगर यहां वो फ़ैक्ट्स के आस पास फटकती भी नहीं दिख रही थी. शायद इसलिए क्यूंकि इस ख़बर से उनके दक्षिणपंथी प्रोपोगेंडा को पूरी तरह से हवा मिल रही थी. यही प्रोपोगेन्डा हमें उस वक़्त भी देखने को मिला था जब इंफ़ॉर्मेशन ब्यूरो में अफ़सर अंकित शर्मा की दिल्ली में हुए दंगों के दौरान हत्या हुई थी और ऑप इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में हत्या को वीभत्स बताते हुए अंकित शर्मा के शरीर पर 400 चाकुओं के घावों की बात कह दी थी. इतना ही नहीं, ऑप इंडिया ने ये भी कहा था कि अंकित शर्मा को 4 से 6 घंटे तक चाकुओं से गोदा गया. ये सब कुछ झूठ था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कुल 13 घाव की बात सामने आई थी मगर ये प्रोपोगेन्डा इतना बड़ा हुआ कि देश के गृह मंत्री तक ने सदन में इस गलत जानकारी को ऑन रिकॉर्ड पेश किया.
ऑल्ट न्यूज़ ने पीड़ित पिता से पहले भी बात की थी और हमने बताया था कि वो किस तरह हताश थे. उनके मन में रोहित की मौत से संबंधित कई सवाल थे जिसका जवाब वो जानना चाहते हैं. हमसे बात करते हुए राजेश जायसवाल ने एक बार भी बलि का ज़िक्र नहीं किया. उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम ऐंगल होने की भी बात को भी पूरी तरह नकार दिया. ऑप इंडिया के इस आर्टिकल के बाद हमने राजेश जायसवाल से फिर से बात की. उन्होंने कहा कि जांच हो रही है. बात करने में वो पहले से अब थोड़े संतुष्ट मालूम पड़ रहे थे. उनका कहना था, “SHO को सस्पेंड किया गया है ये अच्छी बात है. हमें अब वहां उस घर में भी रहने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन उस घर में रोहित की बहुत सारी यादें है जिससे बाकी बच्चे डर जाते हैं. इसीलिए हम वहां नहीं जा रहे अभी.” हमने पूछा कि आप पर ये आरोप है कि आप अपनी बात से मुकर गए हैं. इसपर उन्होंने कहा कि उस वक़्त उन्होंने क्या कहा, ये उन्हें याद नहीं है. उन्होंने कहा, “मेरी मानसिक स्थिति कोई नहीं समझ सकता, जिसके जवान बेटे की मौत हो गयी है.” उन्होंने ये भी सवाल किया – “चलिए मान लेते हैं कि डूब गया था तो बाकि बच्चों ने हमें आकर ये बताया क्यूं नहीं? छुपाया क्यूं? रोहित के कपड़े क्यूं छुपाए गए?” उनका ये सवाल पूरी तरह से वाजिब है. वो कहते हैं “मेरा बेटा तो वापस मुझे नहीं मिल सकता अब. लेकिन सच सामने आना चाहिए.”
इस मामले पर अपडेट के लिए हमने 20 मई को SP मनोज तिवारी से बात की. उन्होंने कहा, “जांच अभी भी चल रही है, DIG साहब खुद इस मामले की तहक़ीकात कर रहे हैं. जो भी है ज़ल्द ही सामने आ जाएगा.”
दावा 1 : रोहित की हत्या हुई
16 मई को ऑल्ट न्यूज़ के एक आर्टिकल में बताया गया था कि कैसे ऑप इंडिया ने गोपालगंज में एक रोहित की मौत के लगभग 40 दिन बाद सांप्रदायिक रंग देते हुए इसे मस्जिद में बलि का मामला बता दिया. हमने कई बातों पर ध्यान दिलाते हुए ये साबित किया था कि बच्चे की मौत नदी में डूबने से हुई थी और ऑप इंडिया ने एक कहानी रचते हुए इसे सांप्रदायिक एंगल दिया. ऑप इंडिया पर इसके लिए बिहार पुलिस ने 16 मई को FIR भी दर्ज की.
इसके बाद ऑप इंडिया की संपादक नूपुर शर्मा 16 मई को ही एक ट्वीट में इस बात पर ज़ोर देती हैं कि रोहित की हत्या हुई है और पिता ने अपना बयान बदल लिया है. उनके मुताबिक़ ‘मुस्लिम’ रोहित पर पानी छिड़क रहे थे, ये इस केस का काफ़ी अहम पॉइंट था. उन्होंने सांप्रदायिकता के दावों को किनारे करते हुए कहा कि ऑप इंडिया के ख़िलाफ़ FIR पिता के बयान को सामने रखने के लिए दर्ज की गई है.
A boy is murdered. His father says ‘muslims killed him’. He first said he was sacrificed in a mosque, then said ‘I don’t remember’ but maintained that Muslims sprinkled water on him. FIR is filed against OpIndia for publishing father’s version. But the truth cannot be defeated
— Nupur J Sharma (@UnSubtleDesi) May 16, 2020
ऑप इंडिया की एडिटर जिस वक़्त पुख्ता तौर पर ये कहती जा रही हैं कि रोहित की हत्या हुई है, उसी वक़्त चालू पुलिस की जांच में एक भी ऐसा सबूत सामने नहीं आया है जिसके दम पर ऐसा कहा जा सके.
19 मई को बिहार के DGP गुप्तेश्वर पाण्डेय ने घटनास्थल पर की गई जांच-पड़ताल का 38 मिनट का एक वीडियो अपने यूट्यूब चैनल से पोस्ट किया. इस वीडियो में वो रोहित के परिजनों, अभियुक्तों से, पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर से और स्थानीय लोगों से बातचीत करते हैं और इस पूरे मामले की सच्चाई सामने रखते हैं.
घटनास्थल का निरीक्षण करते हुए DGP उस नदी में भी उतरते हैं जिससे रोहित की लाश बरामद हुई थी. उन्होंने बताया कि नदी में लाश बरामद होने की जगह गहराई लगभग 12 फ़ीट की थी और उनको बताया गया कि मार्च में पानी का स्तर अभी से ज़्यादा था. एक भैंस चराने वाले राम प्रकाश यादव ने पांचों बच्चों को वहां खेलते और नहाते हुए देखा था. इस वीडियो में 17 मिनट पर उनका बयान है, “पांचों लड़के को वो नदी की तरफ आते हुए देखा था, उस वक़्त उनके साथ छठा कोई नहीं था. उसकी मौत कैसे हुई ये मैं नहीं बता सकता.”
कुछ स्थानीय पत्रकार, जिन्होंने शुरुआत से ही इस मामले पर नज़र बनायी हुई थी, उनका कहना है कि कोई सांप्रदायिक मामला था ही नहीं. उन्होंने ऐसा दोनों पक्षों के लोगों से बात करने के बाद कहा. उन्होंने ये भी बताया कि स्थानीय स्तर से कोई सांप्रदायिक मामले वाली रिपोर्ट गई ही नहीं और अचानक से 1 महीने बाद इस मामले में ये एंगल दिया गया. ये बयान आपको ऊपर दिए गए वीडियो में 18 मिनट पर मिल जाएगा.
डॉक्टर अशोक कुमार अकेला, जिन्होंने ये पोस्ट मार्टम किया था, उनसे बातचीत का हिस्सा इस वीडियो में 19 मिनट से है. उनका कहना है कि श्वास नली (trachea) में थोड़ी मिट्टी (Mud) लगी हुई मिली और फेफड़े कुछ स्पंजी हो गए थे. फेफड़ों को काटने पर दिखा कि उनमें हवा के बुलबुले थे जो कि रोहित के डूब कर मरने की ओर ही इशारा करते हैं. इसी मामले पर दूसरे डॉक्टर संजीव कुमार से सलाह ली जाती है. वो भी यही कहते हैं कि मौत का कारण डूबना ही मालूम पड़ रहा है. उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें सिर्फ़ नाक और मुंह के पास खून के धब्बों से कुछ संदेह पैदा होता नज़र आता है लेकिन कई बार कोई जब नीचे गिरता है तो चोट लग जाती है उसके कारण से भी खून आ सकता है. मगर मौत का कारण ये नहीं हो सकता.
22 मिनट के बाद सभी नाबालिग बच्चों से बारी-बारी से बात की जाती है. सभी का कहना है कि वो लोग सभी दोस्त हैं, पहले भी उस नदी में नहाने जाते थे. उस दिन भी गए थे, लेकिन दूसरे घाट पर. सभी पानी में दूर से छलांग लगा रहे थे. सभी किनारे कूदे पर रोहित पानी में दूर से छलांग लगाकर कूदा तो डूबा ही रह गया. वो लोग रुके और उसके पानी से बाहर आने का इंतज़ार कर रहे थे मगर वो बाहर नहीं आया. बच्चे डर गए, और इसी डर में उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया.
दावा 2 : सभी आरोपी मुस्लिम थे
इसके अलावा ऑप इंडिया ने अपनी तरफ से ये गलत दावा भी किया था कि इस घटना में शामिल सभी आरोपी मुस्लिम समुदाय के हैं. जबकि ये बात शुरुआती रिपोर्ट्स और पीड़ित पिता के बयान से पहले से ही स्पष्ट थी कि आरोपियों में एक बच्चा हिन्दू भी था. ये वही बच्चा था जो रोहित को घर से बुलाकर ले गया. लेकिन ऑप इंडिया ने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया.
DGP की जांच के बाद ऑप इंडिया ने रिपोर्ट्स की हेडिंग बदली
FIR के बाद ऑप इंडिया ये दावा कर रहा है कि उन्होंने पूरे दौरान जो भी छापा वो पिता के बयान पर आधारित था. चलिये मान लेते हैं कि उन्होंने पिता की ही बात रखी. फिर उनके आर्टिकल्स के कुछ टाइटल में “मस्जिद में बलि का मामला” क्यूं दिया गया? टाइटल में तो पिता को संदर्भित करने की कोशिश तक नहीं दिखी. कुछ आर्टिकल्स के उदाहरण नीचे दिए गए हैं. इन्हें ऑप इंडिया ने बदल दिया है.
- “मस्जिद को शक्तिशाली बनाने के लिए बच्चे की दी बलि, पुलिस प्रताड़ना के बाद हिन्दू परिवार को छोड़ना पड़ा गाँव” को अब “मेरे बच्चे की हत्या की गई है, हमने गाँव छोड़ दिया है: मृतक रोहित जायसवाल के पिता” कर दिया गया है.
- “गोपालगंज मस्जिद ‘बलि’ मामला: 4 आरोपितों को पकड़ चुकी है पुलिस, परिवार के आरोपों पर साधी चुप्पी” को अब “किसी से दुश्मनी नहीं, बस बेटे के लिए न्याय चाहिए: रोहित जायसवाल के पिता की गुहार” कर दिया गया है.
- “किसी से कोई दुश्मनी नहीं, बस बेटे के लिए न्याय चाहिए’ – गोपालगंज मस्जिद ‘बलि’ मामले में पिता ने लगाई गुहार” को अब “किसी से दुश्मनी नहीं, बस बेटे के लिए न्याय चाहिए: रोहित जायसवाल के पिता की गुहार” कर दिया गया है.
इसके बाद ऑप इंडिया ने अपने सभी आर्टिकल्स से मस्जिद और बलि शब्द हटाते हुए सारा आरोप पीड़ित पिता पर डालने शुरू कर दिए. यहां ये ध्यान दिए जाने लायक बात है कि ऑप इंडिया के आर्टिकल में शामिल वीडियो में एक भी जगह राजेश जायसवाल अपने बेटे की मस्जिद में बलि दिए जाने की बात नहीं कह रहे हैं. ऑप इंडिया के पुराने आर्टिकल और उसी को बदल कर अपडेट किये गए आर्टिकल के स्क्रीनशॉट नीचे दिए गए हैं.
ऑप इंडिया और उसका प्रोपोगेन्डा के लिए साम्प्रदायिकता फैलाने का इतिहास
गोपालगंज की खनुआ नदी से रोहित की लाश मिलने के 40 दिन बाद अचानक ऑप इंडिया ये कहता है कि मस्जिद को शक्तिशाली बनाने के लिए उसकी बलि दी गयी थी. ऑप इंडिया के इस आर्टिकल से पहले कहीं भी, इस दावे के इर्द-गिर्द बात करती कोई भी रिपोर्ट पढ़ने को नहीं मिलती. ऑप इंडिया को इस मामले की भनक लगती है और वो तुरंत एक के बाद एक कई आर्टिकल्स छापना शुरू करते हैं. इन सभी आर्टिकल्स में साम्प्रदायिक ऐंगल शामिल है और मस्जिद में बलि देने की बात कही गयी है. ये जल्दबाज़ी और सबूतों की अनदेखी इसलिए की गयी क्यूंकि ये सांप्रदायिक ऐंगल ऑप इंडिया के प्रोपोगेन्डा के लिए पूरी तरह से मुफ़ीद था. यही बात दिल्ली में हुए दंगों के दौरान अंकित शर्मा की हत्या के केस में भी हुई जहां 13 चाकू के घावों को 400 बताया गया और भावनाएं भड़काने के मकसद से हत्या की वीभत्सता को बढ़ा चढ़ा कर सामने रखा गया. इसके अलावा ऑप इंडिया के एडिटर राहुल रोशन ने ट्विटर पर ‘प्रशांत भूषण जैसे बुद्धजीवियों’ को सबक सिखाने के मकसद से उनकी मॉब लिंचिंग किये जाने का आह्वान किया था.
अपने दक्षिणपंथी एजेंडे को पुश करने की ख़ातिर ऑप इंडिया ने साहित्यिक चोरी करते हुए एक आर्टिकल तैयार किया जिसमें उन्होंने पुलित्ज़र अवॉर्ड को पूरी तरह से बदनाम करते हुए जोसेफ़ पुलित्ज़र (जिनके नाम पर अवॉर्ड दिया जाता है) पर सवालिया निशान खड़े किये. ये सब कुछ इसलिए किया गया क्यूंकि कुछ ही दिन पहले तीन भारतीयों को पुलित्ज़र अवॉर्ड मिला था और तीनों कश्मीरी पत्रकार थे. तीनों पत्रकारों ने तस्वीरों के ज़रिये आर्टिकल 370 में हुए बदलावों के बाद कश्मीर की स्थिति दिखाई थी. इन तस्वीरों में जो दिखाया गया था वो ऑप इंडिया की आइडियोलॉजी के विपरीत बैठता है और इसलिए उन्होंने पूरे अवॉर्ड को ही चोरी के शब्दों के सहारे डिसक्रेडिट करने की कोशिश की.
ऑप इंडिया की मनगढ़ंत कहानी से क्या हुआ?
इस पूरी घटना को ऑप इंडिया ने तो सांप्रदायिक एंगल दिया ही. लेकिन सोशल मीडिया पर, खासकर भाजपा समर्थक लोगों ने भी ऐसे ही दावे किये थे. देखते हैं कि वो लोग कौन हैं जिन्होंने इस मामले को हिन्दू-मुस्लिम बनाने की भरपूर कोशिश की. सबसे पहला नाम है प्रशांत उमराव पटेल. इन्होंने इससे पहले भी कई मौकों पर झूठी जानकारी फैलाते हुए मामले को सांप्रदायिक एंगल दिया है. इन्होंने शुरुआत से ही इस मामले पर कई ट्वीट किये थे. सभी ट्वीट्स में मस्जिद में बलि की बात की थी. इन ट्वीट्स को हज़ारों रीट्वीट्स मिले थे. इसके दो उदाहरण नीचे देखे जा सकते हैं. हमेशा की तरह बिना किसी स्पष्टीकरण के दोनों ही ट्वीट्स अब डिलीट कर दिये गये हैं. (पहले ट्वीट का आर्काइव) (दूसरे ट्वीट का आर्काइव)
प्रशांत पटेल उमराव ने 16 मई को एक और ट्वीट किया, जहां उन्होंने दावा किया कि “कार्रवाई के भय से मस्जिद का मौलवी फरार हो गया है.” जबकि DGP ने खुद जांच के बाद बताया है कि गांव में न कोई मस्जिद है न मौलवी.
विश्व हिन्दू परिषद् के राष्ट्रीय प्रवक्ता और भारतीय धरोहर मैगज़ीन के एडिटर इन चीफ़ विजय शंकर तिवारी ने 11 मई को ट्ववीट करते हुए मस्जिद में बलि की बात कही. साथ ही हिन्दू समुदाय को भड़काने की कोशिश करते हुए उन्होंने लिखा, “बलि देने वाले होते हैं शांति दूत जो आबादी में केवल 15% हैं लेकिन 40% संसाधनों पर क़ब्ज़ा कर रखा है. क्या अब 25% आबादी होने की प्रतीक्षा है. स्वयं सिंह बनों.” अब जब सबकुछ स्पष्ट है कि मस्जिद में बलि का मामला नहीं था, ये ट्वीट अभी भी उनकी टाइमलाइन पर मौजूद है. (ट्वीट का आर्काइव)
बिहार के गोपालगंज से खबर आ रही है कि मस्जिद को शक्तिशाली बनाने के लिए 15 वर्षीय रोहित जयसवाल की बलि दे दी जाती है।और बलि देने वाले होते हैं शांति दूत जो आबादी में केवल 15% हैं लेकिन 40% संसाधनों
पर क़ब्ज़ा कर रखा है।क्या अब 25% आबादी होने की प्रतीक्षा है।स्वयं सिंह बनों।— Vijay Shankar Tiwari (@VijayVst0502) May 11, 2020
कई मौकों पर गलत जानकारी फ़ैलाने के लिए मशहूर संजय दीक्षित और पायल रोहतगी ने भी यही दावे किए थे. उनके ट्वीट्स भी अभी तक उनकी टाइमलाइन पर मौजूद हैं.
इस तरह एक ऐसी घटना जिसमें अभी तक की जांच से पता चलता है कि बच्चे की मौत डूबने से हुई थी, इसे ऑप इंडिया सहित कई लोगों द्वारा सांप्रदायिक बनाने की भरपूर कोशिश की गई. बाद में कुछ लोगों ने चुपचाप अपने ट्वीट्स डिलीट कर लिए तो कुछ अभी तक अपने गलत दावों पर कायम हैं. ऑप इंडिया ने एक कदम आगे बढ़कर सारे आरोप मृतक बच्चे के पिता पर डाल दिए हैं और खुद को विक्टिम घोषित कर दिया है.
OpIndia’s Hindi editor @ajeetbharti put out a video in which he repeatedly labeled the father as a ‘liar’. Watch this 44 seconds clip to see the number of times the grieving father has been targeted by OpIndia.
Full video: https://t.co/v0GFMuCO1M
6/7 pic.twitter.com/oTsmb0Q3EV
— Pratik Sinha (@free_thinker) May 17, 2020











