पश्चिम बंगाल की चुनावी लड़ाई में शासन के बजाय सांप्रदायिक राजनीति की निरंतर उथल-पुथल अधिक प्रभावी रही है. जो मुद्दा कभी कई चुनावी पहलुओं में से एक था, वो अब राजनीतिक मैसेज और सार्वजनिक चर्चा को तेजी से ध्रुवीकृत खेमों में बदल कर प्रतिस्पर्धा की केंद्रीय धुरी बन गया है.

ये विभाजन नया नहीं है, लेकिन 2021 के बाद से ये काफी सख्त हो गया है. पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 75% मुस्लिम वोट हासिल किये थे, जबकि भाजपा लगभग 7% वोट हासिल कर पाई थी. तब से अब तक यह ध्रुवीकरण और गहरा गया है—शायद एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां से वापसी शायद संभव नहीं है. इसने मतदाताओं को कठोर राजनीतिक और धार्मिक गुटों में बांट दिया है, जहां वैचारिक बदलाव (crossover) की गुंजाइश बहुत कम बची है.

हाल ही में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेसिव रिवीजन (SIR) ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है. कई रिपोर्ट्स और स्टडीज से संकेत मिला है कि इस अभ्यास के दौरान मुसलमानों को असमान रूप से निशाना बनाया गया है, जिससे बहिष्कार की आशंकाएं मजबूत हो गई हैं और सांप्रदायिक शक और भी गहरा हो गया है. इस माहौल में, संस्थागत प्रक्रियाएं और राजनीतिक मैसेज एक साथ आते दिखाई देते हैं, जो एक ऐसे अभियान को धार दे रहे हैं जहां ध्रुवीकरण केवल संयोग नहीं, बल्कि आधारशिला है.

इस चुनाव की तैयारी में, भाजपा का सोशल मीडिया अभियान AI-जनरेटेड वीडियो द्वारा संचालित रहा है जो इस विभाजन को और आगे बढ़ाते हैं. इनमें से कई क्लिप्स मुसलमानों को हिंसक बाहरी लोगों और बंगाल के सांस्कृतिक ढांचे के लिए अस्तित्वगत खतरे के रूप में चित्रित करने वाले कच्चे और हानिकारक रूढ़िवादी चित्रणों पर निर्भर हैं. ये नैरेटिव एक पुराने राजनीतिक तर्क को प्रतिध्वनित और संवर्धित करते हैं: कि राज्य में “अवैध घुसपैठियों” का कब्ज़ा होता जा रहा है और इसकी पहचान खतरे में है.

बिना किसी बारीकी या सूक्ष्मता के, यह संदेश बिल्कुल स्पष्ट है: एक निश्चित दिशा में वोट दें, अन्यथा जैसा बंगाल आप जानते हैं, उसे खोने का जोखिम उठाएं.

उदाहरण के लिए, राज्य में चुनाव होने से एक महीने से भी कम समय पहले 30 मार्च को बीजेपी पश्चिम बंगाल के ऑफ़िशियल हैंडल से शेयर की गई X पोस्ट देखिए:

 

यह भाजपा की ओर से एक क्लासिक ‘सांकेतिक राजनीति’ है जो गहरी सांप्रदायिक चिंताओं को उजागर करती है, और सूक्ष्म रूप से मुसलमानों को ऐसे सांस्कृतिक बाहरी लोगों के रूप में पेश करती है जिनकी उपस्थिति मात्र बंगाल की पहचान को खतरे में डालती है. इसमें निहित संकेत यह है कि भाजपा के खिलाफ वोट देना भाषा, संस्कृति और विस्तार से बहुसंख्यक समुदाय के ही विस्थापन के लिए वोट देना है.

हमें वोट दें या बर्बाद हो जाएं: बंगाली हिंदुओं को भाजपा का संदेश

भाजपा के ऑफ़िशियल हैंडल ने अपने सोशल मीडिया अभियान के हिस्से के रूप में कई AI-जनरेटेड वीडियो जारी किए हैं, जिसमें वायरल नारे को प्रमुखता दी गई है: “पाल्टानो दरकार, चाई बीजेपी सरकार” (बदलाव जरुरी है, भाजपा सरकार चाहिए)

ऐसा ही एक वीडियो (नीचे संलग्न) बंगाल इकाई के इंस्टाग्राम हैंडल पर मौजूद है, जो तृणमूल कांग्रेस की संभावित जीत के इर्द-गिर्द एक भयावह राजनीतिक नैरेटिव बुनता है. ये फिरहाद हकीम का AI-रेंडर वर्जन पेश करता है, जिसे राज्य भर में “मिनी पाकिस्तान” समूहों के निर्माण की घोषणा करते हुए दिखाया गया है. ये वाकया कोलकाता के मेयर से जुड़े एक दशक पुराने विवाद से जुड़ा है. इसके बाद वीडियो में मुस्लिम “घुसपैठियों” के बड़े समूहों के विजुअल्स को दिखाया गया है जो बंगाल के रास्ते भारत में कंटीली सीमाओं को पार कर रहे हैं, इसके बाद कोलकाता में व्यापक हिंसा और अशांति के विजुअल्स हैं, जिन्हें आक्रामक मुस्लिम भीड़ द्वारा उखाड़ फेंके जाने के रूप में दिखाया गया है.

मैसेज साफ और सावधानी से तैयार किया गया है: TMC के लिए वोट न केवल एक राजनीतिक विकल्प के रूप में तैयार किया गया है, बल्कि जनसांख्यिकीय उथल-पुथल के लिए एक ट्रिगर के रूप में तैयार किया गया है जहां हिंदू विस्थापित होते हैं और राज्य की पहचान मौलिक रूप से बदल जाती है. वीडियो में चुनाव को डर, पहचान और सांप्रदायिक विभाजन पर लड़ी गई अस्तित्व की लड़ाई के रूप में पेश किया गया है.

 

 

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X पर 2 अप्रैल को शेयर किये गए एक पोस्ट में पार्टी ने एक गहरा विरोधाभास पैदा करने के लिए AI-जनरेटेड दृश्यों का उपयोग किया है. वीडियो की शुरुआत हिंदू घरों के दृश्यों से होती है जो रोज़मर्रा की धार्मिक गतिविधियों में लीन हैं—पूजा करना, भजन कीर्तनों में भाग लेना और प्रसाद बांटना—जो शांति और एकजुटता को दर्शाता है. फिर इस शांति को अचानक तबाह कर दिया जाता है जब रात के समय ‘स्कल-कैप’ (टोपी) पहने मुस्लिम पुरुषों को मोहल्ले में घुसते और घरों में आग लगाते हुए दिखाया जाता है.

नैरेटिव को इस पंक्ति द्वारा रेखांकित किया गया है: “वे सिर्फ शांति और समृद्धि, सुरक्षा और संरक्षा चाहते थे.” यह तुलना जानबूझकर और सोची-समझी गई है, जिससे एक समुदाय को स्वाभाविक रूप से शांतिपूर्ण और दूसरे को विनाशकारी शक्ति के रूप में पेश किया गया है. ये वीडियो बहुत हद तक सांप्रदायिक रूढ़िवादिता पर आधारित है, जो डर तथा पीड़ित होने की भावना को दृश्यात्मक रूप से अंकित करने के लिए AI का उपयोग करता है.

एक अन्य वीडियो में दिखाया गया है कि कैसे TMC को वोट देने से पहचान, संपत्ति और रोजगार की संभावनाएं ख़त्म हो जाएंगी. TMC के लिए वोट बटन दबाने पर एक महिला को पता चला कि उसकी साड़ी की जगह हिजाब ने ले ली है.

इन दोनों वीडियो में, दृश्यात्मक व्याकरण वैचारिक संदेश को पुख्ता करने का मुख्य काम करता है. हिंदू घरों को दिखाते वक्त AI-रेंडर फ्रेम गर्मजोशी और प्रचुरता से भरे होते हैं: नरम रोशनी, सजावट और सांस्कृतिक निरंतरता की भावना. इसके उलट, जब मुसलमानों का परिचय दिया जाता है तो सौंदर्यशास्त्र अचानक बदल जाता है: पैलेट गहरा हो जाता है, सेटिंग ख़राब हो जाती है, और यहां तक ​​कि आभूषण जैसे व्यक्तित्व के निशान भी गायब हो जाते हैं, जैसे साड़ी की जगह हिजाब ने ले ली है. मुस्लिम आकृतियों को चेहरे विहीन, अराजक और विघटनकारी के रूप में दिखाया गया है, जिन्हें उनकी पहचान से वंचित कर एक सामूहिक खतरे के रूप में पेश किया गया है.

बीजेपी बंगाल के फ़ेसबुक पेज पर अपलोड किया गया एक अन्य वीडियो बांग्लादेशी मुसलमानों द्वारा “मूक जनसांख्यिकीय आक्रमण” के विचार को आगे बढ़ाकर इस नैरेटिव को और तेज करता है. क्लिप बार-बार सुझाव देती है कि बंगाली हिंदुओं की संख्या ज़्यादा हो रही है, जबकि तृणमूल या तो इसमें शामिल है या इसमें मिलीभगत कर रही है. इसके बाद इसमें दक्षिणपंथी टिप्पणीकार जे. साई दीपक को दिखाया गया है, जो इस कथित घुसपैठ को अभूतपूर्व बताते हुए चेतावनी देते हैं कि “वह बचपन जिसमें आप पले-बढ़े, वे मोहल्ले जिनमें आप बड़े हुए—सब कुछ बदल रहा है.”

नीचे इस क्लिप से कुछ फ्रेम्स दिए गए हैं:

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10 मार्च को भाजपा की पश्चिम बंगाल युवा शाखा ने एक AI-जनरेटेड क्लिप प्रसारित की, जो दक्षिणरंजन मित्र मजूमदार की प्रिय बंगाली लोक कथाओं की कल्पना को फिर से पेश करती है. वीडियो में ममता बनर्जी को “दुष्ट रानी” के रूप में दिखाया गया है, जो लुंगी पहने समर्थकों की मदद से व्यवस्थित रूप से बंगाली पहचान को मिटा रही है. प्रतीकात्मक परिवर्तनों की एक श्रृंखला के माध्यम से, यह एक सांस्कृतिक कायापलट को चित्रित करता है—खीर का ‘सेवई’ में बदलना, ‘जल’ का ‘पानी’ बन जाना, और धोती पहने पुरुषों का दाढ़ी वाले लुंगीधारी पुरुषों में बदल जाना—जो भाषा, भोजन और पहनावे के पूर्ण प्रतिस्थापन का संकेत देता है.

ये दृश्य अत्यंत स्पष्ट है: बंगाली पहचान को खतरे में दिखाया गया है, जिसमें मुसलमानों को इसके विरोधी के रूप में पेश किया गया है. पूरे समुदाय को कुछ सांकेतिक चिह्नों तक सीमित करके और उन्हें सांस्कृतिक नुकसान के कारक के रूप में प्रस्तुत करके, यह वीडियो सांप्रदायिक रूढ़िवादिता का सहारा लेता है. इसका समापन एक पूर्व-निर्धारित ‘बहाली’ के साथ होता है, जहां “दुष्ट रानी” का तख्तापलट कर दिया जाता है और उसे उसके मुस्लिम समर्थकों के साथ कांटेदार सीमा के पार बांग्लादेश की ओर भागने पर मजबूर कर दिया जाता है. 

भाजपा का सोशल मीडिया अभियान भी सांस्कृतिक पुरानी यादों में बदल गया है, जिससे उपेन्द्रकिशोर रे चौधरी द्वारा बनाई गई और सत्यजीत रे द्वारा स्क्रीन पर अमर हो गई गूपी और बाघा की प्रतिष्ठित जोड़ी के इर्द-गिर्द AI कंटेंट तैयार की जा रही है. इस क्लिप में दोनों पश्चिम बंगाल के भविष्य की झलक देखने के लिए भविष्य की यात्रा करते हैं, लेकिन उन्हें एक ऐसा मोहल्ला मिलता है जिस पर मुसलमानों का कब्ज़ा है.

तस्वीरें संकेतों से भरी हुई हैं: दीवारों पर फ़िरहाद हकीम के चेहरे वाले तृणमूल कांग्रेस के पोस्टर लगे हैं, जिन पर उर्दू में लिखा है, जो बंगाली भाषा और संस्कृति के मिटाए जाने का दृश्य संकेत देते हैं. इस काल्पनिक भविष्य को दिखाने के लिए लोकप्रिय सांस्कृतिक पात्रों का उपयोग करना एक सोची-समझी रणनीति है, ताकि डर को परिचित चीज़ों से जोड़कर गहरा किया जा सके. एक ऐसे परिदृश्य को पेश करके जहां भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को विस्थापित कर दिया गया है, यह वीडियो राजनीतिक बदलाव को जातीय विस्थापन के पर्याय के रूप में पेश करता है.

 

 

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एक अन्य AI-जनरेटेड वीडियो में ममता बनर्जी को टोपी पहने मुसलमानों से घिरा हुआ दिखाया गया है. वीडियो के साथ कैप्शन से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बांग्लादेशियों का बचाव करने और “राष्ट्र-विरोधी” होने के आरोपों से सहज हैं, क्योंकि वे उनकी पार्टी के वोट बैंक हैं.

 

 

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इसी तरह, इस वीडियो में आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल “पश्चिम बांग्लादेश” बनने की राह पर है. एक मुस्लिम व्यक्ति, टोपी, दाढ़ी, लुंगी की समान विजुअल प्रतीकात्मकता के माध्यम से व्यंग्य करते हुए, एक कार्यक्रम में बाधा डालता है, और घोषणा करता है कि उसे मां दुर्गा और मां काली के नाम का उच्चारण करने की अनुमति नहीं है.

 

 

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एक अन्य फ़ेसबुक वीडियो में ये निहित है कि TMC बांग्लादेशी मुसलमानों और रोहिंग्याओं के अवैध वोटों का इस्तेमाल करके चुनाव जीतती है. अब जब ये मतदाता भाग गए हैं, तो ममता बनर्जी को CPI (M) के दिग्गज एमडी सलीम से मदद लेते दिखाया गया है. इसके अलावा, जिस कूरियर को वोट के बदले पैसे ट्रांसफ़र करने का काम सौंपा गया है, वो भी लुंगी पहनता है, जिसका मतलब है कि वो भी मुस्लिम है. इससे पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में एक गहरी सांठगांठ है, जो TMC को सत्ता में बनाए रखने के लिए मुसलमानों के इशारे पर काम कर रही है.

 

 

नेताओं ने क्या कहा

ऑनलाइन प्रसारित होने वाले इन AI-जनरेटेड दृश्यों की सीधी गूंज भाजपा नेताओं के बयानों में भी सुनाई देती है. ‘रिपब्लिक बांग्ला’ के एक टॉक शो में, बरानगर से भाजपा उम्मीदवार सजल घोष ने इस चुनाव को हिंदू बंगालियों के लिए “आखिरी ट्रेन” के रूप में पेश किया. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह अवसर हाथ से निकल गया, तो भविष्य ऐसा होगा जहां “बंगालियों को अपने नाम के आगे शेख या मोहम्मद जोड़ना पड़ेगा”

पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने बांग्लादेशी “घुसपैठियों” के मुद्दे को बार-बार उठाया है, उन्होंने आरोप लगाया है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार फ़र्ज़ी पहचान डाक्यूमेंट्स के माध्यम से चुनावों में उनकी भागीदारी सुगम बनाती है. योगी आदित्यनाथ और हिमंत बिस्वा सरमा जैसे नेताओं ने भी इसी तरह के दावे किए हैं, जिन्होंने चुनावों को बंगाल की पहचान को “बचाने” के लिए अस्तित्व की लड़ाई के रूप में पेश किया है.

पूरी बात साफ है: “अवैध घुसपैठिये” का डर भाजपा के डिजिटल अभियान और जमीनी भाषणों, दोनों का आधार है. यह संदेश कुछ ऐसा प्रतीत होता है—पार्टी को वोट दें, अन्यथा ‘दूसरे’ (समुदाय) द्वारा कब्ज़ा किए जाने का जोखिम उठाएं. लेकिन यह घेराबंदी केवल “घुसपैठियों” तक नहीं रुकती; यह विस्तार पाकर समग्र रूप से मुसलमानों को जनसांख्यिकीय, सांस्कृतिक और सुरक्षा संबंधी खतरे के रूप में चित्रित करने लगती है.

यहां जो उभर कर सामने आता है, वह एक अत्यंत सांप्रदायिक अभियान है, जो स्पष्ट रूप से ध्रुवीकरण की ओर अग्रसर है. फलस्वरूप, चुनाव को शासन या नीति पर आधारित प्रतिस्पर्धा के बजाय, एक कृत्रिम रूप से निर्मित अस्तित्वगत संकट के रूप में दिखाया गया है. जैसे-जैसे बंगाल चुनाव के पहले चरण की ओर बढ़ रहा है, भाजपा का बंगाल अभियान नैरेटिव राज्य के चुनाव को पहचान के जनमत संग्रह में बदलने की कोशिश कर रहा है, जो राजनीतिक अनुनय और भय-प्रेरित लामबंदी के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है.

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