“मेरे भाई का पत्थर फेंकते, पत्रकारों को परेशान करते, लोगों को धक्का देते, हंगामा करते या कोई भी ग़लत शब्द बोलते हुए एक भी वीडियो फ़ुटेज नहीं है. लेकिन, विरोध वाली जगह खाली होने के बाद सड़कों की सफाई करते और एक बैग में कचरा इकट्ठा करते उनका वीडियो फ़ुटेज ज़रूर है. इसलिए, मैं पुलिस, सरकार और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से पूछना चाहता हूं कि मेरे भाई को गिरफ़्तार क्यों किया गया?”

कोलकाता में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा के सिलसिले में गिरफ़्तार किए गए 16 लोगों में से एक, SK सलमान हुसैन के भाई इमरान ने मंगलवार, 28 जुलाई को ‘ऑल्ट न्यूज़’ से ये बात कही. वो उस समय चीफ़ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत के बाहर अपने भाई की ज़मानत की सुनवाई का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे.

सलमान उन 16 लोगों में शामिल हैं जिन्हें 24 जुलाई की रैली के दौरान कथित तौर पर हिंसा करने के आरोप में कोलकाता और आस-पास के इलाकों से गिरफ़्तार किया गया था. इन 16 लोगों में से 15 मुस्लिम हैं. राज्य विधानसभा में और मीडिया से बात करते हुए, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बार-बार उपद्रवियों को “शुक्रवार वाले लोग”, “विदेशी फंडिंग वाले जमाती” और “इस्लामिस्ट” कहा.

इमरान ने आगे कहा, “सलमान पर इतने गंभीर आपराधिक आरोप क्यों लगाए गए और उन्हें ‘गुंडा’ क्यों कहा गया? उन्हें बांग्लादेशी इस्लामी संगठनों से क्यों जोड़ा गया और रिपब्लिक बांग्ला जैसे कुछ चैनलों ने उन्हें बदनाम क्यों किया? क्या छात्रों के समर्थन में शुक्रवार को विरोध प्रदर्शन में शामिल होना कोई अपराध था? क्या पूरे देश को प्रभावित करने वाले किसी मुद्दे का समर्थन करने के लिए उनका छात्र होना ज़रूरी है? उन्हें एक राष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी आवाज़ उठाने के लिए सज़ा दी गई.”

इसके कुछ ही समय बाद, सलमान को ज़मानत मिल गई. मंगलवार को दोपहर करीब 2 बजकर 30 मिनट पर उन्हें दो दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने के बाद, बेंच ने अचानक मामले की दोबारा सुनवाई की और सभी 16 आरोपियों को ज़मानत दे दी. इन आरोपियों में शेख सलमान हुसैन, मोहम्मद आज़ाद, मोहम्मद अफ़रोज़, इरफ़ान खुर्शीद, अरशद अली उर्फ़ साजिद, मोहम्मद मोइनुद्दीन, मोहम्मद आलमगीर उर्फ़ राजू, इमरान अहमद उर्फ़ गोपी, खालिद रज़ा उर्फ़ रिंकू, ज़मीर अहमद उर्फ़ मिंकू, मोहसिन खान, शबाज़ खान, शेख मोहम्मद सलमान हुसैन, ज़हीरउद्दीन मल, मोहम्मद जावेद अख्तर, मोहम्मद वकार आज़म और दीपक भौमिक उर्फ़ विक्की शामिल थे.

आरोपियों का पक्ष ‘ऑल इंडिया लॉयर्स यूनियन’ (AILU) के बैनर तले लगभग 100 वकीलों ने रखा जिनमें समीम अहमद, राजा सेनगुप्ता, यासीन रहमान, संजय कुमार गुप्ता और अन्य वकील शामिल थे. इसे संवैधानिक अखंडता को बनाए रखने और राज्य के दमन को हराने की दिशा में एक कदम बताते हुए अहमद ने ‘ऑल्ट न्यूज़’ से कहा, “पश्चिम बंगाल सरकार ने लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल लोगों को जेल में डालकर उसे दबाने की कोशिश की थी. मुख्यमंत्री ने कहा था कि आरोपियों को ऐसे नतीजों का सामना करना पड़ेगा जिन्हें उनकी तीन पीढ़ियां याद रखेंगी. आज का फ़ैसला साबित करता है कि लोकतंत्र में ऐसी खोखली बयानबाज़ी के लिए कोई जगह नहीं है.”

सभी राज्यों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाने और पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए लोगों को तुरंत रिहा करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए, ज़मानत आदेश में कहा गया, “प्रथम दृष्टया अदालत के सामने ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे ये पता चले कि किसी आरोपी का आपराधिक बैकग्राउंड है… ये अदालत सभी आरोपियों को ज़मानत देने के पक्ष में है.”

दिन भर चली गहमागहमी भरी कार्यवाही के बारे में बताते हुए अहमद ने ऑल्ट न्यूज़ को कहा, “आरोपियों के पहले बैच को दोपहर में चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और 30 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. अदालत ने शुरू में बचाव पक्ष की ज़मानत की मांग को ठुकरा दिया था. हालांकि, 30-40 मिनट बाद मामले पर फिर से सुनवाई हुई और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, सभी आरोपियों को ज़मानत दे दी गई.”

‘शुक्रवार वाले लोग’, ‘विदेशी फंडिंग वाले जमाती’, ‘इस्लामिस्ट’

ऑल्ट न्यूज़ से बात करने वाले कोलकाता पुलिस के एक अधिकारी के मुताबिक, आरोपी शुक्रवार को सियालदह से एस्प्लेनेड (डोरिना क्रॉसिंग के पास) तक हुए विरोध मार्च के बाद भड़की हिंसा में शामिल पाए गए थे. पुलिस ने सबसे पहले पुलिसकर्मियों और पत्रकारों पर कथित हमलों, सार्वजनिक संपत्ति में तोड़फोड़ और सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा डालने के आरोप में स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज़ किया था.

पुलिस ने बताया कि CCTV फ़ुटेज और वीडियो क्लिप की जांच करके संदिग्धों की पहचान की गई और हिंसा में शामिल कथित तौर पर 70 लोगों की पहचान की गई. पुलिस ने आगे दावा किया कि गिरफ़्तार किए गए कई लोग छात्र नहीं थे और उनका आपराधिक रिकॉर्ड था; आरोप है कि वो “रैली में घुस आए और हिंसा भड़काई.” कुल सात FIR दर्ज़ की गईं — 6 हेयर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में और एक एंटाली पुलिस स्टेशन में.

शनिवार, 25 जुलाई को पश्चिम बंगाल विधानसभा को संबोधित करते हुए, अधिकारी ने इस मामले में हाल ही में पारित ‘पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण अधिनियम, 2026’ या ‘एंटी-गुंडा कानून’ का ज़िक्र किया और कहा कि ये इस कानून को लागू करने का पहला मामला है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जिन 70 लोगों की पहचान की गई, “वे छात्र नहीं थे और उनका विरोध-प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं था.”

मुख्यमंत्री ने कहा, “वो छात्र नहीं हैं, न ही वे खुद को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ कहने वाले दल के सदस्य हैं, और न ही वो NEET पेपर लीक से प्रभावित प्रदर्शनकारी हैं. वो सिर्फ़ गड़बड़ी फैलाने आए थे. मैं पूरे सदन की ओर से हमारे पत्रकार साथियों पर हुए हमले की निंदा करता हूं. पत्रकारों पर हमला मंज़ूर नहीं है. हम ‘गुंडा एक्ट’ के तहत ऐसी कार्रवाई करेंगे कि ये गुंडे और उनकी आने वाली तीन पीढ़ियां भी इसे याद रखेंगी. ठीक इसी वजह से ये कानून बनाया गया था और इसी वजह से इसे पारित किया गया था. बंगाल के लोग अब देख रहे हैं कि इस कानून की ज़रूरत क्यों थी.”

उन्होंने पांच कथित “गुंडों” के नाम भी बताए — राजाबागन से अफ़रोज़, किडरपोर से नाहिद, इकबालपुर से तनबीर और निज़ाम, और वाटगंज से राहुल जमाल.

 

विधानसभा में अपने भाषण के अगले दिन, सीएम ने पत्रकारों से कहा कि आरोपी “विदेशी फ़ंडिंग वाले जमातियों” और “इस्लामवादियों” से प्रभावित हो सकते हैं. उन्होंने कहा, “इनमें से कोई भी छात्र नहीं है, ये सभी जमाती और इस्लामवादी हैं जो भारत को कमज़ोर करना चाहते हैं और देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं. ये गुंडे हैं जिनसे एंटी-गुंडा कानून के तहत निपटाया जाएगा. शुरू में, ये रैली खुद को ‘कॉकरोच पार्टी’ कहने वालों ने आयोजित की थी और बाद में वामपंथी समूह इसमें शामिल हो गए. मैं बंगाल के उन लोगों का शुक्रिया अदा करता हूं जो असली NEET रैली का हिस्सा थे क्योंकि वो इस घटना में बिल्कुल भी शामिल नहीं थे. असल में जो लोग सच में शामिल थे, उन्होंने पत्रकारों पर हुए बर्बर हमलों के बारे में सोशल मीडिया पर जानकारी शेयर की है. उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए ये भी साफ़ किया है कि उनका हमलावरों से कोई लेना-देना नहीं है; कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने मुझे ये सभी जानकारियां भेजी हैं.”

अधिकारी ने कहा कि पिछले 10 हफ़्तों में, राज्य सरकार ने लगातार हो रहे असभ्य व्यवहार से निपटने के लिए कानून लागू किए हैं. मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि वो “गुस्से में आकर बदला ले रहे हैं. खारिजी मदरसों के रजिस्ट्रेशन की जांच से वो नाराज़ हैं. अनधिकृत OBC सर्टिफिकेट रद्द करने के कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश को लागू करने से वो नाराज़ हैं. 1950 के पशु वध कानून से वे नाराज़ हैं. वो ध्वनि प्रदूषण पर लगी पाबंदियों से भी नाराज़ हैं. वो लोग वहां अशांति फैलाने गए थे. उन्होंने PM और CM की तस्वीरों पर लाठियां मारीं… कुछ लोग राष्ट्रीय ध्वज को उल्टा पकड़े हुए थे. इन सभी गुंडों को सज़ा दी जाएगी,” उन्होंने विधानसभा में दिए गए अपने बयान को “फ़ाइनल” बताया.

इससे पहले मीडिया से बातचीत में, CM ने हिंसा भड़काने के आरोपी लोगों को साफ़ तौर पर ‘शुक्रवारी’ या ‘शुक्रवार वाले लोग’ कहा — सीधे तौर पर मुस्लिम समुदाय की ओर इशारा करते हुए, क्योंकि उनका हफ़्ते का सबसे अहम नमाज़, जुम्मा नमाज़, शुक्रवार को ही होता है. “मैंने इन लोगों की पहचान कर ली है… जिनका NEET से कोई लेना-देना नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री बार-बार ‘शुक्रवार’ कह रहे थे… ज़ाहिर है कि वो शुक्रवार को ही ऐसा [हिंसा भड़काना] करेंगे… इसीलिए ‘शुक्रवार वाले लोगों’ ने पत्रकारों पर हमला किया है. मुझे कुछ दिन दीजिए, मुझे पता है कि उनके साथ क्या करना है,” उन्होंने वार्निंग दी.

‘पत्रकारों पर हमले’ के लिए ‘शुक्रवार वाले लोगों’ को ज़िम्मेदार ठहराने के एक और मामले में, अधिकारी को एक घायल पत्रकार के साथ क्लिप में देखा जा सकता है. वो पत्रकार को भरोसा दिला रहे हैं कि जिन लोगों ने कथित तौर पर उन पर हमला किया, उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाएगी. “क्या ये कोई विरोध-प्रदर्शन था? पूर्व मुख्यमंत्री ने इन लोगों को शुक्रवार को पूरी छूट दे रखी थी, इसीलिए ये [हिंसा] शुक्रवार को हुई है.”

‘मुसलमान होने के कारण निशाना बनाया गया’

अदालत से ज़मानत मिलने से कुछ घंटे पहले, ज़ोहिरुद्दीन के पिता याकूब अली माल ने गहरे दुख और बेबसी के साथ ‘ऑल्ट न्यूज़’ से बात की. उन्होंने कहा, “ये कोई असली गिरफ़्तारी नहीं है. हम हमेशा इस डर में जीते हैं कि मुसलमान होने के कारण सरकार हम पर हमला कर सकती है. सरकार का मानना ​​है कि सारे अपराध मुसलमान ही करते हैं. अगर आप इस अदालत में चारों ओर देखें, तो आपको सच्चाई पता चल जाएगी. मेरे बेटे ने कोई अपराध नहीं किया था; वो एक विरोध प्रदर्शन में गया था जहां हज़ारों लोग गए थे और उसने भी वैसे ही नारे लगाए जैसे हज़ारों लोगों ने लगाए थे, फिर भी अगले दिन पुलिस ने उसे ही गिरफ़्तार कर लिया. मेरे बेटे के किसी को परेशान करने का कोई फ़ुटेज नहीं है; उसकी पहचान के अलावा उसे गिरफ़्तार करने का कोई आधार नहीं था. मुझे उम्मीद है कि न्याय होगा.”

याकूब अली माल की बात का समर्थन करते हुए, कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील सैयद नफ़ीरुल इस्लाम ने इस मामले में मुस्लिम समुदाय को “साफ़ तौर पर निशाना बनाए जाने” की निंदा की. उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि राज्य के मुख्यमंत्री को अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास होगा और वो समझेंगे कि उनके बयान उन ज़िम्मेदारियों से कैसे भटक जाते हैं. मुझे उम्मीद है कि वो प्रदर्शनकारियों को बैकग्राउन्ड के आधार पर निशाना नहीं बनाएंगे.”

इस मामले को और उलझाते हुए, अधिकारी का बार-बार ये कहना था कि आरोपियों पर ‘एंटी-गुंडा कानून’ के तहत कार्रवाई की जाएगी. जब हमने हेअर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के जांच अधिकारी द्वारा कोर्ट में जमा की गई FIR और रिमांड पेपर की जांच की, तो उसमें इसका कोई ज़िक्र नहीं मिला. FIR के मुताबिक, आरोपियों पर BNS की 12 धाराओं के तहत मामला दर्ज़ किया गया था. हेअर स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि BNS की धाराओं के अलावा, ‘वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ़ पब्लिक ऑर्डर (अमेंडमेंट) एक्ट, 2026’ की धारा 9 और 15A भी लागू की गई थीं.

‘एंटी-गुंडा कानून’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर अभी कलकत्ता हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच में सुनवाई चल रही है, जिसके प्रमुख एक्टिंग चीफ जस्टिस तपोब्रत चक्रवर्ती हैं.

आरोपियों पर गुंडा कानून लागू न किए जाने के बारे में ऑल्ट न्यूज़ से बात करते हुए वकील शमीम अहमद ने कहा, “AILU ने कोर्ट में इस एक्ट को चुनौती दी थी. राज्य के एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) बिलवादवाल भट्टाचार्य ने कोर्ट में साफ़ तौर पर कहा था कि ये एक्ट अभी भी एक बिल ही है, क्योंकि इसे अभी तक गवर्नर की मंज़ूरी नहीं मिली है. इसलिए, अभी पश्चिम बंगाल में गुंडा एक्ट जैसा कोई कानून मौजूद ही नहीं है. आप किसी पर ऐसा कानून कैसे लागू कर सकते हैं जो असल में है ही नहीं?”

24 जुलाई को क्या हुआ?

शुक्रवार को कोलकाता में कई वामपंथी समूहों – जैसे SFI, AISA, AIDSO, AISF, PDSF, DYFI, CPIM(L) और अन्य – ने एक रैली आयोजित की, जिसे बाद में ‘CJP कोलकाता’ नाम के एकजुटता समूह का भी समर्थन मिला. इस रैली में शहर और उसके बाहर से हज़ारों प्रदर्शनकारी शामिल हुए. वो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे, NEET UG पेपर लीक से प्रभावित छात्रों का समर्थन कर रहे थे और 20 जुलाई को दिल्ली में हुई पुलिस की बर्बरता की निंदा कर रहे थे.

ज़्यादातर लोगों को इकट्ठा करने का काम इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए हुआ, इसलिए कोलकाता और आस-पास के इलाकों से ‘जेन-ज़ी’ (GenZ) युवा हाथों में पोस्टर और प्लेकार्ड लेकर रैली में शामिल हुए और सड़कें ‘आज़ादी’ के नारों से गूंज उठीं. ‘ऑल्ट न्यूज़’ से बात करते हुए रैली में शामिल लोगों ने इसे काफ़ी हद तक शांतिपूर्ण और ज़ुल्म व नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया. 22 साल के ताहा सिद्दीकी ने कहा, “मैं रैली में तब शामिल हुआ जब वो NRS मेडिकल कॉलेज (सियालदह) से मौलाली की ओर बढ़ रही थी. दोपहर करीब 3 बजे विरोध प्रदर्शन में बिताए 30-40 मिनटों के दौरान, प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, किसी भी पत्रकार के साथ बदसलूकी नहीं हुई और पुलिस ने भी प्रदर्शनकारी छात्रों का पूरा सहयोग किया.”

सिद्दीकी ने कहा कि घर लौटने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर हाथापाई और अफरातफरी की कुछ झलकियां देखीं. उन्होंने कहा कि इसके बाद कई दिनों तक चले विवाद और गिरफ़्तारियों ने विरोध प्रदर्शन की असली भावना को दबा दिया. उन्होंने कहा, “ये ध्यान में रखते हुए कि विरोध प्रदर्शन का मकसद सिस्टम में हो रही नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना और छात्रों व आम जनता की एकजुटता दिखाना था, ये देखना बहुत निराशाजनक है कि एक मुख्यमंत्री ने खास तौर पर लोगों के एक समूह को निशाना बनाया. ज़ाहिर है, कुछ उपद्रवी हो सकते हैं जो भीड़ में गड़बड़ी फैलाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन ज़्यादातर समय सब कुछ नियंत्रण में था.”

विरोध प्रदर्शन के आयोजकों में से एक, SFI सदस्य आकाश कर ने माना कि रैली खत्म होने के समय डोरिना क्रॉसिंग के पास अफरातफरी की कुछ घटनाएं हुई थीं. उन्होंने कहा, “लोगों ने पुलिस पर बोतलें और डंडे फेंके, कुछ पत्रकारों के साथ बदसलूकी भी हुई, इससे इनकार करने का कोई मतलब नहीं है जो हुआ वो ग़लत था और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के सिद्धांतों के खिलाफ है, लेकिन इनमें से कुछ भी मेरी आंखों के सामने नहीं हुआ. मैंने जो कुछ भी देखा, वो सोशल मीडिया वीडियो के ज़रिए देखा.”

हालांकि, आकाश कर ने आगे कहा, “इसके बाद हुई गिरफ्तारियां राज्य में मुसलमानों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की एक बड़ी मुहिम का हिस्सा हैं. इस अफरातफरी में BJP के सदस्य भी बराबर के भागीदार थे और उन्होंने आपत्तिजनक नारे भी लगाए, लेकिन उनके खिलाफ कोई FIR दर्ज़ नहीं की गई. जब रैली के आखिर में सभी प्रदर्शनकारी धर्मतल्ला के पास जमा हुए, तो हमने पुलिस से SN बनर्जी रोड पर रानी रश्मोनी हाई स्कूल तक जाने देने का अनुरोध किया था. लेकिन उन्होंने सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए जिससे तनाव पैदा हुआ और भीड़ भड़क गई. इस हंगामे के लिए पुलिस भी उतनी ही ज़िम्मेदार है.”

ऑल्ट न्यूज़’ की एक फ़ैक्ट-चेक रिपोर्ट का ज़िक्र करते हुए जिसमें कुछ मीडिया चैनलों के उन दावों को ग़लत बताया गया था कि CJP विरोध प्रदर्शन बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी से जुड़े थे, आकाश कर ने कहा, “बीजेपी सरकार अपने PR मीडिया चैनलों के सहारे ऐसे दावे करके विरोध प्रदर्शनों को बदनाम करने की कोशिश कर रही है. मुख्यमंत्री के बयान सच्चाई से दूर हैं. हर जगह हो रहे विरोध प्रदर्शनों में वो भारतीय शामिल हैं जो बीजेपी सरकार से परेशान हैं, न कि विदेशी या विदेशी फ़ंडिंग वाले लोग.”

‘ऑल्ट न्यूज़’ को पत्रकारों के साथ बदसलूकी के कुछ वीडियो मिले जो विरोध प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर सामने आए थे. ‘आज तक बांग्ला’ के पत्रकार इंद्रजीत कुंडू द्वारा अपलोड किए गए ऐसे ही एक वीडियो में एक बड़ी भीड़ को एक रिपोर्टर का मज़ाक उड़ाते और ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाते हुए उन्हें वहां से भगाते हुए देखा गया.

एक और क्लिप खुद आरोपी मोहम्मद अफ़रोज़ ने अपलोड की जिसमें भीड़ एक रिपोर्टर को परेशान कर रही है, उस पर पानी फेंक रही है और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगाते हुए उसे खदेड़ रही है; जबकि बैकग्राउंड में किसी को ये कहते हुए सुना जा सकता है, “मीडिया वालों पर हमला मत करो, वो भी बस अपना काम कर रहे हैं.”

वहीं दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर सलमान का एक और वीडियो वायरल हुआ जिसमें वो धर्मतला में विरोध-प्रदर्शन वाली जगह पर सड़कों से कचरा साफ़ करते हुए दिखाई दे रहे हैं. अपनी गिरफ़्तारी से एक दिन पहले, उन्होंने वीडियो में कहा, “ये देश सरकार का नहीं, हमारा है और देश में साफ़-सफ़ाई और शांति बनाए रखना हमारी ज़िम्मेदारी है… आज हमें देश-विरोधी और पाकिस्तानी घुसपैठिया बताया जाता है… खुदा की कसम इस मिट्टी से कितना मोहब्बत है, ये सिर्फ़ मेरा अल्लाह ही जानता है.”

तनाव और बेबसी से घिरे बैंकशाल कोर्ट कॉम्प्लेक्स में जश्न और थोड़ी राहत का माहौल बन गया. जहां एक तरफ़ परिवार के कई सदस्य और वकीलों का बड़ा समूह फूलों और मुस्कुराहट के साथ रिहा हुए लोगों का स्वागत कर रहा था, वहीं कुछ बड़े सवाल अब भी अनसुलझे थे: क्या बहुत कम सबूतों के आधार पर बड़े-बड़े आरोप लगाकर राजनीतिक असहमति को अपराध माना जा सकता है? क्या सांप्रदायिक बयानबाज़ी पुलिसिंग का तरीका तय कर सकती है? और क्या धर्म से परे, विरोध करने के संवैधानिक अधिकार की समान रूप से रक्षा की जाएगी?