1 अगस्त, 2026 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया कि ‘लॉजिकल विसंगति’ (logical discrepancy) के कारण जांच के बाद वोटर लिस्ट से हटाए गए 27 लाख लोगों में से केवल सात लाख लोगों ने ही कोर्ट द्वारा नियुक्त अपीलीय ट्रिब्यूनल के सामने वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए अपील की थी.
कोलकाता में जनगणना के लिए खुद से जानकारी भरने की प्रक्रिया की शुरुआत के मौके पर उन्होंने कहा, “जिन 27 लाख लोगों को SIR ट्रिब्यूनल से संपर्क करने का मौका दिया गया था, उनमें से लगभग सात लाख लोगों ने आवेदन किया था. बाकी लोगों ने अब तक कोई आवेदन या अपील नहीं की है.”
कई मीडिया आउटलेट्स ने मुख्यमंत्री के हवाले से ये आंकड़ा बताया (1, 2, 3).. सुवेंदु अधिकारी ने अपील न करने को नागरिकता के सवालों से और नागरिकता को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पाने से जोड़ा. उन्होंने कहा, “जब तक पूरी प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, ये तय करना संभव नहीं होगा कि जिन लोगों ने वोटर के तौर पर कोई दावा नहीं किया है, वे बाद में भारतीय नागरिक के तौर पर मान्यता मांगेंगे या नहीं.” उन्होंने आगे कहा, “अगर कोई देश का नागरिक नहीं है, तो उसे किसी भी सामाजिक योजना का लाभ नहीं मिलेगा.”
‘द टेलीग्राफ़‘ ने वही सात लाख वाला आंकड़ा छापा, और इस बार इसका ज़िक्र पश्चिम बंगाल सरकार के एक अज्ञात सीनियर अधिकारी के हवाले से किया. रिपोर्ट के मुताबिक, एक अधिकारी ने कहा, “पता चला है कि ‘तार्किक विसंगतियों’ की वजह से हटाए गए 27 लाख वोटरों में से सिर्फ़ 7 लाख ने ही ट्रिब्यूनल में अपील की है.” सीनियर अधिकारी ने बताया कि ये आंकड़ा अलग-अलग ज़िलों की रिपोर्टों को मिलाकर तैयार किया गया था, और राज्य के अधिकारियों को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि बाकी 20 लाख लोगों ने ट्रिब्यूनल में अपील क्यों नहीं की.
उस समय इस आंकड़े की पुष्टि नहीं की जा सकी थी
अगस्त में सात लाख वाले दावे की किसी भी आधिकारिक स्रोत से स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी, क्योंकि चुनाव आयोग की अपनी जानकारी में वोटरों के नाम हटाए जाने के खिलाफ़ दायर अपीलों का अलग से ब्योरा नहीं दिया गया था. अपीलों की कुल संख्या बताने वाले एक RTI जवाब में एक फ़ुटनोट भी था, जिसमें साफ़ किया गया था कि इस आंकड़े में वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के खिलाफ़ और नाम हटाए जाने के खिलाफ़, दोनों तरह की अपीलें शामिल थीं.

पश्चिम बंगाल के दक्षिण मालदा से कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी ने RTI के ज़रिए ये जानकारी हासिल की थी. इसे 24 अगस्त, 2026 को सुप्रीम कोर्ट के सामने तब पेश किया गया, जब कांग्रेस के प्रसेनजीत बोस और तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ’ब्रायन की ओर से भारत के चुनाव आयोग (ECI) के ख़िलाफ़ दायर याचिका पर सुनवाई हो रही थी.
सुनवाई के दौरान, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अपीलों का अलग-अलग ब्यौरा ज़रूरी है, क्योंकि “नाम हटाए जाने से ही किसी व्यक्ति के अधिकारों का तुरंत उल्लंघन हो रहा था.” इसके बाद बेंच ने ECI को निर्देश दिया कि वो अपीलों का अलग-अलग ब्यौरा दे. इसमें ये बताया जाए कि ट्रिब्यूनल के पास कितनी अपीलें लंबित हैं, और उन मतदाताओं से जुड़ी अपीलों को अलग-अलग किया जाए जिनके नाम हटाए या जोड़े गए थे, साथ ही क्रॉस-अपीलों को भी अलग किया जाए.
ECI ने 16 सितंबर को यह ब्यौरा सौंपा.
ECI के आंकड़े सुवेंदु अधिकारी के दावे को ग़लत साबित करते हैं
16 सितंबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में ECI की ओर से दाखिल किए गए ताज़ा हलफ़नामे के मुताबिक, कुल 38.31 लाख से ज़्यादा अपीलें दायर की गईं. इनमें से 22 लाख से ज़्यादा अपीलें उन वोटरों ने दायर की थीं जिनके नाम हटा दिए गए थे या लिस्ट से निकाल दिए गए थे, जबकि 16 लाख से ज़्यादा अपीलें नाम शामिल किए जाने के खिलाफ़ दायर की गई थीं.

दायर की गई 38 लाख से ज़्यादा अपीलों में से, 16 सितंबर तक सिर्फ़ 1.26 लाख अपीलों पर फ़ैसला हुआ था. ECI के हलफ़नामे के साथ लगे अनुलग्नक R/1 में अपीलीय ट्रिब्यूनल में दायर कुल अपीलों का ज़िलेवार ब्यौरा दिया गया है. इसे नीचे ग्राफिक में देखा जा सकता है.

ध्यान देने वाली बात ये है कि ECI के हलफनामे में बताई गई कुल अपीलों की संख्या (38,31,429) और Annexure R/1 में दी गई कुल अपीलों की संख्या (38,29,926) मेल नहीं खाती. इसमें 1,503 अपीलों का अंतर है. फिर भी, Annexure में नतीजों के आधार पर दिए गए डेटा से पता चलता है कि 8,649 अपीलों के कारण नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए, जबकि 1,13,943 अपीलों के कारण नाम शामिल किये गए. दूसरे शब्दों में जिन अपीलों पर फैसला हुआ, उनमें से लगभग 93% मामलों में वोटर का नाम वोटर लिस्ट में शामिल किये गए.
क्या मुख्यमंत्री के बयान के बाद दावे जमा हुए? नहीं.
कोई ये तर्क दे सकता है कि मुख्यमंत्री ने 1 अगस्त को बात कही थी, जबकि आयोग ने 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में अपने आंकड़े जमा किए, जिससे बीच के समय में अपीलें जमा होने के लिए काफी समय मिल गया. हालांकि, उपलब्ध डेटा से इस संभावना की सीधे जांच की जा सकती है, क्योंकि दोनों तारीखों के लिए कुल अपीलों की संख्या मौजूद है. दक्षिण मालदा से कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी को ECI से मिले RTI जवाब के मुताबिक, मुख्यमंत्री के बयान के छह दिन बाद और ‘द टेलीग्राफ़’ की रिपोर्ट के एक दिन बाद, यानी 7 अगस्त 2026 को ट्रिब्यूनल के पास पहले से ही 38,10,620 अपीलें थीं. आयोग के हलफ़नामे के साथ जुड़ी ज़िलेवार रिपोर्ट के मुताबिक, 10 सितंबर 2026 तक ये संख्या 38,29,926 हो गई थी. इस तरह, इस दौरान पूरे राज्य में अपीलों की कुल संख्या में केवल 19,306 की बढ़ोतरी हुई.
इंडियन एक्सप्रेस की जांच में सामने आई नई बातों ने भारत के चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. ऐसे में सात लाख के दावे का महत्व और भी बढ़ जाता है.
कुल मिलाकर, 1 अगस्त को सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया था कि लगभग 27 लाख मतदाताओं के मामलों की जांच हुई और उन्हें वोटर लिस्ट से हटा दिया गया, जिनमें से केवल सात लाख लोगों ने ही इस फैसले के खिलाफ अपील की थी. लेकिन उस समय मौजूद डेटा से इस दावे का मेल बिठाना मुश्किल है. चुनाव आयोग ने साफ किया है कि ये संख्या लगभग 22 लाख है. ये अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल, जिन्होंने SIR प्रक्रिया की देखरेख की थी, अब बंगाल के मुख्य सचिव हैं.





