भारत में ‘5G टेस्टिंग’ को कोरोना वायरस की दूसरी लहर का ज़िम्मेदार बताते हुए उसपर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाला एक ग्राफ़िक व्हाट्सऐप पर वायरल है.

ग्राफ़िक के मुताबिक, “ये जो महामारी दूसरी बार आई है जिसे सब कोरोना का नाम दे रहे है ये बिमारी कोरोना नही 5g टावर की टेस्टिंग की वजह से है टावर से जो रैडिकशन निकलता है वो हवा में मिलकर हवा को ज़हरीला बना रही है इसलिए लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो रही है। और लोग मर रहे हैं। इसीलिए 5g टावर की टेस्टिंग को बंद करने की मांग करिए फिर देखिए सब सही हो जाएगा।“

इस ग्राफ़िक में आगे बताया गया है कि 5G टॉवर से निकलने वाला रेडियेशन उसी तरह से इंसानों पर बुरा प्रभाव डाल रहा है जैसे 4G रेडियेशन ने पक्षियों पर बुरा प्रभाव डाला था और उनकी मौत हो गई थी.

ऑल्ट न्यूज़ के ऑफ़िशयल व्हाट्सऐप नंबर (+917600011160) पर भी इस दावे के फ़ैक्ट-चेक के लिए कुछ रीक्वेस्ट आई हैं.

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फ़ैक्ट-चेक

इस आर्टिकल में हम बारी-बारी से इन सभी दावों की सच्चाई आपके सामने रखेंगे.

1. भारत में 5G टेस्टिंग
2. क्या 5G रेडियेशन कोरोना वायरस की दूसरी लहर के लिए ज़िम्मेदार है?
3. क्या 4G रेडियेशन की वजह से पक्षी और चिड़िया मारे गए?

भारत में 5G टेस्टिंग

इन्फ़ोग्राफ़िक में दावा किया गया है कि भारत में हो रही 5G टेस्टिंग के कारण पैदा हुए तीव्र रेडियेशन से भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर आई है. लेकिन भारत में 5G टेस्टिंग अभी अपने शुरुआती चरण पर ही है. मार्च 2021 की द इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारती एयरटेल उन चुनिंदा टेलीकम्युनिकेशन कंपनियों में से एक है जिसने अपनी रीसर्च और स्थानीय एवं अमेरिकी और जापान की कंपनियों की OpenRAN टेक्नॉलोजी की मदद से देश में 5G नेटवर्क टेक्नोलॉजी की शुरुआत की है. मार्च 2021 तक रिलायंस जियो, भारती एयरटेल, वोडाफ़ोन आइडिया, राज्य संचालित भारत संचार निगम लिमिटेड के 5G ट्रायल्स की अर्जी मंज़ूर नहीं हुई है.

इसके अलावा, पूरी तरह 5G नेटवर्क का इस्तेमाल करने वाले देश साउथ कोरिया और हॉन्ग कॉन्ग में भारत के मुकाबले कोरोना वायरस के कम मामले हैं. कोरोना वायरस के मामलों का रिकॉर्ड रखने वाली वेबसाइट Worldometers के मुताबिक, इन देशों में कोरोना के केसेज़ क्रमशः 511 और 8 हैं. इस तरह कोरोना वायरस के केसेज़ और 5G नेटवर्क के बीच किसी तरह का संबंध होने का कोई सबूत नहीं है.

कोरोना वायरस की दूसरी लहर के लिए 5G रेडियेशन ज़िम्मेदार नहीं है

कोरोना वायरस की बजाय 5G नेटवर्क के कारण लोग बीमार हो रहे हैं, ये दावा मार्च 2020 से शेयर किया जा रहा है. पिछले साल फ़रवरी में, द वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइज़ेशन (WHO) ने 5G के कारण होने वाले नुकसान के बारे में स्पष्टीकरण दिया था, “आज की तारीख तक, काफ़ी रीसर्च के बाद वायरलेस टेक्नोलॉजी के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव पड़ने की बात सामने नहीं आई है. पूरे रेडियो स्पेक्ट्रम पर होने वाली स्टडी से स्वास्थ्य संबंधी निष्कर्ष निकाला जाता है वैसे ही कुछ स्टडी 5G नेटवर्क में शामिल तरंगों पर की गई थीं.”

अमेरिका के सेंटर फ़ॉर डीसीज़ कंट्रोल एंड प्रीवेन्शन (CDC) ने बताया है कि कोरोना वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में कम दूरी (यानी 6 फुट की दूरी) रखने के कारण फैलता है. CDC के मुताबिक, “इन्फ़ेक्शन कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति के ड्रॉपलेट के संपर्क में आने से फैलता है”. इसके अलावा, ये वायरस कई बार हवाई ट्रांसमिशन से भी फैलता है. ये वायरस हवा में छोटी बूंदों या कणों से फैल सकता है जो कि हवा में मिनटों से घंटों तक घूमता रहता है.

इससे अलग, मोबाइल फ़ोन रेडियोफ्रीक्वेंसी इल्क्ट्रोमैग्नेटिक फ़ील्डस भेजते और रिसीव करते हैं. रॉइटर्स ने रिपोर्ट किया था कि 5G बीम-फ़ॉर्मिंग टेक्नॉलोजी का इस्तेमाल करते हैं जिससे रेडियोफ्रीक्वेंसी इल्क्ट्रोमैग्नेटिक फ़ील्डस ज़रूरत पड़ने पर कहीं भी पहुंच सकती है.

रेडियोफ्रीक्वन्सी के असर की बात करते हुए WHO ने लिखा है, “रेडियोफ्रीक्वेंसी फ़ील्ड और मानव शरीर के बीच होने वाली प्रक्रिया से टिश्यू गर्म होते हैं. हाल की रेडियोफ्रीक्वेंसी टेक्नोलॉजी के लेवल से संपर्क होने पर मानव शरीर का तापमान थोड़ा बढ़ता है. जैसे ही फ़्रीक्वेंसी बढ़ती है, शरीर के टिश्यू में उसका प्रवेश कम होता है और शरीर के बाहरी हिस्से (चमड़ी और आंखे) में ऊर्जा का प्रवेश बढ़ने लगता है. यदि कुल एक्सपोज़र अंतर्राष्ट्रीय मानकों से कम रहता है तो आम जनता के स्वास्थ्य पर इसके हानिकारक प्रभाव पड़ने की अपेक्षा कम की जाती है.”

रॉइटर्स से बात करते हुए रेडियोलोजी एंड मेडिकल फिज़िक्स के एमेरिटस प्रोफ़ेसर मार्विन सी. ज़िस्किन ने कहा, “वैज्ञानिक सबूत ये बताते हैं कि 5G उत्सर्जन लगातार नहीं बढ़ता है. इसका मतलब है कि ज़्यादा एक्सपोज़र किसी भी तरह का हानिकारक प्रभाव पैदा नहीं करता है. मैं ये कहना चाहता हूं कि RF एनर्जी समेत एक्सपोज़र लेवल की मिलीमीटर तरंगे, जो कि सामान्य कम्युनिकेशन टेक्नॉलोजी में हमेशा अनुभव की जाती हैं, को लेकर संभावित खतरे की कोई हेल्थ एजेंसी वार्निंग नहीं है. ये IEEE और ICNIRP जैसे ग्रुप्स के स्टैन्डर्ड सेटिंग की समस्या के आकलन के अनुरूप है.” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि अगर एक्सपोज़र लिमिट्स का ध्यान रखा जाए तो 5G से स्वास्थ्य संबंधी नुकसान नहीं हो सकता.

4G रेडियेशन की वजह से पक्षी नहीं मरे थे

जनवरी 2021 में, ऑल्ट न्यूज़ ने 5G ट्रायल्स के कारण पक्षियों के मरने के दावे को गलत पाया था. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, “5G और अन्य मोबाइल फ़ोन्स तकनीक इलेक्ट्रोमैगनेटिक स्पेक्ट्रम की लो-फ़्रीक्वेंसी के तहत आती हैं. ये मेडिकल x-rays और सूरज की किरणों की नुकसानदायक, हाई फ़्रीक्वेंसी के विपरीत विज़िबल लाइट से भी कम पॉवरफ़ुल हैं और कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते”. आप हमारी पूरी फ़ैक्ट-चेक रिपोर्ट यहां पर पढ़ सकते हैं.

PIB फ़ैक्ट-चेक ने भी कोरोना की दूसरी लहर के लिए 5G ट्रायल्स को ज़िम्मेदार बताने वाले दावे का खंडन किया है.

हरियाणा के करनाल में हो रही वेब सीरीज़ की शूटिंग के दृश्य को लोगों ने असली घटना बताकर शेयर किया :

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About the Author

Jignesh is a writer and researcher at Alt News. He has a knack for visual investigation with a major interest in fact-checking videos and images. He has completed his Masters in Journalism from Gujarat University.