25 साल के इरशाद मंसूरी को इस बात का जवाब मिलना चाहिए. 21 जुलाई को सर्जरी होने के बावजूद, दिल्ली के अस्पताल के बिस्तर पर लेटे इरशाद की गर्दन में खून की नस के पास एक पेलेट (छर्रा) फंसा हुआ था. 19 साल के साहिल लोचब को भी ये बताया जाना चाहिए—जो 22 जुलाई को हुई सर्जरी के बाद ठीक हो रहे हैं—कि उनकी आंख में गंभीर चोट और शरीर पर कई जगह पैलेट के घाव कैसे लगे.
दिल्ली पुलिस ने बार-बार कहा है कि 20 जुलाई के मार्च के दौरान उसने पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं किया. किसी दूसरी सुरक्षा एजेंसी ने भी इनके इस्तेमाल की बात नहीं मानी है. पिछले दो दिनों में, ‘ऑल्ट न्यूज़’ इन दोनों युवाओं से मिला, उनके परिवारों और दोस्तों से बात की और सबूतों की एक ऐसी कड़ी का पता लगाया जो एक सीधा सवाल खड़ा करती है: अगर पेलेट गन नहीं चलाई गई थीं, तो वे पेलेट की चोटों के साथ अस्पताल कैसे पहुंचें?
दिल्ली में 20 जुलाई का दिन
20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने कथित NEET पेपर लीक और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित परीक्षाओं में गड़बड़ियों को लेकर संसद तक मार्च करने का आह्वान किया था, जिसके बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर हज़ारों लोग जमा हुए. ये मार्च एक महीने तक चले धरने और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के बाद हुआ था.
जब प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, तो दिल्ली पुलिस ने बैरिकेड्स लगा दिए और रैपिड एक्शन फ़ोर्स (RAF) और सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (CRPF) के जवानों को बड़ी संख्या में तैनात किया गया. हालात बिगड़ने पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. शाम तक, CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने X (ट्विटर) पर आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनकारियों को पेलेट गन से चोटें आई हैं. दिल्ली पुलिस ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि उसके पास ऐसे हथियार नहीं हैं.
‘ऑल्ट न्यूज़’ ने अगले दिन इस दावे की जांच शुरू की.
लेडी हार्डिंग अस्पताल में इरशाद मंसूरी
21 जुलाई को एक सूचना मिलने पर ‘ऑल्ट न्यूज़’ की टीम लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज (LHMC) पहुंची, जहां इरशाद मंसूरी का इलाज चल रहा था. अस्पताल के बाहर हम उनके दोस्त से मिले, जिन्होंने बताया कि अस्पताल में भर्ती मंसूरी के साथ सिर्फ वही थे.
25 साल के मंसूरी मूल रूप से जबलपुर के रहने वाले हैं और गुरुग्राम की एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं. उनके दोस्त ने हमें बताया कि 20 जुलाई को मंसूरी कनॉट प्लेस के पास थे, तभी उन्हें छर्रे (पेलेट्स) लगे; कहा जा रहा है कि ये छर्रे लगभग 40 से 50 मीटर की दूरी से चलाए गए थे.
अस्पताल के बिस्तर पर ली गई मंसूरी की एक सेल्फ़ी में उनके चेहरे और गर्दन पर कई छोटे-छोटे घाव दिखाई दे रहे हैं. तीन छर्रों — एक आंख के नीचे, दूसरा गर्दन में खून की नस के पास और तीसरा चेहरे के अंदरूनी हिस्से (फेशियल कैविटी) में (जिसके कारण उन्हें गंभीर चोटें आईं) उनके दोस्त ने ‘ऑल्ट न्यूज़’ को बताया कि उन्होंने सर्जरी से पहले सहमति पत्र (कंसेंट फॉर्म) पर दस्तखत तो किए थे, लेकिन न तो उन्हें और न ही मंसूरी को इलाज के बारे में कोई जानकारी दी गई थी. उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि अस्पताल प्रशासन ने CT स्कैन की रिपोर्ट तक देने से मना कर दिया.

जब ‘ऑल्ट न्यूज़’ ने उस डॉक्टर से बात करने की कोशिश की जो मंसूरी की सर्जरी के बाद ऑपरेशन थिएटर से बाहर आए थे, तो उन्होंने कुछ भी कहने से मना कर दिया और हमें इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर से बात करने को कहा. उसी वक्त, मंसूरी के एक दोस्त, जो सर्जरी के बाद उनसे मिलने अंदर गए थे, ने ‘ऑल्ट न्यूज़’ के एक रिपोर्टर को मैसेज करके बताया कि वे थोड़ी देर में बाहर आ जाएंगे. कुछ मिनट बाद, उन्होंने लिखा कि उन्हें वार्ड से बाहर नहीं जाने दिया जा रहा है. उन्होंने एक घटना के बारे में बताया जिसमें उसी वार्ड में किसी दूसरे मरीज़ से मिलने कोई आया था, जिससे अस्पताल प्रशासन और बाद में इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर के साथ हंगामा हो गया. उनके मुताबिक, इसके बाद वार्ड के बाहर सुरक्षाकर्मी तैनात कर दिए गए. 22 जुलाई की रात करीब 10 बजे, मंसूरी ने ‘ऑल्ट न्यूज़’ को बताया कि उन्हें अब भी अपने इलाज से जुड़े कागज़ात देखने की इजाज़त नहीं मिली थी.
अस्पताल के बिस्तर से ‘ऑल्ट न्यूज़’ से बात करते हुए मंसूरी ने आगे कहा, “अभी मैं ऐसी हालत में नहीं हूं कि एक मरीज़ के तौर पर अपने अधिकारों के लिए अस्पताल पर दबाव डाल सकूं, खासकर इसलिए क्योंकि यहां मेरा कोई असली सपोर्ट सिस्टम नहीं है. मेरा पूरा ध्यान ठीक होने और ज़ल्दी से ठीक होने पर है. अभी सर्जरी और छर्रों (पेलेट्स) की वजह से मेरी आंख, चेहरे और शरीर के ऊपरी हिस्से में बहुत दर्द हो रहा है.”
उन्होंने लगभग रोते हुए कहा, “मुझे सच में इस बात की चिंता है कि इन चोटों का मेरी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा. मुझे लगता है कि मेरे नुकसान के लिए कुछ मुआवज़ा मिलना चाहिए.”

अस्पताल पहुंचने पर मंसूरी होश में और सतर्क थे. उन्होंने हमें बताया कि उन्हें पता था कि एक और प्रदर्शनकारी को भी पैलेट (छर्रे) लगी है और उन्होंने उसकी हालत के बारे में पूछा. जब हमने उन्हें बताया कि दूसरे अस्पताल में भर्ती 19 साल के साहिल लोचब की एक आंख की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है, तो उन्हें गहरा सदमा लगा.
‘द हिंदू‘ की रिपोर्ट के मुताबिक़, LHMC के एक सूत्र ने बताया कि सर्जनों ने मंसूरी की आंखों के नीचे फंसे पैलेट तो निकाल दिए, लेकिन गर्दन के पास फंसा एक पैलेट नहीं निकाला जा सका क्योंकि वो खून की एक नस के बहुत करीब था, जिससे एक और सर्जरी की संभावना बनी हुई है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने अस्पताल में जिन घायल प्रदर्शनकारियों से मुलाक़ात की, उनमें मंसूरी भी शामिल थे. इससे ये बात साबित होती है कि केंद्र सरकार को पता है कि दिल्ली के अस्पतालों में पैलेट गन से घायल लोगों का इलाज चल रहा है.
AIIMS ट्रॉमा सेंटर में साहिल लोचब
मंसूरी के मामले की जांच के दौरान, ऑल्ट न्यूज़ को पता चला कि पैलेट गन से घायल एक और व्यक्ति को आंख में गंभीर चोट के कारण ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) भेजा गया था.
22 जुलाई को AIIMS के कई कर्मचारियों से बात करने के बाद, हमने साहिल लोचब का AIIMS ट्रॉमा सेंटर में पता लगाया. इससे पहले उसका इलाज AIIMS के डॉ. आर.पी. सेंटर फॉर ऑप्थैल्मिक साइंसेज में हुआ था.

नजफ़गढ़ के रहने वाले 19 साल के साहिल ने हमें बताया, “मैं विरोध प्रदर्शन में शामिल होने गया था और जंतर-मंतर के आस-पास था, तभी मुझे छर्रे (पेलेट्स) लगे. मुझे अभी ठीक-ठीक समय याद नहीं है. जब छर्रे लगे, तो मैं दूसरी तरफ देख रहा था.”
उन्हें दाहिनी आंख, चेहरे, छाती, पीठ, हाथ और शरीर के दाहिने हिस्से में चोटें आईं. “प्रदर्शन में शामिल दो साथी मुझे सबसे पहले LHMC ले गए. मेरी मां और मामा LHMC पहुंचे. कुछ देर वहां रखने के बाद, मुझे सफदरजंग अस्पताल और फिर AIIMS ले जाया गया. चोट लगने के बाद से ही मैं अपनी दाहिनी आंख से देख नहीं पा रहा हूं.”
उनकी मां ज्योति ने हमें बताया, “LHMC के अस्पताल प्रशासन ने हमें बताया कि इस मामले में ज़रूरी सुविधाओं की कमी के कारण साहिल का इलाज वहां नहीं हो सकता, इसलिए उसे दूसरे अस्पताल रेफ़र किया जा रहा है. लेकिन यहां (AIIMS में) एडमिशन के समय उन्होंने रेफ़रल की वजह को नहीं माना और मुझसे ऐसे कागज़ों पर साइन करवाए गए जिनमें LHMC से रेफ़र किए जाने की वजह का कोई ज़िक्र ही नहीं था.”

साहिल के मामा सुल्तान ने बताया कि 21 जुलाई की आधी रात को सर्जरी से पहले साहिल को कई घंटे इंतज़ार करना पड़ा. “उनकी आंख का ज़्यादातर बाहरी हिस्सा, यानी सफ़ेद हिस्सा, खराब हो गया है और पहली सर्जरी इसी सफ़ेद हिस्से की थी. दूसरी सर्जरी सात दिन बाद होगी, जिसमें आंख की बीच की परत का ऑपरेशन किया जाएगा. डॉक्टर ने हमें बताया कि दाहिनी आंख की रोशनी वापस आने की संभावना सिर्फ़ 1% है.”
जब 22 जुलाई की शाम करीब 6 बजे ‘ऑल्ट न्यूज़’ परिवार से मिला, तो उन्होंने बताया कि उन्हें साहिल के इलाज से जुड़ा कोई भी डॉक्यूमेंट अभी तक नहीं मिला है.

साहिल तीन भाइयों में सबसे बड़ा है. उसकी मां ने हमें बताया कि वो पार्ट-टाइम नौकरी करके परिवार की मदद करने के साथ-साथ दिल्ली पुलिस भर्ती परीक्षा की तैयारी भी कर रहा था. उन्होंने बताया कि उसके पिता आंशिक रूप से दिव्यांग थे और कभी-कभी ही काम कर पाते थे. उसके छोटे भाई दीपांशु ने बताया कि साहिल भगत सिंह को बहुत मानता था, और ये बात उसके व्हाट्सऐप और Instagram प्रोफ़ाइल फ़ोटो में भी दिखती थी.
परिवार ने ये भी कहा कि वे सोशल मीडिया पर उन झूठी पोस्ट से बहुत परेशान थे जिनमें दावा किया गया था कि इलाज के दौरान साहिल की मौत हो गई है.

किसी ने पेलेट गन नहीं चलाई, फिर भी कम से कम 3 लोग घायल हुए
दिल्ली पुलिस ने बार-बार इस बात से इनकार किया है कि 20 जुलाई को पेलेट गन का इस्तेमाल किया गया था. केंद्र सरकार के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो ने पेलेट गन के इस्तेमाल के दावों को ग़लत बताते हुए ‘फ़ैक्ट चेक’ जारी किए हैं.
हालांकि, इरशाद मंसूरी और साहिल लोचब (दिल्ली के बड़े सरकारी अस्पतालों में इलाज करा रहे पेलेट गन से घायल दो लोग) ही एकमात्र सबूत नहीं हैं कि दिल्ली की सड़कों पर 20 जुलाई को हुई झड़पों के दौरान पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ था. पेलेट से घायल लोगों में ‘आउटलुक’ का एक रिपोर्टर भी शामिल था. ‘आउटलुक’ ने अपने रिपोर्टर के हवाले से लिखा है, “मैंने देखा कि उसे मेरी तरफ निशाना बनाया गया था और मैं तुरंत भागा… मेरे बैकपैक और हाथ पर कुछ लगा. अगर मैं मुड़ा नहीं होता, तो ये मेरे सीने या चेहरे पर लग सकता था.” आउटलुक द्वारा पब्लिश पीड़ित के मेडिकल डॉक्यूमेंट इस बात की पुष्टि करते हैं कि ये चोटें पेलेट लगने से आई थीं.

इसके अलावा, हमें 21 जुलाई को फ़ेसबुक पर पोस्ट किया गया एक वीडियो मिला, जिसमें 20 तारीख की घटनाएं दिखाई दे रही हैं. इसमें एक महिला सुरक्षाकर्मियों से गुहार लगाती दिख रही है, जबकि उसके पीछे एक RAF जवान हथियार को फायरिंग की पोज़िशन में उठाए हुए आगे बढ़ रहा है. हथियार को देखकर ऐसा लगता है कि ये पंप-एक्शन शॉटगन है.
हमने उस जगह को जियोलोकेट किया. ये वीडियो कनॉट प्लेस में पालिका बाज़ार के एंट्री गेट के पास शूट किया गया था. कैमरा उत्तर-पश्चिम की ओर ‘पिंड बल्लूची’ रेस्टोरेंट के सामने वाले हिस्से की तरफ है, जिसका साइनबोर्ड सीन के पीछे दिखाई दे रहा है. फ़ुटेज में, शॉटगन कनॉट सर्कस की ओर, संसद मार्ग जंक्शन से दूर और लगभग दक्षिण-पूर्व दिशा में तनी हुई है.
इसके अलावा, ऑल्ट न्यूज़ को मिले एक वीडियो में साहिल लोचब को चोट लगने के बाद दूर जाते हुए देखा जा सकता है; उसका चेहरा खून से लथपथ है. हमने इस वीडियो की लोकेशन को भी जियोलोकेट किया. लोचब कनॉट सर्कस के किनारे-किनारे चलता हुआ दिख रहा है — वही दिशा जहां से गोली चलाई गई थी. प्रदर्शनकारी उसकी मदद करते हैं और उसे एक मोटरसाइकिल तक ले जाते हैं, जिस पर उसे वहां से ले जाया जाता है. बैकग्राउंड में संसद मार्ग पर LIC जीवन भारती बिल्डिंग दिखाई दे रही है.
हमें एक तीसरा वीडियो भी मिला जिसमें 20 तारीख के फ़ुटेज का कलेक्शन है. इसमें घायल इरशाद को स्कूटर पर मदद के साथ ले जाते हुए दिखाया गया है. हमने इस जगह की भी लोकेशन पता की.
नीचे दिए गए ग्राफ़िक से पता चलता है कि ये तीनों जगहें एक-दूसरे के काफी पास हैं. ऑल्ट न्यूज़ ये दावा नहीं करता कि फ़ुटेज में वो पल कैद है जब साहिल या इरशाद को चोट लगी थी, लेकिन तीनों वीडियो मिलकर दोनों पीड़ितों को उस जगह से कुछ सौ मीटर की दूरी पर दिखाते हैं जहां RAF के जवान हथियार ताने हुए रिकॉर्ड किए गए थे.

नाम न बताने की शर्त पर ‘ऑल्ट न्यूज़’ से बात करते हुए गोला-बारूद के एक एक्सपर्ट ने फ़ेसबुक वीडियो में दिख रहे हथियार की पहचान एक ‘नॉन-लीथल’ (जानलेवा न होने वाले) 12-बोर गन के तौर पर की, जो धातु के छोटे छर्रे (पेलेट) दागती है. उनके मुताबिक, अगर इसे 20 से 30 मीटर की दूरी से चलाया जाए तो इससे गंभीर चोट लग सकती है और बहुत करीब से ये जानलेवा भी हो सकती है.
पेलेट गन ‘रैपिड एक्शन फ़ोर्स’ (RAF) के साज़ो-सामान का हिस्सा हैं; ये ‘सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स’ (CRPF) के तहत दंगों से निपटने वाली एक खास फ़ोर्स है. एक सीनियर पुलिस अफ़सर ने हमें इसके कमांड स्ट्रक्चर के बारे में बताया. कानून-व्यवस्था की स्थिति के दौरान RAF या CRPF को तैनात करने की मांग उस इलाके के सबसे सीनियर पुलिस अफ़सर की तरफ़ से की जाती है. एक बार तैनात होने के बाद, ये फ़ोर्स उसी अफ़सर की कमांड में आ जाती हैं और किस तरह की फ़ोर्स का इस्तेमाल करना है, इसका फ़ैसला भी वही अफ़सर करता है. दिल्ली के केंद्र-शासित प्रदेश होने से इस बात में कोई बदलाव नहीं आता.
अफ़सर ने बताया कि कार्रवाई के नियम आंशिक रूप से आपसी व्यवहार पर आधारित होते हैं: नियम-पुस्तिका निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने की इजाज़त नहीं देती. फ़ोर्स को पहले लाउडस्पीकर के ज़रिए जनता को चेतावनी देनी होती है. अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो उन्हें बल के किसी भी इस्तेमाल की वीडियोग्राफ़ी करनी होती है. इससे पता चलता है कि अगर RAF के जवानों ने पेलेट चलाए, तो आदेश शायद इलाके की कमान संभाल रहे दिल्ली पुलिस के अफ़सर की तरफ़ से आया होगा. और अगर नियमों का पालन किया गया, तो सुरक्षा एजेंसियों ने पेलेट गन के इस्तेमाल की वीडियोग्राफ़ी की होगी.
भीड़ को काबू करने के लिए पेलेट-फ़ायरिंग शॉटगन का इस्तेमाल लंबे समय से मानवाधिकारों से जुड़ी चिंता का विषय रहा है, क्योंकि इनका इस्तेमाल बिना किसी खास लक्ष्य के किया जाता है. एक ही लक्ष्य पर निशाना साधने वाले हथियारों के उलट, 12-बोर पेलेट कारतूस से धातु के सैकड़ों छोटे छर्रे (पेलेट्स) निकलते हैं जो एक बड़े इलाके में फैल जाते हैं, जिससे यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि कौन इनकी चपेट में आएगा. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने कश्मीर में इस्तेमाल होने वाले हथियारों में पेलेट-फ़ायरिंग शॉटगन को “सबसे खतरनाक हथियारों में से एक” बताया है और कहा है कि विशेषज्ञ इन्हें “मूल रूप से ग़लत निशाना लगाने वाले और बिना किसी खास लक्ष्य के इस्तेमाल होने वाले” हथियार मानते हैं. पेलेट गन से होने वाली चोटों में मामूली आंखों की चोट से लेकर हमेशा के लिए आंखों की रोशनी चले जाने तक के मामले शामिल हैं. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी कहा है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पेलेट-फ़ायरिंग शॉटगन के इस्तेमाल का “कोई सही तरीका” नहीं है, क्योंकि इनसे गंभीर और अक्सर ठीक न होने वाली चोटें (जैसे अंधापन) लगती हैं. साथ ही, संस्था ने अधिकारियों से अपील की है कि वे बल प्रयोग से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत इनके इस्तेमाल पर रोक लगाएं.
इन तीन मामलों के अलावा, एक और शख्स की चोटों की तस्वीरें ऑनलाइन शेयर की जा रही हैं जिसमें पैलेट गन से घायल होने का दावा है. ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर ने इसे शेयर किया है. हालांकि, अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ये पीड़ित कौन है और कहां इसका इलाज चल रहा है.
कलीम अहमद ‘ऑल्ट न्यूज़’ के पूर्व फ़ैक्ट-चेकिंग पत्रकार हैं. वो अभी ‘टेक ग्लोबल इंस्टीट्यूट’ में रिसर्च मैनेजर हैं.





