16 अप्रैल को, महाराष्ट्र के पालघर ज़िले के गडचिंचले गांव में सशस्त्र भीड़ ने तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी. ये गांव कासा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है. तीन दिनों के बाद, इस घटना के अलग-अलग वीडियो सोशल मीडिया पर इस आक्षेप के साथ शेयर किए गए कि ये मुस्लिम संप्रदाय के लोगों द्वारा किया गया सांप्रदायिक अपराध है.

कुछ लोगों ने, इस वीभत्स घटना का एक वीडियो इस दावे के साथ ट्वीट किया कि भीड़ “मार शोएब मार” चिल्ला रही है.

फ़िल्म निर्देशक अशोक पंडित ने दो बार दावा किया कि इस घटना में संलिप्त दोषी का नाम “शोएब” है.

सुदर्शन न्यूज़ के, एडिटर-इन-चीफ़, सुरेश चव्हाणके ने भी ये दावा किया कि उन्होंने वीडियो में “शोएब” शब्द सुना है.

बीजेपी दिल्ली की ऋचा पांडे मिश्रा ने वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा, “मार शोएब मार, मार डाल”. ‘याना मीर’ और ‘दिस पोसेबल’ के अकाउंट से भी इसी तरह के ट्वीट किए गए. इन ट्वीट्स को लगभग 2,700 बार री-ट्वीट किया जा चुका है. फ़ेसबुक पेज ऑवर इंडिया ने वीडियो को ऐसे ही सांप्रदायिक नैरेटिव के साथ पोस्ट किया. उनके पोस्ट को 2,200 से अधिक बार शेयर किया जा चुका है.

ये वीडियो ईसाई एंगल के साथ भी वायरल है

दो मृत व्यक्तियों की फ़ोटो, सोशल मीडिया पर एक अन्य ग्राफ़िक के साथ शेयर की जा रही है. इस ग्राफ़िक्स के ज़रिए ‘ईसाई मिशनरियों के गुंडों’ को हमले के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.

वीडियो में “शोएब’’ नहीं

इस घटना के, अलग-अलग एंगल से रिकॉर्ड किए गए, कई वीडियोज़ देखने के बाद, ऑल्ट न्यूज़ को मालूम चला कि लोग “बस ओये बस” चिल्ला रहे हैं. नीचे पोस्ट किए गए वीडियो में आप ये वाक्य सुन सकते हैं. इसलिए, ये दावा कि इस घटना के अभियुक्तों में से एक का नाम शोएब है, बिल्कुल आधारहीन है.

कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं है

महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने ट्विटर पर जानकारी दी कि इस घटना का कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं है. उन्होंने ये भी बताया कि इस घटना के पीड़ित और अभियुक्त अलग-अलग संप्रदाय से नहीं हैं.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी इस घटना में किसी तरह के सांप्रदायिक एंगल होने के दावों का खंडन किया. उन्होंने कहा कि इलाक़े में चोरों की आवाजाही बढ़ने की अफ़वाहों के कारण ये घटना हुई है.

ये घटना 16 अप्रैल की रात में घटी, जब गडचिंचले गांव के पास स्थानीय आदिवासियों की भीड़ ने तीन लोगों पर हमला कर दिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक़, वो लोग अंतिम संस्कार के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने मुंबई के कांदिवली से सिलवासा जा रहे थे. तभी, रास्ते में स्थानीय लोगों के एक गश्ती दल ने उनको रोक लिया. भीड़ ने कार में मौजूद सभी लोगों से पूछताछ की और फिर पत्थर बरसाए. इसके बाद उनको लाठियों से मारा गया. पुलिस ने इस घटना से जुड़े 109 लोगों को हिरासत में लिया है. इनमें 9 नाबालिग भी हैं.

ऑल्ट न्यूज़ ने पालघर पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी से बात की. उन्होंने बताया कि इस घटना में किसी भी तरह का सांप्रदायिक रंग नहीं है. हमें बताया गया कि पीड़ित और अभियुक्त, दोनों एक ही धर्म से ताल्लुक रखते हैं. अभियुक्त आदिवासी समुदाय के हैं. जनसंपर्क अधिकारी ने बताया, “इस इलाक़े में एक अफ़वाह फैल रही थी और पुलिस ने इस संबंध में संदेश भी जारी किया था.” रिपोर्ट्स के अनुसार, पालघर जिले के आदिवासी गांवों में ‘प्रवासियों द्वारा डकैती’ की अफ़वाहें उड़ रही थीं.

पालघर के एसपी गौरव सिंह ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इस घटना की छानबीन इस सवाल पर केंद्रित है कि आदिवासी इलाक़े में अफ़वाह की शुरुआत कहां से हुई थी.

2011 के जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार, डहाणु तालुका के गडचिंचले गांव में, लगभग 248 परिवार रहते हैं. इनमें से अधिकतर अनुसूचित जनजाति के लोग हैं.

इस घटना से कुछ दिनों पहले की बात है. चर्म रोग विशेषज्ञ डॉ. विश्वास वलवी की एसयूवी कार को सारणी गांव में भीड़ ने पलट दिया था. इस घटना में चार पुलिसवाले भी घायल हुए थे. हिंदुस्तान टाइम्स की 17 अप्रैल, 2020 की रिपोर्ट बताती है “लगभग 250 लोगों की भीड़ ने डॉ. वलवी पर उस वक्त हमला कर दिया, जब वो आदिवासियों के इलाके में खाद्यान्न बांटकर और थर्मल स्क्रीनिंग कर लौट रहे थे.”

सुरेश चव्हाणके और अशोक पंडित जैसे सोशल मीडिया के जाने-माने वीरों ने इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की. उन्होंने दावा किया कि लिंचिंग की घटना में मुस्लिम संप्रदाय के सदस्य शामिल थे. जबकि इस घटना के अभियुक्त और पीड़ित, दोनों एक ही संप्रदाय के हैं. इस घटना का कोई सांप्रदायिक चरित्र नहीं है.

ग़लत
दावा:
पालघर मॉब लिंचिंग के वीडियो में साफ़ साफ़ एक लड़का बोल रहा है, “ मार शोएब मार

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