सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल, 2026 को 2020 नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित नफरत भरे भाषण के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा को दी गई क्लीन चिट को बरकरार रखा.
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि विचाराधीन भाषणों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है. मामले में CPI (M) नेता बृंदा करात और के एम तिवारी ने दो भाजपा नेताओं के खिलाफ़ एक याचिका दायर की थी.
आरोपों को खारिज करते हुए, अदालत ने कहा, “कथित भाषणों, ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश 26 फ़रवरी, 2020 की स्थिति रिपोर्ट और निचली अदालतों द्वारा दर्ज़ किए गए कारणों सहित रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने पर, हम इस निष्कर्ष पर सहमत हैं कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है.”
अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) और निचली अदालत के निष्कर्षों की प्रभावी रूप से पुष्टि की, जिनमें से दोनों ने पहले यह निष्कर्ष निकाला था कि भाषणों ने सांप्रदायिक हिंसा या सार्वजनिक अशांति को नहीं भड़काया था.
इस मामले की शुरुआत 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान की गई टिप्पणियों से हुई थी, जिसके कारण कथित नफरती स्पीच को लेकर कई शिकायतें दर्ज हुईं और कानूनी जांच शुरू हुई. इसके बाद, नफरती भाषा पर बाध्यकारी दिशानिर्देश तय करने की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर की गईं कई रिट याचिकाओं को एक साथ जोड़ दिया गया था.
अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के खिलाफ़ केस
जनवरी 2020 में दिल्ली में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों के दौरान, जो 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों के समय ही हो रहे थे, अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा पर भड़काऊ भाषण देने के आरोप लगे थे. एक चुनावी रैली के वायरल वीडियो में ठाकुर को “देश के गद्दारों को…” का नारा लगवाते हुए सुना गया, जिस पर भीड़ ने “गोली मारो सालों को” कहकर जवाब दिया. यह नारा सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और इसकी व्यापक स्तर पर आलोचना हुई. इसके कुछ हफ़्तों बाद, दिल्ली में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई जिसमें 53 लोगों की जान चली गई, और यह आरोप लगाए गए कि इस तरह के भाषणों ने माहौल को बिगाड़ने में भूमिका निभाई थी.
3] Anurag Thakur spreading hate in election campaign rally
“Desh Ke Gaddaro Ko, Góli Maaro **** ko” 🫡 pic.twitter.com/ymDOKyYe3d
— Amock_ (@Amockx2022) March 24, 2025
इसके बाद बृंदा करात ने ठाकुर और वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग करते हुए कानूनी कार्रवाई की मांग की. उन्होंने सबसे पहले 29 जनवरी 2020 को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को शिकायत सौंपी और कोई कार्रवाई नहीं होने पर ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 5 फ़रवरी 2020 को उन्होंने IPC की धारा 153A, 295A, 504, 505 और 506 के तहत FIR दर्ज करने के निर्देश मांगने के लिए राउज़ एवेन्यू कोर्ट का रुख किया. हालांकि, एडिशनल मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने 26 अगस्त 2020 को याचिका खारिज कर दी.
#WATCH: BJP MP Parvesh Verma says, “…Lakhs of people gather there (Shaheen Bagh). People of Delhi will have to think & take a decision. They’ll enter your houses, rape your sisters&daughters, kill them. There’s time today, Modi ji & Amit Shah won’t come to save you tomorrow…” pic.twitter.com/1G801z5ZbM
— ANI (@ANI) January 28, 2020
इसके बाद करात ने दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसने 13 जून 2022 को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा. उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A, 295A और 505 के तहत अपराधों पर अदालतों द्वारा संज्ञान लेने से पहले सरकार से पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य है. अदालत ने कहा: ‘CrPC की धारा 196 स्पष्ट रूप से किसी भी अदालत को मामला-दर-मामला केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना… संज्ञान लेने से रोकती है.
इसके बाद, करात और के एम तिवारी ने 2023 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. 29 अप्रैल, 2026 के आदेश में, शीर्ष अदालत ने पहले के निष्कर्षों को बरकरार रखा और फैसला सुनाया कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनाया गया जिससे भाजपा नेताओं के खिलाफ मामला प्रभावी रूप से बंद हो गया.
बेंच ने कहा, “उच्च न्यायालय ने एक स्वतंत्र मूल्यांकन पर माना है कि विचाराधीन भाषण किसी संज्ञेय अपराध के घटित होने का खुलासा नहीं करते हैं, ये देखते हुए कि बयान किसी विशिष्ट समुदाय के खिलाफ निर्देशित नहीं थे, न ही उन्होंने हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था को उकसाया था.”
सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला यहां पढ़ा जा सकता है.

नफरत फैलाने वाला भाषण भाईचारे के संवैधानिक मूल्य के विपरीत है
इस पर टिप्पणी करते हुए कि क्या नफरत फैलाने वाले भाषण पर अंकुश लगाने के लिए एडिशनल न्यायिक हस्तक्षेप की ज़रुरत है, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी राहत न्यायिक क्षेत्र से बाहर है, यहां तक कि इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि नफरत फैलाने वाले भाषण की धारणा “भाईचारे के संवैधानिक मूल्य के विपरीत है.”
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “नफरत फैलाने वाला भाषण केवल स्वीकार्य प्रवचन से विचलन नहीं है; ये असल में भाईचारे के संवैधानिक मूल्य के विपरीत है और हमारे गणतंत्र के नैतिक ताने-बाने पर प्रहार करता है. ये भारत के गहरे सभ्यतागत लोकाचार के भी विपरीत है.”
इस सिद्धांत पर ज़ोर देते हुए, बेंच ने आगे कहा, “ये इस संवैधानिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए है कि प्रस्तावना में भाईचारे के सिद्धांत को शामिल किया गया है जो सभी नागरिकों के बीच समान भाईचारे की भावना को अनिवार्य करता है. एक राष्ट्र से संबंधित विचार को चयनात्मक समावेशन या बहिष्कार पर निर्भर नहीं किया जा सकता है; बल्कि, इसके लिए साझा संवैधानिक मूल्यों के लिए सामूहिक प्रतिबद्धता की ज़रूरत होती है. भाईचारा, इसलिए, मांग करता है कि हर नागरिक मतभेदों के बावजूद, दूसरों की समान गरिमा को पहचाने और सम्मान करें, और सचेत रूप से इससे दूर रहें. ऐसा आचरण जो सामाजिक सद्भाव को कमजोर करता है.”
न्यायालय ने कहा कि, “एक बार जब ये संवैधानिक आदर्श नागरिकों, दोनों व्यक्तियों और प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों द्वारा आत्मसात कर लिया जाता है, तो ‘हेट स्पीच’ में शामिल होने का आवेग कम हो जाएगा.”

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि अपराधों को परिभाषित करने और दंडित करने की शक्ति पूरी तरह से विधायी क्षेत्र में है, न्यायपालिका के अंतर्गत नहीं. अपने आदेश में न्यायालय ने कहा, “आपराधिक अपराधों का निर्माण और दंड का निर्धारण पूरी तरह से विधायी क्षेत्र के अंतर्गत आता है. शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर स्थापित संवैधानिक योजना, न्यायपालिका को न्यायिक निर्देशों के माध्यम से नए अपराध बनाने या आपराधिक दायित्व की रूपरेखा का विस्तार करने की अनुमति नहीं देती है.”
इस तर्क को खारिज करते हुए कि हेट स्पीच कानून द्वारा अपर्याप्त रूप से कवर किया गया है, न्यायालय ने कहा, “ये तर्क ग़लत है कि हेट स्पीच का क्षेत्र विधायी रूप से खाली है. IPC और संबद्ध कानूनों के प्रावधानों सहित वास्तविक आपराधिक कानून का मौजूदा ढांचा, दुश्मनी को बढ़ावा देने, धार्मिक भावनाओं को अपमानित करने या सार्वजनिक शांति को परेशान करने वाले कृत्यों को पर्याप्त रूप से संबोधित करता है. इसलिए, ये क्षेत्र खाली नहीं है.”
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने अपनी टिप्पणियों में कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताएं कानून की गैर मौजूदगी के बजाय प्रवर्तन में अंतराल से ज़्यादा हैं. कोर्ट ने कहा, “इस कोर्ट के सामने रखी गई सामग्री से संकेत मिलता है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा उजागर की गई ज़्यादातर चिंताएं कानून की गैर मौजूदगी से नहीं, बल्कि इसके सुसंगत और प्रभावी प्रवर्तन में कमी से उत्पन्न होती हैं. ऐसी चिंताएं, चाहे कितनी भी जरूरी हों, विधायी कार्यों की न्यायिक धारणा को उचित नहीं ठहरा सकती हैं.”
न्यायालय ने हेट स्पीच के खिलाफ़ कार्रवाई की मांग करने वाले व्यक्तियों के लिए मौजूदा कानूनी उपायों की भी रूपरेखा तैयार की जिसमें FIR दर्ज नहीं होने पर उचित अधिकारियों से संपर्क करने के रास्ते भी शामिल हैं.
कुल मिलाकर, खंडपीठ ने दोहराया कि ये आख़िरकार विधायिका को तय करना है कि अतिरिक्त कानूनी या नीतिगत उपायों की ज़रूरत है या नहीं. कोर्ट ने कहा, “हालांकि हम वांछित प्रकृति के निर्देश जारी करने से इनकार करते हैं, हम ये मानना उचित समझते हैं कि ‘हेट स्पीच’ और ‘अफवाह फैलाने’ से संबंधित मुद्दे सीधे तौर पर भाईचारे, गरिमा और संवैधानिक व्यवस्था के संरक्षण पर असर डालते हैं. ये भारत संघ और सक्षम विधायी अधिकारियों के लिए खुला होगा कि वे अपने विवेक से इस पर विचार करें कि क्या किसी और विधायी या नीतिगत उपाय की ज़रूरत है… या विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट दिनांक 23 मार्च 2017 द्वारा सुझाए गए अनुसार उपयुक्त संशोधन लाएं.”
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