बीते दिनों सुरक्षा बलों ने छत्तीसगढ़ में कई माओवादियों को मार गिराया. इसके दो दिन बाद, 23 मई को बीजेपी कर्नाटक के X हैंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की एक एनिमेटेड तस्वीर पोस्ट की जिसमें उनके हाथ में फूलगोभी है और वो समाधि के पत्थर पर अपना हाथ रखे हुए हैं जिस पर लिखा है, “नक्सलवाद रेस्ट इन पीस.” (आर्काइव)

तस्वीर का टाइटल था, “LOL” सलाम, कॉमरेड,” ये कम्युनिस्टों द्वारा ‘लाल सलाम’ के इस्तेमाल पर एक व्यंग्य है.

21 मई, 2025 को छत्तीसगढ़ पुलिस की ज़िला रिजर्व गार्ड इकाई, राज्य में उग्रवाद से निपटने के लिए बनाई गई एक विशेष बल ने नारायणपुर ज़िले में एक नक्सल विरोधी अभियान चलाया. इसमें प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के महासचिव नम्बाला केशव राव उर्फ ​​बसवराजू समेत 27 माओवादी मारे गए. कगार नाम के इस ऑपरेशन का मकसद तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर कर्रेगुट्टाल्लु पहाड़ी श्रृंखला में माओवादियों की उपस्थिति को बेअसर करना था. 

बीजेपी की ये पोस्ट भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन (@cpimlलिबरेशन) के एक बयान के जवाब में थी, जिसमें “नारायणपुर-बीजापुर में CPI (माओवादी) के महासचिव कॉमरेड केशव राव और अन्य माओवादी कार्यकर्ताओं और आदिवासियों की निर्मम न्यायेतर हत्या की निंदा की गई थी.” कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे नरसंहार बताते हुए कहा कि भारतीय नेताओं के “जश्न मनाने वाले” पोस्ट से ये स्पष्ट हो गया कि राज्य “एक अतिरिक्त-न्यायिक विनाश अभियान चला रहा है और नागरिकों की हत्या का क्रेडिट ले रहा है और माओवाद से निपटने के नाम पर कॉर्पोरेट लूट और सैन्यीकरण के खिलाफ आदिवासियों के विरोध को दबा रहा है.” पार्टी शायद अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के X पोस्ट का ज़िक्र कर रही थी, जिन्होंने माओवादियों की मौत को “नक्सलवाद को खत्म करने की लड़ाई में एक ऐतिहासिक उपलब्धि” बताया था.

पिछले 16 महीनों में भाजपा के शासन के तहत, छत्तीसगढ़ में 400 से ज़्यादा कथित माओवादी विद्रोही मारे गए हैं. छत्तीसगढ़ एक महत्वपूर्ण आदिवासी आबादी वाला राज्य है.

हालांकि, दोनों पार्टियां और उनके विचारक नक्सली आंदोलन को एक दूसरे से एकदम उलट विरोधी तरीके से देखते हैं. परेशान करने वाली बात ये है कि बीजेपी कर्नाटक के X पोस्ट में एक ट्रॉप- फूलगोभी का इस्तेमाल किया गया है- जो एक नरसंहार की भयावह याद दिलाता है.

रक्तपात निहित भागलपुर दंगे

एक अनजान पाठक के लिए अमित शाह का नक्सली आंदोलन की समाधि पर फूलगोभी पकड़ना अजीब लेकिन नॉर्मल लग सकता है. हालांकि, यहां फूलगोभी रक्तपात का एक गहरा प्रतीक है. ये 1989 के भागलपुर दंगों का संदर्भ है जिसमें 100 से ज़्यादा मुस्लिम मारे गए थे.

35 साल पहले, बिहार के भागलपुर शहर में क्रूर दंगों की एक श्रृंखला भड़क उठी थी. अक्टूबर, 1989 में राम जन्मभूमि आंदोलन के सांस्कृतिक उपद्रव के बीच मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदू छात्रों की हत्या की अफवाहें फैलने लगीं. इसने संगठित सांप्रदायिक हिंसा की एक लंबी अवधि को जन्म दिया, जो लगभग पूरे दो महीने तक चली. जैसा कि कहा जाता है, भागलपुर दंगे में 250 से ज़्यादा गांव तबाह हो गए, जिसमें एक हजार से ज़्यादा लोग मारे गए, जिनमें से ज़्यादातर मुसलमान थे.

लेकिन भागलपुर के लोगाईं गांव में इससे भी ज़्यादा भयावह घटना घटी. 27 अक्टूबर 1989 को कथित तौर पर पुलिस अधिकारी रामचंदर सिंह के नेतृत्व में एक भीड़ ने 116 मुसलमानों की हत्या कर दी. उनके शवों को दफना दिया गया और हत्याओं को छुपाने के लिए उनकी सामूहिक कब्रों पर फूलगोभी के पौधे लगा दिए गए.

लगभग 25 दिन बाद, 21 नवंबर को भागलपुर के तत्कालीन एडिशनल जिला प्रबंधक, A K सिंह, पास के एक गांव में राहत मिशन पर थे, उन्होंने दफनाए गए शवों पर फूलगोभी के पौधे उगने के बारे में ग्रामीणों के बीच बातचीत सुनी और नरसंहार का खुलासा किया. एक अन्य वृत्तांत से पता चलता है कि A K सिंह ने गिद्धों को फूलगोभी के बागानों के ऊपर मंडराते देखा था इसलिए उनको लगा कि हो सकता है शवों को ज़मीन के नीचे दफनाया गया हो.

1989 में हुई घटनाओं और झड़पों के कारणों के बारे में ज़्यादा जानकारी के लिए हमारी पिछली रिपोर्ट यहां पढ़ें. भागलपुर दंगा जांच आयोग की रिपोर्ट भी यहां पढ़ सकते हैं.

फूलगोभी कल्पना

हालांकि, भागलपुर दंगे तीन दशक पहले हुए थे, पिछले कुछ सालों में फूलगोभी के प्रतीकवाद ने चित्रमय प्रतिनिधित्व, कल्पना और मीम्स के माध्यम से अपना रास्ता ढूंढ लिया है. हर बार, किसी अल्पसंख्यक या गैर-राईटविंग ग्रुप को निशाना बनाया जाता है, हिंदुत्व ग्रुप्स या राईटविंग विचारधारा से जुड़े समर्थकों ने खुले तौर पर फूलगोभी को ‘समाधान’ के रूप में संदर्भित किया है.

मार्च 2025 में महाराष्ट्र के नागपुर में सांप्रदायिक झड़पें होने के बाद, राईटविंग सोशल मीडिया यूज़र्स ने फूलगोभी को संभावित ‘समाधान’ के रूप में संदर्भित किया.

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पिछले साल फ़रवरी में हलद्वानी में दंगे भड़कने के बाद कई सोशल मीडिया पोस्ट में इसी तरह के फूलगोभी संदर्भों का इस्तेमाल किया गया था.

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भागलपुर नरसंहार का महिमामंडन करते हुए कई मीम्स बनाए गए और शेयर किए गए हैं.

पढ़ें | नागपुर झड़प: 1989 के भागलपुर दंगों में सामूहिक हत्याओं का ज़िक्र करने वाले फूलगोभी मीम्स फिर से सामने आए

इस तरह का प्रतीकवाद न सिर्फ भागलपुर में जो कुछ सामने आया उसकी भयावहता को महत्वहीन बनाता है, बल्कि इस कार्रवाई को एक स्वीकार्य ‘समाधान’ के रूप में महिमामंडित करता है. ये निर्धारित करना मुश्किल है कि कौन सी बात ज़्यादा परेशान करने वाली है, कि देश पर शासन करने वाली पार्टी की राज्य शाखा ने इस बात को शेयर किया या “नक्सलवाद को खत्म करने” को नरसंहार के बराबर माना जा रहा है. 24 मई तक, कई सोशल मीडिया यूज़र्स द्वारा तस्वीर की भयावहता की ओर इशारा करने के बावजूद, बीजेपी कर्नाटक के X हैंडल ने पोस्ट को नहीं हटाया है.

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