कोरोनाकाल ने हमें सिर्फ़ एक भयानक तेज़ी से फैलने वाली बीमारी ही नहीं दी है बल्कि हमारी वोकैब्युलरी को और भी समृद्ध किया है. इसमें लॉकडाउन, सोशल डिस्टेंसिंग, सैनिटाइज़ेशन, डिस-इन्फ़ेक्ट आदि शब्द जुड़ गए हैं. इसके अलावा एक शब्द और जुड़ा है जो कि कोरोना वायरस के ही कारण आया है मगर इसके पीछे राजनीतिक कारण भी हैं. ये शब्द है आत्मनिर्भर. नरेंद्र मोदी का ‘दिया’ शब्द जो अब मीम मटीरियल बन चुका है. कांग्रेस नेता शशि थरूर ने 11 जून को तंज़ कसते हुए कविता-नुमा 4 लाइनें लिखीं और एक तस्वीर ट्वीट की. इस तस्वीर में एक महिला एक बच्चे को लेकर बैठी हुई है और दूसरी महिला ड्रिप वाली बोतल हवा में लटकाए खड़ी है. बच्चे को ड्रिप लगी हुई है. शशि थरूर ने इस तस्वीर के साथ लिखा –
हर विपदा से लड़ने की,
हम में बड़ी महारत है
ये आत्मनिर्भर भारत है
ये #आत्मनिर्भर भारत है!

इस तस्वीर को लॉकडाउन के सन्दर्भ में लिया जाने लगा. मार्च में कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते लागू किये गए देशव्यापी लॉकडाउन के बाद देश के कई इलाकों से अफ़सोसजनक तस्वीरें आयीं जिनमें मज़दूरों की परेशान करने वाली स्थिति दिख रही थी. भूख-प्यास से बेहाल लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हुए दिखाई दिए. इस मजबूरी में की जाने वाली यात्रा में कई लोगों की मौत हुई. लोग इसके बारे में लगातार बातें कर रहे हैं. विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश में है. इसी सब के बीच शशि थरूर की इस तस्वीर ने लोगों में ये भ्रम फैला दिया कि ये तस्वीर लॉकडाउन के दौरान की है.

शशि से पहले ये तस्वीर बड़ी फॉलोविंग रखने वाले शायर और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके इमरान प्रतापगढ़ी ने भी ट्वीट की. इन्होंने भी आत्मनिर्भर शब्द का इस्तेमाल किया. इमरान प्रतापगढ़ी के इस ट्वीट को ये आर्टिकल लिखे जाने तक लगभग 15 हज़ार लाइक्स और साढ़े 3 हज़ार से ज़्यादा बार रीट्वीट किया गया है.

तस्वीर की असलियत

असल में ये तस्वीर साल 2017 की है. इसे दी लल्लनटॉप के साथ काम करने वाले अमितेश सिंहा ने खींचा था. हमने अमितेश से बात की तो उन्होंने बताया कि साल 2017 में वो उत्तर प्रदेश चुनावों की कवरेज के लिए निकले हुए थे. मिर्ज़ापुर से आगे बढ़ते हुए उन्हें रास्ते में ये नज़ारा दिखाई दिया तो गाड़ी में बैठे-बैठे उन्होंने 2-3 शॉट्स लिए. इस तस्वीर का इस्तेमाल उन्होंने कहीं भी नहीं किया और 2019 में इसे अपनी इन्स्टाग्राम प्रोफ़ाइल पर डाला.

 

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चूंकि ये फोटो कई लोगों ने डाल दी है। इसलिए ये बताना जरूरी है। ये तस्वीर 2017 की है। उत्तर प्रदेश विधानभा चुनाव के दौरान की। तस्वीर मिर्ज़ापुर की है। तस्वीर 5:24 शाम की है। . . . . #streetphoto #magnumphotos #streetlife #streetportrait #documentary #lensculturestreets #urbanphotography #everydayasia #streetphotographer #HypeBeast #vscoportrait #ig_mood #discoverportrait #portraitphotography #profile_vision #bleachmyfilm #postmoreportraits #portraitpage #igpodium_portraits #portraiture #incredibleindia #photographers_of_india #indiagram #storiesofindia #indiaclicks #canonphotos #canoneos #canonrebel #canonphotographer #focalmarked

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अमितेश से हमने रिक्वेस्ट की कि वो हमें अपनी खींची हुई तस्वीर की ओरिजिनल फ़ाइल भेज दें जिससे हम उनकी कही बातों की तस्दीक कर सकें. उन्होंने हमें फ़ाइल भेजी जिसके बाद हमने ‘मेटाडेटा टु गो’ (metadata2go.com) की मदद से उसका मेटाडेटा निकाला. मेटाडेटा किसी तस्वीर या वीडियो के बारे में उसकी जानकारी होती है. (इसके बारे में समझने के लिए ये आर्टिकल पढ़ें.) इसमें इस तस्वीर को लिए जाने की तारीख 1 मार्च 2017 दिखाई दे रही है.

 

हमने अमितेश से ये भी पूछा कि इसको खींचने वाले के नाम के आगे किन्हीं मयंक खुराना का नाम लिखा है. इसपर उन्होंने बताया कि जिस कैमरा से उन्होंने ये तस्वीर खींची थी, वो उन्हें कंपनी की तरफ़ से मिला था. इससे पहले ये कैमरा मयंक खुराना के पास रहा होगा जिन्होंने अपना डेटा इसमें डाला हुआ था. अमितेश ने बिना ये डेटा बदले तस्वीरें लेना शुरू कर दिया जिसकी वजह से EXIF डेटा में उनकी जगह मयंक का नाम आता है.

अमितेश ने ये भी बताया कि उन्होंने इन्स्टाग्राम पर तस्वीर क्रॉप कर के डाली थी और वही शेयर हो रही है. चूंकि उन्होंने हमें ओरिजिनल फ़ाइल भेजी ही थी, इसलिए हम वो पूरी तस्वीर दिखा रहे हैं.

इस तस्वीर का ‘फ़ैक्ट चेक’ क्यूं ज़रूरी है?

ये हर किसी को मालूम है कि आदिकाल से सांकेतिक तस्वीरों का इस्तेमाल होता आया है. कितने ही ऐसे मौके आये हैं जहां सांकेतिक तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है. ये तस्वीर खस्ताहाल स्वास्थ्य सुविधाओं का सबसे बड़ा सबूत है. एक बच्चे को ड्रिप लगी हुई है और उसे इस हालत में छोड़ दिया जाना लाचार व्यवस्था का गवाह है. ये तस्वीर संवेदनहीनता का उदाहरण है. लॉकडाउन के बाद सामने आई बदइंतज़ामी और लोगों को हुई परेशानी के लिए इस तस्वीर का इस्तेमाल किया जाना समझ में आ सकता है. लेकिन इसका फ़ैक्ट चेक किया जाना इसलिए ज़रूरी हो जाता है क्यूंकि 3 साल पहले खींची गयी तस्वीर को कुछ वक़्त पहले पॉपुलर हुए टर्म ‘आत्मनिर्भर’ के साथ रखा गया है तो लोगों को ऐसा न लगे कि ये तस्वीर भी हाल ही की है.

इसके अलावा एक राजनीतिक वजह भी है जो कि बड़ी मज़ेदार है. साल 2017 के चुनावों में उत्तर प्रदेश में अनोखा समीकरण पाया गया था. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने एक-दूजे का हाथ थाम एक साथ चुनाव लड़ने का फ़ैसला लिया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और राहुल गांधी एक साथ नज़र आये थे. 2017 में जिस वक़्त ये तस्वीर खींची गयी थी, समाजवादी पार्टी प्रदेश में अपने 5 साल पूरे कर चुकी थी. यानी ये तस्वीर अखिलेश यादव का रिपोर्ट कार्ड थी. वही अखिलेश यादव जिनके साथ राहुल गांधी आये थे. वही राहुल गांधी जो कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं, शशि थरूर जिसके एक बड़े नेता हैं. इमरान प्रतापगढ़ी ने 2019 के आम चुनाव में मुराबाद से कांग्रेस के टिकट पर अपनी दावेदारी पेश की थी. ऐसे में इन दोनों का इस तस्वीर को सोशल मीडिया पर विपक्षी पर तंज़ कसते हुए शेयर करना अपने आप में बहुत बड़ी आयरनी है.

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Ketan is Senior Editor at Alt News Hindi.