उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा की सदस्य नाज़िया इलाही खान, कथित तौर पर हिंदुओं से सरकारी और प्राइवेट रोजगार के क्षेत्रों से दो से तीन साल तक मुसलमानों का बहिष्कार करने का आग्रह करती दिखी. उन्होंने मुसलमानों से रिश्ता न रखने या उन्हें किसी तरह के काम या रोजगार पर नहीं रखने करने की भी अपील की. भाजपा नेत्री की ओर से इस तरह का सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाला विवादित बयान उस वक़्त सामने आया, जब देश के मुख्यधारा के बड़े मीडिया संस्थान उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे.

दरअसल, ये विवादित बयान गाज़ियाबाद के खोड़ा थाना क्षेत्र में बकरीद के दिन सूर्या चौहान की हत्या पर मीडिया को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिया गया. नाज़िया इलाही ने कहा, “हमारा भारत देश, सिर्फ पाकिस्तान से ही नहीं लड़ रहा है, हमारा भारत देश हमारे भारत में रहने वाले कुछ असामाजिक तत्व, आतंकवादी मानसिकता वाले लोगों और पाकिस्तानी मानसिकता वाले लोगों से भी लड़ रहे हैं” मुस्लिम समुदाय पर आरोप लगाया कि वो विभिन्न प्रकार के जिहाद जैसे थूक जिहाद, मूत जिहाद, गला रेतों जिहाद, लव जिहाद, लैंड जिहाद, कन्वर्शन जिहाद चला रहे हैं, इतना ही नहीं मुस्लिम समुदाय से हिंदूओं के सुरक्षित नहीं होने का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “120 करोड़ हिंदुओं को सतर्क होने की जरूरत है और जितनी जल्दी हो उतनी जल्दी ही मुसलमानों को प्राइवेट जॉब, गवर्नमेंट जॉब, प्राइवेट और गवर्नमेंट सेक्टर, डोमेसेटिक जगहों के हर जगह से बायकॉट करना चाहिए.”

आगे, मुस्लिम समुदाय पर निशाना साधते हुए नाज़िया इलाही खान ने दावा कर कहा कि ऐसा कोई दिन नहीं जाता है जब आतंकवादी और असामाजिक तत्वों अरेस्ट नहीं होते हैं, ATS (Anti-Terrorism Squad) डिपार्टमेंट से लेकर के सुरक्षा एजेंसी के सबके न्यूज़ को देखिए, तो अभी फ़िलहाल दो से तीन साल के लिए मुसलमानों का बायकॉट (बहिष्कार) करना बहुत जरूरी है.

ऑल्ट न्यूज़ ने पाया कि नाज़िया इलाही खान ने विवादित प्रेस कॉन्फ्रेंस वाले बयान से कुछ दिन पहले ही मृतक सूर्या चौहान के परिवार से मिलने के बाद The Newspaper चैनल को दिए एक इंटरव्यू में भी मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ कठमुल्लों जैसे अपमानजनक शब्दों का उपयोग की थी. उन्होंने 120 करोड़ हिंदुओं को मुसलमानों का बायकॉट करने और देश के सारे मदरसों को ध्वस्त कराने का बयान दिया था.

ये पहली बार नहीं है जब नाज़िया इलाही खान ने इस तरह के विवादित बयान दिए हों, वो अक्सर अपने मुस्लिम विरोधी बयानों, मुसलमानों का सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार करने, मदरसों-मस्जिदों की सम्पत्ति को अवैध और उन्हें ध्वस्त कराने, लव-जिहाद जैसे विवादित भाषणों के ज़रिए चर्चा का विषय बनी रहती हैं.

2026 के अप्रैल माह में पिंकी चौधरी के हिंदू रक्षा दल द्वारा आयोजित एक जनसभा के दौरान भी नाज़िया इलाही, मुस्लिम विरोधी भाषण देती नज़र आयी थी. नाज़िया इलाही ने अपने भाषण में हिंदू परिवारों से मुसलमानों को दूर रखने के लिए “हर हिंदुओं के घर में सुअर पालने” और “हर हिन्दू लड़कियों को सुअर के दाँत का लॉकेट बनाकर माला पहनने” की शुरुआत करने को आह्वान कर रही थीं.  हिंदुओं को मुसलमान दिखने पर उन्हें कैंची दिखा कर पूरा ख़तना कर देने की बात कही थी और कैंची का इस्तेमाल करने का भी आह्वान किया था.

नाज़िया इलाही जब सार्वजनिक रूप से मुस्लिम विरोधी भाषण दे रही थीं तब उनके बगल में एक वर्दीधारी पुलिसकर्मी भी मौजूद थे. लेकिन पुलिसकर्मी द्वारा नाज़िया इलाही को मुस्लिम विरोधी भाषण देने से बिल्कुल भी नहीं रोका गया.

इसके अलावा, फ़रवरी, 2025 में नाज़िया इलाही ने दावा किया था कि उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित होने वाले महाकुंभ मेले में यात्रा के दौरान दिल्ली के पास मुसलमानों के एक समूह द्वारा हमला किया गया. कानपुर देहात पुलिस ने इस सांप्रदायिक दावे का खंडन करते हुए बताया कि जिस टैक्सी में नाज़िया इलाही खान यात्रा कर रही थीं, उसका चालक सो गया था जिसके कारण दुर्घटना हुई थी. साथ ही पुलिस ने इस घटना के बारे में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भ्रामक और निराधार जानकारी फैलाने से बचने की अपील भी की थी.

ऑल्ट न्यूज़ ने इस पूरी घटना के सांप्रदायिक दावे और उसके हर पहलुओं पर एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की थी.

पढ़ें: ‘ट्रक से टक्कर के कारण दुर्घटना, कोई सांप्रदायिक ऐंगल नहीं’: नाज़िया इलाही खान के दावे की असलियत

वाराणसी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान नाज़िया इलाही खान द्वारा मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की अपील करने वाला बयान कोई अलग-थलग घटना नहीं दिखती. उपलब्ध सार्वजनिक वीडियो और उनके पूर्व बयानों से पता चलता है कि वो पहले भी मुस्लिम समुदाय का बहिष्कार, मदरसों और मस्जिदों के संबंध में विवादित टिप्पणियां तथा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले भाषण देती रही हैं.

ऐसे में हालिया बयान एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि सार्वजनिक मंचों से किसी समुदाय विशेष के बहिष्कार या उसके खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की अपील करने वाले भाषणों पर राजनीतिक दलों और प्रशासन की क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए?