प्रेस की आज़ादी और आपराधिक प्रक्रिया के मामले में एक अहम फ़ैसले में, दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वतंत्र न्यूज़ पोर्टल ‘न्यूज़क्लिक’ और उसके एडिटर-इन-चीफ़ प्रबीर पुरकायस्थ के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफ़ेंस विंग (EOW) द्वारा दर्ज FIR और एनफ़ोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) की मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी कार्यवाही को रद्द कर दिया है.

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा का ये आदेश 29 मई, 2026 को आया था और 10 जून को सार्वजनिक हुआ. कोर्ट ने कहा कि इस मामले को आगे चलाना “कानूनी प्रक्रिया का सरासर ग़लत इस्तेमाल” है.

प्रबीर पुरकायस्थ ने EOW की FIR और एनफ़ोर्समेंट केस इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (ECIR) को रद्द कराने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. ECIR वो डॉक्यूमेंट है जिसके ज़रिए ED, प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत कार्यवाही शुरू करती है.

अपनी याचिका में पुरकायस्थ ने तर्क दिया कि FIR “दुर्भावनापूर्ण इरादे से और सिर्फ़ याचिकाकर्ता को परेशान करने के लिए दर्ज की गई थी. FIR में लिखी बातें पूरी तरह से अस्पष्ट और बेबुनियाद हैं और उनमें बेमतलब के आरोप लगाए गए हैं; अगर उन्हें उनकी असल शक्ल में मान भी लिया जाए, तो भी उनसे किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) का पता नहीं चलता.”

अदालत ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली और कार्यवाही रद्द कर दी. फैसले में कहा गया कि आपराधिक साजिश के “सिर्फ़ दावों” के बावजूद, जांच करने वाले अधिकारी कोई भी ऐसा सबूत पेश नहीं कर पाए जिससे अपराध साबित होता हो.

फैसले के बाद ‘ऑल्ट न्यूज़’ से बात करते हुए पुरकायस्थ ने कहा कि इस मामले का असर कानूनी कार्यवाही से कहीं ज़्यादा था. “ये संगठन के लिए एक बहुत बड़ा झटका था. इससे उबरना आसान नहीं है. और सिर्फ़ संगठन ही नहीं, बल्कि इसमें शामिल लोगों के नुकसान पर भी ध्यान देना चाहिए. पत्रकारों की अचानक नौकरी चली गई, उन्हें परेशान किया गया, कई तरह की जांचों का सामना करना पड़ा और उनके डिवाइस ज़ब्त कर लिए गए. एक पत्रकार के लिए कंप्यूटर और फ़ोन काम के सबसे ज़रूरी औज़ार होते हैं. कई बार इनके ज़ब्त होने से उनके पेशेवर जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है.”

मामला क्या था?

पुरकायस्थ और न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ मामला 2020 में दर्ज़ किया गया था. ED और दिल्ली पुलिस के मुताबिक, न्यूज़क्लिक को 11 अप्रैल 2018 को अमेरिका की ‘वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स LLC’ से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के ज़रिए 9.59 करोड़ रुपये मिले थे.

एजेंसियों का आरोप है कि Worldwide Media Holdings LLC ने डिजिटल न्यूज़ मीडिया में विदेशी निवेश से जुड़े नियमों से बचने के लिए न्यूज़क्लिक के शेयर लगभग 11,510 रुपये प्रति शेयर की बढ़ी हुई कीमत पर खरीदे.

जांचकर्ताओं ने ये भी आरोप लगाया कि न्यूज़क्लिक को चीन से जुड़ी संस्थाओं से कुल 38 करोड़ रुपये की विदेशी फंडिंग मिली जिसका मकसद भारत के मीडिया इकोसिस्टम में चीन के पक्ष में कंटेंट फैलाना था. ED के मुताबिक, शुरुआती निवेश के अलावा, न्यूज़क्लिक को 2018 और 2022 के बीच अतिरिक्त 28 करोड़ रुपये मिले.

एजेंसी ने दावा किया कि इन फंड्स को एक्सपोर्ट रेमिटेंस (निर्यात से प्राप्त राशि) के तौर पर दिखाया गया था और आरोप लगाया कि न्यूज़क्लिक इस बात का पर्याप्त सबूत नहीं दे पाया कि विदेशी संस्थाओं को असल में करोड़ों रुपये की सेवाएं दी गई थीं. एजेंसी का आरोप है कि ये पेमेंट कंपनी में विदेशी फंडिंग लाने का एक ज़रिया थे.

2023 में, दिल्ली पुलिस ने Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) के प्रावधान लागू किए. पुलिस का आरोप था कि फंडिंग का कनेक्शन भारतीय मूल के बिज़नेसमैन नेविल रॉय सिंघम से जुड़ा था जिन पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध होने का आरोप है. एजेंसियों ने दावा किया कि Worldwide Media Holdings LLC की स्थापना सिंघम के सहयोगी जेसन फ़ेचर ने की थी.

न्यूज़क्लिक के नेविल रॉय सिंघम से जुड़े होने के आरोपों ने तब राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा, जब 2023 में New York Times की एक इंवेस्टिगेशन रिपोर्ट में बताया गया कि सिंघम से जुड़ी संस्थाओं ने एक ऐसे ग्लोबल नेटवर्क को फ़ाइनेंस किया था जिस पर चीनी सरकार के नैरेटिव को बढ़ावा देने का आरोप था. बाद में ये रिपोर्ट न्यूज़क्लिक के खिलाफ शुरू की गई जांच का एक अहम आधार बनी.

पुरकायस्थ और न्यूज़क्लिक के HR हेड अमित चक्रवर्ती को अक्टूबर 2023 में गिरफ़्तार किया गया था.

जांच करने वालों ने ये भी आरोप लगाया कि न्यूज़क्लिक को मिले फंड का इस्तेमाल एक्टिविस्ट गौतम नवलखा, पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता, एक्टिविस्ट उर्मिलेश और एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ को पेमेंट करने के लिए किया गया था.

आज़ाद और निष्पक्ष पत्रकारिता पर मनमाना हमला और शक्तियों का ग़लत इस्तेमाल: हाई कोर्ट

26 अगस्त 2020 को दर्ज EOW की FIR में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406, 420 और 120B लगाई गई थीं. इसके कुछ समय बाद ही ED ने कार्रवाई शुरू की और फ़रवरी 2021 में न्यूज़क्लिक के ऑफ़िस और पत्रकारों के घरों पर तलाशी ली.

FIR को रद्द करते हुए जस्टिस कृष्णा ने पैराग्राफ़ 86 में कहा: “ऐसी FIR को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का घोर ग़लत इस्तेमाल है और इसलिए इसे रद्द किया जाता है.”

अदालत ने ये भी कहा कि ये कार्रवाई “न सिर्फ दुर्भावनापूर्ण थी, बल्कि याचिकाकर्ताओं की आज़ाद और निष्पक्ष पत्रकारिता पर मनमाना हमला और शक्तियों का ग़लत इस्तेमाल भी थी.”

अदालत ने ये भी माना कि अगर FIR में लगाए गए आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तो भी IPC की धारा 406 और 420 के तहत अपराध के ज़रूरी तत्व नहीं बनते हैं.

इस फ़ैसले में एक अहम बात जांच करने वालों को रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) का जवाब थी. पुरकायस्थ ने EOW की अपनी स्टेटस रिपोर्ट के एक हिस्से का हवाला दिया जिसमें कहा गया था:

“जांच के दौरान RBI से जवाब मिला है. इसमें कहा गया है कि जमा किए गए Form FCGPR के मुताबिक, विदेशी पैसा (foreign inward remittance) ‘ऑटोमैटिक रूट’ से आया था. M/s PPK New Click Studio Pvt. Limited के मामले में, मौजूदा FEMA नियमों के तहत शेयर जारी करने या रिपोर्टिंग में कोई देरी नहीं हुई थी.”

कोर्ट ने कहा:

“ऊपर दी गई बातों से साफ़ है कि जिस FIR को चुनौती दी गई है, उसका पूरा आधार ही RBI ने ग़लत साबित कर दिया है. FIR में आरोप लगाया गया था कि याचिकाकर्ता नंबर 1 को ग़लत तरीके से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) मिला था. RBI ने EOW को लिखा है कि ये निवेश ‘ऑटोमैटिक रूट’ से आया था और FEMA नियमों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ था. FIR को देखने से साफ़ पता चलता है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध (cognizable offence) नहीं बनता है और इसलिए FIR को रद्द किया जाना चाहिए.”

कोर्ट ने इस आरोप को भी खारिज कर दिया कि न्यूज़क्लिक के शेयरों की वैल्यू तय करना कोई अपराध था. कोर्ट ने ध्यान दिया कि शेयर्स की वैल्यू 9,188 रुपये प्रति शेयर तय की गई थी, लेकिन आखिरकार उन्हें 11,510 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से खरीदा गया था.

शेयरों की कीमत के बारे में कोर्ट ने कहा: “ये एक आर्थिक फ़ैसला है जिसमें किसी भी तरह के आपराधिक अपराध का ज़िक्र नहीं है.”

फ़ैसले में ये भी कहा गया कि जब निवेश मिला था, तब डिजिटल न्यूज़ मीडिया में FDI पर कोई सीमा नहीं थी.

कोर्ट ने न्यूज़क्लिक की ओर से केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय को 20 दिसंबर, 2017 को भेजे गए एक पत्र का ज़िक्र किया. इस पत्र में ये स्पष्टीकरण मांगा गया था कि क्या ऑनलाइन न्यूज़ पब्लिकेशन पर भी प्रिंट मीडिया पर लागू होने वाले FDI प्रतिबंध लागू होते हैं या नहीं. 5 जनवरी, 2018 को दिए गए जवाब में मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि “वेबसाइट/वेब पोर्टल पर ऑनलाइन पब्लिकेशन प्रिंट मीडिया के दायरे में नहीं आते हैं.”

ED ने ये भी तर्क दिया था कि न्यूज़क्लिक को सैलरी, कंसल्टेंसी फ़ीस और किराए पर बहुत ज़्यादा खर्च करने के कारण नुकसान हुआ और विदेशी निवेश का एक बड़ा हिस्सा ऐसे भुगतान के ज़रिए दूसरी जगह भेज दिया गया.

इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

“हालांकि, जब कोई कंपनी खास तौर पर डिजिटल प्रिंट मीडिया के कारोबार में काम कर रही हो, तो ऐसे खर्च होना स्वाभाविक है. भले ही ये मान लिया जाए कि याचिकाकर्ता ने ज़रूरत से ज़्यादा भुगतान किया और बहुत ज़्यादा खर्च किया, फिर भी इससे किसी आपराधिक अपराध का पता नहीं चलता. इसलिए, पैसे की हेराफेरी का आरोप टिकने लायक नहीं है.”

IPC की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के आरोप पर कोर्ट ने कहा:

“धोखाधड़ी के अपराध के लिए ये ज़रूरी है कि कोई पीड़ित व्यक्ति हो जिसकी कीमती संपत्ति के मामले में धोखाधड़ी हुई हो. इस मामले में, M/s Worldwide Media Holdings LLC वो कंपनी है जिसने याचिकाकर्ता को 1.5 मिलियन USD भेजे थे. हालांकि, कंपनी की तरफ़ से याचिकाकर्ता द्वारा धोखाधड़ी किए जाने के बारे में कोई भी शिकायत नहीं की गई है.”

कोर्ट ने आगे ये भी कहा:

“जांच के दौरान भी जैसा कि स्टेटस रिपोर्ट में बताया गया है, ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है जिससे पता चले कि कोई व्यक्ति पीड़ित था या याचिकाकर्ता ने किसी के साथ धोखाधड़ी की थी. अगर सभी आरोपों को मान भी लिया जाए, तो भी धोखाधड़ी का अपराध साबित नहीं होता है.”

कोर्ट ने इसी तरह IPC की धारा 406 के तहत लगे आरोप के लिए भी कोई आधार नहीं पाया:

“हो सकता है कि M/s Worldwide Media Holdings LLC ने 1.5 मिलियन USD का भुगतान करके निवेश और शेयर खरीदने का कोई बिज़नेस ट्रांज़ैक्शन किया हो, लेकिन किसी भी तरह से इसे M/s Worldwide Media Holdings LLC द्वारा सौंपी गई संपत्ति या याचिकाकर्ता द्वारा उसका ग़लत इस्तेमाल नहीं कहा जा सकता.”

फैसले में कहा गया: “भले ही सभी आरोपों को मान लिया जाए, फिर भी FIR और उसके बाद की गई जांच में IPC की धारा 406 या 420 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है.”

कोर्ट ने PMLA की धारा 3 और 4 के तहत चल रही कार्यवाही को भी रद्द कर दिया. कोर्ट ने माना कि FEMA का कथित उल्लंघन मनी लॉन्ड्रिंग-रोधी कानून के तहत ‘शेड्यूल्ड ऑफ़ेंस’ (सूचीबद्ध अपराध) नहीं है.

आपराधिक साज़िश के ED के दावे पर कोर्ट ने कहा:

“सिर्फ इसलिए कि पार्टियों के बीच कोई समझौता हुआ है, इसे आपराधिक साज़िश नहीं माना जा सकता; जब तक कि ED ये न दिखा सके कि याचिकाकर्ताओं और अन्य लोगों ने कौन-सा गैर-कानूनी मकसद या तरीका अपनाया है जिसे आपराधिक साज़िश कहा जा सके.”

कोर्ट ने आगे कहा:

“ED के अपने जवाब से ही पता चलता है कि अगर याचिकाकर्ताओं पर लगे सभी आरोपों को मान भी लिया जाए, तो भी FIR में किसी अपराध का पता नहीं चलता. गौरतलब है कि ED ने लगभग डेढ़ साल तक व्यापक जांच की है और याचिकाकर्ताओं व उनके कर्मचारियों को कई बार समन भेजकर पूछताछ की है, लेकिन आज तक कोई भी दोषी ठहराने वाला सबूत नहीं मिला है या रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया है. आपराधिक साजिश के सिर्फ बेबुनियाद दावों के अलावा, ऐसा कोई भी ठोस आरोप नहीं है जो दूर-दूर तक भी PMLA की धारा 4 के तहत दंडनीय अपराध किए जाने का संकेत दे.”

ECIR को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा:

“ये माना गया है कि अगर मुख्य अपराध (प्रेडिकेट ऑफेंस) के तहत FIR रद्द कर दी जाती है, तो ECIR भी अपने आप रद्द हो जाती है. नतीजतन, पूरी ECIR भी रद्द कर दी जाती है.”

जन-हितैषी पत्रकारिता ही हमारी एकमात्र ग़लती: न्यूज़क्लिक

फैसले के बाद, न्यूज़क्लिक ने एक बयान जारी कर कहा कि उन्होंने हमेशा यही माना है कि उनके खिलाफ मामले प्रेस की आज़ादी पर हमले थे.

“न्यूज़क्लिक ने हमेशा यही माना है कि हमारे खिलाफ दर्ज़ कई मामले और आरोप प्रेस की आज़ादी पर हमले हैं. न्यूज़क्लिक की एकमात्र ‘ग़लती’ ऐसी पत्रकारिता करना रही है जो जन-आंदोलनों को कवर करती है.”

पोर्टल ने कहा कि इस फ़ैसले से उसका पक्ष सही साबित हुआ है और उसने अपने स्टाफ़, योगदानकर्ताओं, वकीलों, पाठकों और समर्थकों का शुक्रिया अदा किया.

प्रक्रिया ही सज़ा है

न्यूज़क्लिक और पुरकायस्थ के लिए, इन आरोपों की वजह से कई सालों तक जांच, छापेमारी, गिरफ़्तारियां और लंबी कानूनी लड़ाइयां चलीं.

ये मुश्किल दौर 2021 में शुरू हुआ जब ED ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के तहत पोर्टल के दफ़्तरों और उससे जुड़े मैनेजमेंट के लोगों के घरों की तलाशी ली. अक्टूबर 2023 में दिल्ली पुलिस ने उसी फंडिंग ट्रेल से जुड़े UAPA आरोपों के तहत पुरकायस्थ को गिरफ़्तार किया.

वो मई 2024 तक हिरासत में रहे, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ज़मानत पर रिहा करने का आदेश दिया और कहा कि उनकी गिरफ़्तारी और रिमांड के दौरान अपनाई गई प्रक्रिया गैर-कानूनी थी.

हाई कोर्ट के फ़ैसले में ये भी दर्ज़ है कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद शुरू में पुरकायस्थ को FIR और ECIR नहीं दी गई थीं. कोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, ये डॉक्यूमेंट जून 2021 में दिल्ली के चीफ़ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के दखल के बाद ही उपलब्ध कराए गए थे.

कोर्ट ने पुरकायस्थ के इस आरोप को भी दर्ज़ किया कि जहां EOW की पहली स्टेटस रिपोर्ट में RBI का ये स्पष्टीकरण शामिल था कि FEMA का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है, वहीं बाद की स्टेटस रिपोर्ट में उस संदर्भ को छोड़ दिया गया था.

फ़ैसले में इस बात का ज़िक्र है कि ECIR दिए बिना बार-बार समन भेजने और जांच करने का मकसद पत्रकारों और स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर दबाव बनाना था.

जब पूछा गया कि न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ कार्रवाई की वजह से कितने लोगों की नौकरी गई, तो पुरकायस्थ ने कहा, “स्टाफ़ पत्रकार, स्वतंत्र योगदानकर्ता और स्ट्रिंगर, सबको मिलाकर ये संख्या लगभग 75-80 है.”

हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने EOW FIR और उससे जुड़ी ED की कार्रवाई को रद्द कर दिया है, लेकिन पुरकायस्थ और न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ UAPA का अलग मामला अभी भी लंबित है.