वायरल वीडियो वाले डॉ. अरोड़ा के नुस्खे कोरोना वायरस से बचने के लिए मददगार साबित हो सकते हैं?

फ़ेसबुक यूजर धीरज शर्मा ने नई दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में सीनियर कंसल्टेंट, डॉ. परमेश्वर अरोड़ा एमडी (आयुर्वेद), का एक वायरल वीडियो अपने अकाउंट से पोस्ट किया. वीडियो में डॉक्टर अरोड़ा सड़क पर गुज़र रहे लोगों को संबोधित करते दिख रहे हैं. इस वीडियो में वो दावा करते हैं कि उन्होंने कोरोना वायरस से बचने के लिए पांच टिप्स बताए हैं. अगर उनके बताए टिप्स का पालन करने के बावजूद किसी को वायरस का संक्रमण होता है, तो वो उसका पर्सनल इलाज भी करेंगे.

ये आर्टिकल लिखे जाने तक, धीरज शर्मा के अकाउंट से अपलोड हुए वीडियो को 1.2 करोड़ से अधिक बार देखा जा चुका है और तीन लाख से अधिक लोगों ने इसे शेयर किया है.

Baat Manoge to corona nhi hoga | DR Parmeshwar Arora ,Ganga Raam Hospital

क्या बीतेगी अगर आपके ghar में corona हो gaya तो dhyaan से सुनिए Dr. Saab की बात अगर मानें तो corona नहीं होगा | DR Parmeshwar Arora ,Ganga Raam Hospital

Posted by Dheeraj Sharma on Wednesday, 3 June 2020

एबीपी न्यूज़ ने भी इस वीडियो क्लिप को अरोड़ा के इंटरव्यू के साथ अपने यूट्यूब चैनल पर साझा किया. चैनल ने कई प्रोग्राम्स में अरोड़ा को मंच दिया और उनका प्रचार भी किया.

वायरल वीडियो में, अरोड़ा कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए, हिंदू धर्म के लोगों को रोज़ाना के धार्मिक कामों के साथ-साथ लौंग, काली मिर्च, अजवाइन और गर्म पानी जैसे घरेलू ‘उपचार’ का सेवन करने की अपील करते हैं.

हालांकि, अरोड़ा पहले ऐसे शख़्स नहीं हैं जिन्होंने कोविड-19 से बचने या इलाज के लिए इस तरह के ‘घरेलू उपचारों’ की बात की हो.

वायरस का संक्रमण फैलने के समय से सरकार लोगों को काढ़ा पीने की सलाह दे रही है. इसे मीडिया ने भी जमकर प्रमोट किया है. लौंग और काली मिर्च इस आयुर्वेदिक रेसिपी को बनाने में इस्तेमाल किए जाने वाली सामग्री में से हैं.

नमक के साथ गर्म पानी पीने या गुलगुला करने का दावा भी खूब फैला है.

Posted by Jay Monroe on Friday, 13 March 2020

इस आर्टिकल में हम साइंटिफ़िक रिसर्च के आधार पर कोरोना वायरस के इलाज में इनके असर को जांचेंगे. कोविड-19 के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिलने की वजह से, हमने कोविड-19 के लक्षणों या ऊपरी श्वसन तंत्र में होने वाली किसी अन्य वायरल संक्रामक बीमारी में इन उपचारों के रिसर्च की समीक्षा की है.

दावा:

ऑल्ट न्यूज़ साइंस ने इस वीडियो और सोशल मीडिया पर चल रहे अन्य दावों को अलग-अलग हिस्सों में बांटा. इससे कोरोना वायरस से बचाव/इलाज़ की तीन लिस्ट बनीं.

1. घरेलू नुस्ख़ों से ऊपरी श्वसन तंत्र का इलाज करके कोरोना वायरस को खत्म करने के दावे

“संक्रमण के पहले दिन, वायरस मुखनली (मुंह और गला) में कमज़ोर रूप से चिपका हुआ होता है. गर्म पानी के धीरे सेवन से, वायरस पेट में पहुंच जाएगा, जहां पर पेट का अम्लीय परिवेश वायरस को खत्म कर देगा.”

“अगर संक्रमण मुखनली तक ही सीमित है तो लौंग, काली मिर्च या जीरा को चुटकी भर नमक के साथ दिन में तीन बार खाने से वायरस से सुरक्षित रहा जा सकता है.”

“अगर वायरस ऊपरी श्वसन नली या गले में है तो सोने से पहले चुटकी भर हल्दी और काले नमक को गर्म पानी के साथ गरारा करने से वायरस नष्ट हो जाएगा.”

“हल्दी और काले नमक वाले गर्म पानी से भाप लेने पर नाक के अंदर के वायरस साफ़ हो जाएंगे.”

2. कोरोना वायरस संक्रमण और प्रतिरोधक क्षमता को लेकर किए जा रहे दावे

“मुनक्का को दूध या पानी के साथ खाने से प्रतिरोधक क्षमता का विकास होगा.”

“गर्मी के मौसम में काजू और बादाम के सेवन से अपच की समस्या हो सकती है.”

“प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए खूब पेठा खाएं.”

3. जब संक्रमण प्रणालीगत बन जाए (ख़ून में फैल जाए), तब हर्बल मिश्रण को आजमाने के दावे

“अगर संक्रमण रक्त-प्रवाह तंत्र (ख़ून के रास्ते) तक पहुंच जाए तो लहसुन, काली मिर्च, बड़ी इलायची. लौंग, दालचीनी, तुलसी, मुलेठी, पिपली के मिश्रण को पानी के साथ सेवन करें.

नतीजा:

ग़लत

फ़ैक्टचेक:

1. घरेलू नुस्ख़ों से ऊपरी श्वसन तंत्र का इलाज करके कोरोना वायरस को खत्म करने के दावे

सबसे पहले हम ये समझते हैं कि वायरस कैसे हमारे शरीर में संक्रमण फैलाता है.

नोवेल कोरोना वायरस (SARS-COV2) मुख्य तौर पर सांस के ड्रॉपलेट्स, संपर्क और संभावित तौर पर मल या मुखनली के रास्ते संचारित होता है. जब वायरस नासिका तंत्र और ग्रसनी (ऊपरी श्वसन तंत्र) में प्रवेश करता है, ये श्वसन तंत्र की ‘उपकला कोशिकाओं’ के बाहरी हिस्से पर चिपक जाता है.

Image from the Seer Cancer training centre https://training.seer.cancer.gov/anatomy/respiratory/passages/

SARS-COV2 इन कोशिकाओं से ‘स्पाइक प्रोटीन’ नामक प्रोटीन के जरिए जुड़ता है, जो उपकला कोशिकाओं पर मौज़ूद प्रापक अणु ACE2 से जुड़ जाता है. कोशिकाओं के भीतर घुसते ही, ये वायरस श्वसन तंत्र, फेफड़ों, पाचन तंत्र, रक्त में प्रवेश करके बढ़ता चला जाता है. उसके बाद ये शरीर के अन्य ज़रूरी हिस्सों पर भी हमला करता है.

इसलिए, इस प्रक्रिया के दौरान, ये वायरस शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों की कोशिकाओं और रक्त में अपनी संख्या बढ़ाता जाता है. इसलिए, गर्म पानी पीकर, इसे धोकर, किसी दूसरे पदार्थ के साथ गुलगुला करके या उसकी भाप लेकर इस वायरस को खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये सिर्फ़ श्वसन तंत्र तक सीमित नहीं रहता.

साथ ही, अरोड़ा के मुताबिक़ उनके टिप्स पहले दिन के लिए हैं लेकिन कोरोना वायरस संक्रमण के कई लक्षण पहले दिन नहीं दिखते. इस वजह से कई मौकों पर होता ये है कि संक्रमित लोगों को ये पता ही नहीं चलता है कि वो संक्रमित हो चुके हैं.

इसीलिए, चूंकि वायरस शरीर के कई हिस्सों को संक्रमित करता है, और श्वसन तंत्र में फंसे धूल के कणों से इतर, इसे ऊपरी श्वसन तंत्र में न तो किसी द्रव्य से ‘साफ़’ किया जा सकता है और न ही ‘धोया’ जा सकता है.

और, ये वायरस पेट की उपकला लाइनिंग के अंदर मौज़ूद होता है, जहां पर एसिड की अधिकता होती है. पेट के एसिड से वायरस का संपर्क कराने से वायरस या इसके संक्रमण पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इसलिए, गर्म पानी पीने, गर्म पानी से गरारा करने या उसकी भाप लेने से वायरस खत्म नहीं होगा. भले ही उसमें हल्दी या नमक ही क्यों ना मिला हो.

इस तरह के घरेलू नुस्ख़े आपको थोड़े समय के लिए ख़राश वाले गले को राहत दे सकते हैं, लेकिन इससे न तो वायरस को कोई फर्क़ पड़ता है और न ही संक्रमण का इलाज होता है. ये सर्दी-ज़ुकाम में इस्तेमाल होने वाला अतिरिक्त उपाय है, जैसे कि बुखार को कम करने के लिए ठंढे पानी से भीगे कपड़ों का इस्तेमाल.

ऑल्ट न्यूज़ ने अन्य वायरल दावों का सत्यापन करने के दौरान गर्म पानी से गुलगुला करने के दावे का भी पर्दाफ़ाश किया है.

2. कोरोना वायरस संक्रमण और प्रतिरोधक क्षमता को लेकर किए जा रहे दावे

किशमिश

किशमिश का नाम इसलिए लिया गया है क्योंकि अंगूरों में ‘Quercetin’ (एक प्लांट पिगमेंट) नामक पादप-आधारित फ़्लेवेनॉयड पाया जाता है. इसे इम्युन-मॉड्युलेट्री कम्पाउंड बताया गया है (Yao et al 2016). जब एक रैंडमाइज़्ड क्लिनिकल ट्रायल के दौरान 1002 लोगों ने प्रतिदिन 500-1000 एमजी शुद्ध quercetin का सेवन किया, श्वसन तंत्र के संक्रमण में प्लेसीबो की तुलना में उन लोगों में कोई खास प्रभाव नहीं दिखा (Heinz et al. 2010).

इसके अलावा, 100 ग्राम लाल अंगूर में quercetin की मात्रा 3.54 मिलीग्राम ही होती है (www.quercetin.com). अगर हम ये मान भी लें कि quercetin प्रभावी है, तो एक व्यक्ति को ऊपर की स्टडी के मुताबिक, प्रतिदिन 500-1000 मिलीग्राम के लिए 1.4 से 2.8 किलोग्राम अंगूर का सेवन करना होगा. ये अधिकांश लोगों के लिए असंभव है.

पेठा (ककड़ी, कुम्हर या बेनिनकासा हिस्पिडा)

ऐसा कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है जिसमें ये दावा किया गया हो कि ककड़ी या किशमिश खाने से कोरोना वायरस या श्वसन तंत्र के अन्य संक्रमणों में मदद मिल सकती है.

3. जब संक्रमण प्रणालीगत बन जाए (ख़ून में फैल जाए), तब हर्बल मिश्रण को आजमाने के दावे

अरोड़ा ने दावा किया कि अगर संक्रमण प्रणालीगत बन जाए (खून में फैल जाए) तो लहसुन, काली मिर्च, बड़ी इलायची. लौंग, दालचीन, तुलसी, मुलेठी, पिपली पानी के साथ लेने से कोरोना वायरस से लड़ने में मदद मिलेगी. हम हर एक जड़ी-बूटी पर अलग-अलग चर्चा करते हुए देखेंगे कि कोरोना वायरस या ऊपरी श्वसन तंत्र के किसी भी अन्य संक्रमण में ये कितने असरदार हैं.

काली मिर्च

कोविड-19 के संक्रमण में काली मिर्च इस्तेमाल करने के दावे को WHO पहले ही ख़ारिज़ कर चुकी है (इंफ़ोग्राफ़िक देखें).

लहसुन

लहसुन में कई एंटी-बैक्टीरियल गुण हैं, लेकिन इसका कोई सबूत नहीं है कि लहसुन आपको कोविड-19 से सुरक्षित रखेगा (इंफ़ोग्राफ़िक देखें).

इलायची

कृत्रिम परिवेशों (प्रयोगशालाओं) में हुए कई अध्ययनों और चूहों पर की गई स्टडी से इलायची के एंटी-बायोटिक और एंटी-फ़ंगल गुणों का पता चला है (Ashokkumar, K. et al 2020). हालांकि, ऐसी कोई क्लिनिकल स्टडी नहीं हुई है जो इलायची को किसी संक्रमण के ख़िलाफ़ असरदार साबित करती हो.

लौंग

किसी संक्रमण के ख़िलाफ़ लौंग को प्रभावी साबित करने वाला एक भी क्लिनिकल अध्ययन नहीं किया गया है.

लौंग से कोविड-19 के इलाज़ के एक ऐसे ही दावे को फ़ैक्ट-चेकिंग प्लेटफ़ॉर्म, पॉइंटर ने ग़लत साबित किया है.

दालचीनी

कुछ स्टडीज़ में ये निकला है कि दालचीनी Streptococcus mutans और Lactobacillus plantarum जैसे बैक्टीरिया के ख़िलाफ़ एंटीबैक्टीरियल गुण दर्शाता है और  candidiasis जैसे फ़ंगल संक्रमण को रोकता है. लेकिन इस बारे में और पुख़्ता सबूत की दरकार है क्योंकि ये प्राथमिक डेटा पर आधारित है (Ulbricht, C. et al 2011).

हालांकि, वायरल संक्रमणों के मामलों में दालचीली का असर बताने वाली कोई भी क्लिनिकल स्टडी उपलब्ध नहीं है.

मुलेठी

मुलेठी का एक्टिव कम्पाउंड है Glycyrrhizin, जिसने हर्पेस सिम्प्लेक्स, वेरिसेला ज़ोस्टर, जापानी इंसेफ़्लाइटिंस, इन्फ़्लुएंज़ा और वेसिकुलर स्टोमेटाइटिस वायरस जैसे वायरसों के ख़िलाफ़ एंटी-वायरल गुण दिखाएं हैं (L. Wang, Yang, et al., 2015).

2003 में एक कृत्रिम परिवेश (कोशिकाओं के समूह में), glycyrrhizin ने पुराने SARS-COV1 वायरस को बढ़ने से रोका था (Cinatl J et al 2003). हालांकि, जब तक विस्तृत समीक्षा वाला रैंडमाइज़्ड क्लिनिकल ट्रायल मनुष्यों पर नहीं हो जाता, इसके असर को नहीं माना जा सकता.

तुलसी

वायरल संक्रमणों के मामले में तुलसी को लेकर दो क्लिनिकल अध्य्यन हुए हैं और दोनों में कई खामियां थीं. पहली स्टडी Rajalakshmi et al (1986) की है, इसमें कोई नियंत्रित (कंट्रोल) ग्रुप नहीं था. Das et al (1983) की स्टडी में भी ऐसी ही खामी है. उसमें वायरल इंसेफ़्लाइिटस के 14 मामलों का सैंपल साइज़ रखा गया, जो कि पर्याप्त नहीं है.

बड़े सैंपल साइज़ से ये सुनिश्चित होता है कि संयोग से होने वाला प्रकारांतर बहुत कम होता है या फिर प्रकारंतरें आपस में रद्द हो जाते हैं. छोटे सैंपल साइज़ के साथ, रैंडम घटनाएं (उदाहरण के लिए, संयोग से हुई रिकवरी) कम संख्या में किए गए प्रयोगों के परिणाम पर निर्णायक असर डालते हैं. जब मरीज़ों के समूह को कोई दवा खिलाई जाती है और उसमें से कुछ लोग ठीक हो जाते हैं, इससे ये पता नहीं चल सकता कि वो प्लेसीबो प्रभाव के कारण ठीक हुए हैं या अपने अंदर की प्रतिरोधक क्षमता के कारण या बीमारी के स्वाभाविक स्वभाव के कारण. इन सभी कारकों को न्यून करने के लिए, अध्ययन में “कंट्रोल समूह” का होना अनिवार्य है. यह मरीज़ों का ऐसा चुनिंदा समूह जो “टेस्ट समूह” के लोगों जैसे ही गुण प्रदर्शित करता हो और जिन्हें एक जैसी बीमारी हो लेकिन उन्हें टेस्ट के लिए दवा नहीं दी गई हो. इसलिए, छोटे सैंपल साइज़ वाली और बिना “कंट्रोल समूह” वाली स्टडीज़ भरोसेमंद नहीं होती हैं.

इसलिए, ऐसा कोई सबूत नहीं है कि काली मिर्च, लहसुन, लौंग, इलायची, दालचीनी, मुलेठी, तुलसी का सेवन करने से नोवेल कोरोना वायरस ठीक हो जाएगा. इसके अलावा, इन जड़ी-बूटियों को ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल करने से इनमें मौज़ूद क्रियाशील तत्वों की विषाक्तता की वजह से अवांछित साइड इफ़ेक्ट्स भी हो सकते हैं.

निष्कर्ष

ऐसे समय में, जबकि भारत के अस्पताल नोवेल कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लोगों को ये बहुत आकर्षक और सुविधाजनक लग सकता है कि वो घरेलू नुस्ख़ों का प्रयोग कर संक्रमण को रोक सकते हैं या उसका इलाज भी कर सकते हैं. हालांकि, मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग की बातों को छोड़कर , अरोड़ा के द्वारा बताए गए एक भी नुस्ख़े में दम नहीं है. साथ ही, वो मात्रा के बारे में कोई आइडिया नहीं देते हैं. इसके कारण नकारात्मक साइड इफ़ेक्ट्स हो सकते हैं. हो सकता है कि वीडियो देखकर लोग इन मसालों का अधिक-से-अधिक इस्तेमाल करने लगें. ये एक ख़तरनाक धारणा है कि आयुर्वेदिक नुस्ख़ों का कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं होता.

आयुष मंत्रालय पहले ही ऐसी कई जड़ी-बूटियों का प्रचार कर रहा है, जिनकी वैज्ञानिक जांच नहीं हुई है. इसके साथ-साथ, आसानी से उपलब्ध घरेलू नुस्ख़ों वाले वायरल वीडियोज़, व्हाट्सऐप मेसेज लोगों को आकर्षित करते हैं, जो इन अपरीक्षित उपचारों को आज़मा कर इस बीमारी को ख़ुद से ठीक करने की कोशिश कर सकते हैं.

REFERENCES:

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Heinz, S. A., Henson, D. A., Austin, M. D., Jin, F., & Nieman, D. C. (2010). Quercetin supplementation and upper respiratory tract infection: A randomized community clinical trial. Pharmacological research62(3), 237-242.

Suneetha, W. J., & Krishnakantha, T. P. (2005). Cardamom extract as inhibitor of human platelet aggregation. Phytotherapy Research: An International Journal Devoted to Pharmacological and Toxicological Evaluation of Natural Product Derivatives, 19(5), 437-440.

Haji Monfared Nejad, M., Ostovar, M., Raee, M. J., Hashempur, M. H., Mayer, J. G., & Heydari, M. (2019). Cinnamon: a systematic review of adverse events. Clinical Nutrition, 38(2), 594-602.

Nazari, S., Rameshrad, M., & Hosseinzadeh, H. (2017). Toxicological effects of Glycyrrhiza glabra (licorice): a review. Phytotherapy research31(11), 1635-1650.

Ashokkumar, K., Murugan, M., Dhanya, M. K., & Warkentin, T. D. (2020). Botany, traditional uses, phytochemistry and biological activities of cardamom [Elettaria cardamomum (L.) Maton]–A critical review. Journal of ethnopharmacology, 246, 112244.

Ulbricht, C., Seamon, E., Windsor, R. C., Armbruester, N., Bryan, J. K., Costa, D., … & Grimes Serrano, J. M. (2011). An evidence-based systematic review of cinnamon (Cinnamomum spp.) by the Natural Standard Research Collaboration. Journal of dietary supplements, 8(4), 378-454.

Cinatl, J., Morgenstern, B., Bauer, G., Chandra, P., Rabenau, H., & Doerr, H. W. (2003). Glycyrrhizin, an active component of liquorice roots, and replication of SARS-associated coronavirus. The Lancet, 361(9374), 2045-2046.

Wang, L., Yang, R., Yuan, B., Liu, Y., & Liu, C. (2015). The antiviral and antimicrobial activities of licorice, a widely-used Chinese herb. Acta Pharmaceutica Sinica B, 5(4), 310-315.

Jamshidi, N., & Cohen, M. M. (2017). The clinical efficacy and safety of Tulsi in humans: a systematic review of the literature. Evidence-Based Complementary and Alternative Medicine, 2017.

LiverTox: Clinical and Research Information on Drug-Induced Liver Injury [Internet]. Bethesda (MD): National Institute of Diabetes and Digestive and Kidney Diseases; 2012-. Eugenol (Clove Oil) [Updated 2019 Oct 28]. Available from: https://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/NBK551727/

Rajalakshmi, S., Sivanandam, G., & Veluchamy, G. (1986). Role of Tulsi (Ocimum sanctum Linn.) in the management of Manjal Kamalai (viral hepatitis). Journal of Research in Ayurveda and Siddha9(3-4), 118-123.

Das, S., Chandra, A., Agarwal, S., & Singh, N. (1983). Ocimum sanctum (tulsi) in the treatment of viral encephalitis (A preliminary clinical trial). Antiseptic80, 323-327.

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