क्या महात्मा गांधी ने हिन्दू और सिख औरतों को ‘मुस्लिम बलात्कारिओं के साथ सहयोग’ करने को कहा था?

11 नवंबर 2017 को, एक ट्विटर हैंडल ShankhNaad ने एक पोस्टर शेयर किया और उसमें लिखे गए कथन महात्मा गांधी के बताए। पोस्ट के अनुसार महात्मा गांधी ने कहा था कि “अगर कोई मुसलमान, हिंदू या सिख महिला से बलात्कार करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो उसे कभी भी मना नहीं करना चाहिए, बल्कि उसके साथ सहयोग करना चाहिए। महिला को चाहिए कि वो जीभ को दांतों के बीच लाकर एक मुर्दे के भाँति लेट जाए और उसका सहयोग करे जिससे बलात्कारी मुस्लिम संतुष्ट हो जाएगा और जल्द ही वो उसे छोड़ देगा। (अनुवाद)” ऑल्ट न्यूज ने इस पोस्ट की तथ्य जाँच करने का फैसला किया क्योंकि इससे पहले भी @ShankhNaad को कई बार झूठा दुष्प्रचार और धोखाधड़ी संबंधी जानकारी साझा करते हुए पकड़ा गया है।

Shankhnaad - RT if you think ideology of #Gandhi is a boost for #Rape Jihad and disgrace to humanity !!

@ShankhNaad ने एक लेख जो कि rightLog द्वारा लिखा गया था, उसे अपने ट्वीट में सम्मिलित किया था जिसके अनुसार ऊपर वाले कथन गांधी जी के थे। यह एक गांधी जयन्ती स्पेशल लेख था जिसका शीर्षक था “ये कोट्स पढ़ें और उसके बाद निर्णय ले की क्या इसके बाद भी आप उन्हें महात्मा कहेंगे? (अनुवाद)”

Frustrated Indian screenshot

इसके अनुसार, इस लेख का प्रत्येक उद्धरण एक संदर्भ प्रदान करता है।

“बंटवारे से ठीक पहले, हिन्दू और सिख लड़कियों का रेप मुस्लिम लड़कों के द्वारा बड़े पैमाने पर हो रहा था। गांधी जी ने इस पर सलाह दिया कि “अगर कोई मुसलमान, हिंदू या सिख महिला से बलात्कार करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो उसे कभी मना नहीं करना चाहिए, बल्कि उसके साथ सहयोग करना चाहिए। महिला को चाहिए कि वो जीभ को दांतों के बीच लाकर एक मुर्दे के भाँति लेट जाए और उसका सहयोग करे जिससे बलात्कारी मुस्लिम संतुष्ट हो जाएगा और जल्द ही वो उसे छोड़ देगा।” (अनुवाद)(D Lapierre and L Collins, Freedom at Midnight, Vikas, 1997, p-479)

RightLog के लेख का संदर्भ बहुत विशिष्ट था। इसमें कहा गया था कि Freedom at Midnight by Lapierre and Collins. पुस्तक का पेज नंबर 479 पर ये कथन लिखा गया है। हमने जब उस पुस्तक के पेज नंबर 479 को उलटाया तो हमें ऐसा कुछ मिला ही नहीं। उस पेज पर ही क्या पूरे पुस्तक में ऐसा कोई कथन नहीं मिला। ये कथन बहुत से दिनों से घूम रहा है और जो सबसे पुराना रेफेरेंस इस कथन से रिलेटेड हमें मिला वो 20 जनवरी 2009 का था जिसमें एक पोस्ट में इसका जिक्र किया गया था जो एक राइट विंग के साइट Haindava Keralam पर था।

पेज नंबर 479 पर जो उल्लेख था उसके अनुसार गाँधी जी ने पंजाब में हो रही बलात्कार की घटना पर सुझाव दिया था कि रेपिस्ट के जीभ को दाँतो से काटकर उसके साँस को तब तक रोके रहे जब तक वो मर ना जायें। ShankhNaad और RightLog के द्वारा दिए गए रेफरेंस किताब ने उनके दावों की पोल खोल दी। हालाँकि किताब के लेखक ने भी इन कथन के लिए कोई रेफेरेंस नहीं दिया है।

Gandhi's advice to girls

दूसरा रेफेरेंस जो RightLog के द्वारा दिया गया था उसके अनुसार mkgandhi.org एक वेबसाइट जो कि संचालित होता है  Gandhian Institutes Bhartiya Sarvodya Mandal और Gandhi Research Foundation के द्वारा उनका कुछ अलग ही नज़रिया है रेप के बारे में। उनके नजरिये के अनुसार किसी भी स्त्री को अगर यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है तो उसे जो करना चाहिए शायद वो मान्य नहीं होगा या व्यवहारिक नहीं होगा। उनकी फिलॉस्फी किसी के नैतिक ताकत के इर्द गिर्द घूमती है। उनके नजरिया औरतों के ख़िलाफ़ हो रहे हिंसा पर एक बड़े फिलॉस्फी पर आधारित है। जिसको की नीचे दिए गए अंश से देखा जा सकता है:

मेरा हमेशा ये मानना रहा है कि किसी भी औरत के खिलाफ अत्याचार उसकी इच्छा के विरुद्ध होना असंभव है। ये घटना तभी हो सकती है जब वह डर जाए या उसे खुद का नैतिक ताकत नहीं पता हो। यदि वो हमलावर की शारीरिक ताकत से मेल नहीं खाती, तो उसकी पवित्रता उसे उसके उलंघन में सफल होने से पहले मरने की ताकत देगी। माता सीता के ही उदाहरण को देख लें। शारीरिक रूप से वो रावण से बहुत कमजोर थी लेकिन उनकी पवित्रता उस विशाल राक्षस से बहुत अधिक थी। उसने उसे सभी तरह के आकर्षण के साथ जीतने की कोशिश की, लेकिन अपनी शारीरिक शक्ति के बल पर या किसी हथियार के बल पर वो उन्हें छू भी नहीं सका। वो जरूर असफल हो जाती यदि वो कहीं भी कमजोर पड़ती। (अनुवाद)” (H, 1-9-1940, p. 266)

गाँधी जी ने आगे बताया कि अगर उत्पीड़न हो रहा है तो औरत को चाहिए कि वो अपनी पूरी ताकत से उस उत्पीड़न का विरोध करें।

जब एक औरत के साथ उत्पीड़न होता है तब उसे हिंसा और अहिंसा के बारे में नहीं सोचना चाहिए। उसका प्राथमिक कर्तव्य खुद की रक्षा करना होना चाहिए। अपनी रक्षा करने के लिए उसके दिमाग में जो भी आता है उस का प्रयोग करने के लिए वो स्वंत्रत है। भगवान ने उसे नाखून और दाँत दिए है। उसे अपनी सारी ताकत का प्रयोग करना चाहिए और अगर इस प्रयास में जरूरत हो तो मरने से भी पीछे नही हटना चाहिए। वो आदमी या औरत जो मरने के डर से भयमुक्त है वो ना केवल खुद की सुरक्षा कर पाएगा अपितु वो दूसरी की भी सहायता कर पायेगा। (अनुवाद)“(H, 1-3-1942, p.60)

गाँधी जी द्वारा रखे गए विचार कि औरत को अपनी खुद की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से सामना करना चाहिए, RightLog और ShankhNaad के द्वारा बताया गये उनके कथन से पूरी तरह से अलग है।

ShankhNaad और Rightlog का दावा दक्षिणपन्थी संगठनों और समूहों द्वारा सिर्फ महात्मा गांधी को बदनाम करने का एक हिस्सा है। गाँधी जी के विचार बहुत से मुद्दों पर अनोखे थे जिसके कारण वो कभी-कभी जटिल और विवादास्पद भी थे। इसके अलावा उनके अधिकांश लेखन, उनके जीवन के विभिन्न चरणों मे लिखे गए पत्रों के रूप में होते थे। गाँधी जी के लिखित कार्य की असतत स्वभाव ने उन्हें बदनाम करने के लिए उनका संदर्भ गलत इरादे से प्रस्तुत करना आसान बना दिया है, जैसा कि बार-बार देखा गया है।

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