पिछले कुछ दिनों में भारत में कई सोशल मीडिया पोस्ट और अकाउंट्स को जियोब्लॉक कर दिया गया है. इसमें इंस्टाग्राम पर यूज़र्स के पोस्ट को कानूनी ज़रूरत का हवाला देकर हटा दिया जाता है या इन पोस्ट्स को भारत में देखने पर पाबंदी लगा दी जाती है. कई विपक्षी संगठनों और नेताओं के पोस्ट पर भी ऐसा होता हुआ देखा गया, जहां उनके पोस्ट्स अचानक हटा दिए गए.
6 अगस्त को आम आदमी पार्टी और 7 अगस्त को कांग्रेस पार्टी के यूथ विंग इंडियन यूथ कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बताया कि उनके इंस्टाग्राम पोस्ट लगातार मेटा द्वारा हटाए जा रहे हैं.
Modi ji, IYC se Dar Gaye Kya…
Meta se overtime kara rahe ho…Aur Spineless @Meta walon, Tum Platform ho Ya BJP IT CELL ki Franchise? pic.twitter.com/Y7awNsZOcF
— Indian Youth Congress (@IYC) August 6, 2026
No explanation. No accountability. Just silence.
Democracy demands transparency, not secret restrictions and automated acknowledgements.@Meta, stop hiding behind silence. Tell India why accounts are being restricted on your platforms and whose orders you are acting on.… https://t.co/50a21ApBNo pic.twitter.com/p8tIi97ynw
— AAP (@AamAadmiParty) August 6, 2026
हटाए गए पोस्ट पर क्लिक करने पर दिखता है कि इन पोस्ट्स को मेटा के ऑटोमेटेड सिस्टम द्वारा भारत के ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम’ के तहत कानूनी ज़रूरतों के अनुसार, रेस्ट्रिक्ट कर दिया गया है.
इससे पहले भी, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसफ वियज से जुड़े पोस्ट करने पर कांग्रेस और टीवीके नेताओं के पोस्टस् को इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक से इन्हीं नियमों का हवाला देते हुए हटा दिया गया था. कांग्रेस गोवा के अध्यक्ष गिरीश छोड़नकर ने 11 मई को X पर पोस्ट करते हुए लिखा कि क्या मोदी कांग्रेस और टीवीके गठबंधन से इतना डरे हुए हैं कि मुख्यमंत्री के शपथग्रहण का वीडियो भी ब्लॉक हो रहा है? इसी प्रकार टीवीके नेता अरविन्द ने भी सोशल मीडिया पर स्क्रीनशॉट पोस्ट किया कि उनका तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय से जुड़ा फ़ेसबुक पोस्ट हटा दिया गया.
Shame on you @narendramodi 🤦 pic.twitter.com/ujHKwW8VfI
— Aravind TVK (@Aravind8282) May 11, 2026
ज्ञात हो कि इसी वक्त मेटा ने राहुल गांधी का सी जोसफ वियज के साथ एक रील को ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम’ का हवाला देते हुए ब्लॉक कर दिया था. बाद में भारी आलोचना के बाद मेटा ने उस रील को रीस्टोर भी कर दिया था. इस मामले पर इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कहा था कि ये कार्रवाई मेटा की अंदरूनी गलती की वजह से हुआ था, इसका मंत्रालय से कोई संबंध नहीं हैं.
हाल ही में मेटा ने प्रधानमंत्री मोदी का छात्रों को संबोधित करते हुए एक वीडियो कुछ घंटों के लिए खुद प्रतिबंधित कर दिया गया था, जिसके बाद मेटा ने इसे एक तकनीकी गड़बड़ी बताते हुए माफी मांगी. हालांकि, इसमें पारदर्शिता का अभाव देखा गया, चूंकि सार्वजनिक रूप से मेटा ने यह नहीं बताया कि आखिर किस प्रकार की तकनीकी गड़बड़ी थी, जिसकी वजह से ऐसा हुआ.
आखिरकार प्रावधान क्या है?
इस पूरे तंत्र के पीछे भारत के आईटी अधिनियम की धारा 79(3)(बी) है. यह एक ऐसा प्रावधान है जो मूल रूप से यह तय करने के लिए बनाया गया कि प्लेटफॉर्म कब अपनी सेफ हार्बर यानी दायित्व-मुक्ति खो देते हैं. आसान शब्दों में इसका मतलब यह है कि अगर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया इंटरमीडियरी सरकारी नोटिफिकेशन मिलने के बाद भी सरकार द्वारा फ्लैग किये गए मटीरियल को तुरंत नहीं हटाते, तो वे थर्ड-पार्टी यूज़र कंटेंट के लिए अपनी लीगल इम्यूनिटी खो देते हैं, जिसका मतलब है कि उस मैटेरियल के लिए सोशल मीडिया इंटरमीडियरी को डायरेक्ट जिम्मेदार माना जायेगा. लेकिन डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि सरकार इसका इस्तेमाल एक कंटेंट-ब्लॉकिंग व्यवस्था की कानूनी बुनियाद के रूप में कर रही है, और ज्यादा प्रक्रिया वाली धारा 69ए को दरकिनार कर रही है, जिसके तहत लिखित और तर्कसंगत आदेश देना ज़रूरी होता है.
पारदर्शिता की कमी
इस प्रक्रिया की सबसे गंभीर खामी पारदर्शिता की कमी है. जब सरकार द्वारा किसी पोस्ट को फ्लैग करने का रिक्वेस्ट भेजा जाता है, तो यूजर्स को यह नहीं बताया जाता है कि शिकायत किसने की या आदेश किस आधार पर दिया गया. उस जगह पर एक घिस-पिटा नोटिस दिखता है कि कानूनी आवश्यकताओं के तहत इसे हटा दिया गया. यूज़र्स को ना किसी आदेश की कॉपी दी जाती है, ना केस नंबर और ना ही यह बताया जाता है कि किस अधिकारी के द्वारा ये टेकडाउन रिक्वेस्ट भेजा गया.
इससे भी बड़ी समस्या यह है कि आम यूज़र्स के पास इसे चुनौती देने का कोई ठोस और भरोसेमंद रास्ता नहीं है. SLFC और IFF जैसे डिजिटल अधिकार संगठन कुछ हद तक कई यूज़र्स की मदद कर रहे हैं, लेकिन इतने बड़े स्केल पर पोस्ट हटाए जाने के बाद एक सफल मैकेनिज्म का घोर अभाव दिखाई देता है.
मूल रूप से यह मैकेनिज्म असंतुलित है. इसमें सही वजह बताये या सुनवाई का मौका दिए बिना, पहले कंटेंट हटा दिए जाते हैं, और स्पष्टीकरण देने या पोस्ट के वापस लाने की पूरी ज़िम्मेदारी यूज़र पर आ जाती है. इंडियन एक्सप्रेस की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने 2026 के मार्च से जुलाई महीने के बीच करीब 1 लाख 95 हज़ार ब्लॉकिंग ऑर्डर्स भेजे हैं, जिसमें केवल इंस्टाग्राम को करीब 1 लाख और फेसबुक को करीब 80 हजार ब्लॉकिंग ऑर्डर्स भेजे गए. इसके अलावा, यूट्यूब को करीब 15 हजार ब्लॉकिंग ऑर्डर सरकार द्वारा भेजे गए. सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि ब्लॉक करने के आदेशों का एक बड़ा हिस्सा, खासकर इंस्टाग्राम पर, विरोध-प्रदर्शनों के ज़ोर पकड़ने के दौरान जारी किया गया था.
रिपोर्ट के मुताबिक, मेटा ने अपने API (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) को सहयोग पोर्टल से जोड़ा है. जिसकी वजह से, सरकारी निर्देशों के तहत सिस्टम पर मार्क किए गए कंटेंट को कंपनी की तरफ से अलग से इंसानी समीक्षा के बिना ही उसके प्लेटफॉर्म से अपने-आप हटा दिया जाता है. इस ऑटोमेशन की वजह से मेटा के पास कंटेंट हटाने के इन निर्देशों का पालन करने से पहले उनकी समीक्षा करने या उन पर आपत्ति जताने की कोई गुंजाइश नहीं रहती.
भारत सरकार की नोडल एजेंसी प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) ने 20 अगस्त को इस मामले पर जानकारी शेयर करते हुए बताया कि 2025 में फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी मेटा के अनुरोध पर सहयोग पोर्टल का API इन्टीग्रेट किया गया था. ये राज्यों/केंद्रीय मंत्रालयों को आईटी मध्यस्थों को गैरकानूनी सामग्री सूचित करने में सक्षम बनाता है. पीआईबी ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि मार्च 2026 से जुलाई 2026 की अवधि के दौरान, लगभग 2.98 लाख यूआरएल टेकडाउन के लिए भेजे गए थे, जिनमें से 2.44 लाख यूआरएल राज्यों (82%) द्वारा भेजे गए थे, और इनमें से 51 हजार यूआरएल भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) द्वारा साइबर, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टॉक-निवेश घोटालों के संदर्भ में भेजे गए थे.
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा भ्रामक और अपारदर्शी है मेटा का ‘ऑटोमेटेड सिस्टम’. ब्लॉक किये गए सभी पोस्ट में ये देखा गया है कि मेटा एक ऑटोमेटेड सिस्टम के तहत पोस्ट को ब्लॉक करता है, लेकिन ये ऑटोमेटेड सिस्टम किस आधार पर काम करता है ये यूज़र को नहीं बताया जाता.
- क्या यह मात्र सहयोग पोर्टल के द्वारा भेजे गए अनुरोध को ऑटोमैटिक रूप से ब्लॉक करता है? या कुछ की-वर्ड्स, तस्वीर, एआई-लेबलिंग में गैर-अनुपालन आदि को आधार बनाकर काम करता है, इसमें पारदर्शिता की कमी साफ नजर आती है.
दिल्ली में हाल ही में हुए नीट-यूजी मेडिकल प्रवेश परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के विरोध में हुए छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई को दिखाने वाले पत्रकारों, मीडिया आउटलेट्स और छात्र कार्यकर्ताओं के रील्स भी प्रतिबंधित किए गए. इसके बाद CJP प्रदर्शन से संबंधित कॉन्टेन्ट बनाने वाले क्रीएटर्स के पोस्ट्स पर भी प्रतिबंध लगाए जाने लगे. ऑल्ट न्यूज़ ने इन दोनों ही विषयों पर डिटेल्ड रिपोर्ट पब्लिश की है.
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हाल ही में ऑल्ट न्यूज़ की एक स्टोरी में ‘बुरहान वानी’ का ज़िक्र होने पर बार-बार इसे इंस्टाग्राम हटा दे रहा था. यहां तक कि ऑल्ट न्यूज़ के एक फैक्ट चेक में ‘खालिस्तानी’ शब्द के इस्तेमाल पर पोस्ट को प्रतिबंधित कर दिया गया.






