2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण की मांग करने वाले संविधान संशोधन विधेयक को संसद में रोके जाने के एक दिन बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के माध्यम से एक भावनात्मक संबोधन में विपक्ष पर महिला सशक्तिकरण को अवरुद्ध करने का आरोप लगाया. हालांकि, संसदीय रिकॉर्ड और मुद्दे के विधायी इतिहास से पता चलता है कि प्रधानमंत्री ने फ़ैक्ट्स को ग़लत तरीके से पेश किया और देश को गुमराह किया.
17 अप्रैल को लोकसभा में विपक्ष ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के खिलाफ मतदान किया, जिसमें महिला आरक्षण के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण करने की मांग की गई थी. विधेयक के पक्ष में 298 वोट और विपक्ष में 213 वोट मिले, जो संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत (352 वोट) से कम थे, और परिणामस्वरूप ये विधेयक पारित नहीं हुआ.
अपने 12 सालों की सत्ता में ये पहली बार था कि नरेंद्र मोदी सरकार संसद में संवैधानिक संशोधन पारित कराने में विफल रही.
मतदान के बाद, केंद्रीय मंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने विपक्ष, विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर “महिला विरोधी” होने और महिला आरक्षण विधेयक के कार्यान्वयन में बाधा डालने का आरोप लगाया.
हालांकि, कांग्रेस ने इस कदम को महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन को आगे बढ़ाने का नरेंद्र मोदी और अमित शाह का “नापाक प्रयास” करार दिया.
मोदी ने क्या कहा?
18 अप्रैल को अपने पहले से रिकॉर्ड किए गए संबोधन में, मोदी ने विपक्षी दलों पर हमला बोलते हुए कहा कि उन्होंने “भारत की नारी शक्ति की उड़ान को रोक दिया है” और उनके कार्यों ने महिलाओं के सपनों को “चकनाचूर” कर दिया है. उन्होंने आगे उन पर राजनीतिक स्वार्थ के कारण महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करने का आरोप लगाया, उन्होंने आरोप लगाया कि “वंशवादी” पार्टियों को डर है कि अगर ज़्यादा महिलाएं विधानसभाओं में आती हैं तो सत्ता पर उनकी पकड़ खो जाएगी.
मुद्दे को इरादे के रूप में परिभाषित करते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि विपक्ष ने महिला कल्याण और सशक्तिकरण का विरोध करके “गंभीर पाप” किया है और संविधान निर्माताओं के दृष्टिकोण का अपमान किया है.
पूरे 30 मिनट के भाषण में, मोदी ने 17 अप्रैल को संसद में हुए घटनाक्रम को महिला कल्याण और सशक्तिकरण के लिए एक झटके के रूप में पेश किया, और इसके परिणाम के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया. प्रधानमंत्री ने कहा, ”विपक्ष ने महिला आरक्षण का विरोध करके पाप किया है और उन्हें इसकी सजा जरूर मिलेगी. विपक्षी दलों ने विधेयक को हरा कर हमारे संविधान का अपमान किया है.” उन्होंने कहा, ”कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने पूरे देश के सामने इस ईमानदार प्रयास की भ्रूण हत्या की है. उन्होंने भ्रूण हत्या की है.”
मोदी ने आगे कहा, ‘मुझे ये देखकर बहुत दुख हुआ कि जब महिला कल्याण का प्रस्ताव विफल हुआ, तो कांग्रेस, DMK, TMC, SP जैसी वंशवादी पार्टियां खुशी में तालियां बजाने लगीं…’ जब उन्होंने वोट को महिला कल्याण की अस्वीकृति के रूप में पेश किया तो उनकी आवाज स्पष्ट अविश्वास में कांप रही थी.
पूरा भाषण यहां सुना जा सकता है:
My address to the nation. https://t.co/2Vyx15A4rx
— Narendra Modi (@narendramodi) April 18, 2026
रिकॉर्ड क्या दिखाता है
ये दावा कि विपक्ष ने महिला आरक्षण का विरोध किया, केवल फ़ैक्ट्स की ग़लत व्याख्या है. 2023 में संसद ने लगभग सर्वसम्मत समर्थन के साथ संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण प्रदान करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित किया.
कुल 454 लोकसभा सदस्यों ने संशोधन के पक्ष में मतदान किया, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सदस्य शामिल थे. केवल दो सांसदों ने मुस्लिम और OBC महिलाओं के लिए उप-कोटा की अनुपस्थिति का हवाला देते हुए इसका विरोध किया. राज्यसभा में ये बिल 214-0 वोट से पारित हो गया.
उस वक्त, मोदी ने स्वयं विपक्ष के समर्थन का स्वागत किया था. और हाल में वो दावा कर रहे हैं कि ये दल पहले के पदों के साथ असंगत महिला आरक्षण के खिलाफ हैं.
Delighted at the passage of The Constitution (One Hundred and Twenty-Eighth Amendment) Bill, 2023 in the Lok Sabha with such phenomenal support. I thank MPs across Party lines who voted in support of this Bill.
The Nari Shakti Vandan Adhiniyam is a historic legislation which…
— Narendra Modi (@narendramodi) September 20, 2023
2023 का संशोधन आरक्षण को नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन प्रक्रिया के पूरा होने पर निर्भर बनाता है. जैसा कि संसद में अमित शाह द्वारा स्पष्ट किया गया था, इसने प्रभावी रूप से इसके कार्यान्वयन को 2029 के बाद तक के लिए टाल दिया.
तब राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने तर्क दिया था कि परिसीमन का इंतजार किए बिना आरक्षण तुरंत लागू किया जा सकता है. इसके जवाब में, सरकार ने यह रुख बनाए रखा कि यह निर्धारित करने के लिए परिसीमन अभ्यास आवश्यक था कि किन निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षित किया जाएगा और राजनीतिक पक्षपात के आरोपों से बचा जा सके.
दिलचस्प बात ये है कि सरकार द्वारा इस अधिनियम को पारित होने के ढाई साल बाद 16 अप्रैल, 2026 को अधिसूचित किया गया था.
विपक्ष के ख़िलाफ़ मोदी का आरोप भ्रामक क्यों था?
वर्तमान राजनीतिक संदर्भ में परिसीमन कोई तटस्थ प्रक्रियात्मक कदम नहीं है. संविधान (84वें संशोधन) के तहत, जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण को 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया गया है. एक बार ये रोक हट जाएगी, तो एक नए परिसीमन अभ्यास से राज्यों के बीच संसदीय प्रतिनिधित्व के संतुलन में बदलाव की उम्मीद है.
उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले राज्य—जिन्हें भाजपा का राजनीतिक आधार माना जाता है—उनके सीटों में वृद्धि होने की संभावना है, जबकि कई दक्षिण भारतीय राज्य जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को काफी हद तक नियंत्रित किया है, उन्होंने अपनी सापेक्ष हिस्सेदारी में संभावित गिरावट पर चिंता व्यक्त की है.
इसने परिसीमन को महिला प्रतिनिधित्व के प्रश्न से अलग, संघीय निहितार्थों वाला एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा बना दिया है.
17 अप्रैल को लोकसभा में पराजित हुआ विधेयक 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून नहीं था, बल्कि 2011 की जनगणना का इस्तेमाल करके लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण करके परिसीमन को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव था. इसे महिलाओं के लिए 33% कोटा के कार्यान्वयन में तेजी लाने के एक कदम के रूप में पेश किया गया था.
विपक्षी दलों ने तर्क दिया कि ये जुड़ाव गैर जरूरी था. उन्होंने बताया कि 2023 का कानून पहले से ही कहता है कि आरक्षण नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा, जो दोनों अभी तक पूरे नहीं हुए हैं. इंतजार करने के बजाय, उन्होंने तर्क दिया कि सरकार 543 सीटों की मौजूदा संख्या के भीतर आरक्षण को तुरंत लागू करने के लिए कानून में संशोधन कर सकती है.
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि सरकार ने पुरानी जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करने का प्रस्ताव देकर परिसीमन की समयसीमा में बदलाव करना तो चुना, लेकिन यदि उसका घोषित लक्ष्य महिला प्रतिनिधित्व में तेजी लाना था, तो परिसीमन की आवश्यकता को पूरी तरह से हटाने पर विचार क्यों नहीं किया.
विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा, “पहला सच तो यह है कि ये महिला बिल नहीं है. इसका महिला सशक्तिकरण से कोई लेना-देना नहीं है. ये भारत के चुनावी नक्शे को बदलने की कोशिश है.” एक इंटरव्यू में तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने इस विधेयक को “साड़ी में लिपटा परिसीमन” के रूप में वर्णित किया.
विपक्ष के रुख को महिला आरक्षण के ही खिलाफ पेश करके, प्रधानमंत्री की टिप्पणियों ने एक जटिल संवैधानिक और राजनीतिक असहमति को एक सरल ‘बाइनरी नैरेटिव’ (दोहरे विमर्श) में समेट दिया.
विधायी रिकॉर्ड महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए पार्टियों के बीच लगातार समर्थन दिखाता है. असहमति इस बात पर रही है कि क्या उस सुधार में देरी की जानी चाहिए और उसे एक विवादास्पद परिसीमन प्रक्रिया पर निर्भर बनाया जाना चाहिए. इस संदर्भ में, मोदी द्वारा इस वोट को महिलाओं के कल्याण के साथ विश्वासघात के रूप में चित्रित करने का आग्रह भ्रामक था और ये तथ्यों से परे है, क्योंकि इसमें परिसीमन से जुड़ी व्यवस्था के विरोध को महिला आरक्षण के विरोध के साथ मिला दिया गया था.
मीडिया ने फ़ैक्ट्स तोड़-मरोड़ कर पेश किए, सरकार की बात दोहराई
मीडिया के एक महत्वपूर्ण वर्ग ने विधायी बारीकियों को प्रतिबिंबित किए बिना सरकार की रूपरेखा को बढ़ावा दिया. कई आउटलेट्स ने प्रमुखता से बैनर शीर्षकों में दावा किया कि “महिला आरक्षण विधेयक” लोकसभा में पराजित हो गया – एक ऐसा दावा जो तथ्यात्मक रूप से गलत है.
कवरेज के पैमाने और स्थान को देखते हुए ये ग़लत वर्णन विशेष रूप से महत्वपूर्ण था. कई अख़बारों ने दावे को मजबूत करते हुए 64-बिंदु फ़ॉन्ट में बड़े, पहले पन्ने की सुर्खियां छापीं, जिसमें 17 अप्रैल की संसदीय कार्यवाही के फ़ैक्ट्स को पूरी तरह से ग़लत तरीके से पेश किया गया.
प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक न्यूज़ पेपर्स में, द हिंदू एक उल्लेखनीय अपवाद के रूप में सामने आया, जिसने सटीक रूप से रिपोर्ट किया कि पराजित प्रस्ताव परिसीमन से संबंधित था, न कि महिला आरक्षण कानून से. द हिंदू के पेज-वन का शीर्षक था: संयुक्त विपक्ष ने परिसीमन विधेयक को हराया.

उन समाचार पत्रों में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ भी शामिल था जिनकी पहले पन्ने की हेडलाइन पूरी तरह से भ्रामक थी. इसकी सुर्खी थी: “विपक्ष अड़ा, महिला बिल गिरा” (Opposition Stands, women’s bill falls). ये भ्रामक इसीलिए थी क्योंकि इसने दो अलग-अलग विधायी घटनाक्रमों को आपस में मिला दिया था. जैसा कि पहले बताया गया है, 17 अप्रैल का मतदान महिला आरक्षण कानून पर नहीं था—जो 2023 में ही पारित हो चुका था—बल्कि परिसीमन से जुड़े एक अलग संविधान संशोधन पर था. ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की सुर्खी ने प्रभावी रूप से यह संदेश दिया कि संसद ने महिला आरक्षण को ही खारिज कर दिया है, जो कि पूरी तरह से ग़लत है.
सोशल मीडिया पर कई लोगों ने अख़बार की आलोचना की और बताया कि शीर्षक सही नहीं था.

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्टिंग ने भी इस अंतर को धुंधला कर दिया. जबकि इसकी मुख्य हेडलाइन में सरकार की विधायी हार का ज़िक्र था, वहीं सब-हेड में इस घटनाक्रम को “महिला कोटे पर बिल” के आवश्यक बहुमत से कम रह जाने के रूप में वर्णित किया गया—यह एक ऐसा दावा है जो बिल्कुल भी तथ्यात्मक नहीं है.

‘डेक्कन क्रॉनिकल’ की हेडलाइन— “लोकसभा में महिला कोटा बिल पराजित”— न केवल गलत थी, बल्कि मौलिक रूप से विधायी रिकॉर्ड के विपरीत थी. जिस महिला आरक्षण कानून का इसमें संदर्भ दिया गया था, वह 2023 में ही पारित हो चुका था और तब से उसे अधिसूचित भी किया जा चुका है. यह सुर्खी एक ऐसे कानून के पलटने का संकेत देती है जो पहले से ही लागू है, और बुनियादी पत्रकारिता की सटीकता पर गंभीर सवाल उठाती है.

डेक्कन हेरल्ड के साथ भी ऐसा ही है. पहले पन्ने पर, बड़े फ़ॉन्ट में, मुख्य ख़बर के टाइटल में कहा गया है, महिलाओं के आरक्षण पर विधेयक लोकसभा में हार गया, ये एक ऐसा दावा है जो बिल्कुल सच नहीं है.

दिलचस्प बात ये है कि द हिंदू ने बारीकियों को सही तरह से लिखा, लेकिन उसी समूह से द हिंदू बिजनेस लाइन ने एक टाइटल चलाया जो स्वाभाविक रूप से भ्रामक है. स्टोरी का प्रारंभिक वाक्य – “संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग करने वाला संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, शुक्रवार शाम को लोकसभा में हार गया…” तथ्यात्मक रूप से ग़लत था.

भ्रामक या तथ्यात्मक रूप से ग़लत शीर्षक वाले अन्य अख़बारों में हिंदी दैनिक जनसत्ता, और अंग्रेजी दैनिक द पायनियर, द एशियन एज और द ट्रिब्यून शामिल हैं.
न्यूज़ चैनल्स और डिजिटल न्यूज़ आउटलेट्स ने भी 17 अप्रैल की कार्यवाही को संसद में महिला कोटा विधेयक या महिला आरक्षण विधेयक की हार के रूप में वर्णित करते हुए इसी तरह की ग़लत सुर्खियां दीं. इनमें टाइम्स नाउ, NDTV, रिपब्लिक, ANI, न्यूज़ X, न्यूज़18, लेटेस्टली, द प्रिंट, क्लेरियन इंडिया और न्यूज़ 9 शामिल हैं.
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