पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर 6 अक्टूबर को वोटिंग होनी है. रेजीनगर वाले मुर्शिदाबाद ज़िले के कई स्थानीय पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि भारत में उनके न्यूज़ फ़ेसबुक पेजों के एक्सेस को रोक दिया गया है. ये पेज मुख्य रूप से विपक्षी पार्टियों और उस सीमित प्रचार-प्रसार की ख़बरें दिखाते थे.
पत्रकारों को मिले नोटिस में लिखा है: “भारत के ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स’ के तहत कानूनी ज़रूरतों के कारण हमें बार-बार आपके पोस्ट किए गए कंटेंट तक एक्सेस को रोकना पड़ा… इसी वजह से हमने भारत में आपके अकाउंट एक्सेस को 7 दिनों के लिए अस्थायी रूप से रोक दिया है.”
दो सीटें: चुनावी मुक़ाबले के लिहाज़ से बहुत कम
इन सीटों पर उपचुनाव इसलिए हो रहे हैं क्योंकि चुने गए प्रतिनिधि इस साल की शुरुआत में हुए राज्य चुनावों में दूसरी सीटों से भी जीते थे. नंदीग्राम विधानसभा सीट पर लगभग 2.5 लाख लोग हैं, जिनमें से मुस्लिम वोटर लगभग 27% हैं. ये सुवेंदु अधिकारी का अपना चुनावी क्षेत्र है. 2021 में सुवेंदु अधिकारी ने यहां पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 1,956 वोटों से हराया था. 2026 के विधानसभा चुनावों में वे नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से जीते थे. उन्होंने भवानीपुर सीट अपने पास रखने का फ़ैसला किया, जहां उन्होंने ममता बनर्जी को हराया था, जिसके कारण नंदीग्राम में उपचुनाव की ज़रूरत पड़ी.
नंदीग्राम में चुनावी मुकाबला तब एक अप्रत्याशित मोड़ पर आ गया, जब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने 18 सितंबर को अपना नामांकन वापस ले लिया. इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन करने का फैसला किया. हालांकि, ममता बनर्जी द्वारा संचिता प्रधान को समर्थन देने की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद, उन्हें 2007 की नंदीग्राम हिंसा से जुड़े पुराने मामलों के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया गया. कांग्रेस और टीएमसी ने गिरफ़्तारी के समय पर सवाल उठाए, जबकि बीजेपी का कहना था कि पुलिस की कार्रवाई लंबित मामलों पर आधारित थी और इसमें कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं था. बाद में उन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट से अंतरिम ज़मानत मिल गई.
रेजीनगर में चुनावी परिदृश्य अलग है. यहां मुस्लिम मतदाता कुल मतदाताओं के लगभग 69% हैं. ये निर्वाचन क्षेत्र 2026 के विधानसभा चुनाव में काफी चर्चा में रही सीट थी. आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के नेता हुमायूं कबीर ने नौदा और रेजीनगर दोनों सीटों पर जीत हासिल की और बाद में रेजीनगर सीट छोड़ दी, जहां उनकी जीत का अंतर 58,000 से ज़्यादा वोटों का था.

रेजीनगर उपचुनाव में मुख्य विपक्षी उम्मीदवारों की ओर से बहुत कम प्रचार हुआ है; उनका आरोप है कि पुलिस उन्हें डरा-धमका रही है और सत्ताधारी पार्टी दखल दे रही है. ममता बनर्जी के समर्थन वाले तृणमूल कांग्रेस गुट ने तीन बार विधायक रहे रबीउल आलम चौधरी को मैदान में उतारा है; उन्होंने चुनाव से हटने का मन बना लिया था, लेकिन ममता बनर्जी के मनाने पर वे बने रहे. कांग्रेस ने अब्दुल्लाहिल काफ़ी को उतारा है, जबकि डेमोक्रेटिक TMC गुट ने सफ़ीउज़्ज़मान एस.के. को और CPI(M) ने सईद असद अली को उम्मीदवार बनाया है.
AJUP नेता हुमायूं कबीर का आरोप है कि पुलिस ने उनके 15 कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में गिरफ़्तार किया है, जबकि बाकी लोग इलाका छोड़कर भाग गए हैं. एक वायरल ऑडियो क्लिप को लेकर उनसे भी दो बार पूछताछ की गई. उनका कहना है कि इसी वजह से उन्होंने बड़े पैमाने पर प्रचार रोक दिया और मुख्य रूप से फ़ेसबुक के ज़रिए वोटरों तक एक्सेस कर रहे थे, जबकि उनके बेटे कुछ इलाकों का दौरा कर रहे थे. AJUP नेतृत्व के करीबी निर्दलीय उम्मीदवार सैफ़ुल इस्लाम को 19 सितंबर को गिरफ़्तार किया गया था.
गिरफ़्तारियों, कथित डराने-धमकाने और विपक्ष की ओर से प्रचार की कमी को देखते हुए, दोनों सीटों पर होने वाले चुनाव में कड़ा मुकाबला होने की संभावना कम ही लग रही है.
लोकल न्यूज़ दिखाने वाले फ़ेसबुक पेज पर रोक
दोनों ही चुनाव क्षेत्रों में विपक्ष का कैंपेन पहले से ही धीमा है, और रेजीनगर में सेंसरशिप के आरोपों के बीच चुनाव हो रहा है. जो लोकल पत्रकार सरकार या पुलिस-प्रशासन की आलोचना करने वाले मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते थे या विपक्ष के कैंपेन को कवर करते थे, उनके फ़ेसबुक पेज अचानक भारत में रोक दिए गए. ये पेज उनके काम को पब्लिश करने का मुख्य ज़रिया थे.
ऑल्ट न्यूज़ ने ऐसे कम से कम 12 पेज की पहचान की है: आसिफ़ रोनी का ‘मुर्शिदाबाद ग्लोबल टाइम्स‘; जब्बार शेख़ का ‘हरिहरपारा टाइम्स बांग्ला’; स्वपन कारीगर का ‘मुर्शिदाबाद टुडे‘; रिंकू का ‘मुर्शिदाबाद शिरोनम‘; बख्तर एसके का ‘मुर्शिदाबाद न्यूज़ टाइम‘; राजीव शेख़ का ‘रिपोर्टर प्रेस‘; मुहाइमेनुल हक़ का ‘एम न्यूज़ टीवी‘; अमीनुल इस्लाम का ‘बरताबाही न्यूज़‘; सैदुर रहमान का ‘हाई न्यूज़‘; ‘BNS न्यूज़ बांग्ला’; अब्दुस समद का ‘AN बांग्ला न्यूज़’; और अब्दुल हलीम का ‘न्यूज़ फ्रंट डिजिटल.’
स्वपन कारीगर का ‘मुर्शिदाबाद टुडे’ सबसे ज़्यादा प्रभावित पेजों में से एक है जिसके लगभग 7.4 लाख फ़ॉलोअर्स थे. 26 साल से ज़्यादा का अनुभव रखने वाले पत्रकार स्वपन कारीगर का अकाउंट अब प्रतिबंधित है, जिससे चुनाव से पहले राजनीति पर रिपोर्ट करने की उनकी क्षमता सीमित हो गई.
स्वपन कारीगर ने बताया कि ये पेज उन लोगों की शिकायतों को रिपोर्ट कर रहा था जो AJUP और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियों का समर्थन करते हैं और जिन्हें पुलिस डरा-धमका रही है. उन्होंने ऑल्ट न्यूज़ को बताया, “बहुत से आम लोग, जो AJUP और कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियों से जुड़े हैं, जैसे कि वे लोग जो राजनीतिक रैलियों में शामिल हुए हैं, उन्होंने आरोप लगाया है कि पुलिस अधिकारी उनके परिवार के सदस्यों, खासकर महिलाओं और बच्चों को डरा-धमका रहे हैं और उन्हें परेशान कर रहे हैं. पुलिस वाले 12-14 गाड़ियों के साथ उनके घरों तक भी गए हैं. एक बच्ची के बाल खींचे गए और एक महिला के साथ मारपीट की गई. उन्होंने चुनाव से पहले पूरी तरह से डर और दहशत का माहौल बना दिया है. हम सच को सामने लाते हुए इन घटनाओं की रिपोर्टिंग कर रहे थे. शायद इसीलिए हमारे अकाउंट्स को रोक दिया गया है.”
हमने आसिफ़ रोनी से बात की, जिनके फ़ेसबुक पेज ‘मुर्शिदाबाद ग्लोबल टाइम्स’ के लगभग 4.47 लाख फ़ॉलोअर्स थे. इसे 1 अक्टूबर की रात को हटा दिया गया था — उसी दिन जब मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने रेजीनगर का दौरा किया था. आसिफ़ रोनी ने बताया कि पिछले 28 दिनों में इस पेज पर 39 मिलियन व्यूज़ आए थे. कानून लागू करने वाले अधिकारियों ने उन्हें बताया कि पेज को सात दिनों के लिए रोक दिया जाएगा.
उन्होंने कहा, “ऐसा एक बार अप्रैल के आस-पास, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुआ था. मैं ‘AN बांग्ला’ नाम का एक और पेज चलाता था. वो अभी तक दोबारा चालू नहीं हुआ है. उन्होंने तब कई पेज बंद कर दिए थे, और वे भी अभी तक बहाल नहीं हुए हैं. इसलिए मुझे ‘मुर्शिदाबाद GT’ पर आना पड़ा, जो पहले एक बैकअप पेज हुआ करता था.”
आसिफ़ रोनी ने बताया कि पिछली बार लगी रोक के बाद, पुलिस के एक सीनियर अधिकारी ने उनसे कहा था कि पेज को “चुनाव के बाद” बहाल कर दिया जाएगा.
‘हरिहरपारा टाइम्स बांग्ला’ चलाने वाले जब्बार शेख ने हमें बताया कि अधीर रंजन चौधरी पर एक रिपोर्ट छापने के बाद, 30 सितंबर को उनका फ़ेसबुक पेज हटा दिया गया, जिसके करीब 4.39 लाख फॉलोअर्स थे. जब्बार ने कहा, “तीस से ज़्यादा पेजों पर रोक लगाई गई है. इसकी मुख्य वजह ये है कि हमने विपक्षी पार्टियों, खासकर हुमायूं के कैंपेन से जुड़ी ख़बरें दिखाई थीं. इसलिए हो सकता है कि इसके पीछे कोई राजनीतिक मकसद हो. ये भारत सरकार ने किया है. ये पेज भारत में नहीं दिखते, हालांकि दूसरे देशों में दिखेंगे.”
जब्बार के लिए ये पहली बार था जब उन्हें ऐसी रोक का सामना करना पड़ा. उन्होंने पुलिस से भी संपर्क किया, लेकिन अधिकारियों ने उन्हें बताया कि उन्होंने रोक लगाने का आदेश नहीं दिया था. उन्होंने कहा, “उन्होंने हमें बताया कि मेटा ने खुद गाइडलाइन का उल्लंघन पाया और उसी आधार पर पेजों पर रोक लगाई, और इसमें साइबर विभाग का कोई हाथ नहीं था.”
कई लोकल पत्रकारों के लिए, फ़ेसबुक पर न्यूज़ कंटेंट पब्लिश करना ही उनकी कमाई का एकमात्र ज़रिया था.
स्वपन कारीगर को ‘मुर्शिदाबाद टुडे’ बनाने में छह साल लगे. उन्होंने कहा, “ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. ये मेरी कमाई का एकमात्र ज़रिया था. मुझे पत्रकारिता के अलावा कुछ नहीं आता. मेरा एक और छोटा पेज है जिसके लगभग 14 हज़ार फ़ॉलोअर्स हैं, और मैं अब वहां से नॉन-पॉलिटिकल कंटेंट पोस्ट कर रहा हूं. मैं अपना पेशा नहीं छोड़ सकता, लेकिन फ़िलहाल पॉलिटिकल कंटेंट कम कर रहा हूं.” रिस्ट्रिक्ट होने से पहले उस पेज पर लगभग 24 मिलियन व्यूज़ थे.
रोनी ने बताया कि पूरे ज़िले में ऐसे लगभग 25 से 30 पेज रिस्ट्रिक्ट किए गए हैं. जब हमने पूछा कि इन पेजों को क्यों टारगेट किया गया, तो उन्होंने कहा कि उन्हें बताया गया कि उन्होंने ऐसी न्यूज़ पब्लिश की थी जिसे सरकार-विरोधी माना जा सकता है. उन्होंने कहा, “ज़्यादातर उन्होंने उन पेजों को बंद किया है जो विपक्षी राजनीतिक पार्टियों की न्यूज़ को थोड़ी ज़्यादा कवरेज देते हैं. मेरे मामले में उन्होंने तब रिस्ट्रिक्शन लगाया जब मैंने अधीर चौधरी पर अपनी रिपोर्ट पोस्ट की.”
रोनी अब एक दूसरे पेज, MGT से पब्लिश करते हैं, जिसके लगभग 15,000 फ़ॉलोअर्स हैं। इसी तरह जब्बार भी एक दूसरे पेज से कंटेंट पोस्ट कर रहे हैं, जिसके मुश्किल से 2,000 फ़ॉलोअर्स हैं।
रोनी ने कहा, “हमारे सभी पेज मोनेटाइज़्ड थे. उनसे अच्छी कमाई हो रही थी और हममें से कई लोग अपना गुज़ारा कर रहे थे. पढ़े-लिखे, बेरोज़गार युवाओं ने दूसरी चीज़ों के साथ-साथ ये ट्रेंड भी शुरू किया था.”
मुर्शिदाबाद के SP का कहना है कि वे पत्रकार नहीं हैं
हमने मुर्शिदाबाद के पुलिस सुपरिटेंडेंट सचिन मक्कर से बात की, जिन्होंने सबसे पहले हमसे कहा कि “नोटिस को ध्यान से पढ़ें.”
उन्होंने पूछा, “क्या नोटिस में पुलिस या साइबर क्राइम विंग का ज़िक्र है? आपको इस बारे में मेटा से संपर्क करना चाहिए. क्या उसमें लिखा है कि पुलिस ने पेज पर रोक लगाई है?” जब हमने और सवाल किए, तो उन्होंने कहा, “मेरे पास इस मामले में कहने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है. और वे पत्रकार नहीं हैं; वे मान्यता प्राप्त पत्रकार नहीं हैं. जो भी कार्रवाई हुई है, वो हमने नहीं की है. बाकी चीज़ों के लिए आप मेटा से बात कर सकते हैं…”
ध्यान देने वाली बात ये है कि एडमिनिस्ट्रेटर्स को मिले नोटिस में कहा गया है कि कानूनी ज़रूरतों के तहत पेज रोके गए थे. इससे पता चलता है कि ये पाबंदियां इन पेजों पर मौजूद कंटेंट के बारे में किसी कानूनी अनुरोध या शिकायत के कारण लगाई गई थीं, न कि सिर्फ़ मेटा की अपनी कंटेंट-मॉडरेशन प्रक्रिया के नतीजे के तौर पर.
हमने मेटा को लिखकर उन अनुरोधों और पेज पर रोक लगाने की वजहों के बारे में जानकारी मांगी है. अगर हमें कोई जवाब मिलता है, तो इस आर्टिकल को अपडेट किया जाएगा.














