दारुल उलूम देवबन्द या मीडिया: नुसरत जहां के खिलाफ फतवा किसने जारी किया ?

“सांसद नुसरत जहां के खिलाफ गैर मुस्लिम से शादी करने पर, सिंदूर लगाने पर दारुल उलूम द्वारा फतवा जारी किया गया -(अनुवाद)”, इस खबर ने सप्ताह के अंतिम दिनों में प्रिंट और टेलेविज़न मीडिया के माध्यम से लोगों को व्यस्त रखा। यह खबर तृणमूल कांग्रेस से हाल ही में सांसद बनी नुसरत जहान के खिलाफ एक कथित फतवे के बारे में है, जिन्होंने व्यवसायी निखिल जैन से शादी करने के बाद संसद में सिंदूर लगाकर शपथ ली थी।

इस खबर के बाद, राजनेता और सोशल मीडिया उपयोगकर्ता द्वारा नुसरत जहां के समर्थन में प्रतिक्रिया दी जाने लगी और दारुल उलूम की निंदा भी की गई। हर बड़े मीडिया संगठन ने इस खबर को रिपोर्ट किया गया और यह टीवी पर भी चर्चा का विषय बन गया। इंडिया टुडे ने इस्लामिक स्कूल का उल्लेख करते हुए इसे,“फतवा से खुश दारुल उलूम” बताया, जहां इंडियन एक्सप्रेस ने इसे “फतवाप्रेमी दारुल उलूम” कहा। हालांकि, किसी भी मीडिया संगठन ने दारुल उलूम से इस फतवे के बारे में जांच नहीं की कि क्या उन्होंने वास्तव में इस तरह का कोई फतवा जारी किया था।

यह फतवा कहां है?

दारुल उलूम, एक प्रसिद्ध इस्लामी धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र है, जो उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद में मौजूद है। इस संस्था की एक ऑनलाइन सेवा भी है जहां कोई भी प्रश्न पूछ सकता है और मुफ़्ती से उसके प्रत्युत्तर में फ़तवा या उनकी राय प्राप्त कर सकता है। दारुल उलूम द्वारा जारी किये गए फतवों के बारे में दो महत्वपूर्ण मुद्दे है:

1) मीडिया द्वारा बनाई गई धारणा के विपरीत यह संस्था खुद फतवा जारी नहीं करती है। किसी व्यक्ति द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कोई फतवा या राय दी जाती है।

2) फतवा लिखित में मुफ्ती या किसी धार्मिक विद्वान द्वारा ही दिया जाता है।

इसका पहले भी कई बार गलत उपयोग किया गया है जब पत्रकारों द्वारा संस्था को एक सनसनीखेज खबर बनाने के प्रयास में एक सवाल पूछा जाता है। इस चाल को पहले भी ऑल्ट न्यूज़ द्वारा उजागर किया जा चूका है।

इससे यह स्पष्ट है कि नुसरत जहां के खिलाफ कोई फतवा जारी होता तो किसी के द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में या राय के तौर पर दिया जाता और यह लिखित स्वरुप में भी मौजूद होता। हालांकि, किसी भी मीडिया लेख में फतवे की किसी भी कॉपी को शामिल नहीं किया गया है।

तो नुसरत जहां के खिलाफ फतवा कहां है?

फतवा है ही नहीं

ऑल्ट न्यूज़ ने पाया कि यह विवाद फतवा की वजह से नहीं बल्कि देवबंद के मौलवी असद कासिम के बयान की वजह से शुरू हुआ था।

1. 28 जून की सुबह को, ABP न्यूज़ ने मौलवी के हवाले से कहा कि, यह दावा उलेमा द्वारा किया गया था। उन्होंने कथित तौर पर कहा,“मैंने मीडिया के माध्यम से जाना कि नुसरत जहां, जो हाल ही में बंगाल से सांसद बनी है, वे संसद में सिंदूर लगाकर और मंगलसूत्र पहन कर आयी थी। तो तहकीकात से मालूम हुआ कि उन्होंने जैन धर्म में शादी की है। इस्लाम का नुक्ता नज़र और इस्लाम यह कहता है कि एक मुसलमान सिर्फ मुसलमान से शादी कर सकता है, किसी गैर से नहीं और दूसरी बात बता दूं आपको कि नुसरत जहां जो है वो एक एक्टर है, एक फ़िल्मी जो है उसमे वो काम करती है और ये जो एक्टर होते है में यह समझता हूं कि दीन और धर्म इनके नज़दीक कोई हैसियत नहीं रखता। तो जो शरीयत का हुक्म था वो मैंने मीडिया के माध्यम से आपतक पहुंचाया है”।

2. मौलवी की राय के तुरंत बाद ही, मीडिया इस पर एक बयान लेने के लिए भाजपा नेता साध्वी प्राची के पास पहुंचा। इसके बाद इस राय को एक ‘फतवे’ में बदल कर प्रस्तुत किया गया।

ऑल्ट न्यूज़ ने पाया कि फ़तवे पर सबसे पहला लेख News18 हिंदी द्वारा 28 जून को शाम 4 बजे प्रकाशित किया गया था। इस मीडिया संगठन के लेख में भाजपा नेता साध्वी प्राची द्वारा देवबंद के मौलवी के फतवे के खिलाफ दिए गए एक बयान को प्रकाशित किया गया। हालांकि, लेख में मौलवी के नाम का उल्लेख नहीं किया गया था।

इस खबर ने मुख्यधारा के मीडिया संगठनों में काफी तेज़ी से अपनी जगह बना ली और टाइम्स नाउ ने इस मुद्दे पर टीवी में चर्चा के प्रसारण के लिए मौलवी असद कासिम से संपर्क किया और ट्विटर पर हैशटैग #NusratVsClerics भी चलाया। टाइम्स नाउ ने कासिम को मुफ़्ती के रूप में पेश किया, जबकि ABP न्यूज़ ने कासिम को उलेमा बताया था।

नीचे दी गई वीडियो क्लिप में, असद कासिम को ABP न्यूज़ द्वारा दिए गए बयान के जैसा ही बयान देते हुए सुना जा सकता है,“तो तहकीकात से मालूम हुआ कि उन्होंने जैन धर्म में शादी की है। इस्लाम का नुक्ता नज़र और इस्लाम यह कहता है कि एक मुसलमान सिर्फ मुसलमान से शादी कर सकता है, किसी गैर से नहीं और दूसरी बात बता दूं आपको कि नुसरत जहां जो है वो एक एक्टर है, एक फ़िल्मी जो है उसमे वो काम करती है और ये जो एक्टर होते है में यह समझात हूँ  कि दीन और धर्म इनके नज़दीक कोई हैसियत नहीं रखता। जो उनको अच्छा लगता है वो करते है। इसी का अमल उन्होंने पार्लियामेंट में पेश किया, सिंदूर लगाकर पहुंची, मंगलसूत्र लगाकर पहुंची। तो इस पर तफ्शीला करना ही बेकार है कि उनकी अपनी ज़िन्दगी में हम कोई दखलंदाज़ी नहीं कर सकते। तो जो शरीयत का हुक्म था वो मैंने मीडिया के माध्यम से आपतक पहुंचाया है”

आकस्मित रूप से, असद कासिम के बयान में कहीं भी फ़तवा का उल्लेख नहीं है। देवबंद के मौलवी शरिया कानून पर अपनी राय दे रहे थे, फिर भी टाइम्स नाउ ने प्रसारण में टेलीविजन स्क्रीन पर-F-A-T-W-A ’शब्द को फ्लैश किया था।

3. बाद में मीडिया संगठनों द्वारा लेखों में ‘दारुल उलूम’ के बारे में लिखा गया।

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने असद कासिम के बयान का हवाला देते हुए 29 जून को एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें दावा किया गया था कि दारुल उलूम देवबंद द्वारा नुसरत जहां की गैर इस्लामी व्यक्ति से शादी करने पर उनके विरोध में एक फतवा जारी किया गया था। काफी अजीब है कि द न्यू इंडियन एक्सप्रेस  ने यह नहीं बताया कि कासिम दारुल उलूम का सदस्य है की नहीं, फिर भी एक लेख में बताया गया कि इस संस्था द्वारा एक फतवा जारी किया गया था।

मीडिया द्वारा की गई गड़बड़

ऑल्ट न्यूज़ ने मुफ़्ती असद कासमी से संपर्क किया जिन्होंने यह स्पष्ट बताया कि वे एक पूर्व छात्र होने के अलावा, किसी भी तरह से दारुल उलूम देवबंद से जुड़े नहीं हैं। कासिम हाल में देवबंद में मुफ़्ती है। उन्होंने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि दो अलग-अलग मीडिया संगठन के दो पत्रकारों ने नुसरत जहां के सिंदूर लगाने और मंगलसूत्र पहनने के बारे में शरिया के नज़रिए को जानने के लिए उनसे संपर्क किया था। उन्होंने सिर्फ अपना स्पष्टीकरण दिया था ना कि फतवा जारी किया था।

उन्होंने ऑल्ट न्यूज़ से कहा,“एक फतवे और एक बयान के बीच फर्क होता है। एक फतवा आदेश के समान है जबकि बयान केवल एक राय है। जब कोई व्यक्ति किसी मुद्दे पर इस्लाम से जानना चाहता है, तो वे अपने प्रश्न भेजते हैं, जब कुरान के मुताबिक विद्वान उसका समाधान ढूंढ़ते है और एक फतवा जारी किया जाता है। संस्था के अधिकृत मुफ्दी द्वारा जांच होने के बाद ही दारुल उलूम संस्था द्वारा लिखित स्वरुप में फतवा जारी किया जाता है। लेकिन हाल ही में एक ग़लतफहमी प्रचलित है। मीडिया द्वारा किसी भी बयान को फतवा करार दे दिया जाता है”।

उन्होंने आगे बताते हुए कहा कि,“कुछ मीडिया कर्मियों ने मुझसे नुसरत जहां  के बारे में संपर्क किया था। मैंने उनसे कहा कि इस्लाम किसी के निजी जीवन में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देता है। मैं केवल यह बता सकता हूं कि ग्रंथ क्या कहते हैं – एक मुसलमान केवल एक मुसलमान से ही शादी कर सकता है और एक गैर-मुस्लिम केवल एक गैर-मुस्लिम से ही शादी कर सकता है। उनके [नुसरत जहां के] खिलाफ कोई फतवा जारी नहीं किया गया है, जिससे उनकी इस्लामिक पहचान छीन ली जाये”। मुफ़्ती कासमी ने बताया कि जब भी वे फतवा जारी करने के लिए अधिकृत होते है, वे किसी अन्य मुफ़्ती से सलाह लिए बिना अपनी मर्ज़ी से कोई फतवा जारी नहीं करते है।

यह ध्यान दिया जा सकता है कि ऑल्ट न्यूज़ दारुल उलूम की वेबसाइट पर इस फतवे के बारे में पता लगाने में असमर्थ रहा है। हमने दारुल उलूम के एक वरिष्ठ अधिकारी अशरफ उस्मानी से बात की, जिन्होंने इस बात की पुष्टि की, कि नुसरत जहां के खिलाफ संगठन द्वारा कोई फतवा जारी नहीं किया गया था –“भारतीय मीडिया लापरवाह बनता जा रहा है। वे किसी भी मौलवी के बयान को लेते हैं और उसे दारुल उलूम द्वारा जारी फतवे के रूप में दिखाते हैं। यह बहुत बड़ी लापरवाही की बात है”

उस्मानी ने बताया कि,“दारुल उलूम ने नुसरत जहां के खिलाफ कोई फतवा जारी नहीं किया है”, लेकिन अभी तक इस गैर मौजूद फतवा का उल्लेख कई मीडिया लेखों जैसे कि, आज तक, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी, द हिंदू, NDTV, द इंडियन एक्सप्रेस, ANI, डेक्कन क्रोनिकल, स्क्रॉल, द इकनोमिक टाइम्स, अमर उजाला, ABP न्यूज़ और प्रभात खबर  पर मौजूद हैं।

दक्षिण पंथी वेबसाइट ओपइंडिया और स्वराज्य ने भी इसी गलत खबर को प्रकाशित किया है।

मीडिया ने ऐसे ही किसी मुफ़्ती से संपर्क कर उनसे सवाल करके उनके स्पष्टीकरण को दारुल उलूम द्वारा फतवा जारी करने के रूप में दिखाया। दारुल उलूम की नाराज़गी दिखाते हुए मीडिया संगठनों ने दिन भर इस मुद्दे पर बहस की। कई ऐसे भी मीडिया संगठन, जो खुद तथ्य जांच का काम करते है, उन्होंने भी इसकी जाँच नहीं की कि क्या वाकई में कोई फतवा जारी किया गया है या नहीं।

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