2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद हुई सबसे अप्रत्याशित राजनीतिक घटनाओं में से एक है, ‘नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया’ (NCPI) – जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते थे – अचानक राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गई है.

तृणमूल कांग्रेस (TMC) की करारी हार के बाद, पार्टी एक अभूतपूर्व संगठनात्मक संकट में घिर गई. जहां पार्टी के कई विधायकों ने नेतृत्व के खिलाफ जाकर उलुबेरिया पूर्व के विधायक रिताब्रता बंद्योपाध्याय का समर्थन किया, वहीं संसद में भी एक नाटकीय बदलाव देखने को मिला. पश्चिम बंगाल से चुने गए TMC के 29 में से 20 सांसदों ने पार्टी छोड़कर NCPI का दामन थाम लिया. इससे अनजान और बिना किसी खास पहचान वाली पार्टी रातों-रात संसदीय प्रतिनिधित्व के मामले में राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई.

इतनी तेज़ी से आगे बढ़ने के बावजूद, NCPI, उसके नेतृत्व, संगठनात्मक ढांचे या राजनीतिक शुरुआत के बारे में सार्वजनिक रूप से बहुत कम जानकारी उपलब्ध है. ‘ऑल्ट न्यूज़’ ने पार्टी के पदाधिकारियों से बात की और उपलब्ध रिकॉर्ड्स की जांच की, ताकि उस पार्टी के इतिहास को समझा जा सके जो लगभग रातों-रात गुमनामी से निकलकर चर्चा का केंद्र बन गई.

हावड़ा के एक घर में बनी पार्टी

NCPI के नेशनल ऑर्गनाइज़ेशनल सेक्रेटरी और इसके संस्थापक सदस्यों में से एक होने का दावा करने वाले शांतनु डे के अनुसार, पार्टी बनाने की प्रक्रिया 2022 में शुरू हुई थी.

शांतनु डे, NCPI के संगठनात्मक सचिव | फोटो: Facebook/@shantanu.de.16

खुद को मानवाधिकार कार्यकर्ता बताने वाले शांतनु डे ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि जून 2022 में उत्तिया कुंडू ने उनसे संपर्क किया था.

उन्होंने कहा, “हमारी एक मीटिंग हावड़ा के संकराइल में उत्तिया कुंडू के घर पर हुई थी. उनकी पत्नी शेवली कुंडू के अलावा, NGO और मीडिया संगठनों के कुछ प्रतिनिधि भी वहां मौजूद थे. ये तय हुआ कि हम एक राजनीतिक पार्टी बनाएंगे और उसे पश्चिम बंगाल से रजिस्टर कराएंगे.”

सांकराइल में कुंडू परिवार का घर जहां NCPI का कार्यालय पंजीकृत है. बंगाली प्रकाशन ‘जागो बिस्वा’ भी इसी स्थान से चलाया जाता है.

इस बैठक के बाद, शेवली कुंडू को अध्यक्ष और उत्तिया कुंडू को उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया. पार्टी का रजिस्टर्ड पता हावड़ा ज़िले के हाटगाछा गांव में कुंडू परिवार का घर ही है.

बंगाल की पार्टी ने त्रिपुरा को क्यों चुना?

हालांकि, संगठन का रजिस्ट्रेशन पश्चिम बंगाल में हुआ था, लेकिन इसके संस्थापकों ने तय किया कि इसका पहला चुनावी प्रयोग त्रिपुरा में होगा.

शांतनु डे इस फ़ैसले का श्रेय अपने राजनीतिक अनुभवों को देते हैं.

उनके अनुसार, वे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े हुए थे. उनका दावा है कि 2014 में दमदम में भारतीय शिक्षण मंडल के एक कार्यक्रम में शामिल होने के दौरान, TMC से जुड़े कुछ लोगों ने उन पर हमला किया था.

NCPI ने 2023 में त्रिपुरा विधानसभा की तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे: कैलाशहर, चावमनु और अंबासा. आखिरकार, कागजी कार्रवाई से जुड़ी समस्याओं के कारण अंबासा के उम्मीदवार को निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ना पड़ा. विडंबना यह है कि पार्टी का अभियान दलबदलुओं को हराने पर केंद्रित था.

उन्होंने कहा, “मैं बुरी तरह घायल हो गया था. उस घटना के बाद, अपनी सुरक्षा की चिंता करते हुए मैंने RSS से थोड़ी दूरी बना ली, हालांकि केशव भवन के नेता मेरे संपर्क में बने रहे.” 

“इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए, हमें लगा कि त्रिपुरा जैसे अपेक्षाकृत शांत राज्य से अपनी चुनावी यात्रा शुरू करना बेहतर होगा. हमें यकीन था कि अगर हमने पश्चिम बंगाल में पार्टी बनाने की कोशिश की, तो TMC हम पर हमला करेगी.”

NCPI को 20 जनवरी, 2023 को त्रिपुरा में एक राज्य स्तरीय पार्टी के तौर पर रजिस्टर किया गया. इसके बाद, चार अन्य सीटों पर नॉमिनेशन खारिज होने के बाद पार्टी ने 2023 के चुनाव में तीन विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा.

BJP के साथ वैचारिक निकटता

पार्टी नेताओं के साथ ‘ऑल्ट न्यूज़’ की बातचीत से जो सबसे अहम बातें सामने आईं, उनमें से एक ये है कि कई संस्थापकों ने RSS और BJP के साथ अपनी वैचारिक निकटता का दावा किया है.

शांतनु डे ने खुलकर RSS के साथ अपने पुराने जुड़ाव को स्वीकार किया और कहा कि NCPI के सदस्यों ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान व्यक्तिगत रूप से BJP के लिए प्रचार किया था.

उन्होंने कहा, “मैं एक सनातनी संतान हूं. 2026 के विधानसभा चुनावों में, हमने BJP का समर्थन किया और व्यक्तिगत रूप से पार्टी के लिए काम किया.” 4 मई को आए नतीजों के बाद बंगाल में BJP की जीत के जश्न में डे के शामिल होने की तस्वीरें उनके फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल पर मौजूद हैं. उन्होंने 4 मई को शाम 4 बजकर 31 मिनट पर एक पोस्ट भी शेयर किया था, जिसका कैप्शन था, “भारत का बच्चा-बच्चा जय श्री राम बोलेगा.”

NCPI की पूर्व अध्यक्ष शेवली कुंडू के सार्वजनिक बयानों में भी ऐसी ही राजनीतिक सोच दिखाई देती है.

बंगाली न्यूज़ पोर्टल ‘प्रतिदिन डिजिटल‘ को दिए एक इंटरव्यू में कुंडू ने कहा कि पार्टी का गठन गरीबों, बुज़ुर्गों और महिलाओं के लिए काम करने और साथ ही संघ परिवार के मुख्य वैचारिक नेताओं में से एक, दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को साकार करने के मकसद से किया गया था.

बांग्ला हंट‘ को दिए एक और इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि पार्टी ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान NDA का समर्थन किया था.

ये संबंध इसलिए भी खास हैं क्योंकि TMC के संसदीय दल के एक बड़े हिस्से ने अब NCPI को अपनी राजनीतिक मंज़िल के तौर पर चुना है.

आंतरिक विवाद और संगठन का कमज़ोर पड़ना

शांतनु डे का कहना है कि त्रिपुरा चुनाव के बाद, संगठनात्मक समस्याओं और फंड की कमी के कारण आंतरिक मतभेद पैदा हुए.

उनके मुताबिक, उन्होंने त्रिपुरा में पार्टी की मौजूदगी बनाने में लगभग दो साल लगाए, जहां उनके मुताबिक NCPI के करीब 1 हज़ार सदस्य थे. उनका अनुमान है कि बंगाल यूनिट में 300 से 400 सदस्य थे.

हालांकि, उनका आरोप है कि लीडरशिप ने ऑर्गनाइज़ेशनल और फ़ाइनेंशियल सपोर्ट नहीं दिया. उन्होंने कहा, “हमें सबसे बड़ी दिक्कत फंड की कमी की वजह से हुई. शेवली और उत्तिया कुंडू अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने में नाकाम रहे, जिससे पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा.” उन्होंने आगे कहा कि कुंडू दंपत्ति के साथ मतभेदों के कारण उन्हें 2024 में त्रिपुरा छोड़ना पड़ा, जिसके बाद राज्य में पार्टी का ऑफ़िस बंद हो गया.

लेकिन त्रिपुरा के कुछ नेताओं ने इस बात का खंडन किया है.

त्रिपुरा में NCPI के स्टेट कन्वीनर ज़ाकिर खान ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि शांतनु डे ने 2023 के चुनाव प्रचार के दौरान ही पार्टी छोड़ दी थी.

खान ने कहा, “शांतनु डे ने चुनाव के बीच में ही पार्टी छोड़ दी थी. पार्टी के लिए फंड पश्चिम बंगाल से आता था.” उन्होंने इस बात को भी खारिज किया कि NCPI का BJP के साथ कोई गठबंधन था.

उन्होंने कहा, “हम NDA या BJP के सहयोगी नहीं हैं. हम सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ रहे हैं और संविधान की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं.”

20 जून को त्रिपुरा के ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल ‘त्रिपुरा टीवी बांग्ला’ ने ख़बर दी कि उस राज्य में NCPI के कार्यकर्ता और नेता कांग्रेस में शामिल हो गए.

लीडरशिप का रहस्य

20 TMC सांसदों के अचानक शामिल होने से पार्टी के अंदर की उलझन भी सामने आ गई है.

शुरुआत में शांतनु डे ने इस कदम का सार्वजनिक रूप से विरोध किया और कहा कि उनसे सलाह नहीं ली गई थी. बाद में उन्होंने अपना रुख नरम किया और सांसदों का स्वागत किया, लेकिन जिस तरह से ये फ़ैसला लिया गया, उसकी आलोचना जारी रखी.

उन्होंने कहा, “अभी सांसदों की संख्या के हिसाब से हम पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी हैं. ज़ाहिर है, मैं खुश हूं लेकिन राष्ट्रीय संगठन सचिव होने के नाते, मुझे इसके बारे में पहले नहीं बताया गया था.”

इस रहस्य को और बढ़ाते हुए, NCPI ने हाल ही में अपने फ़ेसबुक पेज के ज़रिए ज्योतिप्रकाश चटर्जी को नया अध्यक्ष घोषित किया. हालांकि, घोषणा के साथ जो तस्वीर लगाई गई थी, उसमें उस व्यक्ति का चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था.

फ़ेसबुक पेज पर TMC के पूर्व सांसदों का पार्टी में स्वागत करने वाली पोस्ट भी शेयर की गई हैं. 25 जून की एक पोस्ट में काकोली घोष दस्तीदार को NCPI संसदीय दल का नेता बताया गया था.

उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि TMC नेताओं का स्वागत करने वाला फ़ेसबुक पेज कौन चला रहा था. उन्होंने ये भी कहा कि पार्टी के कई कार्यकर्ताओं ने उनसे संपर्क करके इस बात पर नाराज़गी जताई कि पार्टी में विलय के मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हुई.

गायब होते संस्थापक

जैसे-जैसे NCPI पर मीडिया का ध्यान बढ़ा है, इसके मुख्य संस्थापकों में से एक, शेवली कुंडू, सार्वजनिक नज़रों से दूर हो गई हैं.

ऑल्ट न्यूज़ ने कलकत्ता हाई कोर्ट की वकील कुंडू से संपर्क करने की कई बार कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

उत्तीय कुंडू, जो खुद को गणितज्ञ, पत्रकार और मोटिवेशनल स्पीकर बताते हैं और ‘जागोबिस्वा’ नाम का पब्लिकेशन चलाते हैं, उनसे भी संपर्क नहीं हो पा रहा है.

हालांकि, 13 मई की कुंडू की एक फ़ेसबुक पोस्ट ऑनलाइन फिर से सामने आई है. इस पोस्ट में पश्चिम बंगाल के नेता सुवेंदु अधिकारी के साथ उनकी एक तस्वीर थी और उन्होंने BJP नेता को पद संभालने पर बधाई दी थी.

जवाब से ज़्यादा सवाल

NCPI का चर्चा में आना जवाब से ज़्यादा सवाल खड़े कर दिए हैं.

एक ऐसी पार्टी जिसके बारे में खुद उसके नेताओं का मानना ​​है कि पश्चिम बंगाल में उसके कुछ सौ सदस्य ही थे और उसका संगठन भी ज़्यादातर निष्क्रिय था, वो अचानक बंगाल के TMC के कई पूर्व सांसदों का संसदीय ठिकाना बन गई है. इसके संस्थापक नेता पार्टी की राजनीतिक स्थिति, अंदरूनी कामकाज और मौजूदा नेतृत्व के बारे में अलग-अलग बातें कहते हैं. कुछ लोग RSS से वैचारिक जुड़ाव और BJP के समर्थन की बात मानते हैं, जबकि दूसरे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पार्टी सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ है.

फिलहाल, NCPI एक राजनीतिक पहेली बनी हुई है: एक ऐसी पार्टी जो लगभग गुमनामी से निकलकर बंगाल की राजनीति के केंद्र में आ गई है, जबकि इसके नेतृत्व, संगठन और भविष्य की दिशा के बारे में बुनियादी जानकारी अभी भी अनिश्चितता के घेरे में है.