11 जुलाई 2016 की रात करीब 8 बजे, बुरहान वानी की मौत के तीन दिन बाद, दक्षिण कश्मीर के शोपियां ज़िले के सेडो गांव में रहने वाली 14 साल की इंशा मुश्ताक अपने घर की ग्राउंड-फ़्लोर वाली खिड़की से बाहर हो रहे विरोध-प्रदर्शन देख रही थी. कुछ ही पल में उसके चेहरे पर ज़ोरदार दर्द हुआ. उसे पता नहीं चला कि उसे क्या लगा. उसके सामने के तीन दांत टूट गए. वो पूरी तरह खून से लथपथ हो गई थी.

जब वो अस्पताल में होश में आई, तो उसका चेहरा 100 से ज़्यादा छर्रों (पैलेट) के ज़ख्मों से भरा हुआ था. उसकी आंखों पर पट्टी बंधी थी. उसे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. उसके बाद वो कभी कुछ नहीं देख पाई.

28 मार्च 2017 की दोपहर, श्रीनगर में 16 साल का फ़र्ज़ान शेख़ घर पर गणित का होमवर्क कर रहा था, तभी उसने बाहर कुछ शोर-शराबा सुना. उत्सुकता में वो बाहर निकला और देखा कि एक जनाज़ा गुज़र रहा है. फिर उसने कश्मीर के समर्थन में नारे सुने और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाकर्मियों को आंसू गैस और छर्रे चलाते देखा. वो घर की ओर भागने लगा. उसने कहा, “मैंने एक पुलिसकर्मी को बंदूक से मेरी तरफ़ निशाना साधते देखा और उसने सीधे मुझ पर गोली चलाई. वो आखिरी चीज़ थी जो मैंने देखी.”

वो ज़मीन पर गिर पड़ा, उसकी बाईं आँख से खून बह रहा था और उसका पूरा शरीर छर्रों से छलनी हो गया था. जब उसे श्री महाराजा हरि सिंह (SMHS) अस्पताल में होश आया, तो एक डॉक्टर उससे पूछ रहा था कि वह कितनी उंगलियां दिखा रहा है. उसे अपनी बाईं आंख से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था.

दो महीने तक ठीक होने के बाद, वो स्कूल लौट आया.

फिर अगस्त में एक दिन, उसके पिता सड़क की लाइट बंद करना भूल गए, जिसकी रोशनी फ़र्ज़ान के बेडरूम में आ रही थी. फ़र्ज़ान रात 11 बजे खुद उसे बंद करने के लिए बाहर निकला. उसे फिर से छर्रे लगे. इस बार उसकी दाईं आंख में. ये छर्रे सड़क के दूसरी तरफ़ खड़ी CRPF की गाड़ी से आए थे. कोई चेतावनी नहीं दी गई थी.

दाईं आंख की तीन और बाईं आंख की चार सर्जरी के बाद, डॉक्टरों ने फ़र्ज़ान को बताया कि उसकी दाईं आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई है. हालांकि, उन्होंने कहा कि और सर्जरी से फ़र्ज़ान की बाईं आंख की 40 से 50% रोशनी वापस आ सकती है. जहां तक इंशा की बात है, उसने अपनी पढ़ाई जारी रखी और स्कूल की फ़ाइनल परीक्षा और फिर 2023 में 12वीं क्लास की बोर्ड परीक्षा पास की.

शायद यही वजह है कि आने वाली बॉलीवुड फ़िल्म ‘चौहान’ के टीज़र में पैलेट गन से लगी चोटों को “सीमित नुकसान” (limited damage) बताया गया है.

फोटो: X/@MirwaizKashmir

‘चौहान आ रहा है’

अजय देवगन की मुख्य भूमिका वाली इस फ़िल्म के डायरेक्टर नीरज यादव हैं और इसे जियो स्टूडियोज़ के साथ मिलकर कलर येलो प्रोडक्शन्स के बैनर तले आनंद एल राय ने प्रोड्यूस किया है. 25 जून, 2026 को जारी किए गए टीज़र से पता चलता है कि कहानी कश्मीर में उग्रवाद और उससे निपटने के अभियानों (काउंटर-इंसर्जेंसी) पर आधारित है. हालांकि, कहानी की पूरी जानकारी अभी साफ़ नहीं है, लेकिन टीज़र के विजुअल्स में पत्थरबाज़ी, पैलेट गन से लगी चोटें, सुरक्षा अभियान और संघर्ष से प्रभावित इलाका प्रमुखता से दिखाया गया है, जिससे ये एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील एक्शन फ़िल्म लगती है. ये फ़िल्म 1 अक्टूबर, 2027 को सिनेमाघरों में रिलीज़ होगी.

2 मिनट 24 सेकेंड के इस टीज़र में, अजय देवगन की आवाज़ (वॉयसओवर) में राज्य द्वारा भीड़ को नियंत्रित करने के पारंपरिक तरीकों को अपर्याप्त बताया गया है. वे कहते हैं कि आंसू गैस बेअसर है क्योंकि मास्क ऑनलाइन मिल जाते हैं, वॉटर कैनन का असर कुछ समय के लिए ही रहता है, और पैलेट गन से “सीमित नुकसान” ही होता है.

लेकिन श्रीनगर की सड़कों पर, या फ़र्ज़ान और इंशा जैसे लोगों के घरों में, पैलेट गन से हुए नुकसान को “सीमित” नहीं कहा जा सकता. पिछले 16 सालों में, घाटी में पैलेट गन ने लोगों की जान ली है, उन्हें अंधा किया है और हमेशा के लिए अपंग बना दिया है; इसके कारण लोगों की आंखे खराब हुईं, बार-बार सर्जरी करानी पड़ी और वे जीवन भर के लिए विकलांग हो गए. यही सच्चाई चौहान की “सीमित नुकसान” वाली बात को इतना क्रूर और परेशान करने वाला बना देती है.

‘जान न लेने वाला विकल्प’

2010 में कई महीनों तक चले अशांति के दौर में जब पुलिस की गोलीबारी में 100 से ज़्यादा आम नागरिक मारे गए थे, तब मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली जम्मू-कश्मीर सरकार ने केंद्र से भीड़ को काबू करने के लिए “जान न लेने वाले” (non-lethal) विकल्प की मांग की थी. इसके बाद केंद्र ने J&K पुलिस को 12-गेज पंप-एक्शन पैलेट शॉटगन उपलब्ध कराईं, जिनका इस्तेमाल सबसे पहले 14 अगस्त 2010 को सोपोर में किया गया था.

पैलेट गन की एक कारतूस से 360 से 600 छोटी लोहे या सीसे की गोलियां तेज़ी से निकलती हैं. ये गोलियां किसी भी दिशा में फैल जाती हैं, जिससे किसी खास निशाने पर गोली चलाना लगभग नामुमकिन हो जाता है. जम्मू-कश्मीर के पूर्व IG जावेद गिलानी ने माना था कि पैलेट का रास्ता पहले से तय नहीं होता. गोली चलने पर कारतूस फट जाता है और गोलियां दूर-दूर तक फैल जाती हैं, जिससे रेंज में आने वाला कोई भी व्यक्ति — प्रदर्शनकारी, राहगीर, खिड़की पर खड़े लोग या बच्चे — इनकी चपेट में आ सकते हैं. पीड़ितों के शरीर से पैलेट निकालने वाले डॉक्टर अक्सर सभी गोलियों को न निकालने का फ़ैसला करते थे, क्योंकि ऐसा करने से और ज़्यादा नुकसान हो सकता था. ये गोलियां शरीर के अंदर हमेशा के लिए रह जाती हैं, ठीक उसी अंधेपन की तरह जो ये पैदा करती हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पैलेट शॉटगन को “क्रूर,” “खतरनाक,” और “ग़लत निशाने वाली और अंधाधुंध” बताया है. उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुसार, भीड़ को काबू करने के लिए इसका इस्तेमाल करने का कोई तरीका नहीं है. UN मानवाधिकार आयोग ने इसे “प्रदर्शनकारियों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले सबसे खतरनाक हथियारों में से एक” कहा है. हालांकि, बॉलीवुड की राय अलग है. ‘चौहान’ फ़िल्म बनाने वालों के लिए, पैलेट से लगी चोटें “सीमित नुकसान” हैं.

‘सीमित नुकसान’ का दायरा

श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) अस्पताल की एक स्टडी में पाया गया कि 2010 में इसके इस्तेमाल के शुरुआती चार महीनों में, पैलेट गन से कम से कम छह लोगों की मौत हुई और 198 लोग घायल हुए. घायलों में से पांच लोगों की आंखों की रोशनी चली गई. सबसे कम उम्र का पीड़ित छह साल का था; सबसे अधिक उम्र का पीड़ित 54 साल का. ये धारणा (कि पैलेट जानलेवा नहीं होंगे) शुरू से ही विवादित रही है. पेपर में कहा गया है, “हालांकि पैलेट से लगी चोट मामूली लग सकती है, लेकिन अगर इससे टिशू (ऊतक) को होने वाले नुकसान और सिर, छाती व पेट पर लगी चोटों की गंभीरता को न समझा जाए, तो इसके भयानक नतीजे हो सकते हैं. बुलेट लगने से घायल हुए मरीज़ों की तरह ही पैलेट से घायल मरीज़ों की भी जांच और इलाज की जानी चाहिए…”

वकील अब्दुल मनान बुखारी की RTI अर्ज़ी के मुताबिक, मार्च 2010 और अक्टूबर 2013 के बीच पैलेट गन से घायल 91 मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती कराया गया. इनमें से 36 मरीज़ों को नेत्र रोग विभाग (ऑप्थल्मोलॉजी) में भर्ती किया गया; कई मरीज़ों के बारे में ये पाया गया कि “उनकी आंखों की रोशनी वापस आने की कोई उम्मीद नहीं है.”

2014 में, श्रीनगर के SKIMS मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने ‘जर्नल ऑफ़ इवोल्यूशन ऑफ़ मेडिकल एंड डेंटल साइंसेज’ में एक स्टडी पब्लिश की. इसमें जनवरी 2010 से सितंबर 2013 के बीच भर्ती हुए उन 20 लोगों के मामलों की समीक्षा की गई, जिन्हें पैलेट गन से आंखों में चोट लगी थी. इनमें से 17 मरीज़ों की एक आंख में और तीन मरीज़ों की दोनों आंखों में चोट लगी थी. स्टडी में पाया गया कि 33% मरीज़ों की नज़र वापस नहीं आई. मरीज़ों की औसत उम्र 21.45 साल थी.

इंशा मुश्ताक | फ़ोटो: फ़ेसबुक/pelletvictimswelfaretrust

फिर साल 2016 आया, जिसे स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “डेड आई महामारी” (आंखें बेकार करने वाली महामारी) के साल के तौर पर जाना गया. 8 जुलाई 2016 को हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में महीनों तक बड़े पैमाने पर अशांति रही और सुरक्षा बलों ने पैलेट गन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया.

संसद में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2016 और अगस्त 2017 के बीच पैलेट लगने से 17 लोगों की मौत हुई. जम्मू-कश्मीर राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में 1,726 लोग मेटल पैलेट से घायल हुए थे. जनवरी 2018 में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने राज्य विधानसभा को बताया कि 8 जुलाई 2016 से 27 फ़रवरी 2017 के बीच कश्मीर में पैलेट गन से 6,221 लोग घायल हुए थे. पीड़ितों में से 728 लोगों की आंखों में चोटें आईं. इनमें से 54 लोगों को किसी न किसी तरह की दृष्टि संबंधी समस्या का सामना करना पड़ा.

CRPF ने 2016 में जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट को बताया था कि उन्होंने सिर्फ़ 32 दिनों में लगभग 13 लाख पैलेट फ़ायर किए थे.

2022 में ‘इंडियन जर्नल ऑफ़ ऑप्थल्मोलॉजी’ में पब्लिश एक स्टडी में (जिसका नेतृत्व डॉ. एस. नटराजन और उनके सहयोगियों ने किया था) 18 जुलाई से 18 नवंबर 2016 के बीच श्रीनगर के एक बड़े अस्पताल में पैलेट गन से आंखों में चोट लगने के कारण भर्ती हुए सभी 777 मरीज़ों के मामलों की समीक्षा की गई. अध्ययन में ये निष्कर्ष निकाला गया कि “पैलेट गन से आंखों में लगी चोटों के कारण आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचा, जिसमें ज़्यादातर मामले ‘ओपन ग्लोब इंजरी’ (आंख के गोले का फटना) के थे. इलाज के लिए अक्सर सर्जरी की ज़रूरत पड़ी, लेकिन जल्दी से इलाज के बावजूद, ज़्यादातर मरीज़ों की दृष्टि में सुधार की संभावना कम ही रही.”

मरीज़ों में से 51.1% की उम्र 20 से 29 साल के बीच थी, और दूसरे सबसे बड़े ग्रुप (36.6%) में 10 से 19 साल के मरीज़ शामिल थे.

संदर्भ के लिए, उसी पेपर में बताया गया था कि 2003 से 2005 तक चले पूरे इराक युद्ध के दौरान आंखों की गंभीर चोट के 797 मामले सामने आए थे. इराक और अफ़ग़ानिस्तान में ब्रिटिश सेना ने 2004 से 2008 के बीच आंखों की चोट के 63 मामले दर्ज़ किए थे. इसमें ये भी देखा गया कि 777 का आंकड़ा शायद कम करके बताया गया था, क्योंकि इसमें दूसरी जगहों पर इलाज करा रहे मरीज़ और वे लोग शामिल नहीं थे जिनकी मेडिकल सुविधा तक पहुंच नहीं थी.

2017 तक, 1,200 से ज़्यादा पीड़ितों ने खुद को ‘पैलेट विक्टिम्स वेलफेयर ट्रस्ट‘ के तहत संगठित कर लिया था. उनमें से लगभग 100 लोगों की दोनों आंखें बुरी तरह खराब हो गई थीं या वे पूरी तरह अंधे हो गए थे. ट्रस्ट के प्रमुख मोहम्मद अशरफ़ एक आंख से अंधे हैं और उनके शरीर और सिर में 600 से ज़्यादा पैलेट (छर्रे) फंसे हुए हैं. वानी ने 2022 में तुर्की की न्यूज़ एजेंसी अनादोलु एजेंसी को बताया, “अगर पीड़ितों तक कुछ मदद पहुंचती है तो मुझे बहुत सुकून मिलता है.”

द पोलिस प्रोजेक्ट‘ के मुताबिक, जुलाई 2016 और फरवरी 2019 के बीच, पैलेट लगने से 2,942 कश्मीरी घायल हुए और 18 लोगों की मौत हुई. इस दौरान पैलेट से हुई कुल चोटों में से 1,459 लोगों को आंखों में चोट लगी और 139 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई.

अगस्त 2020 में, सुरक्षा बलों ने श्रीनगर के बेमिना इलाके में मुहर्रम जुलूस में शामिल शिया शोक मनाने वालों को तितर-बितर करने के लिए पैलेट और आंसू गैस के गोले दागे, जिससे कम से कम 40 लोग घायल हो गए. पुलिस ने कहा कि शोक मनाने वालों ने COVID-19 के कारण धार्मिक सभाओं पर लगी रोक के आदेशों का उल्लंघन किया था.

पीड़ितों में बच्चे और किशोर भी शामिल

19 महीने की हिबा जान 25 नवंबर 2018 को अपनी मां मारसाला की गोद में थी, जब सुरक्षा बलों ने शोपियां के कापरान इलाके में उनके घर के बाहर आंसू गैस के गोले दागे. घर के अंदर दम घुटने जैसा महसूस होने लगा, इसीलिए मारसाला ने ताजी हवा के लिए दरवाजा खोला. तभी, पैलेट जालीदार दरवाजे को चीरते हुए अंदर आए. कुछ पैलेट मारसाला के हाथ पर लगे; एक हिबा की दाईं आंख पर लगा.

श्रीनगर के SMHS अस्पताल में डॉक्टरों ने उसकी आंख से धातु की गोलियां तो निकाल दीं, लेकिन वो ये नहीं बता पाए कि उसकी नज़र वापस आएगी या नहीं. हिबा का चेहरा और उसकी चोट दुनिया भर में एक मिसाल बन गई.

पैलेट गन का असर इसलिए भी बहुत परेशान करने वाला है क्योंकि इसके शिकार होने वालों में बहुत सारे बच्चे और किशोर शामिल हैं. इस मामले में मेडिकल और मानवाधिकारों के रिकॉर्ड बिल्कुल साफ हैं: जब से पैलेट गन का इस्तेमाल शुरू हुआ है, तभी से बच्चे इसके शिकार होते रहे हैं. 2010 में, शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) में इसका शिकार होने वाला सबसे कम उम्र का मरीज़ 6 साल का बच्चा था.

जब ‘स्क्रॉल‘ ने श्रीनगर के SMHS अस्पताल में पैलेट गन से घायल लोगों का इलाज कर रहे डॉक्टरों से बात की, तो वहां आए आई सर्जन एस. नटराजन, जिन्होंने 40 मरीज़ों की सर्जरी की थी, ने बताया, “हमें अपनी पूरी कोशिश करनी होगी… ये युवा, किशोर और बच्चे हैं. हम उन्हें अंधा नहीं होने दे सकते.”

SKIMS के माजिद मुश्ताक की अगुवाई में पैलेट गन से घायल 198 मरीज़ों पर की गई एक स्टडी, जो ‘टर्किश जर्नल ऑफ़ ट्रॉमा एंड इमरजेंसी सर्जरी’ में छपी थी, में पाया गया कि 72.7% मरीज़ों की उम्र 16 से 25 साल के बीच थी.

अनंतनाग के पांचवीं क्लास के छात्र, दस साल के आसिफ़ अहमद शेख की दाईं आंख में एक पैलेट लगी, जिससे उस आंख की पूरी रोशनी चली गई. उसने इटैलियन डॉक्यूमेंट्री फ़ोटोग्राफ़र कैमिलो पास्क्वेरेली से कहा, “टीवी पर कार्टून देखना, गली में दोस्तों के साथ खेलना, घंटों तक किताबें पढ़ना – अब मैं बस यही सपने देखता हूं.”

मानसिक स्वास्थ्य पर असर

‘कश्मीर घाटी में पैलेट चोट के शिकार लोगों में मानसिक बीमारी’ (Psychiatric Morbidity in Pellet Injury Victims of Kashmir Valley) नाम की एक स्टडी के तहत, श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज के साइकियाट्री डिपार्टमेंट के रिसर्चर्स ने अगस्त 2016 से अगस्त 2018 के बीच पैलेट और पैलेट-प्लस-फायरआर्म की चोट वाले 380 मरीज़ों की जांच की. उन्होंने पाया कि पैलेट से घायल 85% लोगों में मानसिक बीमारियां हो गई थीं और 79% में ‘मेजर डिप्रेशन डिसऑर्डर’ (गंभीर अवसाद) पाया गया.

2025 में ‘ट्रॉमेटोलॉजी’ जर्नल में छपी एक और स्टडी में पैलेट गन से सीधे घायल हुए दस लोगों का इंटरव्यू लिया गया. इसमें गंभीर और लंबे समय तक रहने वाले मनोवैज्ञानिक असर देखे गए, जिनमें ‘कॉम्प्लेक्स ट्रॉमा’ (जटिल मानसिक आघात) जैसे लक्षण भी शामिल थे. पेपर में लिखा है, “शारीरिक चोटों के कारण भावनाओं पर नियंत्रण खोने जैसी गंभीर समस्याएं हुईं, जिनमें चिड़चिड़ापन, गुस्सा और निराशा शामिल थी. पीड़ितों ने खाने-पीने की आदतों में गड़बड़ी और मानसिक आघात की बात कही. उनकी अपनी पहचान पर गहरा असर पड़ा; उनमें भूमिकाओं का उलटना, समय के अहसास का टूटना, अपराधबोध और खुद को बेकार समझने जैसी भावनाएं देखी गईं… पढ़ाई-लिखाई के मामले में, नज़र जाने और आघात से उपजी परेशानी के कारण प्रेरणा में कमी आई और आगे की पढ़ाई जारी रखने को लेकर अनिश्चितता पैदा हुई.”

‘चौहान’ टीज़र का विरोध

इसी असल अनुभव ने चौहान के टीज़र और खासकर “सीमित नुकसान” (limited damage) वाले फ्रेज के खिलाफ़ ऑनलाइन विरोध को हवा दी है. कई कश्मीरियों के लिए, फ़िल्म में पैलेट गन की चोटों को “सीमित नुकसान” बताना न सिर्फ़ असंवेदनशील है, बल्कि ये बरसों से दर्ज तकलीफों को कम करके आंकने जैसा भी है.

अगर इस टीज़र को अलग से देखा जाए, तो ये दर्शकों को पैलेट गन से होने वाले इंसानी नुकसान या कश्मीर में इनके कारण हुए गहरे सदमे के बारे में सोचने के लिए प्रेरित नहीं करता. इसके बजाय, ये उस दुख को एक तमाशे की तरह पेश करता है. हिंसा के दृश्य के साथ जोशीले गाने ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’ का इस्तेमाल इस सीन को और भी समस्याग्रस्त बना देता है. जो दर्शक पैलेट गन की वजह से कश्मीर में लोगों के अंधे होने, मरने और जीवन भर के लिए अपंग होने के इतिहास से वाकिफ नहीं हैं, उनके मन में ये टीज़र उन लोगों के प्रति सहानुभूति नहीं जगाता जिन्होंने अपनी आंखें या अपने प्रियजनों को खो दिया; बल्कि ये एक ऐसे हीरो के आने का उत्साह पैदा करता है जो इस समस्या से और भी सख्ती से निपटेगा. इस लिहाज से, टीज़र दर्शकों को एक ऐसी कहानी का समर्थन करने के लिए उकसाता है जो कश्मीर के सबसे गहरे और लंबे समय तक रहने वाले सदमों में से एक को मामूली बनाकर पेश करती है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने X पर लिखा, “’चौहान’ का टीज़र हर उस कश्मीरी के लिए बेहद परेशान करने वाला है, जिसके मन में उन सालों की यादें ताजा हैं जब पैलेट गन दर्द और कभी न भर पाने वाले नुकसान का प्रतीक बन गई थीं. टीज़र आंसू गैस, वॉटर कैनन और पैलेट गन को ‘बेअसर उपाय’ बताकर खारिज कर देता है और फिर एक हीरो को ‘समाधान’ के तौर पर पेश करता है. लेकिन जिसे वे ‘बेअसर’ कहते हैं, उसने हजारों जिंदगियों को बर्बाद कर दिया…”

फिर भी, सच तो ये है कि 2010 में उमर अब्दुल्ला की सरकार के समय ही कश्मीर में भीड़ को काबू करने के हथियार के तौर पर पैलेट गन का इस्तेमाल शुरू किया गया था.

मानवाधिकार कार्यकर्ता वजाहत फ़ारूक भट ने फ़िल्म निर्माताओं से अपील की कि वे काल्पनिक “अल्फ़ा मेल” हीरो और लगातार होने वाली गोलीबारी के ज़रिए हिंसा को बढ़ावा देना बंद करें.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के कश्मीर प्रवक्ता इमरान नबी डार ने इस फ़िल्म को “प्रॉपगैंडा” का ऐसा काम बताया जिसने “गोएबल्स के प्रचार को भी पीछे छोड़ दिया है.” उन्होंने X पर ये भी लिखा, “अपनी आंखें या जान गंवाने वाले बच्चों और युवाओं का मज़ाक उड़ाना और उनके परिवारों के पुराने ज़ख्मों को फिर से कुरेदना, कश्मीरियों के ख़िलाफ़ एक नफ़रत भरे एजेंडे से कम नहीं है.” गोएबल्स का प्रचार हिटलर के मंत्री जोसेफ गोएबल्स के संदर्भ में है, जो झूठे प्रचार के लिए कुख्यात था.

दूसरी ओर, अभिनेता अमिताभ बच्चन भी उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने इस टीज़र की तारीफ़ की है.