मई 2018: चुनाव और फर्जी खबरों के गठजोड़ का व्यापार

मई 2018 नकली समाचार उद्योग के लिए हास्यजनक रूप से शुरु हुआ, जिसमें कई मीडिया संगठन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब के पैरोडी खाते के झांसे में आ गए। लेकिन जैसे जैसे महीना आगे बढ़ा, हमने महसूस किया कि झूठी खबर कोई मज़ाक नहीं है। कर्नाटक चुनावों के बारे में झूठी खबरे फैलाना और पत्रकारों को सुनियोजित तरीके से उनके नाम से झूठे बयान फैलाके उन्हें प्रताड़ित करना दो प्रमुख विषय थे। ऑल्ट न्यूज़ आपको मई, 2018 के महीने के दौरान सोशल मीडिया पर साझा की गयी प्रमुख झूठी खबरों का सारांश प्रदान करता है।

1. सोशल मीडिया पर झूठे बयानों को फैलाना जिससे पत्रकारों को सुनियोजित तरीके प्रताड़ित किया जा सके

पत्रकार रवीश कुमार के झूठे बयान को प्रायोजित तरीके से फैलाये गए। बीजेपी व् दक्षिणपंथी समर्थित सोशल मीडिया ग्रुप्स में रविश कुमार को एक पोस्टर में, 11 वर्षीय गीता (नाम बदला हुआ) के बलात्कार को सहमति से किया यौन संबंध करार देने का आरोप लगाया गया। ये वे शब्द थे जो उन्होंने कभी नहीं कहे थे, उनके स्पष्टीकरण के बावजूद भी उन्हें सोशल मीडिया पर गालियों का सामना करना पड़ा। ऐसी फर्जी खबरें साझा करने वाले फेसबुक पेजों में फ़िर एक बार मोदी सरकार, बीजेपी न्यू इंडिया, We support Narendra Modi, आदि शामिल हैं। इसके बारे में और अधिक जानने के लिए ऑल्ट न्यूज़ का यह लेख पढ़ें।

सुनयोजित रूप से पत्रकारों को निशाना बनाना सोशल मीडिया अभियान पर एक उपद्रवी प्रवृत्ति को दिखाता है। हमने एक और ऐसा मामला देखा जहां राना अयूब के नाम से झूठे बयान फैलाये गए, उनको भी सोशल मीडिया पर गन्दी गालियों का सामना करना पड़ा। यह एक अंतरराष्ट्रीय खबर बन गया जिसमें संयुक्त राष्ट्र प्रतिवेदक ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि “वो राना अयूब को मिलने वाली धमिकियो से बहुत चिंतित हैं और राना की जान गंभीर जोखिम में है।”

2. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में फर्जी समाचार विक्रेता भी व्यस्त रहे

कर्नाटक चुनावों में झूठी खबरों में अचानक वृद्धि देखी गई। एक मुस्लिम आईएनसी (INC) उम्मीदवार के शक्ल से एक वीडियो संपादित किया गया। जो “सत्ता में आने पर हिंदुओं के रक्तपात” की धमकी दे रहा था। बाद में यह वीडियो फर्जी पाया गया। बीबीसी न्यूज के LOGO के साथ ‘जनता की बात’ वाले मतदाता सर्वेक्षण ने कर्नाटक में बीजेपी की जीत की भविष्यवाणी की, जो खबर बाद में फर्जी साबित हुई।

बेंगलुरु में एक महिला को उत्पीड़ित होते हुए दिखाने वाला वीडियो सामने आया जो असल में मलेशिया का वीडियो था।

कांग्रेस (INC) रैली के एक वीडियो में फर्जी समाचार ब्रिगेड ने पाकिस्तानी ध्वज लहराने का दावा किया था, बाद में ये साफ़ हो गया कि वो कोई पाकिस्तानी ध्वज नहीं था, बल्कि एक हरा रंग का ध्वज था। जो अखिल भारतीय मुस्लिम लीग (IUML) का झंडा है। आईयूएमएल (IUML) केरल में स्थित एक मुस्लिम राजनीतिक दल है।

किसी भी कांग्रेस नेता को 20 करोड़ नकदी के साथ नहीं पकड़ा गया था जिसे वह जेडीएस को देना चाहता था। लिंगयात मुद्दे में चर्च की भागीदारी के बारे में भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा साझा ईमेल नकली था। तथाकथित सोनिया गांधी को ‘बड़े पैमाने पर एक्सपोज़ बताते हुए’ लिंगायत मुद्दे का मास्टरमाइंड बताने वाला पोस्टकार्ड न्यूज़ का रिपोर्ट भी नकली था।

ऐसी सभी न्यूज़ का एक परिचित पैटर्न था – जो कांग्रेस, इसके नेताओं, मुसलमानों और ईसाइयों को बुरा दिखाने की कोशिश कर रहा था। यह वही विषय है जो बार-बार दिखाया जाता है।

विपक्ष के अलावा, फर्जी खबरों में पीएम मोदी की झूठी प्रशंसा दिखाने की जरूरत महसूस की। वाराणसी में पीएम मोदी रैली का एक पुराना वीडियो कर्नाटक चुनावों से पहले उनके समर्थकों द्वारा उडुपी रैली के रूप में साझा किया गया था। कर्नाटक के चुनावों से पहले इतनी नकली व झूठी ख़बरें थीं कि ऑल्ट न्यूज़ ने विशेष रूप से समर्पित राउंडअप किया था।

3. प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करते हुए झूठे बयान

ऑल्ट न्यूज ने विश्व प्रसिद्ध सम्मानित लोगो द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करते हुए आंकड़ों का दावा भी खारिज कर दिया जो उनके समर्थकों ने अति उत्साहित रूप से साझा की थी। मार्केटिंग गुरु फिलिप कोटलर, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, लुईस रिचर्डसन और विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने उन सभी आकड़ो और बयानों को फर्जी बताया

पीएम मोदी के प्रशंसको को और निराशा हाथ लगी जब इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति द्वारा उनकी प्रशंसा करना भी नकली साबित हुआ

4. प्रधानमंत्री मोदी ने तथ्यों के जानकारों को हमेशा व्यस्त रखा

कर्नाटक चुनाव में शामिल रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए दावों की पुष्टि करने में तथ्य जांचकर्ता व्यस्त रहे। अपनी खास शैली में उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर हमला किया, 1929 की एक घटना में कांग्रेस नेता द्वारा जेल में बंद भगत सिंह से न मिलने का आरोप लगाया था।

आल्ट न्यूज़ ने पाया कि पीएम मोदी का दावा पूरी तरह झूठा था, एक लेख में दिखाया गया कि कैसे पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भगत सिंह के 1929 में उनसे मिलने गए जब अंग्रेजो ने उन्हें जेल में बंद किया हुआ था।

Source: The Tribune

5. मुसलमानों और ईसाइयों को कोसना

अल्पसंख्यकों के संबंध में डर मनोविज्ञान पैदा करके हिंदुओं को एकजुट करना सोशल मीडिया पर हिंदुत्व समर्थक ग्रुप्स की हमेशा कोशिश रहती है और यही रणनीति मई के महीने में भी थी। यह रमजान का महीना था, फुटबॉल से संबंधित उपद्रव को और मुस्लिमों द्वारा दंगा करने के रूप में साझा किया गया था। मुसलमानों द्वारा नमाज की वजह से NEET परीक्षाओं में छात्रों के साथ ट्रेन में देरी हो जाने वाली खबर भी फर्जी साबित हुई थी।

देश की बड़ी समस्याओ को दरकिनार करते हुए जिन्ना का एक चित्र पुरे महीने के दौरान बहस का मुख्य केंद्र रहा। जैसा कि हमने अतीत में भी देखा है, इस विवाद ने आज़ादी वाले नारे के झूठे आरोपों का भी रूप लिया है। इस बार ये अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों के खिलाफ था।

मई के महीने में चर्च और ईसाईयों को निशाना बनाने वाली झूठी खबरे भी देखी गयी। तुतीकोरिन दंगों में शामिल तमिलनाडु चर्च के रूप में एक 10 साल पुराने वीडियो फिर से फैलाया गया था। इक्वाडोर के एक तस्वीर को नेपाल में एक ईसाई को जीवित जलाते हुए बताकर फैलाया गया, कारण उसे हिंदु धर्म के लोगो को धर्म परिवर्तन का दोषी दिखाया जो की पूरी तरह से फर्जी था।

6. सभी नकली खबर दक्षिणपंथी वर्ग ही नहीं फैलाते

हालांकि झूठी खबरों के मामलों में दक्षिणपंथी वर्ग हमेशा आगे रहते हैं, पर हमने कांग्रेस समर्थकों के उदाहरणों को भी देखा। व्हाइट हाउस ने मनमोहन सिंह को सबसे ईमानदार राजनेता घोषित नहीं किया था लेकिन कांग्रेस समर्थक हमें यह विश्वास दिलाना चाहते थे। फिर ना ही बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी का समर्थन किया था।

दुनिया के सबसे भ्रष्ट प्रधानमंत्री की रैंकिंग में पीएम मोदी का लिस्ट में नाम नकली निकला और इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी को नाथुरम गोडसे के गले में माला डालते हुए फोटो भी फर्जी निकला।

नकली खबरों के एक अन्य उदाहरण में 10 साल पुराने वीडियो को बीजेपी आरएसएस कैडर के रूप में चर्च पर हमला करते हुए दिखाया जा रहा था जो कि फर्जी था।

उपरोक्त झूठी ख़बरें केवल एक छोटा हिस्सा है जो मई महीने के दौरान खूब प्रसारित किया गया था। पर ऐसे फर्जी ख़बरें सोशल मीडिया पर बहुत है। प्रवृत्तियों पर नजर डालने से ऐसा लगता है कि नकली खबरों का खतरा निकट भविष्य में समाप्त नहीं होने वाला। बजाए इसके, 2019 के आम चुनावों में, हमें नकली खबरों में तेजी दिखने की संभावना दिखाई दे रही है और इस बार, कांग्रेस समर्थक भी ऐसी ही रणनीति अपनाते दिख रहे हैं। ऐसे हालातों में, सोशल मीडिया यूजर्स को कोई भी आने वाली जानकारी पर विश्वास करने से पहले उसकी जांच करनी चाहिए व् बिना सोचे समझे उसे शेयर करने से बचना चाहिए।

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