नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं के ख़िलाफ़, सोनम वांगचुक के साथ नेहा, मनीष और आमीन भी पिछले 20 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे हैं. 18 जुलाई की सुबह सोनम वांगचुक को वहां से जबरन हटाकर अस्पताल में भर्ती कर दिया गया. लेकिन इन तीनों छात्रों के अलावा और भी कई लोग हैं जो जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे हैं. कोई 16 दिन, कोई 11 दिन, कोई 8 दिन तो कोई 6 दिन, लगातार लोग अपना समर्थन दिखाते हुए भूख हड़ताल प्रदर्शन का हिस्सा बनते जा रहे हैं. यहां तक कि सोशल मीडिया पर लोग वीडियो शेयर करते हुए समर्थन में पूरे दिन भूखे रह रहे हैं.

नेहा, मनीष और आमीन ने सोनम वांगचुक के साथ ही भूख हड़ताल की शुरुआत की थी. ये ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े पीएचडी स्कॉलर्स हैं, जिनकी शारीरिक हालत अब गंभीर होती जा रही है, लेकिन उन्हें मुख्यधारा मीडिया में उतनी जगह नहीं मिल पा रही, जिसके वो हकदार हैं. पिछले 21 दिनों से ये भूख हड़ताल पर हैं. ये पूरा आंदोलन एक साझा उद्देश्य के तहत चल रहा है, और इसी साझे उद्देश्य के भीतर मौजूद अलग-अलग आवाज़ों, संघर्षों और तकलीफ़ों को समझने के लिए ऑल्ट न्यूज़ ने मौके पर जाकर प्रदर्शनकारियों से बात की.

17 जुलाई को ऑल्ट न्यूज़ जंतर-मंतर पर पहुंचा. मुख्य मंच के बाईं ओर हमने तीन पोस्टर लटके हुए देखे, उन पर ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े छात्र नेता मनीष, नेहा और आमीन की तस्वीरें थीं. साथ ही, उनकी भूख हड़ताल के बीसवें दिन उनके ज़रूरी स्वास्थ्य आंकड़ों की जानकारी भी दी गई थी, जिसमें ब्लड प्रेशर, कीटोन लेवल, ब्लड शुगर और हड़ताल शुरू होने के बाद से उनके वज़न में आई कमी शामिल थी.

भूख हड़ताल पर बैठे ये तीनों अनशनकारी बात करने की हालत में नहीं थे, इसलिए उनकी तरफ से उनके साथी उनका प्रतिनिधि बनकर हमसे बातचीत किये. आइसा की तरफ से धरनास्थल पर मौजूद शाहिद, जो खुद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से समाजशास्त्र में मास्टर्स कर रहे हैं, उन्होंने अनशन पर बैठे अपने तीनों साथियों का परिचय कराया. मनीष इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर हैं और मूल रूप से उत्तर प्रदेश से हैं. नेहा जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रही हैं और उत्तराखंड से आती हैं. आमीन अंबेडकर यूनिवर्सिटी से पीएचडी की पढ़ाई कर रहे हैं और पंजाब के रहने वाले हैं. शाहिद कहते हैं, “ये तीनों बेहतरीन संस्थानों के होनहार रिसर्चर हैं, लेकिन यहां इसलिए बैठे हैं क्योंकि सत्ता में बैठे लोग जवाबदेही को अपनी ज़िम्मेदारी नहीं मानते.”

इन तीनों अनशनकारियों की स्वास्थ्य पर शाहिद गंभीर चिंता जताते हुए कहते हैं, “डॉक्टरों के मुताबिक, तीनों साथियों का शरीर अब ‘स्टार्वेशन मोड’ में चला गया है. सबसे चिंताजनक स्थिति नेहा की है, जिनका ब्लड ग्लूकोज़ स्तर लगातार गंभीर सीमा पर बना हुआ है. आमीन और मनीष का वज़न भी तेज़ी से गिरा है. मनीष का वज़न दस किलो से ज़्यादा कम हो चुका है.” शाहिद के मुताबिक, एक डॉक्टर ने चेतावनी दी है कि आमीन की हालत हाइपोवोलेमिक शॉक की दिशा में बढ़ सकती है. शाहिद यह भी बताते हैं कि इन्हें आज ही नॉर्मल खाना नहीं खिलाया जा सकता क्यूंकि शरीर इतना कमज़ोर हो चुका है कि सामान्य भोजन पचा पाना मुश्किल होगा, इन्हें लिक्विड डाइट पर ही जाना होगा.

घर-परिवार के समर्थन को लेकर शाहिद बताते हैं, “आमीन की बहन खुद उनके साथ धरनास्थल पर मौजूद हैं और उनके माता-पिता भी बीच-बीच में मिलने आते रहे हैं. मनीष के परिजन भी नियमित रूप से आते-जाते रहते हैं. लेकिन नेहा के घरवाले उस तरह नहीं आ पा रहे, क्योंकि जब महिलाएं राजनीतिक आंदोलनों का हिस्सा बनती हैं तो अक्सर परिवारों की प्रतिक्रिया अलग तरह की होती है. यह एक अतिरिक्त दबाव है जिससे कई महिला कार्यकर्ताओं को जूझना पड़ता है.”

धरनास्थल पर मिलने आ रहे लोगों को लेकर शाहिद बताते हैं, “जनसमर्थन भारी मात्रा में मिल रहा है. कई अभिभावक हाथ जोड़कर माफ़ी मांगते हुए आ रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्होंने ग़लती से भाजपा को वोट दिया. कांग्रेस नेता पवन खेड़ा जैसे विपक्षी नेताओं का धरनास्थल पर आना भी एक सकारात्मक संकेत है.” हालांकि, शाहिद ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें भाजपा सरकार से बहुत उम्मीद नहीं है, उनकी मांग साफ़ है, जिसमें धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, एनटीए जैसी निजी और गैर-जवाबदेह संस्था को हटाना, और नई शिक्षा नीति 2020 को वापस लाना शामिल है. वहीं मीडिया के रवैये पर नाराज़गी जताते हुए शाहिद बताते हैं कि यहाँ पर कुछ मीडियाकर्मियों द्वारा कैमरे और माइक ज़बरदस्ती लोगों के सामने लाकर विवादास्पद सवाल पूछे जाते हैं और डॉग-व्हिसल किया जाता है.

धरनास्थल पर रोज़ाना पहुंचकर अनशनकारियों की जांच कर रहीं डॉ. तिलोपा, जो एमबीबीएस-एमडी हैं और आइसा के बुलावे पर यहां आ रही हैं, उन्होंने हमें नेहा, आमीन और मनीष की सेहत को लेकर जानकारी दी. उनके मुताबिक, “ये तीनों बीस दिन से अनशन पर हैं, इसलिए अन्य अनशनकारियों की तुलना में इनकी हालत ज़्यादा गंभीर है. तीनों का ब्लड प्रेशर और शुगर लोअर साइड पर है, और सभी का दस प्रतिशत से ज़्यादा वजन कम हो चुका है.” डॉ. तिलोपा बताती हैं कि जब भी दस प्रतिशत से ज़्यादा वज़न घट चुका हो, तो दोबारा भोजन शुरू करने की प्रक्रिया भी जोखिम भरी हो जाती है और इसे डॉक्टर्स की देखरेख में ही करना होगा.

डॉ. तिलोपा के मुताबिक “तीनों छात्रों में कीटोसिस की स्थिति देखी जा रही है, जो तब होती है जब ब्लड शुगर पूरी तरह ख़त्म हो जाता है और शरीर पहले फैट स्टोर से, फिर मांसपेशियों से ग्लूकोज़ निकालना शुरू करता है. इसी वजह से इन्हें चलने-फिरने में दिक्कत हो रही है.”

डॉ. तिलोपा ने कहा कि मनीष के मसूड़ों से खून आना शुरू हो गया है, जिसे वे फ़िलहाल एक छोटी समस्या मानती हैं, लेकिन बाक़ी लक्षण गंभीर हैं. उनका मानना है कि अगर अनशन और लंबा चला तो मसल वेस्टिंग अभी की रिवर्सिबल स्टेज से इरिवर्सिबल स्टेज में जा सकती है, शॉक की आशंका बढ़ सकती है, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन से किडनी और लिवर को नुकसान पहुंच सकता है, और दौरे तक की नौबत आ सकती है.

डॉक्टर ने तीनों में सबसे चिंताजनक हालत नेहा की बताई, जिनका ब्लड शुगर काफी कम है और रोज़मर्रा की गतिविधियों में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है. डॉ. तिलोपा के मुताबिक, “अगर कल ही अनशन तोड़ दिया जाए तो भी पूरी तरह स्वस्थ होने में एक हफ्ते से दस दिन तक का वक़्त लगेगा, और यह हर व्यक्ति के शरीर पर निर्भर करेगा.”

भूख हड़ताल पर बैठे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े मनीष की पत्नी सीमा, जो खुद लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हैं, एक जुलाई से लगातार धरनास्थल पर मौजूद हैं. वे बताती हैं कि सुबह दस बजे तक वे पहुंच जाती हैं, और दिनभर भीषण गर्मी और ह्यूमिडिटी के बीच लगातार वहीं पर बनी रहती हैं. हालांकि, वे खुद अनशन पर नहीं हैं, फिर भी दिन भर में कई लोग मिलने आते हैं जिससे यहाँ बहुत भीड़ हो जाती है, उसमें भी उन्हें लोगों को संभालना पड़ता है, जिससे उनके लिए भी पूरा दिन बेहद थकाने वाला हो जाता है.

मनीष की सामान्य दिनचर्या के बारे में सीमा बताती हैं, “पहले से ही राजनीतिक रूप से सक्रिय होने और रिसर्चर होने की वजह से उनका ज़मीनी काम ज़्यादा रहता है, इसलिए खाना-पीना पहले से ही अनियमित रहता था. लेकिन जो भी मिलता, वे बिना नखरे किए खा लेते थे.” सीमा बड़े मार्मिक ढंग से बताती हैं कि मनीष को पहले खाने से एक लगाव था, अब बीस दिन में वो सिर्फ पानी पर टिके हुए हैं.

सीमा बताती हैं, “मनीष का वज़न 86 किलो था, जिसमें अब करीब साढ़े दस किलो की कमी आ चुकी है. वे कहती हैं कि रोज़ाना की मेडिकल रिपोर्ट में सामान्य दिन और अनशन के दिन का अंतर साफ़ झलकता है, लेकिन इसके बावजूद हौसला बना हुआ है, और बीस दिन तक टिके रहना अपने आप में एक बड़ी बात है. घर पर मां और नानी की चिंता बहुत ज़्यादा है, क्योंकि मनीष घर के बड़े बेटे हैं. जब भी बात होती है तो मां की आंखों में आंसू आ जाते हैं और वे किसी तरह अनशन छुड़वाने की कोशिश करती हैं, जबकि पिता हौसला देते हुए स्वास्थ्य का ख़याल रखने की सलाह देते हैं.”

अनशन करने वालों की लिस्ट

धरनास्थल पर हमें भूख हड़ताल पर बैठे कुछ लोगों की एक लिस्ट भी दीवार पर चिपकी हुई नज़र आई. धरनास्थल पर सिर्फ कॉकरोच जनता पार्टी, आइसा से जुड़े स्कॉलर ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो किसी संगठन से जुड़े बिना अपने स्तर पर अनशन कर रहे हैं.

ग़ाज़ियाबाद से टीचर और हालत बिगड़ने पर सोलहवें दिन अपना अनशन तोड़ने वाली शीतल बताती हैं कि इस लिस्ट में जिन लोगों का अनशन कम-से-कम तीन दिन तक चलता है, उन्हीं का नाम आधिकारिक सूची में दर्ज किया जाता है. एक दिन के लिए अनशन करने वालों की तादाद कहीं ज़्यादा है. ख़ासतौर पर जिस दिन ‘मास हंगर स्ट्राइक’ का आयोजन हुआ, उस दिन धरनास्थल पर मौजूद बड़ी संख्या में लोगों ने एक दिन का अनशन रखा, और कई लोग अपने घर से भी सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करते हुए समर्थन में पूरे दिन भूखे रहे.

शीतल बताती हैं कि प्रदर्शन में शामिल होने की वजह से उन्होंने अपनी प्राइवेट स्कूल की नौकरी तक छोड़ दी. शीतल ने सोनम वांगचुक के साथ ही भूख हड़ताल शुरू किया था और सोलहवें दिन दोपहर साढ़े बारह बजे उन्होंने अपना भूख हड़ताल तोड़ा. वे बताती हैं कि सिर्फ नमक-पानी के सहारे रहते हुए आख़िरी तीन दिन बेहद मुश्किल हो गए थे, उनका ब्लड प्रेशर 120/80 से गिरकर 80-90 तक पहुंच गया था और पंद्रहवें-सोलहवें दिन उल्टियां शुरू हो गई थीं.

शीतल के मुताबिक, उनके साथ सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाले सौरभ यादव भी अनशन पर थे, जिनका अनशन ग्यारहवें दिन टूटा. मुज़फ्फरनगर के 47 वर्षीय किसान अमित कुमार नीती ने भी सोनम वांगचुक के साथ ही अनशन शुरू किया था और ग्यारहवें दिन चिकित्सीय कारणों से इसे तोड़ना पड़ा.

अमित बताते हैं कि अनशन तोड़ने के अगले दिन सुबह जब वे मुज़फ्फरनगर से वापस लौट रहे थे तो अचानक आंखों के आगे अंधेरा छा गया और बाइक से गिरकर घुटने में चोट लग गई. अमित का कहना है कि एक ग़रीब और किसान परिवार अपने बच्चों को ज़मीन बेचकर, कर्ज़ लेकर पढ़ाता है, और पेपर लीक जैसी घटनाएं उनके बच्चों का भविष्य बर्बाद कर देती हैं, इसीलिए वे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और मामले की जांच की मांग करते हैं.

बिहार मूल के राजेश कुमार वर्मा का दिल्ली में किताबों का कारोबार है. वे आठवें दिन अनशन तोड़ने के बाद कुछ दिन का अंतराल लेकर दोबारा तीन दिन के अनशन पर बैठे. अब वे अनशन तोड़ चुके साथियों के लिए घर का बना खाना पहुंचाने का काम कर रहे हैं, क्योंकिउनके मुताबिक, लंबे अनशन के बाद बाज़ार का खाना पचाना मुमकिन नहीं होता.

यश मिश्रा एक अमेरिकी कंपनी के लिए डेट रिकवरी का काम करते हैं. उन्होंने छठे दिन अनशन तोड़ा. सईद नाम के एक अनशनकारी का शुगर लेवल 40 के आसपास तक गिर गया था, जिसके बाद चौथे दिन जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया गया.

हरियाणा के अभिषेक पांचवें दिन अनशन तोड़ चुके हैं और अब बीच-बीच में धरनास्थल पर आते हैं. बिना किसी ख़र्च के पूरे भारत में घूमने वाले यात्री फ़ारुख़ ख़ान यहां संयोगवश पहुंचे थे, लेकिन पहले से अनशन कर रहे लोगों से प्रभावित होकर रुक गए और पांचवें दिन कमज़ोरी के चलते अनशन ख़त्म किया. मीर हुसैन का अनशन पांचवें दिन जारी था. ऑल्ट न्यूज़ जब अनशनस्थल पर पहुंचा तो राजस्थान से आए संजय नोटिया का उस वक़्त भूख हड़ताल का तीसरा दिन चल रहा था.

छात्रों के अभिभावक भी कर रहे अनशन

धरनास्थल पर सिर्फ छात्र ही नहीं, बल्कि कई अभिभावक भी अनशन में शामिल हैं. मुज़फ्फरनगर के 47 वर्षीय किसान अमित कुमार नीती भी उन्हीं में से एक अभिभावक हैं जिन्होंने 10 दिनों तक भूख हड़ताल किया और ग्यारहवें दिन स्वास्थ्य कारणों से उन्हें अनशन तोड़ना पड़ा. अमित बताते हैं कि उनके अपने बेटे ने एसएससी और आईबी जैसी परीक्षाएं दीं. बेटे ने ही उन्हें आंदोलन के बारे में बताया और खुद पढ़ाई में व्यस्त होने के कारण पिता को धरनास्थल पर भेजा. उन्होंने कहा, “यह लड़ाई सिर्फ आज के छात्रों की नहीं, आने वाली पीढ़ियों और राष्ट्र के भविष्य की भी है.”

धरनास्थल पर बना यह पूरा माहौल 18 जुलाई की सुबह अचानक बदल गया, जब दिल्ली पुलिस के जवान सुबह क़रीब सात बजे जंतर-मंतर पहुंचे और सोनम वांगचुक को धरनास्थल से हटाकर सफ़दरजंग अस्पताल लेकर चले गए, जहां उन्हें भर्ती कराया गया. दिल्ली पुलिस के मुताबिक यह कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश और डॉक्टरों की सलाह पर, सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत को देखते हुए की गई.

कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक को ज़बरन ले जाया गया और पुलिस लोगों को पीट भी रही थी. दीपके ने ट्वीट कर ख़ुद पर भी पुलिस द्वारा हमला किए जाने और हिरासत में लिए जाने का दावा किया, और यह भी कहा कि अब उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है. इसके साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि दिल्ली पुलिस रात में या सुबह प्रोटेस्ट पर सख्ती करने की प्लानिंग कर रही है. उन्होंने लोगों से अपील की कि वे जंतर-मंतर पर रात के पहरे में शामिल हों, ताकि 20 तारीख को संसद तक मार्च कर सकें.