आयुष मंत्रालय ने 24 अप्रैल, 2020 को कोविड-19 महामारी के लिए एक औषधीय उत्पाद आयुष क्वाथ का प्रमोशन किया था. कहा गया था कि यह कोरोना से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का काम करेगा. मंत्रालय ने राज्य व केंद्रशासित सरकारों से आग्रह किया था कि वे आयुष लाइसेंसिंग नियामकों को निर्देश जारी करें, ताकि आयुष क्वाथ औषधि बनाने में रुचि रखने वाले सभी लाइसेंस धारकों (आयुर्वेद/सिद्ध/यूनानी आदि ) को इसके उत्पादन की अनुमति मिल सके.

आयुष क्वाथ बनाने के लिए जिन जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल रिकमेंड किया जाता है वो इस प्रकार हैं –

1. तुलसी (Ocimum sanctum) के पत्ते – 4 भाग
2. दालचीनी (Cinnamomum zeylanicum) – 2 भाग
3. अदरक (Zingiber officinale) – 2 भाग
4. काली मिर्च के (Piper nigrum) दाने -1 भाग

इसके बाद 4 जुलाई, 2020 को केन्द्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने नोवल कोरोना वायरस संक्रमण से लड़ने के लिए दो इम्यूनिटी बूस्टर्स, आयुष क्वाथ और गिलोय चाय का लोकार्पण किया जिसे मुंबई के विभा नेचुरल प्रोडक्ट्स नाम की कंपनी ने बनाया है.

इसके बाद कई लोग इस काढ़े का अपना वर्ज़न ईज़ाद करने में लगे हैं और औषधि बाज़ार ने आयुष क्वाथ के कई जेनेरिक (साधारण) उत्पाद बनाये और बेचे. एक दवा उत्पादक न्यूट्रिली ने आयुष क्वाथ की बोतल पर ‘कोविड-19’ का लेबल भी लगाया था.

बैद्यनाथ के एक विज्ञापन में दावा किया गया था कि आयुष क्वाथ के तुलसी और दालचीनी जैसे अंश इम्यूनिटी बढ़ाते हैं. ‘कूडोस आयुर्वेद’ नामक कंपनी ने अपने विज्ञापन में दावा किया कि अधिक समय तक उपयोग करने से न कोई साइड इफ़ेक्ट, न ही कोई संक्रमण होगा. नेचुरोवेदा ने अपने विज्ञापन में लोगों से गले में ख़राश या सर्दी जु़क़ाम होते ही आयुष क्वाथ लेने को कहा.

आयुर्वेद विशेषज्ञ आचार्य मनीष ने भी दावा किया था कि “आयुष क्वाथ कोविड-19 के सभी लक्षणों पर काम करता है.” शुद्धि आयुर्वेद क्लीनिक के प्रोडक्ट पेज पर आयुष मंत्रालय द्वारा रिकमेंड किये गए आयुष क्वाथ के बारे में दावा किया गया है कि “आयुष क्वाथ ही कोविड-19 से लड़ने का इकलौता स्वीकृत और संभव उपाय है.”

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दावे

1. कोविड-19 से बचाव और इलाज के लिए इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) बूस्ट की जाती है.

2. प्राकृतिक औषधि कोविड-19 संक्रमण से बचाव के लिए इम्यूनिटी बूस्ट करते हैं.

3. आयुष क्वाथ (औषधि) कोविड-19 से लड़ने के लिए इम्यूनिटी प्रदान करता है.

4. आयुष क्वाथ की जड़ी बूटियां कोविड-19 से लड़ने के लिए इम्यूनिटी बूस्ट करती हैं.

5.आयुष क्वाथ के लम्बे समय तक उपयोग से कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं है.

नतीजा:

गलत

फ़ैक्ट-चेक

1.कोविड-19 के कई गंभीर मामलों में इम्यूनिटी बढ़ाने की बजाय उसे दबाया जाता है.

हमारे इम्यून तंत्र के 2 मुख्य भाग हैं, सामान्य/प्राकृतिक और विशिष्ट/अनुकूलिक प्रतिरक्षा. यह ऑल्ट न्यूज़ के पिछले साइंस आर्टिकल में विस्तार से बताया गया था.

रोग के प्रति अपनी इम्यूनिटी बूस्ट करने का क्या मतलब है?

इम्यूनिटी बूस्टर कोई चिकित्सीय शब्द नहीं है. यह आमतौर पर उन सभी खाद्य पदार्थों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिनमें एंटीऑक्सीडेंट क्षमता होती है. यह हमारे संतुलित आहार का ही एक हिस्सा है जो शरीर में इम्यूनिटी और स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करता है. लेकिन यह हमारे प्राकृतिक प्रतिरक्षा क्षमता से आगे कोई तथाकथित इम्यूनिटी बूस्टर का काम नहीं करते. एक स्वस्थ इम्यून सिस्टम तभी बनता है जब हम संतुलित भोजन करते हैं, पर्याप्त नींद लेते हैं, व्यायाम करते और विटामिन D के लिए आवश्यकता अनुसार धूप लेते हैं. वह भी तब, जब व्यक्ति को इम्यूनिटी से जुड़ा कोई रोग जैसे एड्स, बोन मैरो कैंसर न हो, न ही वह किसी कीमोथेरेपी या स्टेरॉइड्स जैसे इम्यून परिवर्तक इलाज से गुज़र रहा हो.

अत्यधिक सक्रिय इम्यून के कारण एलर्जी और ऑटोइम्यून से जुड़ी बीमारियां होती हैं

इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने की बात इस अधूरी धारणा से निकलती है कि हमारा इम्यून सिस्टम सदैव हमारी रक्षा ही करता है. लेकिन ऐसे कई विशेष परिस्थितियों में हमारा वही इम्यून सिस्टम कई बार विभिन्न तरह के विकारों को जन्म दे देता है जो ’हाइपर सेंसटिविटी’ के अंदर गिने जाते हैं. हाइपर सेंसटिविटी विकारों के दौरान हमारी प्रतिरक्षा तंत्र अत्यधिक सक्रिय हो जाती है और हमारे ही शरीर को नुकसान पहुंचाने लगती है. इन विकारों के सबसे बड़े उदाहरण एलर्जिक रिएक्शन हैं जिसमें कुछ विशिष्ट पदार्थों के संपर्क में आते ही हाइपर सेंसटिविटी रिएक्शन हो जाता है. जैसे, मेवे (नट्स एंड ड्राई फ्रूट्स), धूल, फूलों के पराग (पल्लेन) आदि. सोराइसिस, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, सिस्टमिक लुपस एरीथमेटोसस आदि ’ऑटो इम्यून’ बीमारियों के कुछ उदाहरण हैं.

कुछ गंभीर कोविड-19 मामलों में इम्यूनिटी बढ़ाने नहीं बल्कि घटाने की ज़रूरत पड़ती है

कोरोना संक्रमण के कई गंभीर मामलों में मरीजों में ‘साइटोकाइन स्टॉर्म’ देखने को मिल रहा है, जो कई युवा और स्वस्थ लोगों की मौत का कारण बन रहा है, जबकि उन्हें पहले से शुगर था ब्लड प्रेशर की कोई भी बीमारी नहीं थी. ‘साइटोकाइंस’ प्रोटीन सिग्नलिंग करने वाले अणु होते हैं जो इम्यूनिटी और इन्फ्लमेशन में मध्यस्थता और नियंत्रण करते हैं. लेकिन कई संक्रमण और गैर संक्रमण वाले रोगों में रक्त के बहाव में अत्यधिक साइटोकाइंस का प्रवाह होने लगता है. कोविड-19 मामले में साइटोकाइंस के इस तूफ़ान के बाद हमारा इम्यून सिस्टम हमारे शरीर पर ही आघात कर देता है जिससे ARDS (एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम) हो जाता है और शरीर के विभिन्न अंग काम करना बंद कर देते हैं. ऐसे गंभीर मामलों में इलाज के दौरान मरीजों के इम्यून सिस्टम को दबाने की कोशिश होती है. इसलिए ऐसी परिस्थिति में डेक्ज़ामेथासोन जैसे स्टेरॉइड्स को देकर इम्यून सिस्टम को दबाकर मरीज़ की कोविड-19 से मौत होने से रोकी जाती है.

अधिकतर कोरोना मरीज खुद ठीक हो जाते हैं और इम्यू इम्यूनिटी बूस्ट करने से मौतों को नहीं रोका जा सकता

कोविड-19 के अधिकांश मरीज अपने आप ठीक हो जाते हैं और इम्यूनिटी बूस्टर होने का दावा करने वाले उत्पादों का लाभ नहीं होता, कोविड-19 के कई गंभीर मामलों में डेक्ज़ामेथासोन जैसी स्थापित दवाओं के माध्यम से इम्यून सिस्टम को दबाने (बढ़ाने के बजाय) की आवश्यकता होती है।

हालांकि काढ़ा/आयुष क्वाथ के प्रभाव का कोई भी ​​प्रमाण नहीं है, गंभीर कोविड-19 रोगियों की इम्यूनिटी बढ़ाना गलत होगा, जिनमें से कई मरीज़ अतिसक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली की वजह से मर जाते हैं।

2. क्या ये जड़ी बूटियां कोरोना वायरस से लड़ने के लिए इम्यूनिटी बूस्ट कर सकते हैं?

केवल अनुकूलिक प्रतिरक्षा तंत्र ही रोगाणुओं के प्रति विशिष्ट होती है. इसलिए सैद्धांतिक रूप से कोविड-19 के प्रति इम्यून सिस्टम को तैयार करने के केवल 2 उपाय हैं. या तो वैक्सीन या पूर्व मरीजों के ऐंटीबॉडीज़ वाला प्लाज़्मा.

न ही प्राकृतिक भोजन/औषधि, और न ही कोई कृत्रिम एंटीवायरल दवा वह इम्यूनिटी पैदा करती है कि हम कोविड-19 के संक्रमन से बच सकें.

3. आयुष क्वाथ (काढ़ा) कोरोना से लड़ने के लिए इम्यूनिटी बूस्ट नहीं करता है

खनाल. पी et. al. (2020) के एक प्रिंटिंग कंप्यूटर सिम्युलेशन स्टडी (मतलब ऐसा शोध जिसमें किसी भी मनुष्य या जानवर पर प्रयोग ना हुआ हो और ना ही उस क्षेत्र के अन्य वैज्ञानिकों ने उसकी समीक्षा की हो) का लक्ष्य आयुष मंत्रालय द्वारा अनुशंसित काढ़े को कोरोना जैसे जानलेवा संक्रमण के खिलाफ इम्यूनिटी बूस्टर के तौर पर स्वीकृति देना है. उन्होंने 6 जड़ी-बूटियों का चुनाव किया जिनमें से 4 का इस्तेमाल आयुष क्वाथ में किया गया है, जो इम्यून सिस्टम के अलग-अलग भागों को नियंत्रित करते हैं. यह शोध केवल कंप्यूटर सिम्युलेशन के द्वारा किया गया और किसी भी सजीव या कोशिका पर कोई भी प्रयोग नहीं किया गया. साफ है कि यह शोध covid-19 के लिए आयुष क्वाथ या काढ़े, किसी के भी प्रभाविकता का प्रमाण नहीं देता.

आयुष क्वाथ फॉर्मूलेशन पर कोई भी शोध नहीं है. यानी कि इसके प्रभाव को लेकर कोई भी वैज्ञानिक स्वीकृति या अवलोकन के बजाय सिर्फ सिद्धांत दिया गया है.

4.आयुष क्वाथ या कोई भी अन्य औषधि covid-19 से लड़ने के लिए इम्यूनिटी बूस्ट नहीं करते

चलिए इन औषधियों से जुड़े पिछले क्लिनिकल ट्रायल के प्रमाणों की मदद से वायरल इंफ़ेक्शन के खिलाफ इनके इम्यूनोमाड्यूलेशन (बढ़ाना या घटाना) के प्रभाव को देखते हैं. इम्यूनोमाड्यूलेशन का मतलब ऐसे प्रक्रिया से हैं जिसमें इम्यून की प्रतिक्रिया एक वांछिक स्तर पर लाई जाती है, इसमें अति सक्रिय इम्यून रिस्पांस को बढ़ाया या घटाया जा सकता है.

तुलसी

मोंडल एस. et. al.(2011) ने 22 स्वस्थ वॉलंटियर्स पर एक डबल ब्लाइंडेड कंट्रोल्ड ट्रायल किया था. उन्होंने पाया कि 4 हफ्ते बाद प्लेसिबो (बेअसर पदार्थों से बनी गोली) लेने वालों के मुकाबले तुलसी का रस ग्रहण करने वालों में आईएफएन, IL-4 (साइटोकाइन) और T- हेल्पर कोशिका और NK (सफेद रक्त कोशिका) का स्तर बढ़ गया है. हालांकि स्वस्थ वालंटियर की उपलब्धता के मुकाबले 22 लोगों का सैंपल बहुत छोटा है और इस पर अधिक जानकारी के लिए आगे भी शोध करने की ज़रूरत है. जैसा कि हमने देखा अगर तुलसी लेने से साइटोकाइन बढ़ता है तो यह गंभीर कोरोना मरीजों के लिए बहुत नुकसानदेह हो सकता है.

वायरल संक्रमण से बचने के लिए तुलसी के उपयोग को लेकर 2 शोध हो चुके हैं और दोनों में ही प्रणालियों में गुणवत्ता की भारी कमी दिखी है. पहले शोध में राजलक्ष्मी et. al(1986) ने 20 वायरल हेपेटाइटिस मरीजों पर शोध किया था. यह दर्शाता है कि तुलसी लेने के बाद चिकित्सीय सुधार हुए हैं लेकिन सैंपल साइज इतना छोटा है और किसी अन्य ग्रुप से इसकी तुलना भी नहीं की गई. दूसरा शोध दास (1983) ने किया था. इसमें भी वायरल इंसेफेलाइटिस के14 केसेज़ का बहुत ही छोटा सैंपल साइज़ था. हमने ऑल्ट न्यूज साइंस आर्टिकल में पहले भी विस्तार से बताया था कि सैंपल साइज ज्यादा छोटा होने से और क्लिनिकल ट्रायल में कंट्रोल ग्रुप न होने से क्या प्रभाव पड़ता है.

दालचीनी

पिछले साइंस आर्टिकल में हमने बताया था कि कुछ शोध स्ट्रैप्टॉकोक्कस म्यूूटंस और लैक्टोबैसिलस प्लांट्रम जैसे बैक्टेरिया और कैंडीडायसिस जैसे फंगल इंफे़क्शन में दालचीनी के एंटीबैक्टीरियल असर दर्शाते हैं, लेकिन क्योंकि यह असंगठित प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है इसे अभी और प्रमाण की जरूरत है (Ulbricht, C. et al. 2011). हालांकि दालचीनी पर ऐसा कोई भी चिकित्सीय शोध नहीं है जो स्वस्थ लोगों या किसी भी वायरल इन्फे़क्शन पर इम्यूनोमोड्यूलेटरी प्रभाव दिखाए.

काली मिर्च

किसी भी इंफे़क्शन या इम्यूनोमोड्यूलेटरी इफेक्ट के लिए काली मिर्च के प्रभाव पर कोई भी शोध नहीं किया गया है. डब्ल्यूएचओ ने भी काली मिर्च से कोविड-19 के इलाज की बात खारिज की थी (इंफोग्राफिक देखें).

सोंठ (सूखा अदरक)

सोंठ से वायरल इनफेक्शन पर प्रभाव बताने वाला कोई भी चिकित्सीय शोध अभी तक नहीं मिला है.

स्टीफे़नो, D. et al.(2019) के एक शोध में 10 स्वस्थ लोगों को सॉफ्टजेल कैप्सूल में एखिनेसिया अंगस्टीफोलिया और ज़िंगीबर ऑफिशिनेल (अदरक) का मिश्रण देने के बाद उन पर इम्यूनोमोड्यूलेटरी प्रभाव दिखाई दिया था. उन्होंने सफेद रक्त कोशिकाओं (शरीर में इम्यून के लिए काम करने वाले कोशिका) में ज़ीन पर एक्सप्रेशन को नापा और उन्होंने पाया कि उन कैप्सूल्स को खाने के बाद इन ल्यूकोसाइट्स में 500 ज़ीन पर उनका एक्सप्रेशन (वह प्रक्रिया जिससे जींस प्रोटीन बनाते हैं) पड़ा था. इन सब के नतीजे के रूप में ल्यूकोसाइट की प्रक्रिया इन्फ़्लमेशन को दबाने में हो रही थी जो इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया है. यानी कि दावों के उलट जिसमें बूस्टिंग की बात कही गई थी, शोध के बाद पता चला कि इस मिश्रण का इम्यूनोमोड्यूलेशन इम्यून को दबाने के लिए दिया जाने वाला स्टेरॉइड ड्रग हाइड्रोकॉर्टिसोन की तरह काम करता है.

यानी ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो बता सके कि इनमें से कोई भी दवाई (बेशक अकेले ही क्यों ना ली जाए) कोविड-19 के पेशेंट को किसी भी रूप में मदद कर पाएगी. इसके साथ ही इन औषधियों और इनके अंशो के डोसेज और इम्यूनिटी माड्यूलेशन के ऊपर कोई भी ऐसा शोध नहीं है.

5. आयुष क्वाथ में मिले औषधियों के साइड इफ़ेक्ट हो सकते हैं

क्योंकि आयुष क्वाथ पे कोई क्लिनिकल ट्रायल नहीं की गई है, इसके पदार्थों के बीच इंटरैक्शन होने की संभावना का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता. मगर इन जड़ी बूटियों से होने वाले कुछ ज्ञात साइड इफ़ेक्ट्स देखिये:

दालचीनी

दालचीनी के सप्लीमेंट लेने से अक्यूट हेपेटाइटिस हो सकता है; दालचीनी तेल और दालचीनी फ्लेवर के चिंगम च्युइंग गम डर्मेटाइटिस और अन्य एलर्जी रिएक्शन हो सकते हैं. (Hajimonfarednejad, M. et al. 2019).

सूखा अदरक

कुछ मरीजों में सूखा अदरक यानी सोंठ खाने से लीवर पर बुरा असर (Suzuki, Y. et al. 2015) पड़ सकता है. इसका गर्भावस्था में मिचली और उल्टी के लिए चिकित्सीय इस्तेमाल करने वालों में ये पाया गया कि ये गर्भ व्यवस्था की अवधि को छोटा कर सकता है और नवजात शिशु भी छोटी खोपड़ी के साथ पैदा हो सकता है. (Trabace, L. et al. 2015)

काली मिर्च

काली मिर्च का मुख्य भाग पिपेरिन, खून में रीफै़पिसिन, सल्फ़ाडायजीन, टेट्रासाइलक्लाइन और फ़ेनीटोइन के रक्त स्तर को बड़ा देता है जो मरीज़ के साइड इफे़क्ट्स के लिए और भी बुरा है (Velpandian, T. et al. 2001). यह गैस्ट्रिक एसिड के स्त्राव, पोटैशियम के उत्सर्जन और गैस्ट्रिक कोशिका के हटने या मुक्त होने की प्रक्रिया को भी तेज़ कर देता है. (Srinivasan, K. 2007)

तुलसी

पशुओं पर किए गए शोध से पता चला है कि तुलसी रक्त के बहाव का समय बढ़ा सकती है. (Singh, S. et al. 2001) और रक्त में से शुगर भी कम कर देती है. (Gholap, S. .et al. 2004)

यानी यह सभी औषधि साइड इफे़क्ट के कारण बन सकते हैं और कृत्रिम या आधुनिक दवाओं के साथ इंटरैक्ट कर सकते हैं, मगर आयुष मंत्रालय ने तो इसे लम्बे समय के लिए बिना डॉक्टर के सलाह लिए रेकमेंड कर दिया है.

निष्कर्ष

हम अपनी प्राकृतिक या सामान्य इम्यूनिटी को संतुलित भोजन और आदतों के ज़रिए संतुलित कर सकते हैं वहीं इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने के लिए कोई भी जादुई गोली या काढ़ा नहीं है. ’इम्यूनिटी बूस्टर’ शब्द का कोई भी चिकित्सा विज्ञान का आधार नहीं है लेकिन फिर भी आयुष मंत्रालय और कई एक ही तरह की मीडिया इसे व्यापक तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं. बाजार में खाखरा और ब्रेड से लेकर शर्ट और बिस्तर तक कोविड-19 के इम्यूनिटी बूस्टर होने का दावा करने में लगे हैं. ये सभी सबसे जरूरी और प्रमाणित बचाव, जैसे सोशल डिस्टेंसिंग, लगातार मास्क पहनना और हाथ धोना जैसे उपायों से ध्यान भटकाने का काम करते हैं.

आयुष मंत्रालय ने बिना जांच और लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखे आयुष क्वाथ जैसे फ़ाॅर्मुलेशन के बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए प्रमोशन किया. ऐसा लगता है जैसे यह कोविड-19 जैसे बीमारियों में बिना किसी आधार के इम्यूनिटी बूस्टर लाने के खतरों से अनजान है, जहां अत्यधिक सक्रिय रोग इम्यूनिटी लोगों की जान ले रही है. आयुष क्वाथ का दीर्घकालिक उपयोग स्वस्थ लोगों में भी कई तरह के साइड इफ़ेक्ट्स पैदा कर सकता है.

यह साफ़ है कि इन औषधियों को लेने से इम्यूनिटी बूस्टिंग या कम करने में मदद मिलती है, ऐसा दावा पक्के तौर पर नहीं किया जा सकता. विशिष्ट दवाईयों ने भी शोध में ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिया जिससे कोविड-19 मरीजों पर असर या स्वस्थ लोगों के इससे सुरक्षित होने का दावा साफ़ हो. इसके साथ ही, क्योंकि कोविड-19 के मरीज़ों में सैद्धांतिक रूप से इम्यूनिटी बूस्टिंग नहीं की जानी चाहिए, आयुष क्वाथ या काढ़ा से इम्यूनिटी मज़बूत होने वाला दावा मरीज़ों को हानि पहुंचा सकता है. क्योंकि काढ़े या क्वाथ से मरीजों को लाभ होने का कोई साक्ष्य नहीं है, इसलिए इन्हें प्लेसिबो रिलीफ़ की श्रेणी में रखते हुए केवल गले की ख़राश आदि में ‘फ़ील गुड’ वाले गर्म पेय की तरह ही लिया जा सकता है.

रेफ़रेन्स

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[अपडेट: इस आर्टिकल का FI बदला गया है मतलब सोशल मीडिया पर इस आर्टिकल के साथ जो तस्वीर दिखती है उसे बदला गया है. पहले के FI पर आपत्ति जताए जाने के बाद इसे बदला गया है. हालांकि हम ये स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि पहले की तस्वीर सिर्फ एक रिप्रजेंटेटिव इमेज थी, इसका किसी कंपनी या संगठन से कोई संबंध नहीं था.]
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