भारत में इमरजेंसी के बाद प्रेस की आज़ादी पर हुए शायद सबसे क्रूर हमले में, 10 अक्टूबर को दिल्ली में कई पत्रकारों को अपना काम करने से रोका गया और हिरासत में ले लिया गया. पुलिस की ये ज़्यादती पागलपन की हद तक थी.

पत्रकारों के कपड़े खींचकर उन्हें धक्का दिया गया और उनके साथ बदसलूकी की गई; उनके फ़ोन छीन लिए गए और पुलिस की कार्रवाई का फ़ुटेज डिलीट करने के लिए उन पर दबाव डाला गया. कुछ पत्रकारों को विरोध-प्रदर्शन वाली जगह से कई किलोमीटर दूर से उठा गया; वहीं कुछ को तब भी हिरासत में ले लिया गया जब उनके पास प्रेस ID कार्ड थे और वे बार-बार खुद को पत्रकार बता रहे थे. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में स्वतंत्र और मेनस्ट्रीम मीडिया आउटलेट्स के पत्रकारों के ख़िलाफ़ ये सख़्त कार्रवाई एक ऐसी सरकार के दौर में हुई, जिसके प्रधानमंत्री ने पिछले 12 सालों में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है.

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने वामपंथी विचारधारा वाले छात्र समूहों और संगठनों के साथ मिलकर 10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था. वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग कर रहे थे और आरोप लगा रहे थे कि मतदाता सूची के ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) में गड़बड़ी की गई है. उन्होंने चुनाव आयोग पर वोटर लिस्ट में हेरफेर करने का आरोप लगाया और इस प्रक्रिया को वापस लेने की मांग की.

सुबह-सुबह ही, कई स्वतंत्र मीडिया आउटलेट्स के पत्रकारों को जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही हिरासत में ले लिया गया. ‘स्क्रॉल’ के रिपोर्टर आयुष तिवारी सुबह करीब 10 बजकर 45 बजे दीन दयाल उपाध्याय रोड पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) दफ़्तर के बाहर लगभग 50-60 प्रदर्शनकारियों के समूह की कवरेज कर रहे थे, तभी दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.

आयुष तिवारी ने बताया, “पुलिस मौके पर पहुंची और कुछ देर तक इन लोगों का पीछा करती रही. पुलिस लगातार उनके पीछे-पीछे चल रही थी. वहां लगभग 50 से 60 प्रदर्शनकारी और उतने ही पुलिसकर्मी थे. फिर एक सीनियर पुलिस अधिकारी आया और बोला, ‘तुम लोग इन्हें हिरासत में क्यों नहीं ले रहे? बस इन्हें उठा लो.’ इसके कुछ ही मिनटों बाद उन्होंने उन्हें हिरासत में लेना शुरू कर दिया और उनमें से करीब 20-30 लोगों को एक बस में बिठाया गया, जिसमें ‘इंडिया टुडे’ का एक पत्रकार भी शामिल था. मैंने देखा कि उसने पुलिस वाले को अपना प्रेस कार्ड दिखाया, लेकिन इससे पहले कि वो बाहर निकल पाता, बस चल पड़ी.”

इसके बाद प्रदर्शनकारी वहां से लगभग 100 मीटर दूर, CPI(M) के दफ़्तर ‘HKS सुरजीत भवन’ के बाहर चले गए, जहां वे नारेबाज़ी करते रहे. जबकि दिल्ली पुलिस के जवान उनसे लगभग 40 मीटर की दूरी पर खड़े थे. आयुष तिवारी ने कहा कि नारे अपमानजनक नहीं थे. हालांकि, ज़ल्द ही पुलिसकर्मियों का एक बड़ा दल वहां पहुंचा और प्रदर्शनकारियों पर हमला करने लगा, जिनमें से कई लोग लोहे के गेट से होते हुए इमारत के अंदर भाग गए.

आयुष तिवारी घटनाक्रम को रिकॉर्ड कर रहे थे, तभी एक पुलिस अफ़सर ने अन्य को उन्हें भी हिरासत में लेने का निर्देश दिया. उन्होंने बताया, “एक समय ऐसा आया जब पुलिस मेरे दाईं ओर थी और प्रदर्शनकारी बाईं ओर, मैं उनके बीच फंस गया था. जब मैं वीडियो बना रहा था, तो एक पुलिसकर्मी ने कहा, ‘इसे घसीटकर ले जाओ, इसे भी ले जाओ.’ मैंने हर समय अपना प्रेस कार्ड पहन रखा था, और मैं चिल्लाया, ‘मैं एक पत्रकार हूं; मुझे जाने दो.’ उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी; उन्होंने मुझे ज़ोर से धक्का दिया. मैंने भी विरोध किया, जिससे मेरी कमर पर खरोंच आ गई और मेरी शर्ट पूरी तरह फट गई.”

आयुष तिवारी को लगभग 10 अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ एक बस में ले जाया गया. उन्हें बताया गया कि उन्हें सराय रोहिल्ला ले जाया जा रहा है, लेकिन बस ट्रैफ़िक के कारण धीरे-धीरे चल रही थी. जब बस पहाड़गंज पुलिस स्टेशन के बाहर पहुंची, तो बाहर मौजूद लोगों ने अंदर वालों को सचेत किया कि गाड़ी से धुआं निकल रहा है. प्रदर्शनकारी पुलिस पर चिल्लाने लगे और चेतावनी दी कि अगर आग लग गई तो उनकी जान जा सकती है. आयुष तिवारी ने कहा, “प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों पर चिल्लाने लगे और कहने लगे, ‘हमें जाने दो, नहीं तो हम मर जाएंगे. आग लग जाएगी.'”

आख़िरकार पुलिस ने दरवाज़े खोले और हिरासत में लिए गए लोगों को पहाड़गंज पुलिस स्टेशन के बाहर उतरने दिया. आयुष तिवारी वहां से जाने लगे, लेकिन एक पुलिस अफ़सर ने उन्हें वापस अंदर बुलाया. उन्होंने आने से इनकार किया और अफ़सर से कहा कि उन्हें घसीटकर अंदर ले जाना होगा. एक अफ़सर को चुनौती देने के बाद, पुलिसकर्मी ने हार मान ली और उन्हें जाने दिया.

पूरे दिन, पुलिस ने पत्रकारों की पहचान बताने के बावजूद उन्हें हिरासत में लेने के लिए बल का इस्तेमाल किया. ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ की पत्रकार अनुष्का भारद्वाज ने जब हिरासत में लिए जाने का विरोध किया, तो उन्हें उनके बैग और कपड़ों से खींचकर ले जाया गया. बाद में मिली जानकारी के मुताबिक, पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बताने के बाद पुलिस ने उन्हें पहले तो जाने दिया था. लेकिन वही पुलिसकर्मी बाद में वापस आए और उनसे कहा, “बहुत हो गया तेरा, बहुत देर से पत्रकार-पत्रकार कर रही है,” और फिर उन्हें खींचकर ले गए. उन्होंने बताया, “मेरी शर्ट ऊपर खिंचती जा रही थी. उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं थी.”

दोपहर करीब 1 बजकर 14 मिनट पर, ‘स्क्रॉल’ की एडिटर सुप्रिया शर्मा ने X पर पोस्ट किया कि उनके साथी पत्रकार शोएब दानियाल को दक्षिण दिल्ली के एक इलाके में हिरासत में ले लिया गया है, जो जंतर-मंतर से लगभग 20 किलोमीटर दूर है.

रिहा होने के बाद दानियाल ने अपने अकाउंट पर लिखा, “दोपहर करीब 1 बजे मैं दक्षिण दिल्ली में अपने घर के बाहर टैक्सी का इंतज़ार कर रहा था. मुझे जंतर-मंतर जाना था, जो वहां से 20 किलोमीटर से ज़्यादा दूर था. पुलिस ने सड़क बंद कर दी थी और मेरे घर के ठीक बाहर एक चेकपोस्ट बना दिया था. वहां एक पुलिसकर्मी खड़ा था, इसलिए मैं उसके पास गया और उससे आम बातचीत करने लगा कि क्या हो रहा है. मैंने उससे पूछा, ‘आपने आज यहां चेकपोस्ट क्यों बनाया है?’ उसे मुझ पर शक हुआ. उसने मेरा बैग तलाशा और मेरे आधार कार्ड की फ़ोटो खींची. उसने मेरा पता भी नोट किया. आख़िरकार, उसने कहा कि वो मुझे हिरासत में ले रहा है.”

उन्होंने बताया कि पुलिस ने पहले उनसे कहा था कि उन्हें CR पार्क पुलिस स्टेशन ले जाया जाएगा, लेकिन इसके बजाय उन्हें वहां खड़ी एक बस में बिठा दिया गया. उन्होंने बस के अंदर से पुलिसकर्मियों के कई वीडियो रिकॉर्ड किए थे. उन पर फ़ुटेज डिलीट करने का दबाव डाला गया.

दिल्ली के INA मार्केट इलाके से रॉयटर्स के पत्रकार सौरभ शर्मा को भी हिरासत में लिया गया. जंतर-मंतर तक न पहुंच पाने के बाद प्रदर्शनकारी दिन में बाद में यहीं जमा हुए थे. आरोप है कि बिना नेम-टैग वाले दिल्ली पुलिस के एक नकाबपोश अधिकारी ने उन्हें “घसीटा और लात मारी.”

 

डिजिटल आउटलेट ‘मोलिटिक्स’ के एक पत्रकार को बस में बिठाने से पहले धक्का-मुक्की का शिकार होना पड़ा. ये सब तब हुआ जब पुलिस अधिकारियों को पता था कि उन्हें रिकॉर्ड किया जा रहा है और आस-पास मौजूद कई लोग ये सब देख रहे हैं.

न्यूज़लॉन्ड्री के रिपोर्टर अश्विन कुमार सिंह, आस्था सव्यसाची और अनमोल प्रीतम के साथ-साथ एक इंटर्न, अंशु को भी हिरासत में लिया गया.

न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने उनके रिपोर्टर अनमोल और अंशु के फ़ोन ज़ब्त कर लिए, जबकि अश्विन को धक्का दिया गया और उनका फ़ोन छीन लिया गया. ये तीनों डिवाइस न्यूज़ आउटलेट के थे. जब पत्रकारों ने अपनी पहचान प्रेस के सदस्यों के तौर पर बताई, तो कथित तौर पर उनसे कहा गया, “कोई मीडिया नहीं है” उन्हें उत्तरी दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम ले जाया गया और बाद में रिहा कर दिया गया.

मेनस्ट्रीम मीडिया आउटलेट्स के लिए काम करने वाले कई पत्रकारों को भी हिरासत में लिया गया. नवभारत टाइम्स के एडिटर आशीष पांडे ने X पर लिखा कि उनके दो पत्रकारों, ऋतिक जोशी और राहुल चरस को विरोध प्रदर्शन की कवरेज के दौरान हिरासत में ले लिया गया, जबकि वे अपने प्रेस आईडी कार्ड पहने हुए थे. आशीष पांडे ने लिखा, “उन्होंने राहुल के साथ भी बदसलूकी की,” और बताया कि दोनों पत्रकारों को दरियागंज ले जाया जा रहा था. बाद में दोनों को रिहा कर दिया गया.

बूमलाइव के एडिटर जेन्सी जैकब ने भी ट्वीट किया कि उनकी रिपोर्टर जागृति त्रिशा को हिरासत में ले लिया गया और उनका जागृति से संपर्क टूट गया है क्योंकि उनका फ़ोन ले लिया गया था.

इंडिया टुडे के डिजिटल वीडियो और मीडिया ब्रांड ‘Mo’ के क्रिएटर शिवांग शुक्ला को भी हिरासत में लिया गया. उन्होंने खुद अपनी हिरासत का वीडियो बनाया. फ़ुटेज में दिख रहा है कि रिपोर्टिंग करते समय उन्हें धक्का देकर बस में चढ़ाया जा रहा है, जबकि वो बार-बार खुद को पत्रकार बता रहे हैं और पुलिस से कह रहे हैं कि वो इंडिया टुडे से हैं. वीडियो में शिवांग शुक्ला कहते हैं, “मुझे धक्का दिया गया, पीटा गया और इस बस में ले जाया गया.”

 

 

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दूसरे शहरों में पत्रकारों को हिरासत में लिया गया

दिल्ली में हो रहे प्रदर्शन के समर्थन में देश के कई शहरों, जैसे मुंबई, पुणे और बेंगलुरु में भी विरोध प्रदर्शन हुए. अहमदाबाद में, ‘ऑल्ट न्यूज़’ की सीनियर रिपोर्टर किंजल को पुलिस ने हिरासत में ले लिया और तीन घंटे से ज़्यादा समय तक रोके रखा.

किंजल ने बताया: “सादे कपड़ों में एक पुलिस अधिकारी ने एक महिला पुलिस अधिकारी से मेरा आईडी कार्ड चेक करने के लिए कहा. मैंने उन्हें अपना आईडी कार्ड दिखाया, लेकिन मैंने उनसे ये भी पूछा कि वे सादे कपड़ों में क्यों हैं और इतने सारे पुलिस अधिकारी सादे कपड़ों में क्यों हैं. इसके बाद, वे थोड़ा आगे बढ़े और फिर उन्होंने दो-तीन महिला अधिकारियों को मेरे पास भेजा और कहा, ‘इसे पकड़ो और बिठा दो.’ उन अधिकारियों ने मेरी कोई बात नहीं सुनी. उन्होंने बस मेरा हाथ पकड़ा और मुझे वैन में बिठा दिया. मैं उन्हें समझाने की कोशिश करती रही और बताती रही कि मैं एक मीडियाकर्मी हूं, लेकिन उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी.”

नीचे दिया गया वीडियो किंजल ने पुलिस की गाड़ी के अंदर से शूट किया था.

इसके बाद किंजल को 22 अन्य लोगों के साथ रात करीब 8 बजे सरखेज पुलिस स्टेशन ले जाया गया. इस दौरान उनके पास प्रेस कार्ड था. आखिरकार उन्हें रात करीब 9 बजकर 30 मिनट पर रिहा किया गया.

‘स्क्रॉल’ की पत्रकार दिव्या अश्लेषा को पुणे के शनिवार वाडा से दोपहर करीब 3 बजकर 30 मिनट पर हिरासत में लिया गया. ‘स्क्रॉल’ पर छपी उनकी अपनी रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने उन्हें दो बार दूसरे प्रदर्शनकारियों के साथ बस में खींचने की कोशिश की. “मैं चिल्लाती रही कि मैं एक रिपोर्टर हूं. मैंने उन्हें अपना प्रेस कार्ड दिखाया. किसी के दखल देने पर पुलिस ने मुझे दूसरी बार जाने दिया. लेकिन फिर, क्योंकि मैं वहां तस्वीरें लेती रही, उन्होंने कहा: ‘बस अंदर आ जाओ. तुम ये इलाका छोड़कर नहीं जा सकतीं. हम तुम्हें अपने साथ ले जा रहे हैं.'”

उन्हें लश्कर पुलिस स्टेशन ले जाया गया, जो वहां से लगभग 4 किलोमीटर दूर है. वहां, एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने उनसे कहा कि उन्हें “ग़लती से” हिरासत में लिया गया था.

किसी भी काम कर रहे लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों के साथ ऐसा बर्ताव नहीं किया जाता कि उन्हें पकड़ लिया जाए, उनके साथ बदसलूकी की जाए, उनसे उनके डिवाइस छीन लिए जाएं या फ़ुटेज डिलीट करने के लिए धमकाया जाए. 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुई घटनाओं ने उस बात को फिर से साबित कर दिया जो पहले से ही साफ थी — कि सत्ता को जवाबदेह ठहराने, सरकारी कार्रवाइयों पर सवाल उठाने या उसके दावों की पड़ताल करने वाली पत्रकारिता को उचित जगह देने के लिए सरकार तैयार नजर नहीं आती.

यह कार्रवाई एक और वजह से बेहद महत्वपूर्ण थी. पिछले एक साल में स्वतंत्र समाचार संगठनों द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर लगातार की गई रिपोर्टिंग ने मतदाताओं के नाम हटाए जाने, प्रक्रियात्मक अपारदर्शिता और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर इसके परिणामों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. पत्रकारों ने ज़मीनी स्तर पर इस प्रक्रिया के प्रभाव को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और उन पहलुओं को सामने लाया है जिन्हें आधिकारिक बयान और आंकड़े अक्सर अनुत्तरित छोड़ देते हैं. ‘द इंडियन एक्सप्रेस‘ की हालिया पड़ताल ने निर्वाचन आयोग और SIR प्रक्रिया की जांच-पड़ताल को और तेज़ कर दिया, जिससे व्यापक आलोचना शुरू हुई और 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शन को संगठित करने में मदद मिली. ऐसे में पत्रकारों को हिरासत में लेना, इस परेशान करने वाली आशंका को जन्म देता है कि सिर्फ अपना काम करने की वजह से प्रेस को ही निशाना बनाया जा रहा है.