10 और 11 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली और अन्य शहरों में चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ियों को लेकर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग के साथ प्रदर्शन हुए. इस दौरान प्रदर्शनस्थलों पर रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकारों को घसीटा गया, हिरासत में लिया गया, उनके फोन छीने गए और प्रोटेस्ट संबंधी फुटेज डिलीट करने को कहा गया. पुलिस पर पत्रकारों के प्रति देखे गए इस रवैयों को लेकर प्रेस क्लब इंडिया, दिल्ली ने 13 अक्टूबर को मीटिंग आयोजित की और एक शांति मार्च भी निकाला.

बहरहाल, पत्रकारों के शांति मार्च के दौरान भी पुलिस बल द्वारा लगातार ये घोषणा होती रही कि इलाके में ‘धारा 163 लागू होने के कारण सभी वहां से चले जाए और शांति बनाए रखे’.

प्रेस क्लब में मीटिंग के दौरान स्क्रॉल के पत्रकार आयुष तिवारी, द क्विंट के सार्थक जायसवाल, न्यूज़लॉन्ड्री के रिपोर्टर आस्था सव्यसाची और अनमोल प्रीतम, अजित अंजुम, द हिन्दू से सुहासिनी, द कारवां के रयान थॉमस ने अपने और अपने साथियों के साथ हुए दिल्ली के पुलिस के दुर्व्यवहार की जानकारी दी थी. ऑल्ट न्यूज़ ने पत्रकारों पर रिपोर्टिंग के दौरान हुए हमले के बारे में ये खबरें पब्लिश की थी:

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“प्रेस को डराने और उस पर दबाव बढ़ाने की एक सुनियोजित कोशिश”

पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने प्रेस क्लब में हुई मीटिंग के दौरान पत्रकारों पर हुए हालिया पुलिस हमले की निंदा की और कहा, “विरोध प्रदर्शनों की कवरेज के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लेना और उनके साथ बदसलूकी करना प्रेस की स्वतंत्रता पर बढ़ते दबाव को दिखाता है. खास तौर पर युवा, डिजिटल और सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया जा रहा है. पत्रकारों के साथ हुई कार्रवाई महज संयोग नहीं, बल्कि प्रेस को डराने और उस पर दबाव बढ़ाने की एक सुनियोजित कोशिश का हिस्सा है.”

डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म द वायर के फाउंडींग एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मौके पर कहा, “सरकार पहले टीवी चैनलों और अखबारों पर दबाव बनाकर मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश करती रही है, जबकि डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण के लिए IT नियमों का इस्तेमाल किया गया. अब पत्रकारों को हिरासत में लेने, कैमरों की रिकॉर्डिंग रोकने और पुलिस के जरिए दृश्य छिपाने जैसी कार्रवाइयां प्रेस की स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ाने का संकेत देती हैं. हर तरीके से कोशिश की जा रही है कि प्रदर्शन के दौरान क्या हो रहा है, उसकी तस्वीरें और वीडियो देश की जनता तक न पहुंचें.”

“ये गुजरातीफीकेशन और कश्मीरीलाइज़ेशन है मीडिया का…पत्रकारों को दुश्मनों की तरह माना जाता है.”- राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा, “ये गुजरातीफीकेशन और कश्मीरीलाइज़ेशन है मीडिया का. गुजरात में लंबे समय से क्या हुआ, साल 2015 में पाटीदार आंदोलन के बाद से ही सेक्शन 144 नियमित रूप से हर 6 महीने में आगे बढ़ाई जाती है. वहां पत्रकारों को काफी दिक्कतों का सामना करता पड़ता है. दिल्ली में कुछ मायनों में हालत बेहतर है. कश्मीर की स्थिति तो इससे भी ज़्यादा खराब है. इतने सालों में गुजरात और कश्मीर में जो हुआ अब ये दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. और अब ये हाल देश के अन्य जगहों में भी फैल गया है.”

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष संगीता बरुआ पिशारोटी ने कहा, “PIB कार्ड्स मांग रहे हैं, PIB कार्ड्स होते क्या है? PIB कार्ड्स ये होते है कि मंत्रालयों में जाने के लिए सिक्युरिटी क्लीयरंस के लिए मांगे जाते हैं. तो सड़कों पर चलने के लिए आपको PIB कार्ड्स चाहिए?”

“हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि ये मदर ऑफ ऑल डेमोक्रेसी’ है, तब तो और भी आपको नहीं करना चाहिए. आप तो माँ पर वार कर रहे हैं क्या?”